Saturday, 28 March 2020

रह्यूमेटाॅयड आर्थराइटिस के मरीज अधिक सर्तकता बरतें

कोरोनावायरस (कोविड -19) के मौजूदा प्रकोप के मद्देनजर आर्थोपेडिक चिकित्सा विशेषज्ञों ने रह्युमेटाॅयड आर्थराइटिस (गठिया) के मरीजों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी है क्योंकि गठिया जैसे रह्युमेटिक रोगों से ग्रस्त लोगों में संक्रमण होने और अधिक गंभीर संक्रमण होने का अधिक खतरा होता है। 
नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन एवं आर्थराइटिस केयर फाउंडेशन (एसीएफ) के अध्यक्ष डा. (प्रो.) राजू वैश्य ने आज बताया कि गठिया जैसी रह्यूमेटोलाॅजी से संबंधित बीमारियों के जो मरीज हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन या अन्य स्टेराॅयड, बाॅयोलाॅजिक्स या जैनुस किनासे (जेएके) इनहिबिटर्स जैसी दवाइयां ले रहे हैं उनमें रोग प्रतिरोधक (इम्युन) क्षमता कम हो जाती है। इन दवाइयों का उपयोग जोड़ों में दर्द एवं सूजन को कम करने के लिए होता है। यही नहीं, जिन मरीजों में रह्युमेटाॅयड रोग का समुचित तरीके से नियंत्रण नहीं किया गया है उनमें भी संक्रमण से लड़ने की क्षमता कम होती है और साथ ही साथ उनमें रह्युमेटाॅयड आर्थराइटिस की सभी तरह की समस्याएं उत्पन्न हो जाती है।



नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन एवं आर्थराइटिस केयर फाउंडेशन (एसीएफ) के अध्यक्ष डा. (प्रो.) राजू वैश्य ने आज बताया कि  अगर रह्युमेटाॅयड के मरीजों में अचानक ही स्टेराॅयड की खुराक कम कर दी जाए या बंद कर दी जाए तो यह उनके लिए खतरनाक साबित हो सकता है। ऐसे में मरीजों को चिकित्सक से समुचित परामर्श करना चाहिए और अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए चिकित्सक की सलाह का पालन करना चाहिए।


Dr. (Prof.) Raju Vaishya


डा. (प्रो.) राजू वैश्य, अध्यक्ष, आर्थराइटिस केयर फाउंडेशन (एसीएफ) 


अमरीका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केन्द्र (सीडीसी) के अनुसार प्राप्त आकडों के अनुसार अनेक देषों में कोविड - 19 के कारण अस्पताल में भर्ती होेने वाले मरीजों को क्लोरोक्वीन या हाइड्रोसी क्लोरोक्वीन दिया जा रहा है। ब्रिटेन के नेशनल रह्युमेटाॅयड आर्थराइटिस सोसायटी (नार्स) के अनुसार हालांकि क्लोरोक्वीन एवं हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन काफी हद तक सुरक्षित हैं लेकिन लंबे समय इन दवाइयों के सेवन के कारण लीवर एवं किडनी के मरीजों में कार्डिएक विषाक्तता के दुष्प्रभाव तथा रोग प्रतिरक्षण क्षमता में कमी जैसी समस्याएं प्रकट हुई हैं। इसके अलावा अभी तक कोरोनावायरस के संक्रमण भी प्रकट हुए हैं। इसके अलावा अभी तक ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिले हैं जिसके आधार पर कोरोनावायरास के संक्रमण के उपचार के लिए हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन के उपयोग, उसकी खुराक की मात्रा और अवधि के बारे में कोई दिशा निर्देशा दिया जा सके। इसके अलावा कोविड-19 के उपचार के लिए हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन की समुचित खुराक एवं अवधि के बारे में कोई भी वैज्ञानिक आंकड़ा नहीं है।
गौरतलब है कि हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन एवं क्लोरोक्वीन का उपयोग मलेरिया एवं रह्युमेटाॅयड आर्थराइटिस जैसी सूजन पैदा करने वाली कुछ बीमारियों में होता रहा है। इस समय कोरोना वायरस के इलाज में क्लोरोक्वीन एवं हाइड्राक्सी क्लोरोक्वीन का उपयोग हो रहा है और इन दवाइयों की कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी होने की भी खबर है।
डा. (प्रो.) राजू वैश्य ने कहा कि हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है और इसके कई दुष्प्रभाव होते हैं जिनमें मतली, पेट में एंठन और डायरिया आदि शामिल हैं। इसकेे गंभीर दुष्प्रभावों में आंखों पर प्रभाव (रेटिनोपैथी) और हृदय पर प्रभाव शामिल है। हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन का दुष्प्रभाव बच्चों पर भी देखा गया है इसलिए मौजूदा समय में कोरोना वायरस के संक्रमण के इलाज एवं रोकथाम के लिए किसी को भी चिकित्सक के परामर्श के बिना हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन का उपयोग नहीं करना चाहिए। 


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बच्चों को कोरानावायरस के संक्रमण से दूर रखने के लिए स्कूल दे रहे हैं टिप्स


नोवेल कोरोनावायरस के प्रकोप को फैलने से रोकने के लिए पूरे देश में 21 दिनों के लिए लॉकडाउन किया गया हैै। प्रधानमंत्री ने लोगों को इस दौरान घर में ही रहने की सलाह दी है। ऐसे में माता—पिता के सामने दोहरी चुनौती है कि उन्हें खुद को बाहर निकलने से रोकना है और साथ ही साथ अपने बच्चों को घर में ही रहने के लिए समझाना है।
स्कूल बंद होने पर बच्चे चाहते हैं कि वे घर के बाहर जाकर दोस्तों के साथ मस्ती करें। उन्हें यह देखकर अजीब लग सकता है कि जब स्कूल बंद है तो उन्हें खेलने के लिए घर से बाहर नहीं जाने दिया जा रहा है या मम्मी – पापा उन्हें लेकर घूमने के लिए बाहर नहीं जा रहे हैं। अगर बच्चे बाहर खेलने जाने की जिद करें और माता-पिता उन्हें बाहर जाने से मना करें तो वे गुस्से में आ जाते हैं। ऐसे में बच्चों को प्यार से समझाना जरूरी है।
माता—पिता इस समस्या का सामना कैसे करें इसके लिए स्थित द विजडम ट्री स्कूल की ओर से माता—पिता को वाट्सअप और सोशल मीडिया के जरिए वीडियो एवं अन्य जानकारियां भेजकर उन्हें समझा रहा है।
इस पहल को शुरू करने वाले स्कूल नौएडा स्थित द विजडम ट्री स्कूल के अध्यक्ष के के श्रीवास्ता ने इस मौके पर कहा कि हालांकि आज सबके सामने खासकर माता—पिता के सामने मुश्किल वक्त है लेकिन इस वक्त का लाभ उठाकर माता—पिता बच्चों को ड्राइंग बनाने, घर के समान से खिलौने और मॉडल बनाने, डांस — म्यूजिक सिखने, अच्छी किताबें पढ़ाने आदि वैसे काम में वयस्त रख सकते हैं जिनसे बच्चों का कुछ सीखें भी और उनका मनोरंजन भी हो।


श्री के के श्रीवास्तव ने उम्मीद जताई की लाकडाउन की अवधि पूरा होने तक देश में सबकुछ सामान्य हो जाएगा। यह धैय और संयम रखने का समय है। 


द विजडम ट्री स्कूल की प्रिसिपल सुनीता ए शाही ने माता—पिता को यह भी सलाह दी है कि बच्चों को घर से बाहर जाने से रोकने के लिए उनके मन में कोरोना वायरस को लेकर अतिरिक्त भय पैदा नहीं करें बल्कि उन्हें सही जानकारी दें। बच्चे को कोरोना वायरस के खतरों के बारे में आसान शब्दों में प्यार से बताएं कि वायरस कैसे फैलता है और इसके खतरे को कैसे कम कर सकते हैं जैसे कि हाथ धोते हुए उन्हें ढेर सारे बुलबुले दिखाएं। कोरोना वायरस के बारे में बच्चे को बताना जब पूरा हो जाए तो उनसे तुरंत किसी ऐसे टॉपिक पर बात शुरू कर दें जो हल्का-फुल्का हो। बच्चों के साथ ये सभी बातें मुस्कुराहट और हंसी.मजाक के साथ करनी चाहिए या जितना हो सके बातचीत को हल्का रखना चाहिए। इसके अलावा बच्चों को घर पर ही मनोरंजक गतिविधियों एवं घर पर खेले जाने वाले खेलकृकूद में व्यस्त रखें ताकि वे घर से बाहर जाने के बारे में सोचें ही नहीं।


उन्होंने माता-पिता को सलाह दी कि माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को किसी भी संक्रमित व्यक्ति के आस-पास नहीं जाने दें। खांसी-जुकाम और बुखार से पीड़ित लोगों से उन्हें दूर रखें। इसके अलावा माता-पिता को चाहिए कि अपने घर को स्वच्छ रखें और अगर समय हो तो सुबह-शाम पूरे घर को और आसपास की जगह को कीटाणुनाशक से साफ करें। बच्चों के खिलौन भी कीटाणुनाशक से साफ करें। उनके नाखूनों को भी साफ रखें क्योंकि उसमें छिपे वायरस बच्चे को नुकसान पहुंचा सकते हैं। बच्चों को साबुन-पानी से लगातार हाथ धोना सिखाएं।


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Wednesday, 25 March 2020

वैज्ञानिकों ने जगायी चीते के पुनरुद्धार की उम्मीद


नई दिल्ली, 25 मार्च, 2020 अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के एक संयुक्त अध्ययन में भारतीय वैज्ञानिकों ने भारत से लुप्त हो चुके चीते को दोबारा देश में उसके वन्य आवास में स्थापित करने की संभावनाओं का आकलन किया है। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने जानने का प्रयास किया है कि अफ्रीकी चीता भारतीय परिस्थितियों में किस हद तक खुद को अनुकूलित कर सकता है। शोधकर्ताओं ने इस आनुवांशिक अध्ययन में एशियाई और अफ्रीकी चीतों के विकास क्रम में भी भारी अंतर का पता लगाया है।


इस अध्ययन में कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र (सीसीएमबी), हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने विलुप्त हो चुके भारतीय चीते के स्रोत का पता लगाया है। अध्ययन से पता चलता है कि विकास के क्रम में दक्षिण-पूर्व अफ्रीकी और एशियाई चीता दोनों का उत्तर-पूर्वी अफ्रीकी चीते के बीच विभाजन 100,000-200,000 साल पहले हुआ है। लेकिन दक्षिण-पूर्वी अफ्रीकी और एशियाई चीता एक दूसरे से 50,000-100,000 साल पहले अलग हुए थे।


अध्ययन में शामिल कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के डॉ गाई जैकब्स के अनुसार “यह मौजूदा धारणा के विपरीत है कि एशियाई और अफ्रीकी चीतों के बीच विकासवादी विभाजन मात्र 5,000 वर्षों का ही है।”  हालाँकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में एशियाई और अफ्रीकी प्रजातियों के चीतों के बीच प्रजनन के निर्णय को निर्धारित करने वाले प्रमुख मापदंडों में यह देखना अहम होगा कि चीतों की दोनों आबादी परस्पर रूप से कितनी अलग हैं।


सीसीएमबी के वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ के. थंगराज ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “हमने तीन अलग चीता नमूनों का विश्लेषण किया है; पहला नमूना चीते की त्वचा का था, जिसके बारे में माना जाता है कि उसे 19वीं शताब्दी में मध्य प्रदेश में मार दिया गया था, जो कोलकाता के भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की स्तनपायी गैलरी से प्राप्त किया गया है। दूसरा नमूना मैसूर प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय से प्राप्त 1850-1900 के समय के चीते की हड्डी का नमूना है। जबकि, तीसरा नमूना नेहरू जूलॉजिकल पार्क, हैदराबाद से प्राप्त वर्तमान में पाये जाने वाले एक आधुनिक चीते का रक्त नमूना है। सीसीएमबी की प्राचीन डीएनए सुविधा में दोनों ऐतिहासिक नमूनों (त्वचा और हड्डी) से डीएनए को अलग किया गया है और उसका विश्लेषण किया गया है।”


अध्ययन में शामिल एक अन्य शोधकर्ता डॉ नीरज राय ने बताया कि “हमने इन दो नमूनों के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए और वर्तमान में पाये जाने वाले चीतों के नमूनों को क्रमबद्ध किया है और अफ्रिका व दक्षिण-पश्चिम एशिया के विभिन्न भागों में पाये जाने वाले 118 चीतों के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए का विश्लेषण किया है। डॉ थंगराज ने बताया कि “भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के संग्रहालय से प्राप्त नमूने एवं नेहरू प्राणी उद्यान के आधुनिक नमूने पूर्वोत्तर अफ्रीकी मादा वंश के हैं, जबकि मैसूर के संग्रहालय से प्राप्त नमूने दक्षिण-पूर्वी अफ्रीकी चीतों के साथ घनिष्ठ संबंध दर्शाते हैं।”


चीता, जो बिल्ली की सबसे बड़ी प्रजाति है, की आबादी में लगातार कमी हो रही है। वर्तमान में इन बिल्लियों की सबसे बड़ी आबादी अफ्रीका में पायी जाती है, जिन्हें अफ्रीकी चीता कहा जाता है। दूसरी ओर, सिर्फ ईरान में मात्र 50 एशियाई चीते बचे हैं। लगभग एक दशक से भी अधिक समय से भारत में इस पर विचार किया जा रहा है कि क्या देश में चीतों को पुन: जंगलों में लाना चाहिए! इस अध्ययन में यह जानने की कोशिश की जा रही है कि क्या अफ्रीकी चीता भारतीय परिस्थितियों में खुद को ढाल सकता है। इस वर्ष के आरंभ में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को देश में दक्षिणी अफ्रीकी चीते को अनुकूल आवास में रखने की अनुमति दी थी।


यह अध्ययन सीसीएमबी के अलावा बीरबल साहनी पुरा-वनस्पति विज्ञान संस्थान, लखनऊ, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, युनाइटेड किंगडम, जोहान्सबर्ग विश्वविद्यालय, दक्षिण अफ्रिका, नानयांग टेक्नोलॉजिकल विश्वविद्यालय, सिंगापुर के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है। वैज्ञानिकों ने एशियाई और दक्षिण अफ्रिकी चीतों के विकास क्रम के विवरण को गहराई से समझने के लिए माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए का विश्लेषण किया है। उन्होंने पाया कि क्रमिक विकास के साथ चीतों की ये दोनों आबादी एक-दूसरे से भिन्न होती गईं। यह अध्ययन हाल ही में शोध पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित किया गया है।


सीसीएमबी के निदेशक डॉ राकेश कुमार मिश्र ने कहा है कि यह अध्ययन एशियाई चीतों की आनुवांशिक विशिष्टता स्थापित करने की दिशा में साक्ष्य प्रदान करता है और उनके संरक्षण के लिए प्रयासों में मददगार हो सकता है।


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वैज्ञानिकों ने किया मधुमक्खियों के छत्ते में सुधार, मिलेगा गुणवत्ता पूर्ण शहद


पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत शहद उत्पादन और उसके निर्यात के मामले में तेजी से उभरा है। लेकिन, शहद उत्पादन में उपयोग होने वाले छत्तों का रखरखाव एक समस्या है, जिसके कारण शहद की शुद्धता प्रभावित होती है। भारतीय वैज्ञानिकों ने मधुमक्खी-पालकों के लिए एक ऐसा छत्ता विकसित किया है, जो रखरखाव में आसान होने के साथ-साथ शहद की गुणवत्ता एवं हाइजीन को बनाए रखने में भी मददगार हो सकता है। 


केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन (सीएसआईओ), चंडीगढ़ और हिमालय जैव-संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएचबीटी), पालमपुर के वैज्ञानिकों ने मिलकर मधुमक्खी पालन में उपयोग होने वाले पारंपरिक छत्ते में सुधार करके इस नये छत्ते को विकसित किया है। इस छत्ते की खासियत यह है कि इसके फ्रेम और मधुमक्खियों से छेड़छाड़ किए बिना शहद को इकट्ठा किया जा सकता है।


नये विकसित छत्ते का भीतरी (बाएं) और बाहरी दृश्य (दाएं)


पारंपरिक रूप से हनी एक्सट्रैक्टर की मदद से छत्ते से शहद प्राप्त किया जाता है, जिससे हाइजीन संबंधी समस्याएँ पैदा होती हैं। इस नये विकसित छत्ते में भरे हुए शहद के फ्रेम पर चाबी को नीचे की तरफ घुमाकर शहद प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा करने से शहद निकालने की पारंपरिक विधि की तुलना में शहद सीधे बोतल पर प्रवाहित होता है। इस तरह, शहद अशुद्धियों के संपर्क में आने से बच जाता है और शुद्ध तथा उच्च गुणवत्ता का शहद प्राप्त होता है।


आईएचबीटी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ एस.जी.ईश्वरा रेड्डी ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “इस छत्ते के उपयोग सेबेहतर हाइजीन बनाए रखने के साथ शहद संग्रहित करने की प्रक्रिया में मधुमक्खियों की मृत्यु दर को नियंत्रित कर सकते हैं। इस छत्ते के उपयोग से पारंपरिक विधियों की अपेक्षा श्रम भी कम लगता है। मधुमक्खी-पालक इस छत्ते का उपयोग करते है तो प्रत्येक छत्ते से एक साल में 35 से 40 किलो शहद प्राप्त किया जा सकता है। मकरंद और पराग की उपलब्धता के आधार पर यह उत्पादन कम या ज्यादा हो सकता है। इस लिहाज से देखें तो मधुमक्खी का यह छत्ता किफायती होने के साथ-साथ उपयोग में भी आसान है।”



नये विकसित फ्रेम के कोशों में मधुमक्खियों द्वारा भरा गया शहद, जो मोम (सफेद) से सील है


शहद उत्पादन के मामले में भारत दुनिया में 8वाँ प्रमुख देश है, जहाँ प्रतिवर्ष 1.05 लाख मीट्रिक टन शहद उत्पादित होता है। राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 1,412,659 मधुमक्खी कॉलोनियों के साथ कुल 9,580 पंजीकृत मधुमक्खी-पालक हैं। हालांकि, वास्तविक संख्या बहुत अधिक हो सकती है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 2018-19 में 732.16 करोड़ रुपये मूल्य का 61,333.88 टन प्राकृतिक शहद का निर्यात किया था। प्रमुख निर्यात स्थलों में अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, मोरक्को और कतर जैसे देश शामिल थे।


आईएचबीटी ने खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग(केवीआईसी) के साथ मिलकर मधुमक्खी पालन के लिए कलस्टरों की पहचान की है, जहाँ मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देकर किसानों की आमदनी बढ़ायी जा सकती है। आगामी पाँच वर्षों में हिमाचल प्रदेश में केवीआईसी और मधुमक्खी कलस्टरों के साथ मिलकर आईएचबीटी का लक्ष्य 2500 मीट्रिक टन शहद उत्पादन करने काहै।


वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद से संबद्ध आईएचबीटी अरोमा मिशन, फ्लोरीकल्चर मिशन और हनी मिशन के अंतर्गत मधुममक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए कार्य कर रहा है। इसके तहत प्रशिक्षण एवं कौशल विकास कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं और मधुमक्खी के छत्ते तथा टूल किट वितरित किए जा रहे हैं, ताकि रोजगार और आमदनी के असवर पैदा किए जा सकें।


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बच्चों को कारोना वायरस से डराएं नहीं बल्कि उन्हें जागरूक बनाएं

नौएडा। कोरोना वायरस के प्रकोप ने हर किसी को चिंता में डाल दिया है। माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। नौएडा के उदगम प्री स्कूल की चेयरपर्सन दीपा भारद्वाज सिंह ने कहा कि कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए पिछले कुछ दिनों से स्कूल बंद हैं लेकिन बच्चों को इस अवसर का फायदा उठाना चाहिए और घर में सुरक्षित रहते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस के संक्रमण को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित वे लोग हैं जिनके घर में बच्चे हैं। स्कूल के बंद होने पर बच्चों को घर में रखना आम तौर पर मुश्किल होता है।
सुश्री दीपा भारद्वाज सिंह ने कहा कि कोरोना वायरस की वजह से स्कूल बंद हैं लेकिन बच्चों को घर में रहने को कहा जा रहा है। स्कूल बंद होने पर बच्चे चाहते हैं कि वे घर के बाहर जाकर दोस्तों के साथ मस्ती करें। उन्हें यह देखकर अजीब लग सकता है कि जब स्कूल बंद है तो उन्हें खेलने के लिए घर से बाहर नहीं जाने दिया जा रहा है या मम्मी - पापा उन्हें लेकर घूमने के लिए बाहर नहीं जा रहे हैं। सबलोग घर में रूके हुए हैं। बच्चे अगर बाहर खेलने जाने की जिद करें और माता-पिता उन्हें बाहर जाने से मना करेंगे तो वह चिड़चिड़े हो जाएंगे। ऐसे में उनका साथ देना होगा। ऐसे में बच्चों को प्यार के साथ समझाना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि बच्चों को घर से बाहर जाने से रोकने के लिए कोरोना वायरस को लेकर भय पैदा नहीं करें बल्कि उन्हें सही जानकारी दें। बच्चे को कोरोना वायरस के खतरों के बारे में आसान शब्दों में प्यार से बताएं कि वायरस कैसे फैलता है और इसके खतरे को कैसे कम कर सकते हैं जैसे कि हाथ धोते हुए उन्हें ढेर सारे बुलबुले दिखाएं। कोरोना वायरस के बारे में बच्चे को बताना जब पूरा हो जाए तो उनसे तुरंत किसी ऐसे टॉपिक पर बात शुरू कर दें जो हल्का-फुल्का हो। बच्चों के साथ ये सभी बातें मुस्कुराहट और हंसी.मजाक के साथ करनी चाहिए या जितना हो सके बातचीत को हल्का रखना चाहिए। इसके अलावा बच्चों को घर पर ही मनोरंजक गतिविधियों एवं घर पर खेले जाने वाले खेलकृकूद में व्यस्त रखें ताकि वे घर से बाहर जाने के बारे में सोचें ही नहीं। उन्हें पढ़ने के लिए वैसी किताबें दी जा सकती है जिससे उनका मनोरंजन भी हो और उनका ज्ञानवर्धन भी हो सके।
उन्होंने माता-पिता को सलाह दी कि माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को किसी भी संक्रमित व्यक्ति के आस-पास नहीं जाने दें। खांसी-जुकाम और बुखार से पीड़ित लोगों से उन्हें दूर रखें। इसके अलावा माता-पिता को चाहिए कि अपने घर को स्वच्छ रखें और अगर समय हो तो सुबह-शाम पूरे घर को और आसपास की जगह को कीटाणुनाशक से साफ करें। बच्चों के खिलौन भी कीटाणुनाशक से साफ करें। उनके नाखूनों को भी साफ रखें क्योंकि उसमें छिपे वायरस बच्चे को नुकसान पहुंचा सकते हैं। बच्चों को साबुन-पानी से लगातार हाथ धोना सिखाएं।
उन्होंने उम्मीद जताई की सरकार द्वारा किए जा रहे उपायों से देश जल्द ही कोरोना वायरस के प्रकोप से मुक्त हो जाएगा और जल्द से जल्द देश में सबकुछ सामान्य हो जाएगा।


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कोरोनो वायरस से बचने के क्या है आयुर्वेदिक उपाय

नोवेल कोरोनावायरस (कोविड 19) ने काफी लोगों को संक्रमित किया है। ऐसी स्थिति में, हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वे अधिक से अधिक जानकारियां प्राप्त करें और इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतें। 
कोरोनावायरस मुख्य रूप से फेफड़ों और श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है। अमलकी या अमाला (इम्बलिका आफिसिनालिस), गुडुची/गिलोय (तिनसपोरा कोर्डिफोलिया), नीम (अजाडिरचता इंडिका), कुटकी (पिक्रोरहिजा कुरोआ), तुलसी (पवित्र तुलसी) कुछ ऐसी आयुर्वेदिक जड़ी बूटियाँ हैं जो प्रतिरोधक क्षमता के निर्माण और संक्रमण को रोकने में सहायक हैं। 
प्रत्येक नथुने में तिल के तेल की 2-3 बूंदें डालें और नाक के जरिए सांस लें। इससे न केवल नाक और गले के मार्ग लुब्रिकेट होंगे बल्कि भीतरी म्युकस मेम्ब्रेन भी मजबूत होगा और बाहरी चीजों को बाहर रखने में मदद मिलेगी। 
भय और नकारात्मकता से शरीर की रोग प्रतिरक्षण क्षमता कम होती है। अधिक मानसिक तनाव हमारे पाचन को भी प्रभावित करता है और इस तरह ‘‘अमा’’ का निर्माण होता है। यह विषाक्त चीज है जो कई बीमारियों को पैदा करने के लिए जिम्मेदार है।’’



स्वच्छता बनाए रखना वायरस को शरीर में प्रवेश करने से रोकने का सबसे अच्छा तरीका है। साबुन और पानी से बार-बार हाथ धोएं, सेनेटाइजर का उपयोग करें, छींकते समय नाक को ढंकें और व्यस्त और भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें। घर और वातावरण को कीटाणुओं से मुक्त रखने के लिए घर में अग्निहोत्र/यज्ञ करें या हवन समाग्री (जड़ी-बूटियों का मिश्रण) जलाएं। 
शरीर को किसी भी प्रकार के बाहरी चीजों या किसी बीमारी से लड़ने के लिए मजबूत प्रतिरक्षण क्षमता जरूरी है। कोरोना वायरस मुख्य रूप से फेफड़ों और श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है। रोजाना एक चम्मच च्यवनप्राश खाने से इम्युनिटी बढ़ती है, खासकर फेफड़े और श्वसन प्रणाली की। अमलकी या अमाला (इम्बलिका आफिसिनालिस), गुडुची/गिलोय (तिनसपोरा कोर्डिफोलिया), नीम (अजाडिरचता इंडिका), कुतकी (पिक्रोरहिजा कुरोआ), तुलसी (पवित्र तुलसी) कुछ ऐसी आयुर्वेदिक जड़ी बूटियाँ हैं जो प्रतिरोधक क्षमता के निर्माण और संक्रमण को रोकने में सहायक है। 
आयुर्वेद में, एक अच्छा पाचन या मजबूत पाचन क्षमता रोगों से लड़ने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ताजा अदरक खाना और अदरक की चाय, पुदीने की चाय, दालचीनी की चाय और सौंफ की चाय पीना भी अच्छा होता है।
मसालों का पेय बनाएं
आप यह नुस्खा बना सकते हैं। एक लीटर पानी लें और उसमें एक-एक चम्मच - सौंफ, जीरा, धनिया पाउडर और ताजा कसा हुआ अदरक डालें। कुछ मिनट के लिए सब को एक साथ साथ उबालें, उसे छान लें और एक थर्मस में भर कर रख ले। इसे थोड़़ा-थोड़ा करके दिन भर पीते रहें।
नींबू का गर्म शर्बत 
संतरे, अंगूर, नींबू जैसे खट्टे फल विटामिन सी के समृद्ध स्रोत हैं और इनका सेवन करना अच्छा है। एक कप गुनगुने पानी में आधा नींबू निचोड़ लें और दिन में दो से तीन बार पिएं। गर्म पानी पीना लाभदायक है। यह आपको हाइड्रेट रखने में मदद करता है। 
आयुर्वेद में, नाक, गले, साइनस और सिर के लिए नास्य चिकित्सीय उपचार है। डॉ. 
नथुने में डालें तिल का तेल
प्रत्येक नथुने में तिल के तेल की 2-3 बूंदें डालें और नाक के जरिए सांस लें। इससे न केवल नाक और गले के मार्ग लुब्रिकेट होंगे बल्कि भीतरी म्युकस मेम्ब्रेन भी मजबूत होगा और बाहरी चीजों को बाहर रखने में मदद मिलेगी। 


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