Thursday, 24 June 2021

कोविड - 19 के दौरान फेफड़े के कैंसर

– डा. सुरेंद्र कुमार डबास, वरिष्ठ निदेशक और विभागाध्यक्ष,सर्जिकल ओंकोलाजी और रोबोटिक सर्जरी

डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में फेफड़ों के कैंसर के कारण हर साल लगभग 20 लाख 9 हजार लोगों की मौत हो जाती है। भारत में स्त्रियों और पुरूषों में कैंसर के सभी नए मामलों में से 6.9 प्रतिशत मामले फेफड़ों के कैंसर के होते हैं जबकि कैंसर के कारण होने वाली सभी मौतों में से 9.3 प्रतिशत मौतें फेफड़ों के कैंसर के कारण होती है।

आपके बच्चे के 'पहले हजार दिनों' को मजबूत करने के लिए जरूरी है स्तनपान

— डॉ शाची बवेजा, लैक्टेशन कंसल्टेंट, बाल चिकित्सा विभाग, बीएलके सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल।

किसी भी बच्चे के लिए ʺपहला हजार दिनʺ मां के गर्भधारण करने से लेकर बच्चे के दूसरे जन्म दिन तक का समय होता है। इसमें गर्भावस्था का समय और बच्चे के जीवन के पहले दो साल शामिल होते हैं।

इस अवधि में शरीर और मस्तिष्क दोनों का तेजी से विकास होता है। यह समय काफी महत्वपूर्ण और बच्चे की शारीरिक और मानसिक क्षमता को मजबूत करने वाला होता है, लेकिन साथ ही यह बहुत ही संवेदनशील समय भी होता है क्योंकि अगर चीजों को ठीक से प्रबंधित नहीं किया जाता है, तो इससे दीर्घकालिक परिणाम हो सकते हैं। यह अवधि हमें बच्चों को अधिक स्वस्थ बनाने और एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण करने का अनूठा अवसर प्रदान करती है।

 


लॉकडाउन के बाद जिम में अधिक और कठोर व्यायाम करने से युवाओं में गुर्दे खराब होने का खतरा

जिम धीरे-धीरे अनलॉक 3 में फिर से खुल रहे हैं और लोग महीनों तक घर पर रहने के बाद व्यायाम करने के लिए जिम का रुख कर रहे हैं। लेकिन दिल्ली के एक 18 वर्षीय युवा के जिम में अत्यधिक और कठोर व्यायाम करने के कारण उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड。ने का मामला सामने आया है। 

कोरोना काल में कराएं इंटेलीजेंट हिप सर्जरी

कोरोनावायरस के प्रकोप के कारण आज अलग–अलग बीमारियों के मरीजों का समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है। कोविड -19 से बचने के लिए कई मरीज इलाज के लिए अस्पताल आने में कतराते हैं जबकि कई अस्पतालों में आर्थोपेडिक सर्जरी एवं अन्य सर्जरी टाली जा रही है। यह देखा जा रहा है कि आर्थोपेडिक के मरीजों को सही समय पर समुचित इलाज नहीं मिल पाने के कारण पाने के कारण उनकी बीमारियां एवं विकलांगता बढ रही है। हालांकि कई अस्पतालों में सभी मरीजों का इलाज एवं उनकी सर्जरी सही समय पर समुचित तरीके से करने का इंतजाम किया गया है। इन अस्पतालों में मरीजों को हर तरह से संक्रमण से सुरक्षा प्रदान की जा रही है। यही नहीं आज आर्थोपेडिक चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसी तकनीकों का विकास हुआ है जिनकी मदद से आर्थोपेडिक के मरीजों की सर्जरी पूरी तरह से आसान एवं सुरक्षित हो गई है। इन तकनीकों में से एक तकनीक है इंटेलीजेंट हिप सर्जरी।

पोषण और मात्रा : स्वस्थ भोजन की कला


सेहतमंद और कुशल रहने का मेरा मंत्र हमेशा से यह रहा है कि आप जो भी खाएं वह न तो ज्यादा हो और न ही कम हो। वर्षों से अपनी पुस्तकों में और अपने व्याख्यानों में मैं लगातार इसी बात को दोहराती रही हूं और मैं लगातार इसी बात पर दृढ रही हूं। आपको भोजन की थाली में से किसी खास व्यंजन या खाद्य पदार्थ को प्रतिबंधित करने की जरूरत नहीं है बल्कि जो अच्छा खाद्य पदार्थ है उसे अधिक मात्रा में लें और जो खराब खाद्य पदार्थ है उसे कम मात्रा में लें।

बारिश के मौसम में बीमारियों से बचने के लिए बरतें अधिक सावधानी

 

बारिश का मौसम निश्चित रूप से तेज गर्मी से राहत दिलाता है, लेकिन साथ ही साथ इस मौसम में रोगों से सुरक्षा करने की हमारी क्षमता – इम्युन क्षमता घट जाती है और हमें विभिन्न तरह की संक्रामक बीमारियां होने का खतरा अधिक होता है। साल के इन महीनों के दौरान वायरल संक्रमण, गले में खराश, खांसी और सर्दी जैसी समस्याएं बहुत आम हैं क्योंकि मानसून का मौसम सूक्ष्मजीवों के विकास और प्रजनन के लिए सही जलवायु प्रदान करता है। ऐसी परिस्थितियों में, आपको अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। 

सही प्रोटीन प्रतिरक्षा को बढ़ाता है

 


हमें कितना कार्बोहाइड्रेट और वसा खाना चाहिए इस बात पर हमेशा से विवाद होता रहा है। साथ ही हमारे भोजन में इन दोनों में से कौन बडा खलनायक है इस पर बहस होती है और इस बहस के कारण भोजन में प्रोटीन के महत्व की लोग अनदेखी कर देते हैं जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रोटीन एक अत्यंत महत्वपूर्ण मैक्रो पोषक तत्व है जो हमें स्वस्थ, फिट और रोग मुक्त रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। प्रोटीन टूट कर अमीनो एसिड में बदल जाता है और अमीनो एसिड मांसपेशियों सहित शरीर के सभी ऊतकों के निर्माण के लिए ʺबिल्डिंग ब्लॉक” हैं। प्रोटीन की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। यह हमारे शरीर के द्रव्यमान (मास) या मांसपेशी और मांसपेशियों के द्रव्यमान के रखरखाव में भूमिका निभाता है और मांसपेशियों का द्रव्यमान (मसल मास) हमारे समग्र स्वास्थ्य और हमारे जीवन की गुणवत्ता का एक प्रमुख कारक है। इसके अलावा प्रोटीन हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए भी आवश्यक है।

किसी भी उम्र के लोग हो सकते हैं पीलिया से प्रभावित

पीलिया अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, बल्कि यह किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत है। यह एक ऐसी चिकित्सकीय स्थिति है जो नवजात और वयस्क दोनों को प्रभावित करती है। इसमें आंखों, त्वचा और मूत्र में पीलापन आ जाता है। जब इनमें पीलापन नजर आए तब तत्काल जांच कराना और इसके समाधान के लिए उपाय करना जरूरी है। पीलिया के कई कारण हैं। यह लीवर में सूजन अथवा पित्त की नली में रूकावट के कारण हो सकता है। हम जो कुछ भी खाते हैं या पीते हैं वह हमारे उसे हमारे लीवर द्वारा प्रोसेस किया जाता और प्रोसेस किए जाने की इस प्रक्रिया के दौरान शरीर बेकार एवं विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाल देता है। लेकिन कभी—कभी दूषित भोजन और पानी के कारण लीवर की कार्यप्रणाली बाधित होती है। इसके कारण रक्त में बिलीरूबिन नामक बेकार पदार्थ बनते हैं और जमा होते रहते हैं। इसके कारण मरीज की आंखों, त्वचा एवं मूत्र में पीलापन आता है और मरीज को कई अन्य समस्याएं हो सकती है। ये समस्याएं हैं —

— पेट में दर्द

— खुजली

— भूख में कमी

— वजन घटना

— पीला मल

— गहरे रंग का मूत्र

— बुखार

— थकान

— उल्टी

पीलिया रक्त में बिलीरुबिन की मात्रा में वृद्धि के कारण होता है। लीवर की कार्यप्रणाली के बाधित होने या उसमें खराबी आने पर शरीर में बिलीरुबिन की बहुत अधिक मात्रा जमा हो सकती है। यह शरीर का एक ऐसा रसायन है जो लीवर में  लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने के कारण बेकार पदार्थ के तौर पर बनता है। बिलीरुबिन का सामान्य मात्रा में स्राव होने पर समुचित मेटाबोलिज्म में मदद मिलती है लेकिन अगर इसका उत्पादन अधिक हो तो पीलिया हो सकता है। 

सामान्य पित्त नली में रुकावट के कारण पीलिया हो सकता है। यदि सामान्य पित्त नली सिकुड़ जाए तोए तो बिलीरुबिन युक्त पित्त को बाहर धकेल दिया जा सकता है जिससे बाद में पीलिया हो सकता है। इस तरह की बाधा आमतौर पर तब होती है जब कोई व्यक्ति पित्त की पथरी, अग्नाशय के कैंसर या अग्नाशय में सूजन से पीड़ित होता है।

शिशुओं में पीलिया होने का कारण शारीरिक प्रणालियों का कमजोर होना या उसका विकसित होना है। कमजोर लीवर के कारण बच्चों में जन्म के तीन से चार दिन बाद पीलिया हो सकता है।

पीलिया के प्रकार

पीलिया के 3 विभिन्न प्रकार हैं। किस तरह का पीलिया है या इस बात पर निर्भर है कि किस जगह बिलीरुबिन की समस्या शुरू हुई। 

प्री हेपेटिक जाँडिस — रक्त के लीवर में प्रवेश से पूर्व ही अगर उसमें कोई समस्या हो जाए तो प्री हेपेटिक जाँडिस होता है। अगर रक्त की किसी बीमारी या किसी समस्या के कारण काफी अधिक संख्या में लाल रक्त कोशिकाएं एक बार में ही मर जाती है तब रक्त से जितने बिलीरुबिन को निकाला जाता है उससे अधिक मात्रा में बिलीरुबिन बनता है। 

हेप्टोसेलुलर जाँडिस — यह लीवर की एक समस्या के कारण पैदा होती है। अगर लीवर के उत्तक क्षतिग्रस्त हो जाएं और उसके कारण लीवर ठीक से काम नहीं करेगा और लीवर रक्त से बिलीरुबिन को सही तरीके से शरीर से बाहर नहीं निकाल सकेगा। 

ऑब्सट्रक्टिव जाँडिस — जब पित्त की नलिकाएं अवरुद्ध या क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, तो ऑब्सट्रक्टिव पीलिया होता है। इसमें पित्त आंत में नहीं जा पाता है। 

हेपाटोसेलुलर और ऑब्सट्रक्टिव पीलिया सबसे अधिक कैंसर के मरीजों में होती है। 

पीलिया की जांच 

डॉक्टर मूत्र एवं रक्त परीक्षण कराने की सलाह देंगे ताकि बिलीरुबिन के स्तर का पता लगाया जा सके और लीवर की सेहत का आकलन किया जा सके। डॉक्टर अल्ट्रासाउंड कराने को भी कह सकते हैं। इससे लीवर या पैंक्रियाज मे किसी बीमारी या अवरोध का पता चल सकेगा। कुछ कुछ मामलों मेंए डॉक्टर लीवर रोग की पुष्टि करने के लिए लीवर की बायोप्सी कराने को कह सकते हैं। 

पीलिया का उपचार

उपचार के विकल्प रोग के कारण पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए, हेपेटाइटिस ए होने पर आपको ज्यादा से ज्यादा आराम करने, बहुत अधिक तरल पदार्थ पीने और शराब से बचने को कहा जाएगा। अगर आप वैसी दवाइयां ले रहे हैं जिससे लीवर पर प्रभाव पडता है तो आपको उन दवाइयों का सेवन बंद करने को कहा जाएगा। हेपेटाइटिस बी और सी के लिए प्रभावी दवाएं भी उपलब्ध हैं।

अन्य कारणों के लिए, जैसे पित्त की पथरी, पित्त नली में अवरोध होने या अग्नाशय का कैंसर होने पर डॉक्टर सर्जरी का सुझाव दे सकते है।

पीलिया की रोकथाम

पीलिया का संबंध लीवर की कार्यप्रणाली से है। यह महत्वपूर्ण है कि रोगी संतुलित आहार बनाए रखकर, नियमित रूप से व्यायाम करके और अधिक मात्रा में शराब का सेवन नहीं करके लीवर को स्वस्थ बनाए रख सकता है। 

पीलिया होने पर क्या करें

आराम करें — इस दौरान, रोगी को बिस्तर पर आराम करने की सलाह दी जाती है। पहले कुछ दिनों के लिए आपको तरल आहार का सेवन करने को कहा जाएगा। आमतौर पर, रोग के विभिन्न लक्षणों का इलाज करने के लिए कुछ दवाइयां दी जाती है लेकिन लीवर ठीक से काम करे इसके लिए जरूरी है कि आप खाने—पीने के मामले में डाक्टर के निर्देश का सख्ती से पालन करें। 

भरपूर मात्रा में तरल लें — ज्यादातर बीमारी के समयए रोगी को कुछ भी ठोस चीजें खाने का मन नहीं करता है। ऐसे में, यह सलाह दी जाती है कि वह जितना हो सके उतना तरल का सेवन करें। खूब पानी पियें। यह न केवल आपको हाइड्रेटेड रखता है बल्कि शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में भी मदद करता है। दिन में काफी मात्रा में पानी पियें। साथ ही आप उसमें नींबू या पुदीना भी डाल सकते हैं। दिन भर पानी पीने से आपका इलेक्ट्रोलाइट संतुलन भी बना रहेगा और कमजोरी भी दूर होगी।

फल और सब्जी लें — पीलिया होने पर मरीज को सलाह दी जाती है कि पोषक तत्वों से भरपूर जूस लें। इस तरह की बीमारियों में हमारे पाचन तंत्र को कुछ आराम की आवश्यकता होती है, इसलिए, जटिल खाद्य पदार्थों से बचना फायदेमंद है। संतरे, जामुन, पपीता, सेब जैसे फलों में स्वस्थ पाचन एंजाइम और कुछ महत्वपूर्ण विटामिन जैसे सी, के और बी आदि मौजूद होते हैं। कच्चे केले, ब्रोकोली, गाजर का नियमित रूप से सेवन करने से विष को बाहर निकालने की लीवर की क्षमता बढाने में मदद मिल सकती है। 

नारियल पानी — नारियल पानी में भरपूर मात्रा में पोषक तत्व होते हैं जो लिवर के लिए फायदेमंद होते हैं। यह एंटीऑक्सिडेंट का एक अच्छा स्रोत है जो शरीर की प्रणालियों को नुकसान पहुंचाने वाले मुक्त कणों से लड़ने में मदद करता है। यह न केवल आपकी प्रतिरक्षा को बढ़ाता है बल्कि पीलिया को दोबारा होने से भी रोकता है। यह हाइड्रेशन प्रदान करता है और एक उचित तरल संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।

उपरोक्त सभी खाद्य पदार्थों को अपने आहार में शामिल करें और किसी भी प्रकार के शराब या जटिल खाद्य पदार्थों जैसे भारी क्रीम दूध या रेड मीट से बचें। पीलिया के दौरान कम—कम अंतराल पर हल्का आहार लेने की सलाह दी जाती है। जल्दी ठीक होने के लिए ढेर सारा पानी पिएं और भरपूर आराम करें।


अनियमित जीवनशैली कई बीमारियों की जड़ है

 – डॉ कुशल बनर्जी

स्वस्थ जीवनशैली शरीर को मजबूत रखने में अहम भूमिका निभाती है जबकि अनियमित जीवन शैली के कारण कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। हालांकि हममें से अधिकतर लोगों में अनियमित जीवन शैली के हमारे स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव स्पष्ट रूप से जल्दी सामने नहीं आते हैं‚ लेकिन अनियमित जीवन शैली कई बीमारियों का कारण बन सकती हैं। अनियमित जीवनशैली का अर्थ है सोने, जागने और दिन और रात में भोजन करने का अनियमित समय। इनमें से किसी भी अनियमित जीवनशैली के कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। हालांकि इनमें से कुछ स्वास्थ्य समस्याओं का जल्द पता चल जाने पर उनका प्रबंधन किया जा सकता है।

शरीर का प्राकृतिक सोने-जागने का चक्र, जो सर्कैडियन रिदम के नाम से जाना जाता है, का सूर्योदय, दिन के उजाले, सूर्यास्त और रात के समय जैसी प्राकृतिक घटनाओं से गहरा संबंध है। मानव शरीर ने दिन के दौरान कुछ कार्य करना सीखा है और रात के दौरान कुछ अन्य कार्यों काे करना सीखा है। यह उन विकासवादी प्रक्रियाओं का परिणाम है जो सहस्राब्दियों से चली आ रही हैं। हालांकि, अब हमारी दैनिक दिनचर्या इसके साथ समन्वय स्थापित नहीं कर पाती हैं। इसके कारण, दुनिया भर में, विशेष रूप से शहरी आबादी में खतरनाक संख्या में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो रही हैं। इस रिदम में व्यवधान के कारण कम उम्र में मृत्यु, मोटापा, ब्ल्ड ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म का खराब होना, हाइपोथायरायडिज्म जैसे हार्मोन स्राव का अनियमित होना, हृदय रोग, एंग्जाइटी, डिप्रेशन, पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम जैसी स्त्रीरोग संबंधी समस्याएं, थकान और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

हम में से कई लोग इन बेहद सामान्य परिस्थितियों से पीड़ित हो सकते हैं। हालांकि, हम में से अधिकांश लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि अपनी जीवन शैली में सुधार कर हम इन स्थितियों को प्रबंधित कर सकते हैं या इन्हें पूरी तरह से ठीक कर सकते हैं। वजन कम करने या रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने के लिए हम सख्त आहार पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं लेकिन अनियमित समय पर सीमित या ’स्वस्थ’ भोजन का सेवन करना और देर रात तक जागते रहना इन प्रयासों के लाभों को कम कर सकता है। इसी तरह, व्यायाम से रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर में पर्याप्त कमी नहीं हो सकती है यदि यह सुबह जल्दी जागने और निश्चित भोजन के बीच समन्वय के साथ नहीं किया जाता है। गलत समय में भोजन करने, जैसे शाम पांच बजे भोजन करने से भी बहुत कम फायदा होता है। न केवल भोजन के समय को उनके 'सही' समय पर तय करने की आवश्यकता होती है, बल्कि उन्हें सोने के समय के साथ भी समन्वय करने की आवश्यकता होती है, जो कि वयस्कों के मामले में रात के दस बजे (उदाहरण के लिए) के आसपास होता है। व्यायाम और आहार के बीच बेहतर तालमेल रखने पर बेहतर परिणाम सामने आते हैं और भोजन और सोने के समय को तय करना भी महत्वपूर्ण है। ऐसा करने पर कई बीमारियों से छुटकारा पाने की हमारी संभावनाएं बढ जाती हैं।

इसी तरह, नींद के घंटों (लगभग आठ घंटे) का ध्यान रखना, लेकिन एक निश्चित नींद पैटर्न का पालन नहीं करना या सुबह के शुरुआती घंटों में आठ घंटे की नींद लेना कुछ कम घंटों की नींद की तुलना में अधिक हानिकारक हो सकता है। डॉक्टर अक्सर नींद के घंटों पर अमल करने की सलाह देते हैं, लेकिन मरीजों को यह पता नहीं हो सकता है कि अगर वे विषम ‘घंटे’ जैसे रात के दो बजे से सुबह के दस बजे तक सोते हैं तो निर्धारित घंटों के लाभ बहुत कम हो जाते हैं।

इसी तरह, नियमित जीवन शैली का पालन करके दवाओं के प्रभाव में भी सुधार किया जा सकता है। ऐसे कई नए सबूत उपलब्ध हैं जो यह सुझाव देते हैं कि दवाओं का शरीर द्वारा सबसे अच्छा उपयोग किये जाने और उनके सेवन के लिए सलाह दिये गये समय पर ध्यान देने पर दवाओं के प्रभाव में आश्चर्यजनक रूप से सुधार किया जा सकता है।

हम सभी नियमित जीवनशैली के लाभों के बारे में जानते हैं‚ फिर भी हम सभी के पास नियमित जीवनशैली अपनाने का विकल्प नहीं है। हमारी नौकरियों के लिए हमें पूरी रात जागना पड़ सकता है और दिन के दौरान सोना पड सकता है या ऑफिस जाने के लिए हमें सुबह जल्दी घर से निकलना पड़ सकता है और देर रात तक ही घर वापस आ सकते हैं। इन मामलों में, हमें यह सुनिश्चित करने के लिए प्रयास करना चाहिए कि हमें काम के बाद घर जाने में होने वाली देरी से बचने के लिए कुशलता से अपने समय का उपयोग करना चाहिए। यदि काेई गंभीर स्वास्थ्य समस्या विकसित होती है जिसमें इलाज से भी उम्मीद के अनुसार लाभ नहीं हाे रहा है, तो कुछ समय के लिए काम से छुट्टी लेने या अलग नौकरी की तलाश करने जैसे कठोर उपायों पर भी विचार किया जाना चाहिए। आखिरकार, स्वास्थ्य से महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है, और हम पेशेवर रूप से तभी सफल हो सकते हैं जब हमारे पास स्वस्थ दिमाग और शरीर होगा।

अनियमित जीवनशैली का शिकार होने वाले सबसे कमजोर समूहों में छात्रों की आबादी शामिल है। भारत में, विशेष रूप से, हम पाते हैं कि आठ या नौ वर्ष के बच्चे देर रात तक जागते हैं। कभी-कभी यह पढाई के कारण होता है तो कभी यह परिवार के सदस्यों के साथ समय बिताने के कारण होता है जो काम से देर से लौटते हैं। इस प्रवृत्ति को बदलने के महत्व पर पर्याप्त जोर नहीं दिया जा सकता है। इसके कारण डॉक्टरों को आज पच्चीस साल के रोगियों में भी हृदय की बीमारी का पता लगाने के लिए मजबूर होना पडता है और इसका कारण इस तरह की जीवन शैली है जो आठ या नौ साल की उम्र से ही शुरू हो जाती है। आश्चर्य की बात तो यह है कि माता-पिता भी कभी-कभी ऐसी जीवन शैली के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं। अनियमित जीवनशैली बचपन के मोटापे, बहुत कम उम्र में मधुमेह, हृदय रोग, पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिजीज और कई अन्य बीमारियों के मामलों में तेजी से वृद्धि का एकमात्र सबसे बड़ा कारण हो सकती है। घर का वातावरण ऐसा होना चाहिए जिसमें जल्द सोने, नियमित व्यायाम और निश्चित समय पर भोजन करने के पैटर्न का पालन किया जाता हो। बच्चों को यह महसूस नहीं होने देना चाहिए कि जल्द और निश्चित समय पर सोने पर वे शिथिल हो जाएंगे। वास्तव में, ये प्रथाएं अब स्मृति को बढ़ाने, याददाश्त और एकाग्रता में सुधार करने के लिए जानी जाती हैं जिससे संभावित रूप से शैक्षणिक प्रदर्शन में सुधार होता है।

एक नियमित अनुशासित जीवन शैली की शक्ति को कम मत समझें। हम सभी को इसके मूल्य और इसके लाभों की सराहना करना सीखना चाहिए और उनकी भी सराहना करनी चाहिए जो इनका ध्यान रखते हैं।



डॉ अग्रवाल ग्रुप ऑफ आई हॉस्पिटल के कार्यकारी निदेशक डॉ अश्विन अग्रवाल से ब्लैक फंगस के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी

 

ब्लैक फंगस : क्यों है ज्यादा खतरनाक?

कोविड के मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और कोविड के काफी मरीजों में हाइपरइम्यून प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने के लिए उन्हें स्टेरॉयड दिया जाता है। ये कारक कोविड रोगियों को म्यूकोर्मिकोसिस जैसे फंगल संक्रमण के लिए अतिसंवेदनशील बनाते हैं। ब्लैक फंगस के नाम से जाना जाने वाला यह संक्रमण त्वचा, फेफड़े, आंख, मुंह और मस्तिष्क को प्रभावित करता है। किसी व्यक्ति में यह संक्रमण होने पर, ये फंगस साइनस की ओर बढ़ते हैं। कुछ मामलों में ये साइनस से आंख के आसपास या कुछ मामलों में आंखों में फैल सकते हैं।

म्यूकोर्मिकोसिस का इलाज क्या है?

म्यूकोर्मिकोसिस संक्रमण जब आंखों को प्रभावित करता है‚ तो ऐसे मामले में, इसका इलाज दवाओं या सर्जरी से किया जा सकता है। समय पर या शीघ्र निदान और इलाज से आंखों को और दृष्टि को बचाया जा सकता है।

यह शरीर पर कैसे हमला करता है?

इसके स्पोर नेजल कैविटी में प्रवेश करते हैं। जब रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है तो फंगस तेजी से बढ़ता है और साइनस, ऑर्बिट और ब्रेन को प्रभावित करता है।

दवाएं / उपचार

दिखाई देने में समस्या होने पर किसी को डरना नहीं चाहिए। यहां तक कि दिखाई नहीं देने पर भी, यदि रोगी समय पर नेत्र रोग विशेषज्ञों के पास पहुँच जाते हैं तो चिकित्सक के द्वारा जल्द से जल्द उचित उपचार से दृष्टि को बहुत अच्छी तरह से बचाया जा सकता है।

आंखों को प्रभावित करने वाले म्यूकोर्मिकोसिस संक्रमण के मामले में, इसका इलाज या तो दवाओं से (एंटीफंगल एम्पोटेरिसिन बी) या सर्जरी से किया जा सकता है। फिर भी समय पर या शीघ्र निदान से हमेशा आंख और दृष्टि को बचाया जा सकता है।

कोविड के इलाज में गलतियां किस प्रकार हमें नई महामारी की ओर ले जा रही है?

कोविड रोगियों को स्टेरॉयड और इम्यूनोमॉड्यूलेटिंग दवाओं के उपयोग से बचना चाहिए या इनका इस्तेमाल कम करना चाहिए। जब तक यह बहुत जरूरी नहीं हों, इनका इस्तेमाल करने से बचना चाहिए और इनकी खुराक, समय और अवधि को ध्यान में रखते हुए ऐसी दवाओं का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए। स्टेरॉयड दोधारी तलवार हैं। जब इनका सावधानी से उपयोग किया जाता है तो वे जीवन रक्षक होते हैं और यदि नहीं तो वे नुकसान पहुंचा सकते हैं।

जब रोगी दवा के रूप में स्टेरॉयड ले रहा होते हैं तो उनका रक्त शर्करा बढ़ सकता है, इसलिए रक्त शर्करा पर सख्त नियंत्रण रखना जरूरी है, साथ ही रक्त शर्करा की नियमित जांच कराना भी जरूरी है।



संपूर्ण विकास के लिए योगाभ्यास

 

 – डॉ प्रताप चौहान, निदेशक, जीवा आयुर्वेद 

दीर्घायु जीवन जीने की चाह होना स्वाभाविक है और हमारे आस-पास के लगभग सभी लोग लंबा जीवन जीना चाहते हैं। सदियों से, इसने लोगों को कड़ी मेहनत करने और दीर्घायु के रहस्य का खुलासा करने के लिए प्रेरित किया है। इस उम्मीद में उन्होंने विभिन्न युगों में कई खोजें और आविष्कार किए हैं।

योग क्या है?

योग एक प्राचीन कला और विज्ञान है जिसकी खोज महान संतों ने लंबी आयु और सुख की प्राप्ति के लिए की थी। यह लोगों को जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने और उनके अंतिम लक्ष्य को भी समझने में मदद करता है।
योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द
"युज" से हुई है, जिसका अर्थ है 'संयोजन' या 'मिलन'। सामान्य तौर पर तत्वों का मिलन या संयोजन योग कहलाता है। यह मिलन स्वाभाविक रूप से उनकी संयुक्त शक्ति, महत्व और उपयोगिता को बढ़ाता है।

अलग-अलग परिभाषाएं लेकिन लक्ष्य एक

जीवन के महत्व को समझने के लिए और योग के माध्यम से कोई व्यक्ति जीवन के मुख्य लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर सकता है, यह समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता में अर्जुन को क्या संदेश दिया था।

भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, "योग कर्मसु कौशलम्", जिसका अर्थ है कि कर्तव्यों की पूर्णता योग है।

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ।।50।।

"मन की इस समता से युक्त होकर मनुष्य इस जीवन में पवित्र और अपवित्र दोनों प्रकार के कर्मों का परित्याग कर देता है। इसलिए योग का अभ्यास करें। समता का योग कर्म की निपुणता है।" (श्लोक 50, अध्याय 2)

पतंजलि योगसूत्र में महान ऋषि महर्षि पतंजलि कहते हैं -

पतंजलि योगसूत्र-समाधिपाद्ः।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।।2।।

ʺवह संतृप्ति जहाँ सभी विचार, भावनाएँ और इच्छाएँ बिना किसी बलपूर्वक दबाव के स्वाभाविक रूप से और सहज रूप से कम हो जाती हैं, योग कहलाती हैं"

कई ऋषियों और विशेषज्ञों ने मानव जाति के लाभ के लिए योग तकनीकों को अपने तरीके से समझाया है। वेद और उपनिषद या ज्ञान देने वाले अन्य प्राचीन ग्रंथ तथ्यों पर आधारित हैं जो लोगों को स्वस्थ और सुखी जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। चाहे कर्म योग, भक्ति योग, ध्यान योग, या ज्ञान योग हो‚ इनके माध्यम से, एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि निरंतर अभ्यास या आत्म अनुशासन का पालन किये बिना मन को नियंत्रित करना बहुत कठिन है। यदि आपके मन में अनियंत्रित इच्छाएं हैं तो स्वस्थ और प्रसन्न मन का होना असंभव है।

समर्पण के बिना अधूरा है योग

योग को उसके संपूर्ण अर्थों में सीखने और अभ्यास करने के लिए समर्पण आवश्यक है। इसे अनियमित या आधे मन से करने से कोई लाभ नहीं होगा। रोजाना सही तरीके से योग का अभ्यास करने से व्यक्ति को इससे काफी लाभ मिल सकता है। एक प्रशिक्षित योग अभ्यासी जीवन के किसी भी कठिन मार्ग का सामना कर सकता है और उस लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है जिस पर वह अपनी नजर रखता है।

महर्षि पतंजलि ने योग के आठ भागों का वर्णन किया है, जिन्हें सामूहिक रूप से 'अष्टांग योग' के नाम से जाना जाता है। ये हैं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। अष्टांग योग का नियमित अभ्यास मन को भ्रष्ट और अशुद्ध होने से रोकता है। इसके अलावा, व्यक्ति शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक स्तर पर समन्वय और संतुलन बढ़ाकर अपने मन को नियंत्रित करने में अधिक सक्षम हो जाता है। जिसके परिणामस्वरूप स्वस्थ शरीर अपने भीतर के स्व से जुड़ता है और समाज के प्रति परोपकारी होकर एक स्वस्थ संसार का निर्माण करता है।

योग को अधिक आसान और अधिक सुखद अनुभव बनाने के लिए यहां कुछ उपाय बताये गए हैं‚ जिनका पालन किया जाना चाहिए।

  • योग का अभ्यास करते समय दिमाग में हमेशा शुद्ध विचारों को रखने की कोशिश करें। अपने आप को बताएं कि आप स्वस्थ और मजबूत हैं और अपने आप को और भी बेहतर बनाना चाहते हैं।

  • मनचाहा लक्ष्य पाने के लिए योगाभ्यास के लिए आपके पूर्ण विश्वास के साथ-साथ समर्पण की भी आवश्यकता होती है।

  • काम, इच्छा, आसक्ति, अहंकार, स्वार्थ आदि जैसे आंतरिक शत्रुओं से निपटने के लिए, और मन को शुद्ध और शांत और मौलिक बनाने के लिए, आपको यम (अहिंसा, सत्य बोलने, चोरी नहीं करने, शुद्ध रहने और लालच नहीं करने) और नियम (स्वच्छता, संतोष, तपस्या, आत्मनिरीक्षण और ध्यान) का अभ्यास करने की आवश्यकता है। यम और नियम का अभ्यास आपके आध्यात्मिक अभ्यास (साधना) को मजबूत करेगा, आपके जीवन को सरल करेगा, आपको निडर बना देगा, और अंततः मन के संघर्षों को समाप्त कर देगा।

  • योग केवल कुछ आसन या सांस लेने की तकनीक तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसमें शरीर, मन और आत्मा का अनुशासन शामिल है।

योग धर्म, मानव धर्म

सभी के जीवन में योग के महत्व को समझने के बाद, दुनिया के 175 से अधिक देश योग को अपनाने और अभ्यास करने के लिए सहमत हुए हैं। इसके अलावा, उन्होंने हर साल 21 जून को 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' मनाने का भी फैसला किया है। इससे पता चलता है कि योग वह शक्ति है जो लोगों को शांतिपूर्ण, समृद्ध और स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्रेरित कर सकती है।

आइए, जीवन को स्वस्थ, खुशहाल और अधिक ऊर्जावान बनाने के लिए योग को अपनाएं। आइए हम चिंता, निराशा, अवसाद, तनाव और थकान के मुकाबलों से खुद को मुक्त करें।


नोट : योग का अभ्यास करने से पहले, अपने चिकित्सक से परामर्श करें। आपको प्रशिक्षित विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही योग का अभ्यास करना चाहिए।