Sunday, 17 November 2019

अस्थमा की रोकथाम और चिकित्सा कैसे करें

डाॅ. मानव मनचंदा, वरिष्ठ पल्मोनोलाॅजिस्ट, एशियन इंस्टीच्यूट आॅफ मेडिकल साइंसेस, फरीदाबाद
मानसून षहर के लोगों के लिए राहत लेकर आया है लेकिन इसने साथ ही साथ कई बीमारियों के विशाणुओं एवं जीवाणुओं को भी पनपने का मौका दिया है। मानसून के आगमन के बाद से ही षहर के अस्पतालों में क्रोनिक आॅब्स्ट्रक्टिव एयरवेज डिजीज (सीओएडी) तथा अस्थमा को बढ़ाने वाली एलर्जी से ग्रस्त मरीजों की संख्या बढ़ रही है। मानसून में उमस भरा मौसम दमा के मरीजों के लिए सबसे बुरा समय होता है।
मानसून में होने वाला अस्थमा एक तरह का एलर्जिक अस्थमा होता है, जो नमी के साथ- साथ वातावरण में  मौजूद परागकण और फफूंद जैसे एलर्गन की उपस्थिति के कारण होता है। एलर्जी प्रतिरक्षा प्रणाली की  प्रतिक्रिया होती है। जब किसी व्यक्ति को पौधों के पराग कण, फफंूद या पशु बाल जैसे हानिरहित पदार्थों से एलर्जी हो और जब वह इनके सम्पर्क में आता है तो षरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली प्रतिक्रिया करती है। हालांकि प्रतिरक्षा प्रणाली सामान्य रूप से शरीर के रक्षा तंत्र के रूप में कार्य करती है। एलर्जी से पीड़ित लोगों में, प्रतिरक्षा प्रणाली 'एलर्गन' नामक इन पदार्थों के साथ हानिकारक पदार्थ के रूप में व्यवहार करती है और अस्थमा के अटैक सहित विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं करती है। साँस के माध्यम से अंदर जाने वाले एलर्गन में पशु के रोएं (बाल), धूल के कण, फफूंद और परागकण शामिल हैं।
मानसून के मौसम में जब हवा में घास के परागकण की मात्रा बढ़ जाती है और अधिकतर कवक फलने-फूलने  लगते हैं तो ये लोगों विषेशकर कम प्रतिरोधक क्षमता वाले बच्चों और बुजुर्गों को प्रभावित करने लगते हैं। धूल से एलर्जी वाले और अस्थमा से पीड़ित लोगों में सीओएडी होने की संभावना अधिक होती है।
मानसून के दौरान हवा में काफी मात्रा में वायरस तैरने लगते हैं। एलर्जी पैदा करने वाले परागकण और धूल शरीर में प्रवेष कर श्वसन तंत्र को प्रभावित करते हैं। एंटीबॉडी की कमी वाले लोगों, बच्चों और स्टेरॉयड का सेवन करने वाले लोगों में इसका खतरा अधिक होता है। इसलिए बरसात के मौसम में मास्क पहनने और उबला हुआ पानी पीने की सलाह दी जाती है।
मानसून के दौरान सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सल्फर जैसे विषैले पर्यावरण गैसों की मौजूदगी बढ़ जाती है जिसके कारण अस्थमा पीड़ितों में अस्थमा का प्रकोप और गंभीरता बढ़ जाती है। मानसून के दौरान वायरल संक्रमण के मामलों में वृद्धि के कारण भी अस्थमा के हमले बढ़ जाते हैं।
 बरसात के मौसम में अस्थमा का प्रबंधन
— नियमित रूप से दवा का सेवन करें: अस्थमा के रोगियों को चिकित्सक के द्वारा लिखी गयी दवा का नियमित रूप से सेवन करना चाहिए और दवा की एक भी खुराक नहीं छोड़ना चाहिए। कुछ रोगियों को उनके चिकित्सक के द्वारा इनहेलर लेने की सलाह दी जाती है। अस्थमा के मरीजों को अपने एयरवेज खुला रखने के लिए नियमित रूप से इनहेलर लेना चाहिए। कुछ रोगियों में लापरवाही से इनहेलर को रोकने और शुरू करने की आदत होती है। यह प्रवृत्ति बहुत हानिकारक है और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए।
— घर में पालतू जानवरों को न रखें। यदि घर में पहले से ही पालतू जानवर हैं तो उन्हें रोगी के कमरे में नहीं जाने देना चाहिए क्योंकि पालतू जानवर के कमरे से जाने के बाद भी बालों की रूसी बेडरूम में रह सकते हैं।
— जहां तक संभव हो घर में एयर कंडीशनर वाले कमरे में रहें।
— बाथरूम जैसे नम स्थानों की नियमित रूप से ब्लीच और डिटर्जेंट और कीटाणुनाशक से सफाई कर मोल्ड से मुक्त रखें।
— परागकणों के संपर्क में रहने से बचने के लिए बेडरूम में पौधों को न रखें।
— जब तेज हवा चल रही हो तो परागकणों के संपर्क से बचने के लिए घर से बाहर नहीं निकलें। बरसात के मौसम में वातावरण में काफी मात्रा में परागकण पाये जाते हैं।
— जहां तक संभव हो, कालीन का प्रयोग नहीं करें क्योंकि कालीन में बहुत सूक्ष्म धूल कण, पशु के रोएं चिपक जाते हैं और इन्हें आसानी से हटाया नहीं जा सकता है।
— सप्ताह में एक बार सभी तकिया कवर, चादरें आदि को गर्म पानी से धोएं।


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