Saturday, 9 November 2019

ब्रेस्ट कंजर्वेशन सर्जरी से स्तन कैंसर के रोगी जी सकते हैं उच्च गुणवत्तापूर्ण जीवन 


स्तन कैंसर लंबे समय से शहरों में अधिक उम्र की महिलाओं की बीमारी मानी जाती रही है। लेकिन अब इसने भारत के कोने- कोने में अपनी लंबी छाया फैला दी है। इस बीमारी में सिर्फ एक दशक में 250 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है, और अब यह न केवल ग्रामीण-शहरी विभाजन को नजरअंदाज कर रही है, बल्कि युवा महिलाओं में भी फैल रही है।
देश में अभी हर साल स्तन कैंसर के 1.3 लाख से अधिक मामले दर्ज किये जाते हैं जबकि 10 साल पहले इसके 54 हजार मामले ही सामने आते थे। यह शहरों में सबसे आम कैंसर के रूप में उभरा है, और ग्रामीण क्षेत्रों में दूसरा सबसे आम कैंसर है। वास्तव में, यह बीमारी भारतीय महिलाओं में कैंसर के सभी मामलों में एक चौथाई मामलों के लिए जिम्मेदार है, और कैंसर से संबंधित मौतों का पांचवां सबसे महत्वपूर्ण कारण है।
गैर स्वयं सेवी संगठन - द पिंक इनीशिएटिव द्वारा किये गए एक अध्ययन के अनुसार, देश में स्तन कैंसर के रोगियों की आयु वर्ग में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। लगभग 25 साल पहले, हर 100 स्तन कैंसर के रोगियों में, 2 रोगी 20-30 आयु वर्ग के, 7 रोगी 30-40 आयु वर्ग के और 69 रोगी 50 साल से अधिक उम्र की होते थे। दूसरे शब्दों में, अब स्तन कैंसर के सभी रोगियों में से लगभग आधे रोगी 50 साल से कम उम्र के होते हैं। इसके अलावा, 25-40 साल के रोगियों की संख्या बढ़ रही है, जो बहुत ही परेशान करने की प्रवृत्ति है।
स्तन कैंसर का अगर समय पर पता चल जाए और पर्याप्त रूप से इलाज किया जाए, तो इसका इलाज संभव है। डिजिटल मैमोग्राफी एक विशेष प्रकार की एक्स-रे जांच होती है, जिससे बहुत ही प्रारंभिक अवस्था में कैंसर का पता लग जाता है। 40 साल की हो चुकी हर महिला को यह जांच साल में एक बार अवश्य कराना चाहिए।
स्तन कैंसर के लिए सर्जरी में पहले की जाने वाली रैडिकल मास्टेक्टोमी (स्तन को पूरी तरह हटाना) के बाद काफी बदलाव आया है। स्तन कैंसर के लिए सबसे आम सर्जरी आज मोडिफायड रैडिकल मास्टेकटोमी (एमआरएम) है, जो पुनर्निर्माण के साथ या इसके बिना स्तन को पूरी तरह से हटाने पर जोर देता है। दूसरा विकल्प ब्रेस्ट कंजर्वेशन सर्जरी (बीसीएस) है, जिसके तहत केवल ट्यूमर को हटाया जाता है, और बाकी स्तन का बरकरार रखा जाता है।
ब्रेस्ट कंजर्वेशन ट्रीटमेंट (बीसीटी) में ब्रेस्ट कंजर्वेशन सर्जरी (बीसीएस) और पूरी ब्रेस्ट रेडियोथेरेपी शामिल होती है, जिसकी पुनरावृत्ति दर और जीवित रहने की सम्पूर्ण दर मोडिफायड रैडिकल मास्टेकटोमी (एमआरएम) से अधिक होती है और इसलिए ब्रेस्ट कंजर्वेशन ट्रीटमेंट (बीसीटी) अब पश्चिम में जल्द होने वाले स्तन कैंसर के लिए देखभाल का मानक बन गई है।
मीनाक्षी मिशन हाॅस्पिटल में, हमने कुछ साल पहले सर्जरी के बाद फौलो- अप वाली स्तन कैसर के रोगियों पर एक अध्ययन किया था। इस अध्ययन का उद्देश्य स्तन हटाने के बाद उनके जीवन की गुणवत्ता का आकलन करना था। अध्ययन में कुछ चौंकाने वाले तथ्यों का पता चला था।
तीन में से लगभग एक रोगियों ने कहा कि वह अपने पति से ही उपेक्षित की जा रही थी। वास्तव में, इन महिलाओं में से कई महिलाओं को उनके पतियों ने छोड़ दिया था, संभवतः इस कारण से क्योंकि पुरुष अपनी पत्नी के स्तन को हटाने के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर सके, तब भी जब उन्होंने इस निर्णय में शुरू में अपना समर्थन दिया था। करीब 38 प्रतिशत रोगियों ने सेक्स के प्रति उनके दृष्टिकोण पर नकारात्मक प्रभाव के बारे में बताया, जबकि 73 प्रतिशत रोगियों ने कहा कि स्तन हटाने से उनके शरीर की छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। 
अधिकतर स्तन कैंसर के रोगी, उनके पति और रिश्तेदार पूरा स्तन हटाने के पक्ष में निर्णय लेते हैं, तब भी जब रोग प्रारंभिक चरण में होता है और इलाज संभव होता है, इस भय और मिथ्या धारणा के कारण कि यदि पूरे अंग को निकाल दिया जाए तो कैंसर दोबारा नहीं होगा। इन रोगियों को सर्जरी के बाद के गुणवत्तापूर्ण जीवन को नुकसान पहुंचाने से बचाने के लिए ब्रेस्ट कंजर्वेशन ट्रीटमेंट का विकल्प चुनने के लिए शिक्षित करने की जरूरत है, जैसा कि हमने अपने अध्ययन में पाया है।
दुर्भाग्य से, भारत में, बीसीटी चिकित्सकों या रोगियों में अधिक लोकप्रिय नहीं है। केवल 11-23 प्रतिशत सर्जन इसे पसंद करते हैं जबकि पश्चिम में 60-70 प्रतिशत सर्जन इसे वरीयता देते हैं। एमआरएम की तुलना में बीसीएस के फायदों में बेहतर शारीरिक छवि, यौन सक्रियता और मनोवैज्ञानिक समायोजन शामिल हैं। यह चिकित्सा समुदाय की जिम्मेदारी है कि वे बीसीटी के बारे में मरीजों को जानकारी दें और उन्हें स्तन रहित जीवन जीने की बजाय एक संपूर्ण जीवन जीने में सक्षम बनाएं।
मीनाक्षी मिशन हाॅस्पिटल, मदुरै में 2006 से ही स्तन कैंसर के रोगियों के लिए बीसीटी की सुविधा उपलब्ध करायी जा रही है। सौभाग्य से, हम पहले की तुलना में आज अधिक से अधिक रोगियों को बीसीटी का विकल्प चुनते हुए देख रहे हैं।
डॉ. के. एस. किरुशना कुमार मीनाक्षी मिशन हॉस्पिटल एण्ड रिसर्च सेन्टर, मदुरै में प्रमुख ऑन्कोलॉजिस्ट हैं।


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