गर्मियों में मुंहासों से बचें

गर्मी महिलाओं के सौंदर्य एवं स्वास्थ्य के लिये आफत बन कर आती है। गर्मी के दिनों में गंदगी और पसीने की चिपचिपाहट हमारी परेशानियों एवं बेचैनी को बढ़ाने के अलावा चेहरे की त्वचा पर बुरा प्रभाव डालती हैं। इस मौसम में तैलीय त्वचा अधिक तैलीय हो जाती है। गर्मी के कारण त्वचा की तैलीय ग्रंथियां अधिक सक्रिय हो जाती हैं जिससे तैलीय स्राव अधिक होने लगता है। तेल की अधिकता तथा पसीने के कारण त्वचा में चिपचिपाहट होने लगती है। ऐसी चिपचिपी त्वचा पर धूल, मिट्टी आदि आसानी से चिपक जाती है जिससे त्वचा पर जीवाणुओं का संक्रमण बढ़ना शुरू हो जाता है जिसकी परिणति ब्लैक हैड और कील-मुंहासों के रूप में होने लगती है। तैलीय त्वचा की समस्या का सबसे अधिक शिकार कम उम्र की महिलाएं और युवक होते हैं। जिन महिलाओं की त्वचा अधिक तैलीय होती है, उनकी त्वचा पर रोम-छिद्र भी ज्यादा खुले और बढ़े हुए होते हैं। चिकनाई की अधिकता के कारण चेहरे पर ज्यादा चमकीलापन रहता है और बेहद चिपचिपाहट होती है। ऐसी स्थिति में रोम-छिद्रों के बंद होने से तमाम सीवम वहीं इकट्ठा होने लगता है और सीवम के सूखने पर ब्लैक हैड बनने लगते हैं। ब्लैक हैड अर्थात् कीलों में मवाद पड़ने से मुंहासे की समस्या शुरू हो जाती है। शुरू-शुरू में त्वचा पर छोटे-छोटे दाने बनने शुरू हो जाते हैं। इन दानों में मवाद भरा होता है जिसके सूखने पर त्वचा पर काले धब्बे बन जाते हैं।


मुंहासे महिलाओं खास तौर पर किशोर एवं युवा वय की महिलाओं की सामान्य समस्या है। मुंहासे यूं तो किसी भी मौसम में निकल सकते हैं लेकिन गर्मियों में इनका प्रकोप बढ़ जाता है। इस कारण गर्मी के दिनों में मुंहासों के प्रति अधिक सचेत एवं सावधान रहने की जरूरत है।


मुंहासे आम तौर पर 12 से 20 साल की उम्र में अधिक निकलते हैं। कम उम्र की 90 प्रतिशत लड़कियां किसी न किसी हद तक मुंहासे की समस्या से ग्रस्त रहती हैं। अनेक लड़कियों को आनुवांशिक कारणों से अधिक मंुहासे निकल सकते हैं।


चर्म एवं यौन रोग विशेषज्ञ डा.चिरजीव छाबड़ा बताती हैं कि हार्मोन संबंधी परिवर्तन एवं आनुवांशिक कारण हालांकि मुंहासों के लिये प्रमुख तौर पर जिम्मेदार हैं लेकिन स्टेरॉयड, कुछ तरह की गर्भनिरोधक गोलियों तथा तपेदिक एवं मिर्गी की दवाइयों के सेवन, अत्यधिक तनाव, चेहरा चमकाने के लिये चेहरे पर विशेष तरह की ग्रीज, घरेलू या बाजारू तेल तथा क्रीम लगाने से भी मंुहासे बढ़ सकते हैं। कई लड़कियों को अपने चेहरे को छेड़ते या कुरेदते रहने की आदत होती है। यह आदत भी मंुहासे का कारण बन सकती है। कुछ लड़कियों में मासिक स्राव से करीब एक हता पहले से मंुहासे अधिक निकलने लगते हैं क्योंकि मासिक स्राव से पहले हार्मोन परिवर्तन होते हैं। मासिक स्राव के बाद मंुहासे अपने आप घट जाते हैं।


कॉस्मेटिक लेजर विशेषज्ञ डा.चिरंजीव छाबड़ा बताती हैं कि मुंहासे का इलाज बहुत ही आसान एवं सरल है। लेकिन इसके लिये ब्यूटीशियनों की बजाय चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिये। अगर मरीज सही समय पर मुंहासे का इलाज शुरू कर दे तब एंटीबायोटिक खाने की जरूरत नहीं पडे़गी, सिर्फ क्रीम लगाने से ही मंुहासे ठीक हो जायेंगे। मुंहासे होने पर कभी-कभी कुछ विटामिनों एवं फेस टॉनिकों का सेवन किया जा सकता है।


मुंहासे या तो अपने आप पांच से छह साल में निकलने बंद हो जाते हैं अथवा इलाज से दूर हो जाते हैं लेकिन ये चेहरे पर भद्दे निशान, काले धब्बे एवं गहरे गड्ढे छोड़ जाते हैं जिससे सुंदर से सुंदर चेहरा कुरूप हो जाता है। इससे व्यक्ति पर उम्र का प्रभाव अधिक ही प्रकट होता है। कम उम्र की महिला भी अधिक उम्र की दिखती है। लेकिन अब मुंहासों के दाग-धब्बों एवं गड्ढों से ग्रस्त महिलाओं के लिये लेजर वरदान बन कर सामने आया है। लेजर की मदद से मुंहासे के निशान एवं गड्ढों को स्थायी तौर पर दूर किया जा सकता है।


लेजर की मदद से मुंहासों के उपचार में सक्रिय कॉस्मेटिक लेजर चिकित्सक डा.छाबड़ा बताती हैं कि कुछ समय पहले तक इन्हें हटाने के लिये डर्माब्रेजन की सर्जरी की सहायता ली जाती थी जो बहुत ही कष्टदायक सर्जरी थी। इसके लिये मरीज को अस्पताल में रहना पड़ता था और कष्ट झेलना पड़ता था। लेकिन लेजर की मदद से मुंहासे के दाग-धब्बे को हटाने के लिये मरीज को न तो अस्पताल में रहने की जरूरत होती है और न ही उसे कोई कष्ट सहना पड़ता है।


लेजर का उपयोग दो तरह के मुंहासों में होता है। इनमें एक है सिस्ट इन मोड्यूल्स जिसमें मवाद भरे हुये होते हैं। इसके इलाज के लिये जब मंुहासे निकलते रहते हैं उस समय सिस्ट को लेजर की मदद से खोला जाता है और फिर दवाइयां दी जाती है। जब मंुहासे दूर हो जाते हैं और उनके निशान रह जाते हैं तब भी लेजर का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह मुंहासे होने और मंुहासे के चले जाने दोनों स्थितियों में लेजर का इस्तेमाल होता है। इन दोनों के लिये कार्बन डाईक्साइड लेजर का ही उपयोग किया जाता है। लेकिन दोनों के इस्तेमाल के तरीके अलग-अलग होते हैं।


डा.चिरंजीव छाबड़ा का कहना है कि कुछ हिस्से में लेजर करने पर चेहरे को धूप से बचाने की कोई जरूरत नहीं होती है लेकिन पूरे चेहरे में दाग होने पर लेजर करने के बाद मरीज को दस से पन्द्रह दिन तक तेज धूप से बचना चाहिये। अगर घर से बाहर निकलना जरूरी हो तो छाता लेकर तथा चेहरे पर सन क्रीम लगाकर निकलना चाहिये।


लेजर चिकित्सा की सबसे बड़ी खाशियत यह है कि इसमें किसी तरह की चीर-फाड़ नहीं करनी पड़ती है। इसमें न तो रक्त बहता है न मरीज को किसी तरह का दर्द होता है। लेकिन मंुहासों का इलाज कराने से बेहतर सावधानियां एवं एहतियात बरत कर इससे बचना है खास तौर पर गर्मियों में।


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