Saturday, 2 November 2019

मधुमेह पर प्रभावी नियंत्रित के लिए चिकित्सकों को भी अपने कौशल में करना होगा सुधार 

नई दिल्ली स्थित नेशनल हार्ट इंस्टीट्यूट के मधुमेह रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद गुजराल ने बताया, ''वर्तमान में मधुमेह देखभाल में वायदों और वास्तविकता में काफी अंतर है। कई रोगियों को इलाज के बाद भी उचित लाभ नहीं मिल पाता और उनमें कई तरह की गंभीर जटिलताएं पैदा हो जाती हैं जिससे उनकी जिंदगी और जीवन की गुणवत्ता में कमी आ जाती है।'' डॉ. गुजराल के द्वारा एक साल से भी कम समय से लेकर 25 साल तक मधुमेह से पीड़ित करीब 1660 रोगियों से, एक साल से थोड़ा समय तक (सितंबर 2013 से जुलाई 2014 तक) प्राप्त आंकड़ों से पता चला कि उनमें से करीब 70 प्रतिशत रोगियों ने रोग की किसी भी अवस्था में सामान्य चिकित्सक से अपना इलाज कराया, 11 प्रतिशत रोगी पोस्टग्रैजुएट या इंडोक्राइनोलॉजिस्ट के पास गये और करीब 19 प्रतिशत रोगियां ने विशेषज्ञ से अपना इलाज कराया।


चिकित्सा विशेषज्ञों ने कहा है कि बीमारी के बारे में समुचित जागरूकता और मरीजों की उचित देखभाल की बदौलत भारत मधुमेह की चिकित्सा के मामले में अग्रणी बन सकता है। आज भारत को मधुमेह की विश्व राजधानी माना जाता है औरयहां होने वाली मौतों में से 40 प्रतिशत से अधिक मौतों के लिए मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जिम्मेदार हैं। सिर्फ 70 साल से कम उम्र में ही, ये बीमारियां 60 प्रतिशत मौतों का कारण बनती हैं। अंतर्राष्ट्रीय मधुमेह फेडरेशन की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार, मधुमेह से पीड़ित साढ़े 6 करोड़ लोग भारत में रहते हैं जो कि कुल आबादी का लगभग छह प्रतिशत है।


देश में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में करीब 381 मेडिकल कॉलेज हैं और इनमें भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) में लगभग 50,000 एमबीबीएस सीटें पंजीकृत हैं। सरकारी कॉलेजों में पीजी सीटों की कुल संख्या 10,798 है और निजी कॉलेजों में यह संख्या 6536 है। मधुमेह का इलाज करने वाले विशेषज्ञों की संख्या सिर्फ 6.5 प्रतिशत (एम. डी. मेडिसीन 4.4 प्रतिशत और डी एम इंडो 2.1 प्रतिशत) है। डॉ. गुजराल ने बताया, ''भारत में मधुमेह का इलाज करने वाले विशेषज्ञों की कमी है। एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) ने एमबीबीएस चिकित्सकों को मधुमेह का इलाज करने के लिए अधिकृत किया है और उन्हें मधुमेह के इलाज की मान्यता दी गयी है, इसके लिए उन्हें उपयुक्त प्रशिक्षित प्रदान किया गया है और उन्हें समय-समय पर अपडेट किया जाता है।''


मधुमेह का इलाज पाठ्य संदर्भ पुस्तकें और व्यावहारिक प्रशिक्षण की पुस्तकें जैसे दो स्तरीय साहित्य के माध्यम से किया जाना चाहिए और इसके लिए जनरल प्रैक्टिशनरों को सक्षम और सुयोग्य बनाया जाना चाहिए। इस अवसर पर डॉ. गुजराल ने मधुमेह के प्रबंधन पर शुगर 'क्योर' नामक हैंडबुक का विमोचन किया, जो पिछले 15 सालों में उनकी छठी पुस्तक है। यह पुस्तक मधुमेह रोगियों और वैसे व्यक्तियों जिनमें मधुमेह विकसित हाने का अत्यधित खतरा हो, के लिए उपयोगी हो सकती है। यह पुस्तक ग्लिटरिंग इंक पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गयी है। इस पुस्तक को आरएसएसडीआई (दिल्ली चैप्टर) के माननीय जनरल सेक्रटरी डॉ. विनोद मित्तल ने जारी किया।
इस अवसर पर 'क्योर' को मधुमेह को नियंत्रित करने के लिए एक रणनीति के रूप में जारी किया गया। 'सी' का अर्थ काउज टू बी अंडरस्टूड (कारण जिन्हें समझना है) , 'यू' का अर्थ अंडरस्टैंडिंग द इनडिविजुवल नीड्स (व्यक्तिगत जरूरत को समझना), 'आर' का अर्थ रिस्क रिडक्शन ऑफ मेजर कम्प्लीकेशन्स (प्रमुख जटिलताओं के खतरों को कम करना) और 'ई' का अर्थ 'इनस्योर गुड क्वालिटी ऑफ लाइफ एंड लांगेविटी (अच्छी गुणवत्ता वाली और लंबी जिंदगी को सुनिश्चित करना) है। 
नेशनल हार्ट इंस्टीच्यूट के इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. विनोद शर्मा ने बताया, ''पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में मधुमेह की शुरुआत आम तौर पर दो दशक पहले हो जाती है। इस तरह मधुमेह लोगों को उनकी जिंदगी के महत्वपूर्ण सालों में प्रभावित करती है और इससे न सिर्फ स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली पर चिकित्सा संबंधी बोझ बढ़ता है, बल्कि यह समाज पर भी काफी आर्थिक बोझ डालता है। धमनियों को संकुचित करने वाली समस्या एथरोस्क्लेरोसिस की प्रक्रिया मधुमेह के चिकित्सकों द्वारा पहचान से पहले ही शुरू हो जाती है। इसलिए अक्सर दिल के दौरे या स्ट्रोक के समय मधुमेह की पहचान होना आश्चर्य की बात नहीं है।''


मधुमेह के साथ जीवन व्यतीत करना जीवन भर के लिए मजबूरी बन जाती है। मधुमेह ग्रस्त लोगों को यह जानकारी देना जरूरी है कि उन्हें अपने मधुमेह पर निगरानी रखनी चाहिए। जो रोगी अपने चिकित्सकों से अधिक सलाह लेना चाहते हैं, वे अक्सर द्फ्तर के उचित संपर्क में नहीं रहने के कारण निराश हो जाते हैं। डॉ. विनोद गुजराल ने हाल ही में 'डॉ. गुजराल्स स्पेशियलिटी क्लिनिक्स' नामक एक मोबाइल एप्लिकेशन का शुभारंभ किया है जिससे सामान्य चिकित्सक को अपने स्मार्ट फोन पर प्रोटोकॉल को पाने के लिए सिर्फ एक क्लिक करना पड़ता है। यह एप्लिकेशन ''मोबाइल हेल्थ'' - स्वास्थ्य सेवा में स्मार्टफोन जैसी मोबाइल प्रौद्योगिकी के उपयोग में नवीनतम अनुसंधानों में से एक है। यह एप्लिकशन ट्रैक करने के लिए और देखभाल करने वालों और देखभाल की सुविधा पाने वालों को आपस में जुड़े रहने के लिए रोमांचक नए तरीके की शुरुआत की है।


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