Tuesday, 19 November 2019

रीमिक्स का फैलता काला कारोबार 

क्या आप विशुद्ध रविंद्र संगीत को विशुद्ध मैडोना अंदाज में सुनना और देखना पसंद करते हैं? यदि हां, तो आप नई पीढ़ी के ठंडे अर्थात् कूल बंदे हैं। अगर आप ऐसा करना पसंद नहीं करते तो आपको तुरंत गेहुंआ वस्त्र और कमंडल धारण कर हिमालय की ओर प्रस्थान करना चाहिए क्योंकि अब चहुं ओर 'कांटा लगा....'की ही धूम है। रीमिक्स नई पीढ़ी का संगीत है जो वास्तव में ब्रिटेन मंे शुरू हुआ और वहीं से भारत पहुंचा। अस्सी के दशक के मध्य में गुलशन कुमार ने ही इस रीमिक्स के जादू को सबसे पहले पहचाना था। उनकी कंपनी टी-सीरिजने मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के गाए गानों को नए -नए कलाकारों की आवाज में रिकार्ड कराया। ऐसा प्रचारित किया गया कि इन नए एलबमों में गानों के साथ झनकार बीट्स जोड़ी गयी है अर्थात् पुराने गानों को नई और तेज धुनों में पिरोया गया है। इन गानों को 'वर्जन रिकार्डिंग' के नाम से जाना गया और इसी ने अब रीमिक्स का दानवी रूप धारण कर लिया है। आज किसी भी संगीत चैनल पर आपको 10 में से 7 गाने रीमिक्स ही देखने को मिलेंगे। भारतीय टाॅप चार्ट में भी रीमिक्स संगीत का ही दबदबा है जिनमें हैरी आनंद, डी जे अकील, अकबर सामी, डी जे नशा आदि सबसे बड़े नाम हैं।
इन रीमिक्सों ने जहां एक ओर पुराने संगीतकारों के दिल में छूरा घोंपने का काम किया, वहीं दूसरी ओर भारतीय संगीत उद्योग को भी भारी आर्थिक क्षति पहुंचा रहा है। नौशाद जैसे संगीतकार जब अपने मेलोडियस गीतों को झाम-झाम, धाम-धाम के साथ सुनते हैं तो उनकी आत्मा कलप जाती है। इसके ऊपर से रीमिक्स वीडियो में अश्लील नाच और लटकों-झटकों का समावेश उनके जैसे लोगों को खून के आंसू रूला रहा है।
भारतीय संगीत उद्योग पर नजर डालें तो पता चलता है कि पायरेसी और ऊंचे अप्रत्यक्ष करों जैसी भयानक मुसीबतों से जूझ रहे इस उद्योग के लिए वर्जन रिकार्डिंग और रीमिक्स ने कोढ़ में खुजली का काम किया है। यदि पिछले दो-तीन वर्षों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो पता चलता है कि यह उद्योग अब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। पारम्परिक संगीत और कर्णप्रिय पुराने गीतों की आत्मा को बुरी तरह रौंदने वाले रीमिक्सों ने पिछले डेढ़ वर्षों में ही बालीवुड पर चार बिलियन रुपयों का चूना लगाया है। आज रीमिक्स संगीत पूरे बाजार का 80 प्रतिशत हिस्से पर काबिज हो चुका है और बाकी बचे 20 फीसदी हिस्से में ही सृजनात्मक कार्य करने वाले छटपटा रहे हैं।
इंडियन म्यूजिक इंडस्ट्री (आईएमआई) एक अपेक्स बाॅडी है जिसमें 50 कंपनियां शामिल हैं। इसके सदस्यों के अनुसार यदि अभी जल्द ही कोई कदम नहीं उठाया गया तो सर्वनाश की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।  आई एम आई के अध्यक्ष बी.जे. लाजरूस के अनुसार उद्योग को पिछले तीन वर्षों में 1800 करोड़ रुपयों का घाटा हुआ है और यह घाटा अवैध संगीत के कारण हुआ है। हर साल लगभग 600 करोड़ का नुकसान होता है जिसमें से 450 करोड़ पायरेसी और 150 करोड़ वर्जन रिकार्डिंग के कारण हुआ है। लाजरूस के मुताबिक कुछ कंपनियों को इस अवधि में 200 करोड़ तक का घाटा झेलना पड़ा है। कोई भी इतना बड़ा घाटा बर्दाश्त नहीं कर सकता और अगर अभी कुछ नहीं किया गया तो कुछ कंपनियां बंद हो जाएगी।
इन अवैध रूप से कुकुरमुत्तो की तरह बन रहे रीमिक्स पर लगाम कसने के लिए आई एम आई भरपूर प्रयास कर रही है। उन्होंने भारत सरकार से काॅपी राइट कानून 1994 से अनुच्छेद 52(1)(जे) को हटाने की पुरजोर वकालत की है। इस अनुच्छेद के अनुसार दो वर्षों से अधिक पुराना कोई भी गीत वर्जन रिकार्डिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है बशर्ते इस बात की जानकारी काॅपीराइट धारकों, संगीत रचनाकारों और गीतकार को अग्रिम पांच प्रतिशत रायल्टी की रकम के साथ पहले ही दे दी जाए। कुछ संगीत कंपनियों ने इस अनुच्छेद का बड़ी चालाकी से फायदा उठाया है। लाजरूस के अनुसार ये कंपनियां पहले तो छोटी रकम अग्रिम के रूप में अदा कर देती है लेकिन एलबम की बिक्री पर आगे कोई राशि अदा नहीं करती जबकि एलबम की दसियों हजार काॅपियां बेच कर मुनाफा कमाती है। अनाधिकारिक सूचनाओं के अनुसार टी सिरीज ने 'कांटा लगा......' की पहली पांच हजार काॅपियों पर तो अग्रिम राशि चुका दी लेकिन कुछ बेची गई लगभग 50 लाख काॅपियों का कोई हिसाब नहीं किया गया। हालांकि कानून में बदलाव की पुरजोर कोशिशें की जा रही हैं लेकिन फिर भी कुछ लोगों का मानना है कि बदला हुआ कानून भी तब तक बेकार ही साबित होगा जब तक कि उसे सख्ती से लागू करने की दिशा में कदम न उठाए जाएं। एक कानूनी सलाहकार अश्नी पारिक का मानना है कि हमारे कानून तो विश्व स्तर के हैं लेकिन उनके लागू करने के बारे में काफी कुछ किया जाना बाकी है।
आई एम आई ने पायरेसी से लोहा लेने के लिए 'साउंड आफ साइलेंस' के नाम से अभियान शुरू किया है। इस अभियान के तहत आई एम आई के सदस्य सरकार, कानूनी संस्थाओं और ग्राहकों से पायरेसी और उसके दुष्परिणामोें के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए साथ-साथ कदम उठाने की गुहार कर रहे हैं। इसके अलावा इन्होंने सरकार से अनुरोध किया है कि कैसेट पर उत्पादन शुल्क न लगाने की प्रथा रहने दें और सीडी पर लगाया गया 16 प्रतिशत का उत्पादन शुल्क भी हटा लें। राज्य सरकारों से भी कर ढांचों को तर्कसंगत बनाने की अपील की गई है। लाजरूस का सुझाव है कि सरकार को पायरेसी मामलों में सख्त रूख अपनाते हुए कड़ी सजा का प्रावधान करना चाहिए। आई एम आई के आंकड़ें बताते हैं कि पिछले चार वर्षों में पायरेसी मामलों में तीन हजार 652 आपराधिक मामले दर्ज हुए और चार हजार 96 गिरफ्तारियां की गई। इनमें से केवल 191 मामले ही अदालती निर्णय तक पहुंचे और मात्र 30 लोगों का ही भारी जुर्माना अथवा लंबी कारावास हुई।
जिस प्रकार जुआ घर में जाने वाला जुआरी चाहे हारे या जीते, जुआघर हमेशा फायदे में ही रहता है। उसी प्रकार रीमिक्स बनने से संगीतकारों का दिल टूटे या संगीत और फिल्म उद्योग को करोड़ों का चूना लगे, रीमिक्स बनाने वाला हमेशा फायदे में ही रहता है। नकल के इस कारोबार में जहां नामी गिरामी कंपनियां धड़ल्ले से रीमिक्स निकाल रही हैं वहीं ये कंपनियां एक दूसरे पर चोर होने की कालिख भी पोत रही हैं। 
रीमिक्स की पुरानी खिलाड़ी टी-सीरिज ने सोनी म्यूजिक पर मुकदमा दायर कर दिया है। टी-सीरिज के अनुसार सोनी म्यूजिक ने कुछ समय पहले जो 'डी जे हार्ट रीमिक्स' कैसेट बाजार में उतारा था वह टी-सीरिज के पहले से चल रहे कैसेट डी जे हाॅट रीमिक्स की नकल है।
टी-सीरिज ने आरोप लगाया कि सोनी म्यूजिक ने अपने एलबम का टाइटल हमारे टाइटल की कपट पूर्ण नकल है और उसके गाने भी चुराए गए हैं। दूसरी ओर सोनी म्यूजिक ने इन आरोपों को बेतुका बताया है। उनके अनुसार,'टी-सीरिज वालों को हथियाने में महारथ हासिल है और हाल ही में टी-सीरिज, टाइम्स म्यूजिक के दो उत्पाद हथियाने का मुकदमा हार गई है। पिछले वर्ष हमने टी-सीरिज पर हमारे सफल एलबम 'डांस मस्ती.....' से मिलता-जुलता एलबम बाजार में उतारने के लिए मुकदमा दर्ज किया था।' उन्होंने टी-सीरिज पर वार करते हुए कहा कि डी जे हाॅट रीमिक्स भ्रामक है। उन्होंने हमारे रीमिक्स 'मेरे नसीब में......', यूनिवर्सल के रीमिक्स 'सैंया दिल में आना रे.......' और अन्य हिट गीतों की नकल की है।
आरोपों की यह बहस अंतहीन है और आगे भी इसके बढ़ते जाने के ही संकेत हैं। चोरी चाहे जिसने भी की हो लेकिन सच तो यह है कि कोयले की इस दलाली में कालिख हमारे महान संगीतकारों और गीतकारों के मुंह पर ही लगी है। 
'कांटा लगा....' ने भले ही विवाद पैदा किया हो और उसका वीडियो तो बहुतों को खड़े-खड़े पानी-पानी हो जाने पर मजबूर करता हों लेकिन कांटा लगाने वाली डी जे डाॅल वाकई बहुत खुश हैं और उन्हें लोगों की आलोचनाओं से कोई शिकायत नहीं है। जिन समझदार लोगों ने सफलता का फार्मूला पा लिया वे नए फिल्मी गानों के साथ म्यूजिक चार्ट पर राज कर रहे हैं। फार्मूला बहुत सीधा और सरल है। सत्तर के दशका का कोई गीत लीजिए और उसको इलेक्ट्राॅनिक गिटार, सिंथसाइजर और इलेक्ट्राॅनिक ड्रम जैसे धूम धड़ाके वाले वाद्य यंत्रों के साथ दोबारा रिकार्ड कीजिए। रिकार्डिंग में गायक/गायिका की आवाज का कोई खास महत्व नहीं है। हां, गाने में वीडियो में थोड़ा ज्यादा मेहनत करनी होगी। इस बात का हर हाल में ध्यान रखना होगा कि वीडियो की माॅडल किसी भी हालत में कपड़े कम से कम पहन पाए। यदि सीधे बाथरूम से बाथरूम से माॅडल के नहाने का लाइव टेलिस्काट हो जाए तो उसे सफल होने में कोई संदेह नहीं।
हालांकि कुछ पुराने संगीतकार इस नए रीमिक्स चलन से खुश नहीं हैं। उन्हें हर रोज थोक के भाव पैदा हो रहे नवोदित संगीतकारों की उन्नति फूटी आंखों नहीं भा रही है। दो-चार सठिया चुके संगीतकार कुछ कंपनियों के साथ मिलकर इस चलन को बंद कराने की साजिश कर रहे हैं। वे जलन के मारे अपने गीतों का खून और बलात्कार किए जाने जैसे आरोप मढ़ रहे हैं तो कुछ इस 'अपराध' से कमाए रुपयों में अपना हिस्सा मांग रहे हैं। नौशाद साहब तो कहते हैं कि रीमिक्स का संगीत से कुछ लेना-देना ही नहीं है। यह केवल अश्लील नृत्य है जो इस तरह का संगीत धड़ाधड़ बिक रहा है। 
रीमिक्स संगीत पर छपी एक रिपोर्ट में नौशाद ने कांटा लगा वाले अपने गाने के बारे में कहा कि वह एक अत्यंत मधुर गीत था और इन लोगों ने इसे पूरी तरह बर्बाद कर दिया। यह गाना एक ऐसी प्रेमिका के बारे में था जो अपने प्रेमी का इंतजार कर रही है। अब इन्होंने उसे रीमिक्स करके और वाहियात वीडियो बना कर गाने के अर्थ को ही बर्बाद कर दिया।
संगीतकार बप्पी लहरी जिन्होंने कभी भी पाॅप संगीत से उधार लेने में कोई गुरेज नहीं की वह भी रीमिक्स से आहत हुए हैं। पिछले वर्ष उन्होंने यूनिवर्सल म्यूजिक समूह और डा. ड्रे के खिलाफ एक मुकदमा जीता है। यह मुकदमा ट्रुथ हटर््स के गाने 'एडिक्टेड' के खिलाफ था।
न्यूयार्क स्थित डी जे अफलातून के रीमिक्स वर्जन 'कलियों का चमन......' सबसे पहले यू एस क्लब सर्किट में चर्चित हुआ। इसके बाद इसे डी जे क्विक ने चलाया। तत्पश्चात् ट्रुथ हार्ट्स ने इसे एडिक्टेड के रूप में डाला और उसके बाद मुम्बई स्थित हैरी आनंद ने इसे रीमिक्स (या री-रीमिक्स) करके देव कोहली के शब्द और शाश्वती की आवाज में पेश कर दिया।
यूनिवर्सल म्यूजिक के चेयरमैन और आई एम आई के अध्यक्ष विजय लाजरूस कहते हैं कि हमें अक्सर बेची गई वस्तुओं की सही जानकारी नहीं मिलती और न ही पांच प्रतिशत राॅयल्टी, जो हमें अदा की जानी चाहिए। अगर हमारे काॅपीराइट कानून थोड़े और सख्त होते तो हमें रचनाशीलता की असली कद्र करने वालोें के साथ अनुबंध करने में सहायता होती जा हमें राॅयल्टी भी देते।
ए एफ पी रिपोर्ट के मुताबिक अपेक्षाकृत अनजान संगीतकार हर हफ्ते नए-नए सीडी और कैसेट निकाल रहे हैं। ये लोग कानूनी दिक्कतों से बचने के लिए गाने के बालों और धुनों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं। इस तरह 12 बिलियन सालाना व्यापार वाले संगीत उद्योग में अपनी पैठ बना रहे हैं। रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि एक रीमिक्स एलबम मात्र दो लाख रुपए में बनाया जा सकता है। लेकिन एलबम की मदमस्त वीडियो बनाने में पांच लाख तक का अतिरिक्त खर्च होता है। इसके अलावा एलबम के प्रचार में खर्च हाने वाली राशि भी खासी बड़ी होती है। इन सब खर्चों के बावजूद ये खर्च किसी नई फिल्म के संगीत को प्रचारित करने में लगने वाले खर्च से कम ही होता है।
ऐसा नहीं है कि रीमिक्स के कोई समर्थक नहीं हैं। टाइम्स म्यूजिक के उपाध्यक्ष रबी भटनागर कहते हैं,'इसमें गलत क्या है? यह पूरे विश्व में हो रहा है। आज के किसी बच्चे से पूछ कर देखिए क्या उसे 1980 के दशक से पहले का कोई गीत याद है? पुराने गानों को अब कोई नहीं खरीदता। और अगर कोई इन गानों की रीमिक्स करता है तो वह इन भूला दिए गए गानों को फिर से जीवंत कर रहा है। असल में वह उनका प्रचार ही कर रहा है। भटनागर के अनुसार रीमिक्स उद्योग भारतीय संगीत क्षेत्र का केवल 10 फीसदी हिस्सा है इसलिए रीमिक्स के खिलाफ आवाजें उठाना अनुचित है।
यह वास्तविकता है कि शास्त्रीय संगीत आधारित कुछ पुराने गीतों को रीमिक्स करके दोबारा नयी पीढ़ी से अवगत कराया जा रहा है। एक भारतीय एफ एम रेडियो पर किसी किशोर ने 'बिन्दु रे......' वाला रीमिक्स गाना सुनवाने की फरमाइश की। जब उसे बताया गया कि इस रीमिक्स का ओरिजिनल वर्जन वास्तव में किशोर कुमार का गाया पड़ोसन फिल्म का है जो 40 साल पहले था, तो उसे विश्वास नहीं हुआ।
बाॅलीवुड में भी रीमिक्स बेचने का नया चलन उभर कर सामने आ रहा है। अगर किसी फिल्म का संगीत खासा चर्चित हो जाता है तो कुछ समय बाद रीमिक्स तैयार करके दोबारा बाजार को भुनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए फिल्म परदेश, रंगीला, कुछ-कुछ होता है, दिल से, बीबी नं. 1, कहो न प्यार है आदि फिल्मों के गाने को रीमिक्स करके अच्छा मुनाफा कमाया गया।
पायरेसी के आघात और इंटरनेट पर एमपी3 की आसान उपलब्धता के बावजूद रीमिक्स संगीत ने अपना वजूद न केवल कायम रखा है बल्कि रीमिक्स एलबमों की बिक्री लगातार बढ़ भी रही है। संगीत तानाशाहों के लंबे-चैड़े भाषणों और शुद्धता की ढपली बजाने वालों के विरोध के बावजूद रीमिक्स खरीदने वालों की कोई कमी नहीं है।   


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