Saturday, 2 November 2019

सर्जरी की नई तकनीक से होगा इरेक्टाइल डिसफंक्शन का इलाज

इरेक्टाइल डिसफंक्शन का इलाज जब दवा के सेवन से नहीं हो पाता तो इसके लिए सर्जरी का सहारा लिया जाता है। अब इरेक्टाइल डिसफंक्शन के इलाज के लिए सर्जरी का एक नया विकल्प उपलब्ध है जो अत्यंत कारगर साबित हुआ है। कैलाश कॉलोनी के नोवा स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के यूरोलॉजी विभाग के वरिष्ठ कंसल्टेंट डॉ. विनीत मल्होत्रा ने बताया, ''इरेक्टाइल डिसफंक्शन से पीड़ित रोगियों में इसके स्थायी समाधान के लिए शिश्न प्रत्यारोपण (पेनिल इंप्लांट) सबसे सफल उपाय बनता जा रहा है।''
पेनिल प्रास्थेसिस लचीली/हवा भरी हुई रॉड होती है जिसे शल्य चिकित्सा की मदद से शिश्न के इरेक्शन चैंबर में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। यह इम्प्लांट शिश्न को सेमी - इरेक्ट बनाता है यहां तक कि जब शिश्न उत्तेजित नहीं हो और उसे थोड़ा उठाने की जरूरत हो या पूरा खड़ा करने की जरूरत हो तो इसे समायोजित किया जा सकता है।
शिश्न प्रत्यारोपण (पेनिल इंप्लांट) छोटा होता है और लिंग के अंदर पूरी तरह से फिट बैठता है। अगर इसे बहुत करीब से न देखा जाए तो इसका पता भी नहीं चलता। सेक्स के दौरान, रोगी कोई अंतर महसूस नहीं करता है क्योंकि यह जोश और लिंग के स्खलित होने को प्रभावित नहीं करता। यहां तक कि सेक्स के दौरान, जब तक महिला को इसके बारे में बताया नहीं गया हो, उसे इसका पता नहीं चलता।
लिंग को कड़ा करने के लिए रोगी को एक पंप को प्रेस करना होता है, जो तरल को जमा रखने वाले कोश से तरल को सिलिं्रडर में भेजता है। इससे सिलेंडर फूल जाता है जिसके कारण लिंग कड़ा हो जाता है। संभोग के अंत में, मरीज को सिलिंडर से हवा निकालने के लिए पंप के आधार पर स्थित डिफ्लेशन वॉल्व को प्रेस करना होता है जिससे लिंग अपनी सामान्य अवस्था में आ जाता है।
इरेक्टाइल डिसफंक्शन के चार सबसे आम कारणों में धूम्रपान, उच्च कोलेस्ट्रॉल, मधुमेह और उच्च रक्तचाप शामिल हैं। इन स्वास्थ्य समस्याओं से रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचता है।


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