Wednesday, 6 November 2019

आधुनिक प्रवृतियों से फैल रहा है गर्भाशय कैंसर

सुप्रसिद्ध टेलीजिवन कलाकार जेड गुडी का 27 साल की अवस्था में गर्भाशय कैंसर से निधन हो गया। विषेशज्ञों का कहना है कि मौजूदा समय में आधुनिक प्रवृतियों के कारण गर्भाशय कैंसर का प्रकोप तेजी से फैल रहा है। खामोश हत्यारा के नाम से कुख्यात इस कैंसर की पहचान आम तौर पर देर से होने के कारण इसका इलाज मुश्किल होता है। नयी दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोला अस्पताल के प्रमुख कैंसर चिकित्सक डा.राकेश चौपड़ा का कहना है कि आरंभिक अवस्था में इसका पता लग जाने पर विकिरण थेरेपी का सहारा लिया जाता है जबकि अंतिम अवस्था में इसका पता लगने पर साइटोरिडक्टिव सर्जरी एवं कीमोथेरेपी की मदद ली जाती है।


महिलाओं में बच्चे नहीं पैदा करने अथवा एक बच्चे पैदा करने की बढ़ रही प्रवृति के कारण में गर्भाशय कैंसर का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। हमारे देश में यह कैंसर अब ग्रीवा (सेरविक्स), स्तन एवं मुख गुहा के कैंसर के बाद चौथा सबसे सामान्य कैंसर बन गया है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंघान परिषद(आई.सी.एम.आर.) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डव्ल्यू.एच.ओ.) के अनुसार वर्ष 1998 में केवल भारत में गर्भाशय कैंसर के 17हजार से अधिक रोगियों का पता चला जिनमें से करीब दस हजार रोगियों की उसी साल मौत हो गयी। एक अनुमान के अनुसार विश्व में हर साल तकरीबन एक लाख 60हजार से अधिक महिलायें गर्भाशय कैंसर से ग्रस्त होती हैं। कोई भी देश इस बीमारी से अछूता नहीं है।हालांकि अलग-अलग देशों में गर्भाशय कैंसर की दर अलग-अलग है। जापान को छोड़कर अन्य विकसित देशों में तो इसकी दर बहुत अधिक है। प्रति एक लाख महिलाओं में उत्तरी अमरीका में  16 महिलायें जबकि जापान में सात महिलायें इस कैंसर से पीड़ित है।जबकि  
प्रति एक लाख महिलाओं में से दिल्ली 
में नौ ,मुंबई में सात,चेन्नई में छह महिलायें इस कैंसर से पीड़ित हैं।
डा.राकेश चौपड़ा का कहना है कि गर्भाशय कैंसर बढ़ने का मुख्य कारण आज के समय में कम बच्चे पैदा करने की बढ़ रही प्रवृति है। हालांकि आधुनिक समय में यह प्रवृति अनिवार्य बन गयी है लेकिन इससे इस कैंसर को बढ़ावा मिला है। उनके अनुसार गर्भाधारण करने और संतान जनने के कारण इस कैंसर का खतरा कम हो जाता है।कुछ बच्चों के जन्म के बाद तो महिला को यह कैंसर होने का खतरा नहीं के बराबर होता है।
डा.राकेश चौपड़ा बताते हैं कि बांझ औरतों को अक्सर ओवुलेशन को उत्तेजित करने वाली क्लोमोफिन जैसी दवाइयां दी जाती हैं जिनसे गर्भाशय कैंसर होने की आशंका दो से तीन गुना बढ़ जाती है। जबकि गर्भनिरेधक गोलियों के सेवन से इस कैंसर का खतरा कम हो जाता है।
डा. राकेश चौपड़ा बताते हैं कि गर्भाशय कैंसर के पांच फीसदी मामलों में पारिवारिक पृष्ठभूमि होती है।गर्भाशय 
कैंसर की रोगियों की अत्यंत नजदीकी संबंधियों को यह कैंसर होने की आशंका अधिक हो जाती है। इसलिये ऐसे परिवारों
की महिलाओं को बच्चे पैदा हो जाने के बाद गर्भाशय को निकाल देने की सलाह दी जाती हैं हांलाकि गर्भाशय निकाल चुकी महिलाओं में भी प्राथमिक पेनिटोनियल कार्सिनोमेटोसिस के मामले सामने आये हैं। इसलिये गर्भाशय कैंसर की मरीजों की निकट रक्त संबंधियों को सी.ए.-150 पेल्विक जांच और योनि का अल्ट्रासाउंड नियमित रूप से कराना आवश्यक होता है।स्तन कैंसर होने पर गर्भाशय कैंसर होने का खतरा दो से चार गुना बढ़ जाता है। कुछ अध्ययनों से पता चला है कि गर्भाशय कैंसर का मांसाहारी एवं वसायुक्त आहार से गहरा ताल्लुक है। जबकि हरी सब्जियों और फलों के सेवन से गर्भाशय कैंसर से बचाव होता है। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि टेलकम पाडडर के इस्तेमाल से भी गर्भाशय कैंसर की आशंक बढ़ जाती है।
गर्भाशय कैंसर को खामोश हत्यारा भी कहा जाता है क्योंकि अक्सर इसकी  पहचान गंभीर अवस्था में ही होती  है। तकरीबन 70फीसदी मरीजों में इसके लक्षण तीसरी एवं चौथी अवस्था में ही प्रकट होते हैं। गर्भाशय कैंसर के समान्य लक्षणों में पेट फूलना ,पेट दर्द,योनि से रक्त स्राव और पेशाब के रास्ते संक्रमण जैसी समस्यायें शामिल हैं। इन लक्षणों में से एक भी लक्षण उभरने पर महिला की श्रोणि(पेल्विक)की जांच करानी चाहिये ताकि प्रारंभिक अवस्था में ही इसकी पहचान हो जाये।
गर्भाशय कैंसर की जांच का संबसे प्रचलित तरीका पैप स्मीयर जांच है। इसके तहत योनि के भीतर या गर्भाशय ग्रीवा से कुछ कोशिकायें निकाल कर उनकी जांच की जाती है।लेकिन कई मामलों में यह युक्ति  अपर्याप्त साबित हुयी है। पैप स्मीयर जांच कराने वाली एक से दो प्रतिशत महिलाओं में गलत निष्कर्ष निकलते हैं। अमरीका के न्यू हैवेन सेंटर की ओर से किये गये 
अध्ययनों के दौरान पैप स्मीयर जांच के निष्कर्षों में अनियमिततायें पायी गयीं।पैप स्मीयर की तुलना में इंडोवेजाइनल अल्ट्रासाउंड एवं रंगीन डॉप्लर जैसी नयी तकनीकें इस कैंसर 
की जांच के मामले में अधिक सही एवं कारगर साबित हुयी है। इसके अलावा इस कैंसर की जांच के लिये पेंटोनियल साइटोलाजी,सीरम सी ए-25,कैट स्कैन और लैपरोस्कोपी का भी इस्तेमाल किया जाता है।
इस कैंसर के इलाज के लिये विकिरण  चिकित्सा ,औषधि चिकित्सा( कीमोथेरेपी) एवं शल्य चिकित्सा का सहारा लिया जाता है। प्रारंभिक अवस्था में जब यह कैंसर गर्भाशय ग्रीवा तक ही सीमित होता है और आसपास की उतकों तक नहीं पहुंचा होता है तब विकिरण चिकित्सा की मदद से इस बीमारी को पूरी तरह समाप्त किया जा सकता हैं। कैंसर की इस प्रारंभिक अवस्था में 90 फीसदी मरीजों को नयी जिंदगी दी जा सकती है।लेकिन कैंसर कोशिकाओं के आसपास फैलने तथा योनिक के ऊपरी एक तिहाई हिस्से  में फैलने लेकिन श्रोणीगुहा   तक ही सीमित रहने की अवस्था में सर्जरी की सहायता ली जाती है। सर्जरी के जरिये गर्भाशय,योनि के ऊपरी हिस्से और प्रभावित क्षेत्र से लिम्फ ग्रंथियों को निकाल देने पर 62प्रतिशत मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं।
इसके बाद की तीसरी एवं चौथी अवस्था में इलाज के लिये साइटोरिडक्टिव सर्जरी और कीमोथेरेपी का सहारा लिया जाता है।आपरेशन के जरिये कैंसर ग्र्रस्त कोशिकाओं को निकाल देने के बाद शेष कैंसर ग्रस्त कोशिकाओं को दवाइयों से समाप्त किया जाता है।


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