Monday, 25 November 2019

आर्थराइटिस रिवर्सल प्रोग्राम की मदद से आर्थराइटिस से निजात

डा. सुभाष शल्या
आर्थराइटिस जोड़ों के दर्द की आम समस्या है जिसमें जोड़ घिस जाते हैं। किसी जोड़ में सूजन, दर्द और अकड़न होने का मतलब आर्थराइटिस की शुरूआत है। अधिक उम्र के लोगों को मौसम के साथ जोड़ों के दर्द के घटने-बढ़ने की शिकायत अधिक होती है। इसके अलावा 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को उनके शरीर में होने वाले हार्मोन संबंधी परिवर्तन के कारण भी मौसम का जोड़ों पर अधिक प्रभाव पड़ता है। कभी-कभी आनुवांशिक कारणों से भी जोड़ों का दर्द होता है। उदाहरण के तौर पर 16 से 30 वर्ष के एंकालोजिंग आर्थोपेथिज से पीड़ित लोग भी जोड़ों में भारी सूजन और दर्द की शिकायत करते हैं। 


आर्थराइटिस के बारे में माना जाता है कि यह दमा की तरह दम के साथ ही जाता है। लेकिन अब यह धारणा गलत साबित हो रही है। आर्थराइटिस के गंभीर हो जाने पर शल्य चिकित्सा की मदद से जोड़ बदलना पड़ता है। आथ्र्राइटिस के मरीज आम तौर पर उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे रोगों से भी पीड़ित होते हैं। ऐसे मरीजों में जोड़ बदलने (टोटल ज्वाइंट रिप्लेसमेंट) का आॅपरेशन करना मुश्किल होता है। इसके अलावा जोड़ बदलने का खर्च भी तीन से चार लाख रुपये के आसपास आता है जो आम लोगों के सामथ्र्य के बाहर की बात है। लेकिन विशेष व्यायामों, दवाईयों तथा संतुलित और पौष्टिक भोजन की मदद से जोड़ों की समस्या से पीड़ित लोगों में आॅपरेशन की जरूरत काफी हद तक और यहां तक कई मामले में बिल्कुल समाप्त की जा सकती है। 
आथ्र्राइटिस के मरीजों में जोड़ बदलने की अनिवार्यता को टालने के लिये अपने वर्षों के अनुभवों एवं अध्ययनों के आधार पर आथ्र्राइटिस रिवर्सल थिरेपी का विकास किया है। वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित इस थिरेपी की मदद से आथ्र्राइटिस से ग्रस्त जोड़ों के बिगड़े हुये अलाइनमेंट को सर्जरी बगैर ठीक किया जाता है। इसके अलावा शारीरिक वजन, उच्च रक्त चाप और मधुमेह जैसी बीमारियों को नियंत्रित रखा जा सकता है। 
आर्थराइटिस के मरीजों के लिये नयी दिल्ली में स्थापित बोन ज्वाइंट्स केयर फाउंडेशन आफ इंडिया के तहत चलाये जा रहे आर्थराइटिस रिवर्सल प्रोग्राम की बदौलत अब तक सैकड़ों मरीजों को सर्जरी के बगैर सामान्य एवं सक्रिय जीवन जीने लायक बनाया जा चुका है। इस पद्धति की मदद से उन मरीजों को भी सामान्य जीवन जीने योग्य बनाया जा सकता है जो रह्मूेटाॅयड आर्थ्राइटिस के कारण विकलांग हो चुके और कई जगह इलाज कराकर निराश हो चुके हैं। इसके अलावा ओस्टियो आर्थराइटिस के जिन मरीजों को घुटने बदलवा लेने की सलाह दी गयी है उन्हें भी इस पद्धति से लाभ मिला है और जोड़ बदलवाये बगैर वे सामान्य जीवन जी रहे हैं। 


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