Monday, 25 November 2019

ठंड के मौसम में दमा से बचायेगी होलिस्टिक चिकित्सा

सर्दियों के मौसम में ठंडी हवा तथा सघन प्रदूषण के कारण दमा की समस्या बहुत अधिक बढ़ जाती है। होलिस्टिक चिकित्सा की मदद से सर्दियों में दमा के प्रकोप से बचा जा सकता है। दुष्प्रभाव पैदा करने वाली दमा की दवाईयों एवं इनहेलरों की तुलना में होलिस्टिक चिकित्सा से इलाज पूरी तरह से कारगर एवं दुष्प्रभाव रहित है। यही नहीं इस होलिस्टिक चिकित्सा की मदद से दमा को पूरी तरह से जड़ से ठीक किया जा सकता है।
सर्दियों के मौसम में कड़कड़ाती ठंड के कारण दमा का प्रकोप बढ़ जाता है। कई बार ठिठुराने वाली ठंड दमा के अनायास दौरे का कारण बनती है। हमारे फेफडे़ ठंड के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। कुछ लोगांे को तो दमा बदलते मौसम में ज्यादा तंग करता है क्योंकि इस समय वातावरण में एलर्जन की मात्रा सबसे अधिक होती है। ठंड बढ़ने के साथ ही ठंडी हवा और खुश्क मौसम के कारण दमा का प्रकोप बढ़ जाता है। खुश्क हवा के कारण फेफड़े अधिक म्यूकस का उत्पादन करने लगते हैं। ये गाढ़े म्यूकस फेफड़े में हवा गुजरने वाले रास्तों को बंद कर देते हैं जिससे दमा का अटैक होने की आशंका बढ़ जाती है। इसके अलावा जाड़े के दिनों में वाहनों के धुंये और अन्य प्रदूषक वातावरण में ऊपर नहीं उठ पाते और जमीन पर ही जमे रह जाते हैं। इसके कारण भी जाड़े के दिनों में दमा का प्रकोप अधिक होता है। इन कारणों से सर्दियों के मौसम में अधिक परहेज की जरूरत है। आधुनिक (एलोपैथी) चिकित्सा में हालांकि आज ऐसी कई दवाईयां हैं जिनसे दमा को नियंत्राण में रखा जा सकता है। अब तक इसके कारगर उपचार का कोई उपाय विकसित नहीं हो पाया है। आधुनिक चिकित्सा में दमा को नियंत्राण में रखने तथा दमा के मरीजों को राहत दिलाने के लिये शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाईयों, संास नलिकाओं को खोलने वाली (ब्रोंको डाइलेटर्स) दवाईयों, स्टेराॅयडों, इनहेलरों, नेबुलाइजरों तथा वेंटिलेटरों का इस्तेमाल होता है लेकिन इन उपायों का लंबे समय तक इस्तेमाल करने से मरीजों को तरह-तरह के दुष्प्रभावों का भी सामना करना पड़ता है। यही नहीं इन तमाम आधुनिक उपलब्धियों के बावजूद दमा का प्रकोप और इसके कारण होने वाली अचानक मौतों की संख्या बढ़ती जा रही है। नौजवान और बालिग इसके अधिक शिकार हो रहे हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ भी इसके कारण का पता नहीं लगा पाए हैं। दूसरी तरफ तेजी से लोकप्रिय हो रही होलिस्टिक चिकित्सा दमा एवं ब्रोंकाइटिस जैसी श्वसन संबंधी बीमारियों के इलाज में बहुत ही कारगर साबित हो रही है। 
दमा आम तौर पर श्वसन नलिकाओं में सिकुड़न, सूजन अथवा बलगम जमा होने के कारण होता है। इस कारण दमा के मरीजों को सांस लेने में काफी तकलीफ होती है। उन्हें खांसी और बेचैनी भी होती है। दुष्प्रभाव पैदा करने वाली शक्तिशाली दवाईयों की तुलना में होलिस्टिक चिकित्सा पूर्णतः सुरक्षित, दुष्प्रभावरहित एवं कारगर विकल्प है। होलिस्टिक चिकित्सा में एक्युपंक्चर एवं योग जैसी वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियांे का इस्तेमाल किया जाता है। डा. रविन्द्र तुली और उनके नेतृत्व में जैव ऊर्जा, एक्युपंक्चर, रेकी, प्राणिक हीलिंग एवं योग की विभिन्न पद्धतियों की मदद से दमा उपचार की सुरक्षित विधियों का विकास किया गया है। 
होलिस्टिक चिकित्सा वैकल्पिक, प्राकृतिक, प्राचीन और आधुनिक चिकित्सा पद्धति का सम्मिश्रण है। इस पद्धति से इलाज के तहत मरीज के अंदर मौजूद रोगों से लड़ने वाले तत्वों को सक्रिय किया जाता है। इस पद्धति से इलाज के तहत न तो आॅपरेशन की जरूरत होती है और न ही मरीज को कोई दवा दी जाती है। डा. तुली होलिस्टिक चिकित्सा की एक महत्वपूर्ण पद्धति एक्युपंक्चर के बारे में बताते हैं कि एक्युपंक्चर चिकित्सा के तहत त्वचा के कुछ खास बिन्दुओं के स्पंदन (स्टीमुलेशन) से शरीर के विभिन्न अंगों के कार्यकलापों को प्रभावित किया जाता है। इस चिकित्सा में पूरे शरीर में त्वचा के नीचे अवस्थित एक्युपंक्चर बिन्दुओं में अत्यंत पतली सुईयां चुभोकर रोगों को दूर किया जाता है और शरीर के विभिन्न अंगों की कार्यप्रणालियों को दुरूस्त रखा जाता है। माना जाता है कि ये एक्युपंक्चर बिन्दु ऊर्जा चैनलों पर स्थित हैं। एक्युपंक्चर सुईयों को विद्युत ऊर्जा की मदद से भी स्पंदित किया जा सकता है। डा. तुली बताते हैं कि एक्युपंक्चर चिकित्सा के तहत बाल जैसी महीन और नरम तथा किटाणु रहित स्टीरीलाइज्ड पिनों के ऊपर मौक्सा जड़ी को जलाकर 20 से 30 मिनट तक के लिये छोड़ दिया जाता है। इस दौरान मरीज को संबद्ध अंग में संवेदना होती है और वह तनाव रहित महसूस करता है। कई बार मरीज की जरूरत के अनुसार मोक्सा जड़ी-बूटियों को एक्युपंक्चर बिन्दु के ऊपर सेक दिया जाता है। इस विधि को मोक्सीबस्शन कहा जाता है। सुईयों के जरिये विद्युतीय स्पदंन भी दिया जा सकता है। एक्युपंक्चर चिकित्सा की अन्य विधियों में एक्युपे्रशर, गोलाकार प्रोब से टैपिंग और लेजर का भी इस्तेमाल किया जाता है। ये विधियां बच्चों और सुईयों से डरने वाले लोगों के लिये उपयुक्त है। कई मरीजों में दो-तीन बार के उपचार में ही फायदा नजर आने लगता है लेकिन कई बार रोग को जड़ से निकालने में कई माह लग जाते हैं। 
होलिस्टिक चिकित्सा से न सिर्फ दमा का जड़ से सफाया किया जाता है बल्कि इससे रोगी के संपूर्ण स्वास्थ्य में भी आश्चर्यजनक सुधार होता है जिससे उसका जीवन आनन्दमय हो जाता है। इस पद्धति से दमा का इलाज कराने से छात्रा, शारीरिक श्रम करने वाले लोग, घरेलू महिला और बड़े-बूढ़े लोगों - हर किसी को समान रूप से फायदा होता है। लेकिन मरीजों को होलिस्टिक चिकित्सा के सुयोग्य एवं प्रशिक्षित विशेषज्ञों के पास ही जाना चाहिये अन्यथा लाभ के बजाय नुकसान हो सकता है। 
डा. रविन्द्र कुमार तुली नयी दिल्ली में होलिस्टिक मेडिसीन विशेषज्ञ हैं। 


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