Sunday, 24 November 2019

कंधे और कोहनी की सर्जरी अब भारत में

घुटने की तुलना में कंधे और कोहनी के अधिक छोटे और नाजुक होने के कारण इनके जोड़ों की सर्जरी बहुत ही जटिल होती है, लेकिन नयी तकनीकों की बदौलत इन जोड़ों की खराबियों को दूर करने के लिये सर्जरी संभव हो गयी है। अब हमारे देश के कुछ चुनिंदा केन्द्रों में भी कंधे एवं कोहनी की चीर-फाड़ किये बगैर आर्थोस्कोपी सर्जरी तथा जोड़ों को बदलने की सर्जरी (टोटल शोल्डर एंड एलबो रिपलेसमेंट) भी होने लगी है।
पिछले कुछ दशकों में अस्थि शल्य चिकित्सा में शानदार कामयाबियां हासिल हुयी हंै। इनकी बदौलत दुनिया भर में घुटने और कूल्हे बदलने के आॅपरेशन (टोटल ज्वाइंट रिप्लेसमेंट) और घुटने की आर्थोस्कोपी (की होल सर्जरी) जैसी तकनीकों का व्यापक इस्तेमाल होने लगा है। इन तकनीकों की बदौलत आथ्र्राइटिस तथा निचले भाग की विभिन्न जोड़ों की व्याधियों और चोटों के उपचार में अत्यंत साकारात्मक प्रगति हुयी है। हालांकि निचले भाग की जोड़ों के उपचार में मिली कामयाबियांे के बावजूद अभी हाल तक उपरी भाग की जोड़ों की सर्जरी के मामले में ज्यादातर सर्जनों ने दिलचस्पी नहीं दिखायी है। लेकिन अब ऊपरी भाग की जोड़ों की सर्जरी के क्षेत्रा में काफी विकास हुआ है। 
शरीर के निचले भाग के जोड़ वजन उठाने वाले होते हैं। ये तुलनात्मक रूप से मजबूत और बड़े होते हैं। इस कारण इनकी सर्जरी अपेक्षाकृत आसान होती है। जबकि शरीर के ऊपरी अंगों के जोड़ अपेक्षाकृत छोटे और कम मजबूत होते हैं। लेकिन हम इन जोड़ों का निचले भाग के जोड़ों की तुलना में बहुत अधिक इस्तेमाल करते हैं। इन कारणों से ऊपरी अंगों के जोड़ों की सर्जरी अधिक मुश्किल होती है। 
अस्थि शल्य चिकित्सा के क्षेत्रा में विकसित नयी तकनीकों की मदद से अब ऊपरी अंगों की जोड़ों की सर्जरी आसान हो गयी है। आथ्र्राइटिस या चेाट के कारण ऊपरी अंगों के जोड़ों के पूरी तरह खराब हो जाने पर जोड़ों को बदलने के आॅपरेशन (टोटल शोल्डर एंड एलबो रिप्लेसमेंट) तथा जोड़ों के क्षतिग्रस्त होने पर आथ्र्राेस्कोपी आधारित आॅपरेशन संभव हो गया है। आर्थोस्कोपी की मदद से दो छोटे चीरे लगाकर ही जोड़ों का आॅपरेशन किया जा सकता है। आर्थोस्कोपी सर्जरी कंधे की जोड़ की हड्डियों के हट जाने, खेल कूद के दौरान चोट लगने और कंधे की जोड़ के जाम हो जाने जैसी समस्याओं के समाधान के लिये खास तौर पर उपयोगी है। 
अभी तक कंधे या कोहनी की समस्याओं की जांच एवं इलाज का कोई संतोषजनक समाधान नहीं था। इसके इलाज के तौर पर मरीजों को दर्दनिवारक दवाईयां दी जाती थी, उनकी फिजियोथिरेपी करायी जाती थी और स्टेराॅयड के इंजेक्शन दिये जाते थे। लेकिन इन उपायों से उन्हें फौरी राहत ही मिलती थी। लेकिन आर्थोस्कोपी की मदद से अब जोड़ों के भीतर झांकना और जोड़ की समस्या का सही-सही आकलन संभव हो गया है। इसके अलावा जोड़ में एक अन्य छेद करके अत्यंत सूक्ष्म एवं मुलायम उपकरण प्रविष्ट कराकर समस्या को कारगर तरीके से दूर किया जा सकता है। इस तकनीक की मदद से घुटने, कंधे, जांघ जैसी लगभग सभी जोड़ों की खराबियों को दूर किया जा सकता है। आर्थोस्कोपी पद्धति से आॅपरेशन के दौरान घुटने या अन्य जोड़ों के अंदर एक सूक्ष्म दूरबीन या टेलीस्कोप को प्रवेश कराया जाता है और दूरबीन को एक प्रकाश स्रोत तथा कैमरे के साथ जोड़ दिया जाता है जिससे टी वी स्क्रीन पर घुटने के अंदर के सारे भाग दिखाई पड़ते हैं। इसके आधार पर ही आॅपरेशन किया जाता है। आर्थोस्कोपी से आॅपरेशन के लिए मरीज को सिर्फ एक दिन अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता है। आथ्र्राइटिस और चोट के कारण कोहनी अथवा कंधे की जोड़ों को स्थायी नुकसान होने पर इन जोड़ों को सफलतापूर्वक बदला जा सकता है। 
पिछले पांच से दस साल से शरीर के ऊपरी भाग की जोड़ों की सर्जरी की सुविधायें केवल अमरीका और यूरोप के देशों में उपलब्ध थी। लेकिन अब भारत के कुछ गिने-चुने चिकित्सा केन्द्रों में भी ये सुविधायें उपलब्ध हो गयी है। पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत कम खर्च में ही ये सुविधायें भारत में उपलब्ध हो गयी हैं। 
डा. राजू वैश्य नई दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में वरिष्ठ अस्थि शल्य चिकित्सक हैं। वह नई दिल्ली में डिफेंस काॅलोनी स्थित हीलिंग टच क्लिनिक के निदेशक हैं। 


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