Friday, 8 November 2019

ऑपरेशन बगैर हाइपरट्रोपिक कार्डियोमायोपैथी का इलाज

हाइपरट्रोपिक कार्डियोमायोपैथी हृदय मांसपेशियों की वंशानुगत बीमारी है जिससे मरीज की अचानक मौत तक हो सकती है। यह बीमारी हृदय मांसपेशियों की उन बीमारियों (कार्डियोमायोपैथी) में शुमार है जो हृदय की रक्त धमनियों की आम बीमारियों (कोरोनरी एथरोस्क्लेरोसिस) के विपरीत किसी भी उम्र यहां तक कि बचपन या युवावस्था में भी हो सकती है। इस बीमारी और इसके इलाज के बारे में बता रहे हैं प्रसिद्ध हृदयरोग चिकित्सक और नयी दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डा.के.के.सक्सेना।


कार्डियोमायोपैथी में हृदय की मांसपेशियां रक्त को पंप करने की क्षमता खो देती हैं। कुछ मरीजों में हृदय की लयबद्धता गड़बड़ा जाती है जिससे हृदय की धड़कन असामान्य हो जाती है। अभी तक हृदय की मांसपेशियों के कमजोर होने के कारणका  ठीक तरह से पता नहीं चल पाया है। अमरीका में करीब पचास हजार लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं। इस बीमारी के अनेक रोगी को हृदय का प्रत्यारोपण करने की भी जरूरत पड़ती है।


कार्डियोमायोपैथी कई तरह की होती है जिसमें हाइपरट्रोपिक कार्डियोमायोपैथी का प्रकोप काफी अधिक है। यह बीमारी एथलीटों और शारीरिक श्रम करने वालों के लिये अचानक मौत का कारण बनती है। हाइपरट्रोपिक कार्डियोमायोपैथी में हृदय मांसपेशियों के फाइबर का विकास एवं समायोजन असामान्य होता है जिससे हृदय की मांसपेशियां मोटी हो जाती हैं। इस बीमारी में मुख्य तौर पर हृदय  के प्रमुख पंपिंग चैम्बर (बायें निलय) खास तौर पर दांयंे  तथा बायंे  निलय (वेंट्रिकल) को विभाजित करने वाली दीवार (सेप्टम) में मोटापे की घटना होती है। हृदय मांसपेशियों के मोटे होने से पंपिंग चैम्बर का आकार छोटा हो जाता है और रक्त प्रवाह में रुकावट होती है। परिणामस्वरूप  हृदय की पंपिंग क्षमता घट जाती है।


यह बीमारी पुरुषों  एवं महिलाओं दोनों को किसी भी उम्र में हो सकती है। इसके लक्षण आम तौर पर वयस्क होने पर प्रकट होते हैं। आम तौर पर इसके लक्षण 20 से 60 साल की उम्र के बीच प्रकट होते हैं लेकिन कुछ मरीजों में कोई अन्य लक्षण प्रकट हुये बगैर उनकी अचानक मौत हो जाती है। यह बीमारी पैदाइशी और वंशानुगत होती है। इसलिये जिस परिवार में इस रोग का इतिहास हो उस परिवार के सदस्यों को इस रोग के लिये नियमित जांच करानी चाहिये।


इस बीमारी में छाती में तकलीफ, चक्कर, सांस लेने में दिक्कत, थकावट, कमजोरी, शारीरिक श्रम, भाग-दौड़ या व्यायाम के दौरान बेहोशी, हृदय की धड़कन बहुत अधिक बढ़ जाने जैसे लक्षण हो सकते है। बांये निलय में रक्त प्रवाह में रुकावट बढ़ने के साथ मरीज की हालत गंभीर होती जाती है।


इस बीमारी की जांच की सबसे अच्छी विधि इकोकार्डियोग्राफहै। इसमें ध्वनि तरंगों की मदद से हृदय मांसपेशियों में मोटापे तथा हृदय की कार्यक्षमता का आकलन किया जा सकता है। इस बीमारी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिये रेडियो न्यूक्लियाइड अध्ययन किये जा सकते हैं। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर छाती के एक्स-रे, कार्डियो कैथेराइजेशन और हृदय मांसपेशियों  की बायोप्सी की मदद भी ली जा सकती है।


बीमारी के इलाज के लिये आम तौर पर दवाइयों, पेस मेकर एवं सर्जरी की मदद ली जाती है। हाल में एंजियोप्लास्टी की तकनीक पर आधारित आरंभिक अवस्था में बीटा ब्लाकर्स जैसी दवाइयों की मदद से हृदय आरंभिक अवस्था में बीटा ब्लाकर्स जैसी दवाइयों की मदद से हृदय की   चीर-फाड़ की जरूरत  नहीं पड़ती और मरीज बहुत जल्द ठीक हो जाता है। इस बीमारी के आरंभिक अवस्था में बीटा ब्लाकर्स जैसी दवाइयों की मदद से हृदय की पंपिंग को धीमा करके मरीज को आराम पहुंचाया जाता है। इसके अलावा कैल्शियम चैनल ब्लाकर्स की मदद से हृदय पर रक्त दाब घटाया जाता है। एंटीएरिथमिक दवाइयों की मदद से हृदय के रुकने  की आशंका टाली जाती है। हालांकि दवाइयों का सभी मरीजों में लाभ नहीं होता है और कुछ मरीजों में फेफड़े में पानी भर जाने, रक्त दाब गिर जाने और अचानक मौत होने जैसे इसके गंभीर दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। कुछ मरीजों को पेसमेकर और सर्जरी की जरूरत  पड़ सकती है। अभी हाल तक गंभीर रोगियों के लिये एकमात्र विकल्प ऑपरेशन ही था। ऑपरेशन के लिये हृदय को खोल कर हृदय की मांसपेशियों के बढ़े हुये भाग को काटना पड़ता है ताकि रक्त प्रवाह में रुकावट  समाप्त हो जाये।


इस बीमारी के इलाज के लिए बैलून एंजियोप्लास्टी आधारित एक नयी तकनीक का विकास हुआ है। इस तकनीक की मदद से चीर-फाड़ के बगैर हृदय की मांसपेशियों के अतिरिक्त हिस्से को निकाल लिया जाता है। इस तकनीक में एक्स-रे एवं इकोकार्डियोग्राफी की निगरानी में खास सेप्टम आर्टरी में गाइड वायर (तार) डाली जाती है। इसके बाद तार से प्रभावित भाग तक बैलून ले जाया जाता है और उसकी मदद से आर्टरी के अंदर शुद्ध अल्कोहल इंजेक्ट कर दिया जाता है। इससे हृदय मांसपेशियों का अतिरिक्त हिस्सा मृत हो जाता है।


इस चिकित्सा से रक्त प्रवाह सुचारू  हो जाता है। इस तकनीक से 90 प्रतिशत मरीजों में सफलता मिलती है। मरीज को मात्र दो-तीन दिन अस्पताल में रहना पड़ता है। यह तकनीक नयी है लेकिन बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रही है। दुनिया भर में अब तक कई हजार मरीजों का इस तकनीक से इलाज हो चुका है।


 


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