Sunday, 10 November 2019

पेट की गैस कहीं बड़ी समस्या में न बदल जाए

आजकल पेट में गैस बनना एक साधारण बात हो गई है। पाचन तंत्र में विकार उत्पन्न होने की वजह से उदर और आंतों में गैस की समस्या उत्पन्न हो जाती है है। गैस बनना किसी रोग का लक्षण भी हो सकता है। अधेड़ उम्र के लोग इससे अधिक पीड़ित रहते हैं क्योंकि इस उम्र में पाचन क्रिया कमजोर होने लगती है। लोग अक्सर इसे आम समस्या समझकर नजर अंदाज कर दिया करते हैं।
गैस उदर या आंतों में बनती है। उदर व आंत शरीर के वे भाग हैं जिसमें आहार का पाचन होता है। पाचन के लिए आमाशयिक रस की जरूरत होती है। अमाशयिक रस में एंजाइम, पेप्सिन, लाइपेज और रेनिन होते हैं। पेप्सिन, हाइड्रो क्लोरिक अम्ल के साथ मिलकर प्रोटीन को पेप्टीन में बदलता है। रेनिन, दूध के केसीनोजन को गाढ़ा करता है और लाइपेज वसा का पाचन कराता है। अमाशयिक रस द्वारा ही कुछ विषैले पदार्थ जैसे विष, धातु, अल्केलोइड्स आदि निकलते हैं। अनावश्यक जीवाणुओं व कीटाणुओं का नाश भी अमाशयिक रस के द्वारा ही होता है। खाने की चीजों के पाचन के लिए अमाशयिक प्रक्रिया के दौरान पोषक तत्व सोख लिए जाते हैं, और अनचाहे अवशेष मलमूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं। पाचन क्रिया के तहत रासायनिक प्रक्रिया होती है और गैस बन जाती है। गैस का अधिक या कम बनना पाचन शक्ति, व्यक्ति की आयु, शारीरिक और मानसिक रोग और खाने की चीजों के मिश्रण आदि पर निर्भर होता है।
पेट की गैस दो प्रकार की होती है। एक तो वह जो भोजन करते समय हमारे पेट में पहुंच जाती है। जैसे− नाइट्रोजन, ऑक्सीजन। दूसरी कार्बन डाइआक्साइड, हाइड्रोजन और मीथेन है जो पाचन प्रक्रिया के दौरान आंतों में बनती है। एक स्वस्थ व्यक्ति में ये गैसें कम मात्रा में होती हैं जो कि मलद्वार या डकार से आसानी से बाहर निकल जाती हैं। परन्तु अधिक मात्रा में गैस बनने और पाचन क्रिया के दौरान इसके भोजन में मिलने के कारण इससे कष्ट देने वाले लक्षण पैदा होने लगते हैं। खाना खाने के एक या दो घंटे पश्चात पेट में भारीपन महसूस होता है और सांस लेने में भी तकलीफ होती है तथा मलद्वार से अधिक गैस निकलने के कारण आंतों में अनपचे कार्बोहाइडे्रट का बैक्टीरिया द्वारा फर्मेंटेशन होता है। ये गैसें अधिकतर हाइड्रोजन कार्बन डाईआक्साइड और मीथेन होती हैं। सामान्यतः इनमें कोई गंध नहीं होती।
पेट के दर्द की वजह गैस नहीं है। दर्द आंतों की गतिशीलता में कमी की वजह से होता है। ज्यादा गैस बनना किसी गंभीर रोग से संबंधित हो सकता है। खट्टी डकारें आना, पेट का फूलना और मलद्वार से दुर्गंधमय गैस निकलने को नजरअदांज नहीं किया जाना चाहिए। इनका पूरा इलाज होना जरूरी है। उदर के रोग जैसे गैस्ट्राइटिस, पेट में अल्सर या पेप्टिक कैंसर, आंतों के रोग एंट्राइटिस, अल्सर, एमीबाइसिस तथा जिआर्डिएसिस आदि से भी गैस की समस्या हो सकती है।
इसके अलावा हवाई यात्रा में भी गैस विकार की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। हवाई यात्रा के दौरान इस रोग से ग्रस्त लोगों को अधिक सावधानी की आवश्यकता होती है क्योंकि हवाई जहाज में वायुमण्डल का दबाव कम होने के कारण उदर की गैस आयतन में तीस प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है और कष्टदायक लक्षण सामने आने लगते हैं।
मुंह और सांस लेने के अंगों में विकारों की वजह से भी गैस की समस्या हो सकती है। नाक, सांस में बाधा, टौंसिल और एडिनाइड का इलाज आसानी से संभव हो सकता है और अगर गैस की समस्या इनके कारण से हो तो उसे दूर किया जा सकता है। इसी तरह दांतों के विकार और कृत्रिम दांतों की बनावट के कारण होने वाले विकार भी गैस के लक्षण हो सकते हैं।
शिशुओं में भी गैस विकार की समस्या पाई जाती है। शिशु मां से या बोतल से दूध पीते समय मुंह से हवा अंदर ले लेते हैं। इस प्रकार दूध के साथ−साथ आक्सीजन और नाइट्रोजन गैसें भी उनके पेट में पहुंच जाती हैं। यदि पेट में गैस ज्यादा मात्रा में हो जाती है तो वह दूध पीना छोड़ देता है और बेचैनी महसूस करता है, रोने लगता है और यदि यह गैस समय पर डकार द्वारा नहीं निकलती है तो या तो शिशु उल्टी कर देता है या फिर उसे असमय ही गैस के साथ मल हो जाता है।
गैस निकालने के लिए बच्चे को दूध पिलाने के बाद कंधे से लगाकर पीठ थपथपानी चाहिए, जब तक कि वह डकार न ले ले। गैस के विकार से होने वाली समस्या से बचने के लिए खाने−पीने में सफाई की आदत की जरूरत होती है। जल्दी−जल्दी जरूरत से ज्यादा खाना, खाते समय, चिंता या मानसिक तनाव से ग्रस्त होना, भोजन के समय बीच−बीच में ज्यादा पानी पीना आदि गैस की परेशानी को और अधिक बढ़ाते हैं। जुलाब की गोलियों का बार−बार इस्तेमाल भी हानिकारक होता है।
गैस के अलग−अलग शारीरिक और रोगात्मक कारण होते हैं इसलिए हर किसी के लिए एक सा भोजन उपयुक्त नहीं होता। जिन खाने की चीजों से गैस बनने की संभावना हो उनसे बचना चाहिए। कोका कोला, पेप्सी, सोड़ा आदि पेय ज्यादा गैस पैदा करते हैं क्योंकि इन सब में कार्बन डाईआक्साइड तथा सोडे की मात्रा ज्यादा होती है। ऐसी खाने की चीजों से भी बचना चाहिए जिनमें लेक्टोज की मात्रा ज्यादा होती है। बच्चों को लेक्टोज रहित आहार के तहत न्यूट्रा माइजेन जैसे एमिनो एसिड, प्रोटीन हाइड्रोलाइसेट या फिर सोयाबीन का दूध दिया जा सकता है। बड़ों को सभी प्रकार के दूध, आइस्क्रीम, चीज, दूध से बनी मिठाई, दूध से बने पेय, सफेद ब्रेड, बिस्कुट, क्रीम सूप, क्रीम युक्त व्यंजन और ठंडे मांसाहार से बचना चाहिए।
कुछ सब्जियां और फल भी अधिक गैस बनाते हैं। फूल गोभी, पत्ता गोभी, सूखी फलियां, ककड़ी, हरी मिर्च, सलाद, मटर, मूली, प्याज, कच्चे सेब, तरबूज, खरबूजा आदि अधिक गैस बनाते हैं। तले हुए या वसायुक्त पदार्थों से भी ज्यादा गैस बनती है। इनके इस्तेमाल से आंतों में कार्बन डाईआक्साइड बनती है।
अन्य रोगों की तरह गैस विकार की समस्या पर काबू पाने के लिए भी नियमित व्यायाम और योगाभ्यास लाभदायक होते हैं। सुबह शाम 2−4 किलोमीटर तक घूमना गैस की समस्या को दूर करने के लिए अच्छा व्यायाम है। इससे रक्त संचार भी ठीक बना रहता है। पाचन शक्ति भी सही रहती है। मानसिक तनाव से दूर रहते हुए शांति से सादा भोजन, इसका सबसे बड़ा इलाज है।
खाना खाते वक्त कम पानी पीना चाहिए। क्योंकि अधिक पानी पाचन के लिए हानिकारक होता है। रात को देर से भोजन करना भी गैस की समस्या को बढ़ाता है। भोजन को ठीक से पचने के लिए 6−8 घंटे लगते हैं। इसके लिए पूर्ण आराम और 7−8 घंटे की नींद आवश्यक होती है। इन सावधानियों को बरतने के बाद भी यदि गैस से पीछा न छूटे तो किसी विशेषज्ञ से सलाह लें।


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