Wednesday, 6 November 2019

पेट को दर्द दिये बगैर पेट दर्द से छुटकारा

पेट दर्द की परिणति कई बार खतरनाक या जानलेवा स्थितियों के रूप में होती है। कई बार तो अनपच, गैस एवं अम्लता जैसे मामूली कारण पेट दर्द के सबब बनते हैं लेकिन कई बार पथरी, कोलोन कैंसर, एपेंडिसाइटिस और अल्सर जैसी खतरनाक स्थितियां पेट दर्द का कारण बनती हैं। एक समय इन खतरनाक स्थितियों को दूर करने के लिये पेट चीर कर ऑपरेशन का सहारा लेना पड़ता था लेकिन आज लैपरोस्कोपी एवं माइक्रो लैपरोस्कोपी की मदद से इन समस्याओं को आसानी से दूर किया जा सकता है।
सुप्रसिद्ध लैपरोस्कोपी सर्जन तथा फरीदाबाद स्थित एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (ए आई एम एस) के चेयरमैन डा. नरेन्द्र कुमार पाण्डे बताते हैं कि लैपरोस्कोपी एवं माइक्रो लैपरोस्कोपी तकनीक की मदद से पित्त की थैली, बच्चेदानी, आंतों और किडनी जैसे पेट के विभिन्न अंगों की समस्याओं को दूर किया जा सकता है।
पेट दर्द की असहनीय पीड़ा से शायद ही कोई व्यक्ति अनजान होगा। आम तौर पर पेट दर्द के अनेकानेक कारण होते हैं। अक्सर पेट दर्द की तीव्रता का संबंध बीमारी की गंभीरता से नहीं होता है। उदाहरण के तौर पर कई बार तेज पेट दर्द अनपच, गैस, अम्लता और आंतों में एेंठन जैसे मामूली कारणों से हो सकते हैं जबकि मामूली पेट दर्द कोलोन कैंसर अथवा एपेंडिसाइटिस और अल्सर जैसी जानलेवा स्थितियों का सूचक हो सकता है। लेकिन इसके बावजूद अक्सर देखा गया है कि लोग पेट दर्द होने पर कोई दर्दनिवारक दवाई खा लेते हैं और पेट दर्द ठीक होने पर वे निश्चिंत हो जाते हैं।
एसोसिएशन ऑफ सर्जन्स ऑफ इंडिया (एएसआई) के अध्यक्ष डा. पाण्डे बताते हैं कि पेट दर्द जिन कारणों से हो सकते हैं उनमें खाद्य विषाक्तता, संक्रमण, अल्सर, मासिक स्राव, अंडोत्सर्ग, हर्निया, उपापचय में गड़बड़ियां, एपेंडिसाइटिस, पेल्विक संक्रमण, इंडोमेट्रियोसिस, इरिटिबल बाउल सिंड्रोम, पेट में रक्त स्राव, कैंसर, पथरी, गांठ या ट्यूमर के अलावा पित्त नली, यकृत, वृक्क (रीनल), मूत्राशय, जननागों और मूत्रमार्ग, रक्त वाहिनियों और अग्न्याशय की बीमारियां शामिल हैं। दरअसल पेट दर्द के इतने कारण हैं जिन्हें गिनाना संभव नहीं होता है। पेट दर्द के कारणों को जानने में पेट दर्द शुरू होने के समय, दर्द की अवधि, दर्द की जगह, दर्द की प्रकृति, दर्द की तीव्रता आदि महत्वपूर्ण होते हैं।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के हाथों प्रतिष्ठित डा. बी सी राय पुरस्कार से सम्मानित डा. पाण्डे बताते हैं कि पेट दर्द के उपचार के लिये उसके कारण की सही-सही पहचान जरूरी होती है। हालांकि पेट दर्द के कारणों की जांच में अल्ट्रासाउंड एवं इंडोस्कोपी जैसी जांच तकनीकों एवं उपकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है लेकिन लैपरोस्कोपी एवं माइक्रो लैपरोस्कोपी तकनीक के विकास के बाद पेट दर्द के कारणों की सही-सही पहचान एवं पेट दर्द के कारगर उपचार के क्षेत्र में क्रांति का सूत्रपात हुआ है। लैपरोस्कोपी एवं माइक्रो लैपरोस्कोपी की मदद से न केवल पेट दर्द के कारणों का सही-सही पता चलता है बल्कि कई मामलों में मरीज को अधिक कष्ट दिये बगैर उन कारणों को दूर भी किया जा सकता है।
डा. पाण्डे बताते हैं कि लैपरोस्कोपी के तहत् अत्यंत पतले एवं टेलीस्कोपनुमा उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है। लैपरोस्कोपी एक ऐसी तकनीक है जिसकी मदद से पेट के किसी भी भाग तक सीधे पहुंच कर पेट के भीतर जांच-पड़ताल की जा सकती है। अगर पेट में कोई गांठ या पथरी है तो उसकी जांच की जा सकती है और आगे की जांच के लिये उसके ऊतक लिये जा सकते हैं।
लैपरोस्कोपी आधारित सर्जरी के विकास से पेट के चीर-फाड़ की आवश्यकता समाप्त हो गयी है। लैपरोस्कोपी सर्जरी के तहत् किसी भी मांसपेशी को काटे या मांसपेशियों में चीर-फाड़ किये बगैर उदर के निचले हिस्से की त्वचा में मात्र आधे इंच का चीरा लगाकर मांसपेशियों के बीच अत्यंत पतली ट्यूब (कैनुला) प्रवेश करायी जाती है। इस ट्यूब के जरिये लैपरोस्कोप डाला जाता है। यह लैपरोस्कोप अत्यंत सूक्ष्म कैमरे से जुड़ा होता है। फाइबर आप्टिक तंतु के जरिये भीतर की तस्वीरों को परिवर्द्धित आकार में उससे जुड़े टेलीविजन के मॉनिटर पर देखा जा सकता है। टेलीविजन मॉनिटर पर तस्वीरों को देखते हुये इस पतली ट्यूब के रास्ते आधे इंच के व्यास वाली एक और पतली ट्यूब प्रवेश करायी जाती है। इससे पित्त की थैली के सभी विकार, अपेंडिक्स तथा सभी प्रकार के हर्निया का इलाज सफलतापूर्वक किया जा सकता है। डा. अनिल जैन बताते हैं कि लैपरोस्कोपी ऑपरेशन के बाद मरीज शीघ्र काम-काज करने लायक हो जाता है और उसे अधिक समय तक अस्पताल में नहीं रहना पड़ता है।
अमरीका में किये गये अध्ययनों से पता चलता है कि परम्परागत ऑपरेशन के बाद मरीज को करीब 48 दिन आराम करने की जरूरत होती है जबकि नयी तकनीक से ऑपरेशन करने के बाद करीब नौ दिन का आराम पर्याप्त होता है।
मौजूदा समय में लैपरोस्कोपी का अधिक विकसित रूप माइक्रो लैपरोस्कोपी के रूप में सामने आया है। भारत में यह तकनीक एआईएमएस सहित कुछ गिने-चुने चिकित्सा केन्द्रों में उपलब्ध हो गयी है। इस ऑपरेशन में मरीज को उतना ही कष्ट होता है मानो उसे सुई चुभोई जा रही है। परम्परागत माइक्रोस्कोप ऑपरेशन के लिये 11 मिली मीटर व्यास का चीरा लगाने की जरूरत होती है जबकि माइक्रोलैपरोस्कोपी ऑपरेशन के तहत् मात्र पांच मिली मीटर व्यास का चीरा लगाना ही पर्याप्त होता है। यही नहीं माइक्रोलैपरोस्कोपी ऑपरेशन के बाद टांके को हटाने की जरूरत नहीं पड़ती है। इस तरह दूर-दराज के मरीजों को दोबारा सर्जन के पास आने की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसे मरीज स्थानीय चिकित्सक से ही चेकअप आदि करवा सकते हैं। लैपरोस्कोपी एवं माइक्रो लैपरोस्कोपी तकनीक की मदद से हर्निया के अलावा पित्त की थैली, बच्चेदानी, आंतों और किडनी जैसे पेट के सभी अंगों के ऑपरेशन किये जा सकते हैं। 


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