Saturday, 30 November 2019

फेफड़ों के कैंसर के 80 प्रतिशत मरीज धूम्रपान से परहेज करने वाली महिलाएं हैं

ग्रामीण भारतीय महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर का कारण है घरेलू धुआं
फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित सभी महिलाओं में से 80 प्रतिशत महिलाएं धूम्रपान से परहेज करने वाली होती हैं। महिलाओं में फेफड़ों का कैंसर होने का मुख्य कारण रसोईघर का हवादार नहीं होना और घरेलू वायु प्रदूषण है। दिल्ली और उसके आसपास के टायर 2 और 3 शहरों में फेफड़ों के कैसर के मामले अधिक हाते हैं।
फेफड़ों के कैंसर होने के जोखिम को कैसे रोकें
हालांकि इस स्थिति को पूरी तरह से रोकने का कोई निश्चित तरीका नहीं है, लेकिन कुछ सावधानियाँ बरतकर इनके जोखिम कारकों को कम किया जा सकता है -
धूम्रपान बंद करना - ज्यादातर युवा धूम्रपान की आदत को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना लेते हैं। अगर आपको धूम्रपान करने की आदत है, तो तुरंत धूम्रपान बंद कर दें क्योंकि धूम्रपान बंद कर देने से फेफड़ों के कैंसर के खतरे काफी कम हो जाते हैं, भले ही आपने सालों तक धूम्रपान किया हो।
किसी भी रूप में धुएं से बचें - ज्यादातर मामलों में चुल्हे से निकलनेे वाले घरेलू धुएं को जिम्मेदार ठहराया जाता है। इसलिए घर में उचित वेंटिलेशन बनाए रखा जाना चाहिए।
स्वस्थ आहार - विटामिन पोषक तत्वों और एंटी-ऑक्सीडेंट से भरपूर स्वस्थ और संतुलित आहार का सेवन करें। ताजे फल और सब्जियां दैनिक आहार का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। विटामिन-ई से भरपूर खाद्य पदार्थों में नट्स (बादाम, अखरोट, और सूरजमुखी के बीज), एवोकाडोस, आम और गेहूं शामिल हैं। विटामिन ई एक एंटीऑक्सिडेंट है, जो फेफड़ों की कोषिकाओं की अखंडता को बनाए रखता है। कई अध्ययनों से पता चला है कि विटामिन ई से भरपूर आहार के सेवन से धूम्रपान करने वालों में फेफड़ों के कैंसर के खतरे लगभग 20 प्रतिषत तक कम हो गए।
पश्चिमी देशों में, जहां महिलाओं में फेफड़े के कैंसर में वृद्धि का कारण केवल अधिक संख्या में महिलाओं के धूम्रपान करने को माना जाता है, वहीं भारतीय महिलाओं में इसका कारण पर्यावरण प्रदूषण को माना जाता है। पास- पास घर होने के कारण, घरों के भीतर उत्पन्न वायु प्रदूषण बाहरी वायु प्रदूषण की तुलना में अधिक खतरनाक और हानिकारक होते हैं। खाना बनाने के लिए लकड़ी और मिट्टी के तेल जैसे प्रदूशण पैदा करने वाले ईंधन का उपयोग करने से काफी मात्रा में छोटे कालिख के कण पैदा होते हैं जो फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर धीरे-धीरे एलवियोली को खराब करते हैं, जिससे फेफड़ों का कैंसर होता है।
मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, साकेत के मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर केयर में हाल ही में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि धूम्रपान नहीं करने वाली महिलाएं एक साथ धूम्रपान करने वाले पुरुषों और महिलाओं से अधिक प्रभावित हुईं। दो साल तक किये गये इस अध्ययन में फेफड़ों के कैंसर के 250 से अधिक रोगियों को षामिल किया गया था। इसमें यह देखा गया कि सिर्फ धूम्रपान ही फेफड़ों के कैंसर का कारण नहीं है। धूम्रपान नहीं करने वाली महिलाओं में बीमारी की दर काफी अधिक थी। इस अध्ययन में षामिल कुल रोगियों में से 75 प्रतिषत पुरुष थे और शेष एक-चैथाई महिलाएं थीं। पुरुषों में, उनमें से 70 प्रतिषत नियमित धूम्रपान करने वाले थे और 30 प्रतिषत धूम्रपान नहीं करने वाले थे। लेकिन महिलाओं में आंकड़े बेहद चैंकाने वाले और विपरीत थे। धूम्रपान नहीं करने वाली 82 प्रतिशत महिलाएं फेफड़ों के कैंसर से प्रभावित थी।
इस अध्ययन से यह भी पता चला कि पीड़ित महिलाएँ मुख्य रूप से दिल्ली- एनसीआर, और उसके आसपास के दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों जैसे मुरादाबाद, सहारनपुर, हाथरस, आगरा, मथुरा, वाराणसी, मुज़फ़्फ़र नगर आदि से थीं।
फेफड़े का कैंसर, दुनिया में कैंसर के सबसे घातक प्रकारों में से एक है, जो हर साल सबसे अधिक जीवन को प्रभावित करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, इसकी पहचान ज्यादातर उन्नत चरणों में ही की जाती है, और फेफड़ों का कैंसर, कैंसर से संबंधित मृत्यु का प्रमुख कारण रहा है। सन् 2018 में इससे 20 लाख 9 हजार लोगों की मृत्यु हो गई। मुख्य रूप से, इसके लक्षण आम तौर पर प्रारंभिक अवस्था में अलग नहीं होते हैं और इस कारण लोग अक्सर उन्हें मौसमी समस्या मान लेते हैं।
विष्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में हर साल घरेलू वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से 43 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में, 30 करोड़ से अधिक लोग खाना पकाने के लिए या अपने घरों को गर्म करने के लिए ठोस ईंधन (कोयला, लकड़ी, लकड़ी का कोयला, फसल अवषेश) या पारंपरिक स्टोव या खुली आग का उपयोग करते हैं। इस तरह की गलत प्रथाएं काफी मात्रा में घरेलू प्रदूषण पैदा करती हैं, जिनमें सूक्ष्म कण और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे प्रदूषक होते हैं जिनसे विभिन्न प्रकार की बीमारियां होती हैं। भारतीय ग्रामीण घरों में आंतरिक वायु प्रदूषण विष्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंडों से औसतन 20 गुना अधिक है। विशेष रूप से भारत के ग्रामीण इलाकों में खराब वेंटिलेशन, घरों में धुआं और प्रदूशित हवा सूक्ष्म कणांे के स्वीकार्य स्तर से कम से कम 100 गुना अधिक होता है। परिवार में महिलाएं और छोटे बच्चे इससे 80 प्रतिषत तक प्रभावित होते हैं।
पिछले एक दशक में महिलाओं में फेफड़े के कैंसर के मामलों में अचानक वृद्धि हुई है। घरेलू प्रदूषण के खतरों और खराब वेंटिलेशन के बारे में दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों में भारतीय महिलाओं के बीच जागरूकता पैदा किया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें घरों के भीतर के (इनडोर) प्रदूषण और बाहरी प्रदूषण दोनों के लिए जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। विशेष रूप से दूसरे और तीसरे दर्ज के षहरों में इनडोर प्रदूषण से निपटने के लिए खाना पकाने के लिए चूल्हों की जगह पर एलपीजी गैस लगाए जाने के अलावा लोगों को घरों और रसोई घरों से हवा के आवागमन की खराब व्यवस्था के खतरों के बारे में भी अधिक जागरूकता की आवश्यकता है। दिल्ली - एनसीआर आदि में बाहरी और घरेलू प्रदूशण दोनों ही महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार हैं। 
हालांकि पुरुष और महिलाएं दोनों इन कारकों से प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन जागरूकता की कमी महिलाओं के लिए अधिक खतरनाक है क्योंकि महिलाओं में फेफड़े के कैंसर का पता देर से चलता है और महिलाएं डाॅक्टर के यहां जाने से हिचकती हैं। इसलिए महिलाओं के लिए इस बीमारी के प्रति जागरूक होना जरूरी है। 


- डॉ. मीनू वालिया, निदेशक- मेडिकल ऑन्कोलॉजी, मैक्स सुपर स्पेशलिटी हाॅस्पिटल, वैशाली और पटपड़गंज


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