Saturday, 29 February 2020

स्कूल में बच्चों और प्राधानाध्यापिका के जन्म दिन का जश्न

किसी भी व्यक्ति के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण दिन उसका जन्म दिवस होता है। खासकर बच्चों के जन्म दिन तो उनके माता—पिता एवं दोस्तों— रिश्तेदारों के लिए भी खास हो जाता है। नोएडा एक्सटेंशन के द विज़डम ट्री स्कूल हमेशा अपने स्कूल के बच्चों को जन्मदिन का जश्न मनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। द विज़डम ट्री स्कूल ने जन्मदिन के महत्व को बनाए रखने के लिए  शुक्रवार 28 फरवरी को अपने प्री-प्राइमरी विंग के बच्चों के लिए जन्मदिन का आयोजन किया।स्कूल ने सोमवार, 24  फरवरी को  विद्यालय की प्रधानाध्यापिका के जन्मदिन का आयोजन किया। जन्मदिन मनाने के लिए विद्यालय परिवार के अध्यापकगण व  विद्यालय प्रबंधन के सभी सदस्यों को एम. पी. हॉल में एकत्रित किया गया । केक काटने के रस्म के बाद विद्यालय परिवार के सभी सदस्य प्रधानाध्यापिका को मुबारकवाद दिया। विद्यालय के अध्यक्ष श्री के. के. श्रीवास्तव ने जन्मदिन के अवसर पर  प्रधानाध्यापिका के अच्छे स्वास्थ्य और उनकी खुशियों की तथा जीवन की सफलता की कामना की ।


शुक्रवार को बच्चों के जन्म दिवस के समारोह की शुरुआत बड़े धूम-धाम से हुई। जन्मदिन मनाने के लिए प्री-प्राइमरी विंग के सभी बच्चों को एम.पी.हॉल में एकत्रित किया गया। प्री-प्राइमरी के सभी बच्चे रंग-बिरंगें ड्रेस में आए थे। इस समारोह  का मुख्य आकर्षण एक बड़ा-सा चॉकलेट केक था। केक काटने की रस्म के बाद नन्हे बच्चें म्यूजिक की धुन पर थिरकने लगे और सभी ने बहुत मज़े किए।
विद्यालय के अध्यक्ष श्री के. के. श्रीवास्तव और प्रधानाध्यापिका श्रीमती सुनीता ए. शाही ने जन्मदिन के अवसर पर सभी बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए आशीर्वाद दिया साथ ही उनकी खुशियों और सफलता की कामना की।


Friday, 21 February 2020

स्वादिष्ट होने के साथ पौ​ष्टिक भी है लिट्टी चोखा : जानिए लिट्टी के गुण

- विनोद कुमार


बिहार में कहावत है जो खाए लिट्टी चोखा, वह कभी ना खाए धोखा। लिट्टी चोखा के गुणों के कारण संभवत ऐसा कहा जाता हो। वैसे तो लिट्टी चोखा बिहारी भोजन है लेकिन आजकल दिल्ली और अन्य शहरों में भी लोकप्रिय हो रहा है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अचानक दिल्ली के राजपथ पर आयोजित हुनर हाट में पहुंच कर बिहारी स्टाइल में लिट्टी चोखा खाए और लिट्टी चोखा खाते हुए अपनी तस्वीरें भी अपने टिव्टर हैंडल से जारी की। जिसके बाद ये तस्बीरें वायरल हो गई और तरह-तरह के कयास लगने शुरू हो गए। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर लिट्टी चोखा को लेकर चर्चा भी शुरू हो गई।


कुछ साल पहले तक लिट्टी चोखा केवल बिहार तक ही सीमित था। सदियों से बिहार में खेतों पर काम करने वाले किसान और मजदूर अपने गमछे में लिट्टी या सत्तू बांध कर ले जाते थे और भूख लगने पर कहीं भी बैठ कर खा लेते थे। धीरे-धीरे यह शहरों में भी लोकप्रिय हुआ और शहरों में भी घरों और होटलों में बनाया जाने लगा। पिछले कुछ सालों के दौरान बिहार के मजदूरों के देश भर में फैलने के साथ धीरे-धीरे यह अन्य राज्यों के शहरों में खास तौर पर दिल्ली और मुंबई में भी लोकप्रिय होने लगे हैं। आज से करीब 35-40 साल पहले दिल्ली में लिट्टी-चोखा मिलना मुश्किल था लेकिन अब यह दिल्ली में खूब दिखने लगा है - खास तौर पर उन इलाकों में जहां बिहार के लोग रहते हैं। लक्ष्मी नगर, आनंद विहार, नौएडा, फरीदाबाद आदि इलाकों में मेट्रो स्टेशनों के पास आप सस्ते में लिट्टी-चोखा का आनंद ले सकते हैं। अपने स्वाद के कारण अब यह गैर-बिहारी लोगों में भी लोकप्रिय हो गया है।



लिट्टी चोखा आसानी से तैयार होने वाला एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जो खाने में स्वादिष्ट तो होता ही है और साथ ही साथ यह सेहत के लिए भी फायेदमंद है। इसका मुख्य घटक सत्तू है जो मुख्य तौर पर बिहार में ही बनाया जाता है और इस कारण से लिट्टी चोखा वर्षों तक बिहार तक ही सीमित रहा। बिहार में भी मगध और भोजपुर क्षेत्र में इसका चलन अधिक है जबकि मिथिला में कम है। माना जाता है कि लिट्टी चोखा का गढ़ मगध (गया, पटना और जहानाबाद वाले इलाके) है।
कहा जाता है कि लिट्टी-चोखा का इतिहास मगध काल से जुड़ा है। मगध के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल के दौरान सैनिक युद्ध के दौरान लिट्टी जैसी चीजें खाकर रहते थे। हालांकि इसके ठोस ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलते। बाद में यह मगध साम्राज्य से देश के दूसरे हिस्सों में भी फैला। यह अपनी खासियत की वजह से युद्धभूमि के दौरान खाने के लिए प्रचलन में आया। इसे बनाने के लिए किसी बर्तन की जरूरत नहीं है। इसमें पानी भी कम लगता है और ये सुपाच्य और पौष्टिक भी होता है। यह जल्दी खराब भी नहीं होता। एक बार बना लेने के बाद इसे दो-तीन दिन तक खाया जा सकता है। यहीं नहीं इसे कहीं भी खाया जा सकता है। यहां तक कि आप इसे चलते-चलने भी खाया जा सकता है। इसे रखने और खाने के लिए बर्तन की भी जरूरत नहीं होती है।
बाद में मुगल काल के समय लिट्टी को शोरबा और पाया के साथ खाए जाने का प्रचलन शुरू हुआ। लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान इसमें तब्दिली आई। अंग्रेजों ने अपनी पसंदीदा करी के साथ लिट्टी का स्वाद लिया। स्वतंत्रता आंदोलन में लिट्टी चोखा सेनानियों के लिए बनाया जाता था। 1857 के विद्रोह में सैनिकों के लिट्टी चोखा खाने का जिक्र मिलता है। ऐसे उल्लेख भी मिलते हैं कि तात्या टोपे और झाँसी की रानी के सैनिक बाटी या लिट्टी को पसंद करते थे क्योंकि उन्हें पकाना बहुत आसान था और बहुत सामानों की जरूरत नहीं पड़ती थी. 1857 के विद्रोहियों के लिट्टी खाकर लड़ने के किस्से भी मिलते हैं। कुछ पुस्तकों में बताया गया है कि 18 वीं सदी में लंबी तीर्थयात्रा पर निकले लोगों का मुख्य भोजन लिट्टी-चोखा और खिचड़ी हुआ करता था। बिहार में आज भी काफी लोग यात्रा पर निकलने पर अपने साथ लिट्टी रख लेते हैं।
हालांकि पक्के तौर पर ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ नहीं कहा जा सकता कि लिट्टी की शुरूआत बिहार में ही हुई थी लेकिन यह अवश्य है कि यह सदियों तक मुख्य तौर पर बिहार में ही प्रचलन में रहा। आज वक्त बदलने के साथ-साथ लिट्टी चोखा को बनाने और खाने के अंदाज भी बदल गए है। इसे आग पर सेंकने की कई विधियां देश भर में चलन में रही हैं। कई जगह इसे बाटी की तरह बनाया जाता है जिसे मेवाड़ और मालवा इलाकों में दाल और चूरमा के साथ खाया जाता है। लिट्टी दुनिया के सबसे आसानी से तैयार होने वाले खानों में से एक है, इसे बनाने के लिए न तो ढेर सारे बर्तन चाहिए, न ही बहुत सारे मसाले और तेल, यहां तक कि पानी भी बहुत कम लगता है। इसकी एक खासियत यह भी है कि यह कई दिनों तक खराब नहीं होता, लेकिन लोग इसे ताजा और गर्मागर्म खाना ही पसंद करते हैं. आम तौर पर सर्दी के दिनों में लोग अलाव सेंकते हुए घर के बाहर ही रात के खाने का इंतजाम भी कर लेते हैं।
गूंथे हुए आटे की लोई को गोला बनाकर उसे चपटा कर दिया जाता है और फिर उसमें सत्तू भरा जाता है। सत्तू में पहले से ही नमक-मिर्च, लहसून अदि डालकर अच्छी तरह मिलाया जाता है। इसके बाद इसे कोयले या लकड़ी या गोबल के उपल के अलाव में पकाया जाता है। इसेे देसी घी में डुबोकर बैंगन के चोखे के साथ खाया जाता है। चाहे तो बिना घी में डुबोये ही खा सकते हैं। यह न केवल स्वादिष्ट होता है बल्कि काफी पौष्टिक होता है। यह पचने में भी आसान होता है। लिट्टी-चोखा आप सुविधा और उपलब्ध सामग्री के हिसाब से जैसे चाहे वैसे बना सकते हैं और जैसे चाहे वैसे खा सकते हैं।


आपदाओं की स्थिति में स्कूल में सुरक्षा तैयारी का जायजा लेने के लिए माॅक ड्रिल 

बच्चे देश के भविष्य हैं और देश के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है कि उनका वर्तमान सुरक्षित हो। बच्चों का वर्तमान सुरक्षित रहे इसके लिए ऐसा माहौल बनाना जरूरी है ताकि वे बिना किसी डर के स्कलू जाएं, स्कलू में पूरी तरह सुरक्षित रहें और पूरी तरह से सुरक्षित घर लौट सकें। स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि स्कूलों में आपदाताओं को रोकने के पक्के उपाय हों तथा आपदा होने पर बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था हो। इसके लिए सुरक्षा संबंधी प्रशिक्षण एवं जागरूकता भी जरूरी है। 
स्कूलों में आपदा होने पर बचाव इंतजामों की जांच के लिए नौएडा एक्स में 'मॉक फायर ड्रिल' का आयोजन किया गया जिसमें स्कूल इमरजेंसी प्लान की पूरी प्रक्रिया को ध्यान में रखा गया। बच्चों को आग लगने की स्थिति में बचने के उपायों के बारे में जागरूक किया गया। बच्चों को तत्काल निर्णय लेने, तत्काल प्रतिक्रिया करने तथा जीवन सुरक्षा के सभी पहलुओं के बारे में अवगत कराया गया। 
मॉक ड्रिल का उद्देश्य किसी भी आपात स्थिति में स्कूल की तत्परता की जाँच करना और साथ ही छात्रों और कर्मचारियों को बचाव कार्यों के बारे में जागरूक कराना था।
स्कूल के चेयर मैन श्री के के् श्रीवास्तव एवं प्रधानाध्यापिका श्रीमती सुनीता ए शाही ने छात्रों से आपदा की स्थिति में तेजी से प्रतिक्रिया करने की जरूरत के बारे में बताया तथा मानसिक रूप से शांत रह कर निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने पर जोर दिया ।


Saturday, 1 February 2020

भारी बटुआ युवकों को बना रहा है दर्दनाक बीमारी का शिकार

- विनोद कुमार
नई दिल्ली। जींस या पैंट की पिछली जेब में भारी बटुआ रखने की प्रवृति युवाओं को कमर और पैरों की गंभीर बीमारी का शिकार बना रही है। जींस या पैंट की पीछे वाली जेब में भारी वाॅलेट रखने से “पियरी फोर्मिस सिंड्रोम अथवा वाॅलेट न्यूरोपैथी नाम की बीमारी हो सकती है जिसमें कमर से लेकर पैरों की उंगलियों तक सुई चुभने जैसा दर्द होने लगता है।
इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन डा. राजू वैश्य ने बताया कि इस इस बीमारी के शिकार वे लोग ज्यादा होते हैं जो पैंट या जींस की पिछली जेब में मोटा वाॅलेट रखकर घंटों कम्प्यूटर पर काम करते रहते हैं। आज के समय में इस बीमारी के सबसे ज्यादा शिकार युवा हो रहे है। कंप्यूटर इंजीनियरों को इस बीमारी का खतरा अधिक होता है। इस बीमारी का समय रहते उपचार नहीं होने पर सर्जरी करवानी पड़ती है।
डा. वैश्य ने बताया कि जब हम पैंट में पीछे लगी जेब में मोटा बटुआ रखते हैं तो वहां की पायरी फोर्मिस मांसपेशियां दब जाती है। इन मांसपेशियों का संबंध सायटिक नर्व से होता है, जो पैरों तक पहुंचता है। पैंट की पिछली जेब में मोटा बटुआ रखकर अधिक देर तक बैठकर काम करने के कारण इन मांसपेशियों पर अधिक दवाब पड़ता हे। ऐसी स्थिति बार-बार हो तो “पियरी फोर्मिस सिंड्रोम अथवा वाॅलेट न्यूरोपैथी नाम की बीमारी हो सकती है, जिससे मरीज को अहसनीय दर्द होता है। जब सायटिक नस काम करना बंद कर देती है तो पैरों में बहुत तेज दर्द होने लगता है। इससे जांघ से लेकर पंजे तक काफी दर्द होने लगता है। पैरों की अंगुली में सुई सी चुभने लगती है।
फोर्टिस एस्कार्ट हार्ट इंस्टीच्यूट के न्यूरो सर्जरी विभाग के निदेशक डा. राहुल गुप्ता बताते हैं कि मोटे पर्स को पिछली जेब में रखकर बैठने पर कमर पर भी दबाव पड़ता है। चूंकि कमर से ही कूल्हे की सियाटिक नस गुजरती है इसलिए इस दबाव के कारण आपके कूल्हे और कमर में दर्द हो सकता है। साथ ही कूल्हे की जोड़ों में पियरी फोर्मिस मांसपेशियों पर भी दबाव पड़ता है। इसके अलावा रक्त संचार के भी रूकने का खतरा होता है। हमारे शरीर में नसों का जाल है जो एक अंग से दूसरे अंग को जोड़ती हैं। कई नसें ऐसी भी होती हैं जो दिल की धमनियों से होते हुए कमर और फिर कूल्हे के रास्ते से पैरों तक पहुंचती हैं। जेब की पिछली पॉकेट में पर्स रखकर लगातार बैठने से इन नसों पर दबाव पड़ता है, जिससे कई बार खून का प्रवाह रुक जाता है। ऐसी स्थिति लंबे समय तक बने रहने से नसों में सूजन भी बढ़ सकती है।
इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के आर्थोपेडिक सर्जन डा. अभिषेक वैश बताते हैं कि पैंट या जींस की पीछे की जेब में मोटा पर्स रखने से शरीर के निचले हिस्से का संतुलन भी बिगड़ जाता है जिससे कई तरह की शारिरिक परेशानियां हो सकती हैं। पिछली जेब में मोटा वॉलेट होने की वजह से शरीर का बैलेंस ठीक नहीं बनता है और व्यक्ति सीधा नहीं बैठ पाता है। इस कारण ऐसे बैठने से रीढ़ की हड्डी भी झुकती है। इस वजह से स्पाइनल जॉइंट्स, मसल्स और डिस्क आदि में दर्द होता है। ये ठीक से काम नहीं करते हैं। इतना ही नहीं ये धीरे-धीरे इन्हें डैमेज भी करने लगते हैं।
डा. अभिषेक वैश का सुझाव है कि जहां तक हो सके घंटो तक बैठे रहने की स्थिति में पेंट की पिछली जेब से पर्स को निकालकर कहीं और रखें। नियमित रूप से व्यायाम करे। पेट के बल लेटकर पैरों को उठाने वाले व्यायाम करें। जिन्हें यह बीमारी है वे अधिक देर तक कुर्सी पर नहीं बैठे। कुर्सी पर बैठने से पहले ध्यान रखे कि बटुआ जेब में न हो। ड्राइविंग करते समय भी अधिक देर तक नहीं बैठना चाहिए। कोशिश करे छोटे से छोटे पर्स का उपयोग करे या अपना पर्स आगे की जेब में रखे। अगर आपको कमर में दर्द हो रहा हो तो चिकित्सक से मिलें। अगर यह बीमारी आरंभिक अवस्था में है तो व्यायाम से भी लाभ मिल सकता है। बीमारी के बढ़ने पर सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है जो काफी महंगी होती है।