Friday, 21 February 2020

स्वादिष्ट होने के साथ पौ​ष्टिक भी है लिट्टी चोखा : जानिए लिट्टी के गुण

- विनोद कुमार


बिहार में कहावत है जो खाए लिट्टी चोखा, वह कभी ना खाए धोखा। लिट्टी चोखा के गुणों के कारण संभवत ऐसा कहा जाता हो। वैसे तो लिट्टी चोखा बिहारी भोजन है लेकिन आजकल दिल्ली और अन्य शहरों में भी लोकप्रिय हो रहा है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अचानक दिल्ली के राजपथ पर आयोजित हुनर हाट में पहुंच कर बिहारी स्टाइल में लिट्टी चोखा खाए और लिट्टी चोखा खाते हुए अपनी तस्वीरें भी अपने टिव्टर हैंडल से जारी की। जिसके बाद ये तस्बीरें वायरल हो गई और तरह-तरह के कयास लगने शुरू हो गए। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर लिट्टी चोखा को लेकर चर्चा भी शुरू हो गई।


कुछ साल पहले तक लिट्टी चोखा केवल बिहार तक ही सीमित था। सदियों से बिहार में खेतों पर काम करने वाले किसान और मजदूर अपने गमछे में लिट्टी या सत्तू बांध कर ले जाते थे और भूख लगने पर कहीं भी बैठ कर खा लेते थे। धीरे-धीरे यह शहरों में भी लोकप्रिय हुआ और शहरों में भी घरों और होटलों में बनाया जाने लगा। पिछले कुछ सालों के दौरान बिहार के मजदूरों के देश भर में फैलने के साथ धीरे-धीरे यह अन्य राज्यों के शहरों में खास तौर पर दिल्ली और मुंबई में भी लोकप्रिय होने लगे हैं। आज से करीब 35-40 साल पहले दिल्ली में लिट्टी-चोखा मिलना मुश्किल था लेकिन अब यह दिल्ली में खूब दिखने लगा है - खास तौर पर उन इलाकों में जहां बिहार के लोग रहते हैं। लक्ष्मी नगर, आनंद विहार, नौएडा, फरीदाबाद आदि इलाकों में मेट्रो स्टेशनों के पास आप सस्ते में लिट्टी-चोखा का आनंद ले सकते हैं। अपने स्वाद के कारण अब यह गैर-बिहारी लोगों में भी लोकप्रिय हो गया है।



लिट्टी चोखा आसानी से तैयार होने वाला एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जो खाने में स्वादिष्ट तो होता ही है और साथ ही साथ यह सेहत के लिए भी फायेदमंद है। इसका मुख्य घटक सत्तू है जो मुख्य तौर पर बिहार में ही बनाया जाता है और इस कारण से लिट्टी चोखा वर्षों तक बिहार तक ही सीमित रहा। बिहार में भी मगध और भोजपुर क्षेत्र में इसका चलन अधिक है जबकि मिथिला में कम है। माना जाता है कि लिट्टी चोखा का गढ़ मगध (गया, पटना और जहानाबाद वाले इलाके) है।
कहा जाता है कि लिट्टी-चोखा का इतिहास मगध काल से जुड़ा है। मगध के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल के दौरान सैनिक युद्ध के दौरान लिट्टी जैसी चीजें खाकर रहते थे। हालांकि इसके ठोस ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलते। बाद में यह मगध साम्राज्य से देश के दूसरे हिस्सों में भी फैला। यह अपनी खासियत की वजह से युद्धभूमि के दौरान खाने के लिए प्रचलन में आया। इसे बनाने के लिए किसी बर्तन की जरूरत नहीं है। इसमें पानी भी कम लगता है और ये सुपाच्य और पौष्टिक भी होता है। यह जल्दी खराब भी नहीं होता। एक बार बना लेने के बाद इसे दो-तीन दिन तक खाया जा सकता है। यहीं नहीं इसे कहीं भी खाया जा सकता है। यहां तक कि आप इसे चलते-चलने भी खाया जा सकता है। इसे रखने और खाने के लिए बर्तन की भी जरूरत नहीं होती है।
बाद में मुगल काल के समय लिट्टी को शोरबा और पाया के साथ खाए जाने का प्रचलन शुरू हुआ। लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान इसमें तब्दिली आई। अंग्रेजों ने अपनी पसंदीदा करी के साथ लिट्टी का स्वाद लिया। स्वतंत्रता आंदोलन में लिट्टी चोखा सेनानियों के लिए बनाया जाता था। 1857 के विद्रोह में सैनिकों के लिट्टी चोखा खाने का जिक्र मिलता है। ऐसे उल्लेख भी मिलते हैं कि तात्या टोपे और झाँसी की रानी के सैनिक बाटी या लिट्टी को पसंद करते थे क्योंकि उन्हें पकाना बहुत आसान था और बहुत सामानों की जरूरत नहीं पड़ती थी. 1857 के विद्रोहियों के लिट्टी खाकर लड़ने के किस्से भी मिलते हैं। कुछ पुस्तकों में बताया गया है कि 18 वीं सदी में लंबी तीर्थयात्रा पर निकले लोगों का मुख्य भोजन लिट्टी-चोखा और खिचड़ी हुआ करता था। बिहार में आज भी काफी लोग यात्रा पर निकलने पर अपने साथ लिट्टी रख लेते हैं।
हालांकि पक्के तौर पर ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ नहीं कहा जा सकता कि लिट्टी की शुरूआत बिहार में ही हुई थी लेकिन यह अवश्य है कि यह सदियों तक मुख्य तौर पर बिहार में ही प्रचलन में रहा। आज वक्त बदलने के साथ-साथ लिट्टी चोखा को बनाने और खाने के अंदाज भी बदल गए है। इसे आग पर सेंकने की कई विधियां देश भर में चलन में रही हैं। कई जगह इसे बाटी की तरह बनाया जाता है जिसे मेवाड़ और मालवा इलाकों में दाल और चूरमा के साथ खाया जाता है। लिट्टी दुनिया के सबसे आसानी से तैयार होने वाले खानों में से एक है, इसे बनाने के लिए न तो ढेर सारे बर्तन चाहिए, न ही बहुत सारे मसाले और तेल, यहां तक कि पानी भी बहुत कम लगता है। इसकी एक खासियत यह भी है कि यह कई दिनों तक खराब नहीं होता, लेकिन लोग इसे ताजा और गर्मागर्म खाना ही पसंद करते हैं. आम तौर पर सर्दी के दिनों में लोग अलाव सेंकते हुए घर के बाहर ही रात के खाने का इंतजाम भी कर लेते हैं।
गूंथे हुए आटे की लोई को गोला बनाकर उसे चपटा कर दिया जाता है और फिर उसमें सत्तू भरा जाता है। सत्तू में पहले से ही नमक-मिर्च, लहसून अदि डालकर अच्छी तरह मिलाया जाता है। इसके बाद इसे कोयले या लकड़ी या गोबल के उपल के अलाव में पकाया जाता है। इसेे देसी घी में डुबोकर बैंगन के चोखे के साथ खाया जाता है। चाहे तो बिना घी में डुबोये ही खा सकते हैं। यह न केवल स्वादिष्ट होता है बल्कि काफी पौष्टिक होता है। यह पचने में भी आसान होता है। लिट्टी-चोखा आप सुविधा और उपलब्ध सामग्री के हिसाब से जैसे चाहे वैसे बना सकते हैं और जैसे चाहे वैसे खा सकते हैं।


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