Tuesday, 19 November 2019

हिंसा से त्रस्त आधी दुनिया के लिये आधा कानून

घर की चाहरदीवारी के भीतर होने वाली हिंसा से औरतों को बचाने के मकसद से बनाया गया ''घरेलू हिंसा निषेध कानून 2005'' पिछले दिनों लागू कर दिया गया। हालांकि इस कानून का मसौदा केन्द्र सरकार ने साल भर पहले ही तैयार कर लिया था लेकिन घरेलू हिंसा को व्यापक रूप से परिभाषित करने और कुछ और प्रावधानों को शामिल करने की मांग को देखते हुये इसके क्रियान्वयन को तब स्थगित कर दिया गया था। घरेलू हिंसा रोकने संबंधी विधेयक पिछले वर्ष अगस्त में संसद में पारित हुआ था। 13 सितंबर, 2005 को राष्ट्रपति की संस्तुति से इसे कानून को दर्जा मिला। तबसे महिला संगठन इसे जल्द लागू कराने का प्रयास कर रहे थे। शुरू में इस कानून के तहत महिलाओं को पति व बिना विवाह साथ रह रहे पुरुष और उसके रिश्तेदारों के हाथों हिंसा से बचाने की बात थी। लेकिन आखिरकार पत्नी व बिना विवाह साथ रह रही महिला के अलावा मां, बहन व अन्य महिला रिश्तेदारों को भी इसके तरह संरक्षण देने का फैसला किया गया। 


महिलाओं के खिलाफ तेजी से बढ़ रही घरेलू हिंसा के मद्देनजर इस कानून को लागू किया जाना महिलाओं को सुरक्षित वातावरण मुहैया कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। स्वयंसेवी संस्थायें एवं महिला संगठन लंबे अर्से से वैसे विशेष कानून की मांग कर रहे थे जो बंद दरवाजों की पीछे होने वाले हिंसक बतार्व को रोकने, महिलाओं को सुरक्षा दिलाने तथा दोषियों को सजा दिलाने में कारगर साबित हो सके। 


हमारे समाज में यह कानून इस मायने में महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे समाज में हिंसा की सबसे ज्यादा शिकार महिलायें ही होती हैं, उनके उत्पीड़न की सबसे ज्यादा घटनाओं में परिजनों का हाथ होता है और आरोपियों को सजा न मिल पाने की सबसे उंची दर औरतों के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामले में ही होते हैं। 


इस कानून के तहत घर में रह रही किसी भी महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन और शरीर को कोई नुकसान या चोट पहुंचाना, शारीरिक या मानसिक कष्ट देना अथवा ऐसा करने की मंशा रखना, यौन उत्पीड़न करना, गरिमा व प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना, गाली गलौज करना, रौब जमाना, बच्चे न होने या पुत्र न होने पर ताने मारना, अपमानित करना या पीड़ा पहुंचाने की धमकी देना घरेलू हिंसा के दायरे में आयेगा। यही नहीं, महिला के आर्थिक और वित्तीय संसाधनों तथा जरूरतों को पूरा न करना भी घरेलू हिंसा के दायरे में आएगा। इस कानून में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है जिस घर में महिला रह रही है उसे वहां से निकाला नहीं जा सकेगा। इस कानून में पीड़ित महिला की मदद के लिए एक संरक्षण अधिकारी और गैर सरकारी संगठन की नियुक्ति का भी प्रावधान किया गया है जो पीड़ित महिला की मेडिकल जांच, कानूनी सहायता, सुरक्षा और छत मुहैया कराने जैसे काम देखेंगे। कानून के तहत महिलाओं के खिलाफ हिंसा को दंडनीय और गैर जमानती अपराध माना गया है और अपराधी को एक साल की कैद या 20 हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इस कानून में इस बात का भी उल्लेख है कि पीड़ित महिला के पक्ष में मजिस्ट्रेट के आदेश के उल्लंघन पर क्या कार्रवाई होगी।


हमारे समाज में महिलाओं के खिलाफ सदियों से हो रहे अत्याचारों खास तौर पर घरों की चाहरदीवारी में हो रही हिंसा का सीधा संबंध पुरूष मानसिकता से है जिसके कारण पुरूष अपने को श्रेष्ठ और महिला को निकृष्ठ मानता है। महिलाओं के खिलाफ जारी हिंसा को समाप्त करने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हमारी परम्परागत सोच है और इस कारण महिलाओं के खिलाफ जारी हिंसा को रोकने के  कानून को कारगर तरीके से लागू करने के लिये सबसे अधिक जरूरत परम्रागत सोच को बदलने तथा जागरूकता कायम करने की है। औरतों को सम्पत्ति, वस्तु और भोग्या मानने की मानसिकता से ग्रस्त हमारे समाज में औरतों को पीटना एवं उन्हें प्रताड़ित करना मर्दों का मूल अधिकार माना जाता हैं। महिलाओं को सदियों से पुरूषों की संरक्षण में रहने की सीख दी जाती रही है। यह कहा जाता रहा है कि औरत को जीवन भर किसी न किसी पुरूष के संरक्षण में रहना चाहिये - बचपन में पिता के संरक्षण में, युवावस्था में पति के संरक्षण में और बुढ़ापे में बेटे के संरक्षण में। ऐसे में महिलायें अपने पतियों, बेटों, अथवा घर के अन्य सदस्यों के हाथों पिटना एवं उनकी कू्ररता का शिकार होना अपना नियति समझ कर चुपचाप सहती रहती हैं। यह मानसिकता आज भी नहीं बदली है। 


यह पाया गया है कि घरेलू हिंसा की शिकार ज्यादातर महिलायें अशिक्षित या कम शिक्षित होती हैं इसलिए वे आर्थिक रूप से अपने आप को सहारा नहीं दे पातीं। ज्यादातर महिलाओं के लिये पति के घर के अतिरिक्त कोई और आश्रय नहीं होता है, इसलिए पति के हाथों होने वाली हिंसा को सहन करती रहती हैं। पति की हिंसा की शिकार ज्यादातर महिलायें अपने पिता के घर नहीं जा पाती हैं क्योंकि या तो उनके पिता की मृत्यु हो चुकी हो चुकी होती है या वे सामाजिक लांछन के डर से बेटी को रखने में समर्थ नहीं होते। आम तौर पर पुलिस भी घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला की कोई मदद नहीं करती। इस तरह, घरेलू हिंसा से पीड़ित ज्यादातर महिलाओं को उसी स्थिति में रहना पड़ता है।


संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15-49 वर्ष की 70 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा की शिकार हैं। नेशनल क्राइम रिकार्डस ब्यूरो के अनुसार पति और रिश्तेदारों द्वारा महिलाओं पर हिंसा के मामलों में पिछले एक साल में 9.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 


आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2004 में घरेलू हिंसा के 55 हजार 439 मामले दर्ज हुए जिनकी संख्या वर्ष 2003 में 50 हजार 703 थी। यह हालत तो तब है जबकि घरेलू हिंसा के ज्यादातर मामले थानों तक जाते ही नहीं हैं। गरीब और अनपढ़ ही नहीं, पढ़ी-लिखी और संपन्न महिलाएं भी घरेलू हिंसा की यंत्रणा भोगती रहती हैं। घरेलू हिंसा के  जो मामले दर्ज भी होते हैं उनमें से ज्यादातर में अपराधियों को सजा नहीं मिल पाती। यह इस तथ्य से भी जाहिर है कि देश भर में बलात्काार के करीब 49 हजार मामले आज तक लंबित हैं। यह पाया गया है कि बलात्कार के 100 में से 84 मामलों में अपराधी पीड़ित महिला का परिचित ही होता है। बलात्कार के हर 10 में से तीन मामलों में पड़ोसी ही आरोपी होता है। 


घरेलू हिंसा से महिलाओं को बचाने के मार्ग में जो मुख्य बाधायें हैं उनमें परम्परागत सोच, सामाजिक लांछन और आर्थिक पराधीनता के अलावा जटिल और लंबी कानूनी प्रक्रियायें भी हैं। पति के अत्याचार या घरेलू हिंसा की जो महिलायें शादी के बंधन से मुक्त होना चाहती हैं उन्हें कानून का सहारा या तो मिलता ही नहीं या लंबे समय के जद्दोजहद के बाद तब मिलता है जब उस सहारे की कोई औचित्य ही नहीं रहता है। जिन महिलाओं को शादी के बाद जान का खतरा बना हुआ है उन्हें भी शादी के बंधन से आजाद होने की दिशा में कोई कानूनी मदद नहीं मिल पाती है। भारत में तलाक के लिये वैवाहिक संबंधों में न सुधरने वाली दरार होना मात्र ही पर्याप्त कारण नहीं समझा जाता। अदालतों में बच्चों के स्वामित्व को लेकर होने वाले विवादों का निपटारा भी पौराणिक तरीकों से किया जाता है। ऐसे विवादों में वैवाहिक सम्पत्ति, स्त्री धन की वापसी और गुजारा भत्ता आदि भी शामिल है जिसे स्त्री के हितों के खिलाफ ही आंका जाता रहा है। पर्याप्त जन अदालतों के अभाव में महिलाओं को तलाक के निपटारे के लिए मजबूरन पुलिस और अनुच्छेद 498 ए का सहारा लेना पड़ता है। एक गुमराह पति की स्वीकृति मात्र से भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) के अनुच्छेद 498 ए के तहत तलाक नहीं मिल जाता। महिला को अदालत में जाना पड़ता है और थाने में पति के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराना पड़ता है। अगर वह अपने पति पर आर्थिक रूप से निर्भर है और पति को जेल हो जाए तो गुजारा भत्ते का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। इसलिए महिलाएं सभी वैवाहिक विवादों के जल्द निपटारे के लिए अनुच्छेद 498 ए का प्रयोग करती हैं। पति की क्रूरता के 81 प्रतिशत मामलों का निपटारा नहीं हो पाता। प्रत्येक एक लाख की जनसंख्या में पति या रिश्तेदारों की क्रूरता के मामले 4.4 दर्ज होते हैं जबकि दहेज हत्या के 0.7 और यौन उत्पीड़न के 0.9 अपराध होते हैं। इसी प्रकार पति या रिश्तेदारों की बर्बरता के मामलों में गिरफ्तारियों का प्रतिशत मात्र 10.3 है। इसलिए एक महिला के लिए कोई ऐसा रास्ता नहीं है जिसमें उसे आपात स्थिति में राहत मिल सके। चाहे वह हिंसा से सुरक्षा हो, पति के घर से निकाला जाना हो, पति को सम्पत्ति बेचने से रोकना हो, बैंक लाॅकर खाली करना हो अथवा अपने बच्चों से अलग करके उनके साथ रहने का अधिकार छीनना ही क्यों न हो। परिणामस्वरूप उत्पीड़ित महिला को अपने जायज हक से कम पर ही संतोष करने पर मजबूर होना पड़ता है। उत्पीड़न की शिकार महिलाएं आईपीसी के अनुच्छेद 498 ए के तहत मानसिक और शारीरिक बर्बरता का आपराधिक मामला दर्ज करा सकती हैं और इन्हीं के आधार पर तलाक का मामला भी दर्ज हो सकता है। लेकिन अदालती फैसला आने में लगने वाले लंबे समय के कारण महिला को आपसी सहमति के आधार पर ही तलाक लेना पड़ता है। 


जाहिर है कि घरेलू हिंसा (निरोधक) विधेयक घरेलू हिंसा से त्रस्त महिलाओं की समस्याओं को पहचानने और उन्हें राहत दिलाने की दिशा में एक अच्छा कदम साबित हो सकता है। सवाल है तो बस यह कि नया कानून कहां तक व्यावहारिक हो पायेगा। यह कानून रातों रात नहीं बना बल्कि इसे बनाने और लागू करवाने के लिए तमाम महिला संगठनों ने खासा संघर्ष किया है। और जिन संगठनों ने इसके लिए संघर्ष किया है उन्हें यह अच्छी तरह पता है कि अमलीकरण का असली संघर्ष तो इसके बाद शुरू होगा। घरेलू हिंसा निषेध कानून को किताबों से लाकर आम औरतों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी की हिंसा से बचने की ढाल बनाना बड़ी चुनौती है। इसलिए भी, कि इस रास्ते की बाधांएं ज्यादा बड़ी है और इसलिए भी कि किसी राजनैतिक संघर्ष से कहीं ज्यादा मुश्किल होता है परंपरानिष्ठ समाज की मान्यताओं से लड़ना जरूरी यह है कि इस कानून का इस्तेमाल किसी हथियार की तरह करने और प्रतिघात न्योतने की बजाय इसे औरतों की सशक्तिकरण की सकारात्मक मुहिम का हिस्सा बनाया जाए। 


आम तौर पर औरतें घरेलू हिंसा समेत बहुत सारे अन्याय उन्हें अपनी किस्मत मानकर सहती रहती हैं। ऐसे कानून तभी कारगर हो सकते हैं, जब पीड़ित पक्ष को यह जानकारी ही नहीं यह भरोसा भी दिलाया जाए कि अन्याय उसकी किस्मत नहीं है। उसे इससे मुक्ति मिल सकती है और इस मामले में उसकी मदद के लिए न सिर्फ कानून वरन पूरी सामाजिक व्यवस्था उसके साथ है। स्त्री अधिकार को लेकर एक संवेदनशील सामाजिक व्यवस्था का बनाना और उसका भरोसा दिलाना कानून बनाने जितना ही महत्वपूर्ण है ताकि उत्पीड़िता को यह न लगे कि यदि वह कानून का इस्तेमाल करती है तो पूरा जमाना उसका दुश्मन  बन जाएगा। उसे यह भरोसा रहे कि वह कानून का इतेमाल करने के बाद भी वह समाज में सम्मान से जी सकेगी। इसके साथ ही यह जरूरी है उस मशीनरी की मानसिकता को बदलना, जो इसे निचले स्तर पर लागू करेगी। मसलन बलात्कार के मामलों में अक्सर यह शिकायत रहती है कि जब कोई पीड़ित औरत थाने रपट लिखाने जाती है तो वहां उसे सहानुभूति की बजाय उसे अक्सर उसी नजर से देखा जाता है जिस नजर से बलात्कार करने वालों ने देखा था। घरेलू हिंसा के मामलों में भी ऐसे ही खतरे हैं। एक लोकतांत्रिक समाज बनाने के लिए हमें ऐसी तमाम छोटी-बड़ी लड़ाइयां लड़नी होगी। घरेलू हिंसा निषेध कानून तो इस दिशा में एक कदम भर है।


क्या है घरेलू हिंसा कानून के प्रावधान एवं उसकी प्रकृति 


घरेलू हिंसा कानून को पांच अध्याय में बांटा गया है। पहले अध्याय में मुख्य बातों को परिभाषित किया गया है। दूसरे अध्याय में घरेलू हिंसा के मुद्दे के बारे में विशेष वर्णन किया गया है और इस घरेलू हिंसा की अवधारणा में निहित विभिन्न पहलुओं की व्याख्या करने की कोशिश की गई है। तीसरे अध्याय में सुरक्षा अधिकारियोें और सेवा प्रदाताओं के अधिकारों एवं कर्तव्यों की व्याख्या की गई है। चैथे अध्याय में राहत पाने के लिये प्रक्रियाओं एवं कार्यवाहियों की व्याख्या की गयी है। पांचवें अध्याय में दंड, अपराध की प्रकृति और सुरक्षा अधिकारियों और सेवा प्रदाताओं की स्थिति के बारे में बताया गया है। 


पहले अध्याय में तीन परिभाषाएं हैं जो इस कानून के कारगर क्रियान्वयन के लिये महत्वपूर्ण हैं। ये परिभाषायें पीड़िता  के पारिवारिक संबंध और साझी गृहस्थी के बारे में है। 


इस कानून में पीड़ित व्यक्ति (धारा 2ए) की परिभाषा उस महिला के रूप में की गई है जिसका प्रतिवादी के साथ पारिवारिक संबंध रहा हो और जिसने प्रतिवादी द्वारा की गयी किसी प्रकार की घरेलू हिंसा का शिकार होने का आरोप लगाया हो। इसका अर्थ यह हुआ कि पीड़ित व्यक्ति निश्चित तौर पर महिला हो और उसका कोई पारिवारिक संबंध होगा। 


इस कानून में पारिवारिक/घरेलू संबंध (धारा 2 एफ) को एक ही घर में एक साथ रहने वाले दो व्यक्तियों के संबंध के रूप में परिभाषित किया गया है जो साझी गृहस्थी में रह रहे हैं और जिनके बीच समरक्तता, विवाह या विवाह जैसे अन्य संबंधों के कारण रिश्ते हैं, या गोद लिये जाने अथवा संयुक्त परिवार के सदस्य के तौर पर एक दूसरे के साथ रहने के कारण एक दूसरे के बीच संबंध है। इस तरह से, कानून में साझी गृहस्थी में एक साथ रहने और परिवार जैसे किसी रिश्ते की बात कही जाने के कारण इस कानून का दायरा व्यापक बन गया है। 


मौजूदा समय में बाल यौन दुव्र्यहार के मुद्दे के लिए कोई विशेष कानून नहीं है और इसे इस कानून के दायरे में  लाया जा सकता है। इसके अलावा (साझी गृहस्थी) (धारा 2 एस) का उल्लेख किये जाने पर इसमें वह घर शामिल होता है जिस पर मालिकाना हक पीड़ित व्यक्ति और प्रतिवादी के नाम संयुक्त तौर पर हो सकता है या नहीं भी हो सकता है। इसमें किराये का घर भी शामिल हो सकता है। इस परिभाषा की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यदि अत्याचार करने वाला व्यक्ति और पीड़ित व्यक्ति वैसे घर में एक साथ रहते आये हों जो कि उनके नाम नहीं, बल्कि संयुक्त परिवार के नाम है, तो भी यह साझी गृहस्थी मानी जाएगी, भले ही पीड़ित व्यक्ति अथवा अत्याचार करने वाले व्यक्ति का साझी गृहस्थी में कोई हक, हिस्सा या उसका सरोकार हो या नहीं। 


इस कानून में सुरक्षा अधिकारी और सेवा प्रदाता की नियुक्ति का भी प्रावधान किया गया है जो घरेलू हिंसा की पीड़िता के लिये मुख्य सहायक के रूप में काम करते हैं। उनके कार्यों की व्याख्या तीसरे अध्याय में की गई है। 


दूसरे अध्याय में (घरेलू हिंसा) (धारा 3) की व्यापक परिभाषा दी गयी है। जिसमें सभी प्रकार की हिंसा और शारीरिक, मानसिक, यौन, मौखिक और आर्थिक दुव्र्यवहार जैसे सभी तरह के अत्याचार शामिल हैं। इसके अलावा  इसके दायरे में कोई कार्य, अनाचरण/कार्याधिकार या प्रतिवादी द्वारा पीड़ित व्यक्ति को क्षति, चोट या उसके स्वास्थ्य, सुरक्षा और तंदुरुस्ती को खतरे में डालने जैसे व्यवहार भी शामिल हंै। यह परिभाषा घरेलू हिंसा के समाधान के लिए मुख्य आधार तैयार करती है और यह घरेलू हिंसा को कारगर तरीके से रोकने तथा इससे पीड़ित व्यक्ति को क्षति-पूर्ति दिलाने में मददगार साबित होती है। यह परिभाषा इस कानून के तहत विभिन्न प्राधिकरणों के जरिये इसके क्रियान्वयन के लिये आधार तैयार करता है। 


इस कानून के क्रियान्वयन के लिये संरक्षक अधिकारी और सेवा प्रदाताओं की नियुक्ति जरूरी है जिनके अधिकारों और कर्तव्यों की व्याख्या अध्याय तीन में की गयी है। संरक्षक अधिकारी की नियुक्ति हर जिले में होगी तथा राज्य सरकार उसके कार्यक्षेत्र को अधिसूचित करेगी। (धारा 9) इनके निम्नलिखित कार्यक्षेत्र हैं। 


- इस कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियां निभाने वाले मजिस्ट्रेट की सहायता करना
- घरेलू हिंसा की रिपोर्ट तैयार करना 
- निर्धारित प्रपत्र में मजिस्ट्रेट के लिये एक आवेदन तैयार करना 
- कानूनी सहायता की उपलब्धता को सुनिश्चित करना 
- सेवा प्रदाताओं की एक सूची देना
- यह सुनिश्चित करना कि कानूनी सहायता उपलब्ध करायी गई है
- पीड़िता के लिये आश्रय की व्यवस्था करना
- कानूनी कार्यवाही शुरू करने के लिये आवश्यक कदम उठाना
- यह सुनिश्चित करना कि चिकित्सकीय जांच जल्द से जल्द हो
- अगर पीड़िता को चोट लगी है तो मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट देना 
- अगर किसी तरह की आर्थिक राहत का आदेश मिला है तो यह सुनिश्चित करना कि पीड़िता को वह राहत मिले।


यह बात नोट की जानी चाहिए कि संरक्षण अधिकारी मजिस्ट्रेट के सीधे नियंत्रण एवं उनकी निगरानी में है। 
इस कानून में सेवा प्रदाता (धारा 10 ) का प्रावधान किया गया है जो कोई भी स्वैच्छिक संस्था/एन जी ओ/कंपनी हो सकती है जो कानूनी/चिकित्सकीय/वित्तीय सहायता जैसे कानूनी तरीकों से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने के उद्देश्य से स्थापित हो और यह संस्था/कंपनी राज्य सरकार के पास पंजीकृत हो। 


सेवा प्रदाता को निम्नलिखित कार्य सौंपे गये हैं
घरेलू हिंसा की रिपोर्ट तैयार करना और उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना
पीड़िता को चिकित्सकीय सहायता की उपलब्धता सुनिश्चित करना और संरक्षण अधिकारी तथा स्थानीय पुलिस थाने को रिपोर्ट प्रेषित करना 
पीड़िता के लिये आश्रय में रहने आदि की व्यवस्था करना तथा कार्यवाही आरंभ करने के लिये स्थानीय पुलिस थाने को रिपोर्ट प्रेषित करना ,
इस कानून के अध्याय चार में समुचित उपाय किये जाने की प्रक्रियाओं के बारे में विस्तार से उल्लेख है। 


मस्जिेट्रेट के अधिकारों के ब्यौरे निम्नलिखित हैं- 
- मजिस्ट्रेट की ओर से पीड़िता/संरक्षण अधिकारी अथवा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रथम श्रेणी के दंडाधिकारी को आवेदन दिया जा सकता है। 
- फैसला सुनाने के दौरान संरक्षण अधिकारी/सेवा प्रदाता की रिपोर्ट पर गौर किया जाना जरूरी है।
- पीड़िता केा आर्थिक राहत देने का आदेश दिया जा सकता है। यह फैसला पीड़िता को हुयी क्षति या चोट के मुआवजे के लिये अन्य व्यक्ति या निकाय से संपर्क करने के पीड़िता के अधिकार से स्वतंत्र होगा। 
- यह भी कहा गया है कि आवेदन पर तीन दिन के भीतर विचार लिया जाना चाहिए और 60 दिन के भीतर उसके बारे में कोई फैसला सुनाया जाना चाहिए।
- यह भी कहा गया है कि कानूनी कार्यवाही शुरू होने के दो दिन के भीतर प्रतिवादी को नोटिस दिया जाना चाहिए  तथा ड्यूटी निभाने वाले संरक्षण अधिकारी की यह जिम्मेदारी सुनिश्चित करनी होगी कि नोटिस संबंधित व्यक्ति को मिल जाये। अगर मजिस्ट्रेट को जरूरी लगे तो कानून में कल्याण विशेषज्ञों के जरिये काउंसलिंग एवं सहायता देने का भी प्रावधान है। मामले की सुनवाई बंद कमरे में भी करने का प्रावधान है बशर्ते मजिस्ट्रेट को यह जरूरी लगे।


इस कानून की एक महत्वपूर्ण एवं अनोखी विशेषता यह है कि यह कानून पीड़िता को उसी मकान में रहने का अधिकार देता है जिसमें वह पीड़ित के साथ पहले से रह रही थी भले ही उसके पास उस मकान के संबंध में कोई अधिकार/टाइटिल या बेनेफिशियल इंटरेस्ट हो या नहीं। पीड़िता को पीड़ित व्यक्ति द्वारा मकान से निकाला या हटाया नहीं जा सकेगा अगर यह कानूनी प्रक्रियाओं के अनुसार हो।


पीड़िता के लिये जो समाधान उपलब्ध है वे हैं - संरक्षण आदेश (धारा 18), आवास आदेश (धारा 19), आर्थिक राहत (धारा 20) और मुआवजा आदेश (धारा 24)


आंकड़ों में घरेलू हिंसा 
- भारत में प्रतिदिन 26 वें मिनट में महिला का उत्पीड़न।
- 34 वें मिनट में बलात्कार।
- 42 वें मिनट में यौन उत्पीड़न।  
- 43 वें मिनट में महिला का अपहरण।
- 93 वें मिनट में जलाई जाती है एक महिला।
- अमेरिका में हर 18 मिनट में महिला की पिटाई।
- कोलंबिया में महिला मरीजों में 20 प्रतिशत घरेलू हिंसा की शिकार। 
- ब्रिटेन में हर तीसरे परिवार में एक महिला उत्पीड़ित।
- आस्ट्रिया में 1500 तलाकशुदा महिलाओं में 59 प्रतिशत ने घरेलू हिंसा के चलते लिया तलाक।


घरेलू हिंसा निषेध कानून के तहत निम्न आचरण अपराध माने गये हैं 


शारीरिक हिंसा
0 मारपीट, डांटना
0 थप्पड़ मारना
0 धक्का देना
0 किसी भी तरह की शारीरिक चोट पहुंचाना


यौन हिंसा
0 सेक्स संबंध स्थापित करने के लिए मजबूर करना
0 अश्लील फिल्म, साहित्य या चित्र देखने के लिए बाध्य करना अथवा ऐसी कोई हरकत करना जो महिला के सम्मान को ठेस पहुंचाती हो
0 बालिकाओं से यौन दुव्र्यवहार करना


आर्थिक हिंसा
0 महिला व बच्चों को भरण-पोषण के लिए पैसा नहीं देना
0 महिला व बच्चों को खाना, दवाइयां आदि न उपलब्ध कराना
0 नौकरी करने में बाधा डालना
0 अपने वेतन का उपभोग न करने देना
0 घर से बाहर निकाल देना
0 यदि किराए के मकान में रह रही है तो तो किराया न देना
0 घरेलू सामान का उपयोग करने से रोकना


मौखिक व भावनात्मक हिंसा
0 बेइज्जत करना
0 नाम लेकर फिकरे कसना
0 महिला के चरित्र व कार्यों पर आक्षेप करना
0 लड़का नहीं पैदा करने के लिए ताने देना
0 नौकरी करने से रोकना
0 शादी के लिए बाध्य करना
0 आत्महत्या की धमकी देना
0 अन्य कोई भी मौखिक व भावनात्मक हिंसा


पारिवारिक परामर्श केंद्र
परिवार परामर्श केंद्र में मौजूद पुलिस के आला अधिकारी वर्दी और डंडे के जोर पर सारे मामले चुटकियों में हल कर देते हैं। न कोई नुकर, न कोई विरोध और न ही कोई सवाल। पतिदेव सिर्फ हां और जी हां में जबाब देते हुए अपनी  अर्धांगिनी को साथ लेकर घर की ओर चल देता है। फाइलों में एक मामला 'निपट'जाता है। 


इधर वर्दी के सामने भीगी बिल्ली बने पतिदेव घर पहुंचते ही सिंह रूप धारण कर लेते हैं और पुलिस से मिली गालियों और दुत्कार से पैदा हुई कुंठा को अपनी पत्नी और बच्चों पर निकालते हैं। नतीजा यह होता है कि घर बसने की रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फिर जाता है। झिड़कियों और डांट के सामने कबूल किए गए बयान और वादे केंद्र से बाहर निकलते ही उपशब्दों और हाथापाई में बदल जाते हैं। कई मामले ऐसे भी पाए गए हैं, जहां अपमान का बदला पति ने पत्नी को मारपीट कर पूरा किया है। पतिदेव के गुस्से का ग्रास बन चुकी महिलाएं दूसरी बार डर के मारे परामर्श-केंद्र में जाने की हिम्मत नहीं करती और पुलिस उनकी परवाह भी नहीं करती।


सन 1995 में परिवार-परामर्श केंद्र में 265 मामले और इस वर्ष 30 अप्रैल तक 71 मामले दर्ज किए गए, लेकिन किसी भी मामले की समीक्षा नहीं की गई। मामलों की खानापूर्ति करते हुए इन्हें एक ही सुनवाई में या तो निपटा दिया जाता है या फिर तलाक का मामला बताकर कोर्ट में खदेड़ दिया जाता है। 


दंपतियों की परेशानियों को गंभीरता से समझने और उन्हें सहजता से रास्ता बताने के लिए परामर्श केन्द्र में माजशास्त्रियों को भी नहीं बिठाया जाता। इसके कारण उनकी समस्या जस की तस बनी रहती है।    


 


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