Sunday, 24 November 2019

हृदय रोगों की कष्टरहित चिकित्सा

हृदय रोगों के कष्टरहित इलाज के लिये भारत के हृदय रोग चिकित्सा केन्द्र ने ई.ई.सी.पी.(इंहांस्ड एक्सटर्नल काउंटर पल्शन) तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया है। इस तकनीक की मदद से हृदय की बंद रक्त धमनियों को खोला जा सकता है। इसके लिये मरीज को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत भी नहीं होती है। इस तकनीक से न सिर्फ हृदय रोगी, बल्कि बुजुर्ग, मधुमेह, उच्च रक्त चाप तथा लीवर के रोगों से पीड़ित रोगी का भी इलाज हो सकता है क्योंकि इसमें हृदय के साथ-साथ इन बीमारियों का भी इलाज हो सकता है।
हृदय रोगों से निजात पाने के लिए आम तौर पर बाई पास सर्जरी अथवा एंजियोप्लास्टी का सहारा लिया जाता है। लेकिन अब ई.ई.सी.पी. (इंहांस्ड एक्सटर्नल काउंटर पल्शन) तकनीक के जरिये हृदय रोगियों का इलाज बिना सर्जरी के ही संभव हो सकेगा।
अमरीका तथा चीन समेत दुनिया के कई देशांे में इस तकनीक का व्यापक इस्तेमाल हो रहा है। यह तकनीक कष्ट रहित, कम खर्चीली तथा अधिक कारगर है इसलिए वहां लोग इसी तकनीक के जरिये हृदय रोगों का इलाज कराना चाहते हैं। अब हमारे देश में भी इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू हो चुका है।
यह तकनीक अन्य परम्परागत तकनीकों की अपेक्षा अधिक कारगर और कष्टरहित है। बाई पास सर्जरी और बैलूनिंग के दौरान रोगी को अत्यंत कष्टदायक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है जबकि इस तकनीक के जरिये हृदय रोगियों का इलाज बिना किसी शल्य चिकित्सा के ओ.पी.डी. में ही किया जाता है। मरीज को उसके बाद दवा खाने की भी जरूरत नहीं होती और रोगी स्वस्थ, सक्रिय और सामान्य जीवन जीने लगता है।
यह तकनीक पूरी तरह से प्रकृति के तहत कार्य करती है। इसके तहत मरीज को एक टेबल पर लिटाकर उसकी छाती पर तीन इलेक्ट्रोड्स लगाकर ई.सी.जी. रिकार्ड किया जाता है तथा प्लेथीस्मोग्राफ से ब्लड प्रेशर रिकार्ड किया जाता है। उसके बाद शरीर के कुछ हिस्सों को एक कलाई-बंद कपड़े (कफ) से लपेटा जाता है जिससे शरीर में वायुदाब की स्थिति बनती है। इस दबाव के कारण हृदय की बंद पड़ी  धमनियां फिर से कार्य करने लगती हैं और रक्त का प्रवाह सुचारू हो जाता है। इस तकनीक से रक्त की सारी नलिकाओं में रक्त प्रवाह हो जाता है और बंद नलिकाओं में पहले की तुलना में तत्काल 42 प्रतिशत अधिक रक्त प्रवाह शुरू हो जाता है। इससे हृदय तक रक्त को जाने में कोई रूकावट नहीं होती और हृदय को पर्याप्त आॅक्सीजन भी मिलती रहती है। इससे रोगी को तत्काल काफी राहत मिलती है और उसे हृदय संबंधी कोई परेशानी नहीं होती। 
चिकित्सकों के अनुसार हृदय की सामान्य प्रक्रिया आॅक्सीजन की जरूरत और आपूर्ति पर निर्भर करती है। कार्डियेक मांसपेशियों द्वारा आॅक्सीजन की खपत इस बात पर निर्भर करती है कि हृदय कितनी तेजी से धड़क रहा है और यह किस तरह पंप कर रहा है। आॅक्सीजन की मात्रा का निर्धारण रक्त के प्रवाह से लगाया जाता है। कार्डियेक मांसपेशियों के ऊतकों में तकरीबन 80 प्रतिशत रक्त प्रवाह उस समय होता है जब हृदय आराम कर रहा होता है। अध्ययनों से पता चला है कि ई.ई.सी.पी. तकनीक अवरुद्व धमनियों में प्राकृतिक बाईपास का निर्माण करता है। यह तकनीक रक्त नलिकाओं को छोटी-छोटी अतिरिक्त शाखाएं खोलने या निर्माण करने के लिए प्रेरित करती है। ये शाखाएं हृदय मांसपेशियों तक जाने का स्थायी मार्ग बन जाती हैं जिससे पर्याप्त मात्रा में रक्त का प्रवाह और आॅक्सीजन की आपूर्ति होने लगती है। इस तकनीक से इलाज के बाद मरीज की व्यायाम करने की क्षमता बढ़ जाती है। उसे दोबारा एंजाइना का अटैक पड़ने की संभावना कम हो जाती है और एंजाइना की दवाईयां लेेने की आवश्यकता भी कम हो जाती है।
इस तकनीक से इलाज में चार से सात सप्ताह का समय लग सकता है। इस दौरान रोगी प्रतिदिन अपने घर से अस्पताल के ओ.पी.डी. में आकर एक से दो घंटे की चिकित्सा लेता है। कुछ रोगियों को इस चिकित्सा की एक से अधिक कोर्स लेने की जरूरत पड़ सकती है।  
मेरठ मेडिकल काॅलेज के प्रधानाचार्य डा. एस. एल. श्रीवास्तव का कहना है कि गंभीर एंजाइना के रोगी, खासकर एंजाइना के वैसे रोगी जिन्हें नाइट्रेटयुक्त दवाईयों के सेवन से भी पर्याप्त आराम नहीं मिल रहा हो, वैसे मरीज जिनकी स्थिति आॅपरेशन कराने लायक नहीं हो, वैसे मरीज जिन्हें सर्जरी के बाद भी कोई खास आराम नहीं मिला हो, वैसे मरीज जो बाई पास सर्जरी या एंजियोप्लास्टी नहीं कराना चाहते हैं उन्हें यह तकनीक काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। इस तकनीक का फायदा न सिर्फ मध्य वय के रोगी, बल्कि बुजुर्ग, मधुमेह, उच्च रक्त चाप तथा लीवर के रोगी भी उठा सकते हैं क्योंकि इसमें हृदय रोगों के साथ-साथ इन बीमारियों का भी इलाज हो सकता है। हालांकि इस इलाज से कुछ रोगियों को कफ के दबाव के कारण वहां की त्वचा में जलन हो सकती है। ऐसा होने पर या कोई अन्य समस्या होने पर तुरंत चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।
नयी दिल्ली स्थित जयपुर गोल्डन अस्पताल के निदेशक वाई पी मुंजाल के अनुसार यह तकनीक भारत जैसे विकासशील देशों के लिए अत्यंत सुविधाजनक है क्योंकि इसमें अपेक्षाकृत कम खर्च आता है। इसके लिए आॅपरेशन कक्ष की जरूरत नही होती और रोगी का इलाज ओ.पी.डी. में ही हो जाता है।


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