Saturday, 23 November 2019

फेसबुक और वाट्सएप की लत से उंगलियों एवं हाथों को नुकसान 

युवाओं में फेसबुक और वाट्सएप जैसे सोशल नेटवर्किंग माध्यमों की लत तेजी से बढ़ रही है लेकिन इनके बहुत अधिक उपयोग से कलाई और उंगलियों की जोड़ों में दर्द, आर्थराइटिस, रिपिटिटिव स्ट्रेस इंज्युरिज (आरएसआई) तथा कार्पल टनल सिंड्रोम (सीटीसी) की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
रिपिटिटिव स्ट्रेस इंज्युरिज (आरएसआई)
पिछले कुछ वर्शो में टच स्क्रीन वाले फोन, स्मार्ट फोन तथा टैबलेट के लगातार इस्तेमाल के कारण वैसे लोगों की संख्या बढ़ी है जिन्हें उंगलियों, अंगूठे और हाथों में दर्द की समस्या उत्पन्न हो रही है। इस तरह का दर्द एवं जकड़न रिपेटिटिव स्ट्रेस इंज्युरिज (आरएसआई) पैदा कर सकती है। आरएसआई एक ही गतिविधि के लंबे समय तक बार-बार दोहराये जाने के कारण जोड़ों के लिगामेंट और टेंडन में सूजन (इंफ्लामेंशन) होने के कारण होती है। 
जो लोग टच स्क्रीन स्मार्ट फोन और टैबलेट पर बहुत ज्यादा गेम खेलते हैं और टाइप करते हैं उनकी कलाई और अंगुलियों के जोड़ों में दर्द हो सकता है और कभी-कभी अंगुलियों में गंभीर आर्थराइटिस हो सकती है। गेम खेलने वाले डिवाइस के लंबे समय तक इस्तेमाल के कारण युवा बच्चों में इस समस्या के होने की अधिक संभावना होती है। किसी भी गतिविधि के बार-बार दोहराये जाने के कारण जोड़, मांसपेशियां, टेंडन और नव्र्स प्रभावित होते हैं जिसके कारण रिपिटिटिव स्ट्रेस इंजुरीज होती है। उदाहरण के लिए, जो लोग सेल फोन पर अक्सर संदेश टाइप करने के लिए अपने अंगूठे का उपयोग करते हैं, उनमें कभी-कभी रेडियल स्टिलाॅयड टेनोसिनोवाइटिस (डी क्वेरवेन सिंड्रोम, ब्लैकबेरी थम्ब या टेक्सटिंग थम्ब के नाम से भी जाना जाने वाला) विकसित हो जाता है। इसमें टेंडन प्रभावित होती है और अंगूठे को हिलाने-डुलाने में दर्द होता है। हालांकि डेस्कटाॅप कीबोर्ड के लंबे समय तक इस्तेमाल के कारण दर्द से पीड़ित रोगियों में इसके संबंध की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि डेस्कटाॅप कीबोर्ड पर बार-बार टाइप करने पर यह दर्द और बढ़ सकता है।
कार्पल टनल सिंड्रोम (सीटीसी) 
ज्यादातर लोग टच स्क्रीन का इस्तेमाल गलत तरीके से और गलत पोस्चर में करते हैं। स्ट्रेस से संबंधित इंजुरीज लोगों को तब भी हो सकती है जब वे टाइप करते समय अपनी कलाई पर अधिक दबाव डालते हैं या अपने हाथों को बहुत ज्यादा आगे या पीछे की ओर झुकाते हैं जिससे उनके हाथों पर स्ट्रेस पड़ता है। इसके कारण होने वाली बीमारियों में कार्पेल टनेल सिंड्रोम सबसे सामान्य है। यह कलाई में मीडियन नर्व पर दबाव पड़ने के कारण होता है।
इस बीमारी का खतरा मोबाइल एवं कम्प्यूटर का बहुत अधिक इस्तेमाल करने वालों के अलावा उन सभी लोगों को अधिक होता है जिन्हें अपनी ऊंगलियों एवं हाथों का बहुत अधिक इस्तेमाल करना पड़ता है। मिसाल के तौर पर टाइपिस्टों, मोटर मैकेनिकों और मांस काटने वालों को यह बीमारी होने की आशंका अधिक होती है। मधुमेह, गाउट एवं गठिया के मरीजों तथा शराब का बहुत अधिक सेवन करने वालों को भी कार्पल टनल सिंड्रोम का खतरा अधिक होता है। इसके अलावा गर्भधारण, रजोनिवृति और गर्भनिरोधक गोलियों के सेवन से होने वाले हार्मोन संबंधी परिवर्तन के दौरान भी यह बीमारी हो सकती है। 
यह बीमारी आनुवांशिक कारणों से भी हो सकती है। कुछ लोगों में आनुवांशिक तौर पर कलाई एवं ऊंगलियों की नसों (फ्लेक्सर टेंडन) की प्राकृतिक चिकनाई कम होती है। प्राकृतिक चिकनाई कम होने पर सीटीएस होने की आशंका अधिक होती है। इसके अलावा कुछ लोगों की कलाई और ऊंगलियों में हड्डियों एवं नसों की बनावट इस प्रकार की होती है कि उन्हें यह बीमारी अन्य लोगों की तुलना में अधिक होती है। कलाई या हाथ के अगले हिस्से में चोट लगने से भी सीटीएस हो सकती है। 
हाथों में सुन्नपन्न, सनसनाहट अथवा झुनझुनी, छोटी-मोटी चीजों को पकड़ने में कमजोरी, हाथ को कंधे तक उठाने में दर्द और अंगूठे, तर्जनी एवं मध्यमा में संवदेना की कमी जैसे लक्षण कार्पल टनल सिंड्रोम (सीटीसी) के लक्षण हैं। 
कार्पल टनल कलाई में हड्डियों और सख्त लिगामेंट से घिरी अत्यंत पतली सुरंग जैसी संरचना है जो कलाई एवं ऊंगलियों की विभिन्न हड्डियों को आपस में जोड़ती है। कार्पल टनल कलाई के जरिये प्रवेश करते हुये ऊंगलियों में जाता है। इस सुरंग (टनल) से ऊंगलियों और अंगूठे की नसें (फ्लेक्सर टेंडन) और मध्यस्थ स्नायु (मेडियन नर्व) गुजरते हैं। ये नसें मांसपेशियों और हाथ की हड्डियों को जोड़ती हैं और ऊंगलियों की क्रियाशीलता का संचालन करती हैं। हमारा मस्तिष्क मध्यस्थ स्नायु (मेडियन नर्व) के जरिये ही हाथों एवं ऊंगलियों तक संदेश पहुंचा कर उनकी क्रियाशीलता पर नियंत्रण रखता है। हाथ एवं ऊंगलियों के हिलाने पर नसें (फ्लेक्सर टेंडन) टनल के किनारों से रगड़ खाती हैं। इन ऊंगलियों की नसों के टनल से बार-बार रगड़ खाने के कारण नसों में सूजन उत्पन्न होती है। सूजन के कारण मध्यस्थ स्नायु (मेडियन नर्व) पर दबाव पड़ता है और इससे ऊंगलियों एवं हाथों में सुन्नपन, कमजोरी एवं झुनझुनी पैदा होती है और गंभीर अवस्था में इनमें भयानक दर्द होता है।
उंगलियों का कैसे करें बचाव
अगर ऊंगलियों को काम के दौरान बीच-बीच में विश्राम मिलता रहे तो सूजन एवं दबाव को कम होने में मदद मिलती है। अपने काम-काज के तौर-तरीकों में बदलाव लाकर इस बीमारी की रोकथाम की जा सकती है। अगर इस बीमारी का समय से पता चल जाये तो इसका इलाज आसान हो जाता है। रिपेटिटिव स्ट्रेस इंज्युरिज (आरएसआई) और कार्पल टनल सिंड्रोम की जांच नर्व कंडक्शन परीक्षण से होती है। 
रोग की आरंभिक अवस्था में इसका इलाज रात में कलाई में पट्टी अथवा स्पिन्ट पहनने से हो सकता है। इससे कलाई को मुड़ने से रोका जाता है। कलाई को विश्राम देने और दवाइयों से भी आराम मिलता है। गंभीर अवस्था में चिकित्सक कार्पल टनल में कोर्टिसोन के इंजेक्शन दे सकते हैं। जिन मरीजों को उक्त तरीकों से लाभ नहीं मिलता उन्हें सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। आधुनिक समय में सर्जरी की ऐसी तकनीकों का विकास हुआ है जिसमें चीर-फाड़ की जरूरत नहीं के बराबर होती है। 


 


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