Sunday, 24 November 2019

प्राचीन भारत में रोगों और आहार के बारे में क्या थी धारणा 

जीवन को बरकरार रखने के लिए सबसे जरूरी चीजों में भोजन और पोशण संबंधी देखभाल षामिल है ओर यह स्वस्थ शरीर और मस्तिश्क के विकास के लिए भी जरूरी है। स्वस्थ्य षरीर एवं मस्तिश्क के विकास के लिए भोजन और पोषण महत्वपूर्ण है और यह अनेक बीमारियों को रोकने के लिए भी जरूरी है। साथ ही साथ भोशण और पोशण बिमारियों की रोकथाम और उनके उपचार में भी असरदार है। 
कोलकाता के कैंसर फाउंडेशन ऑफ इंडिया की सुक्ता दास के अनुसार भारत में भोजन को तंदुरूस्ती के साथ जोड़कर देखे जाने की लंबी परंपरा रही है जो कि वैदिक मंत्रों, उपनिशदों के आध्यात्मिक चिन्तनों, और भारत के प्राचीन चिकित्सा- शास्त्रों में प्रलक्षित होता है। इस अध्ययन को, तंदुरूस्ती और रोग की स्थितयों में भोजन और पोषण की उस धारणा पर केन्दित करने की कोशिश की गई जो शुरूआती चिकित्सा-शास्त्रों  मसलन. चरक संहिता, सुुश्रत संहिता, अष्टांग संग्रह, अष्टांग हृदय और भव्यप्रकास में उल्लेखित हैं।
इन चिकित्सा-शास्त्रों की आलोचनात्मक समीक्षा इस बात की ओर इशारा करती है कि उस वक्त भोजन-विज्ञान काफी विकसित था और इंसानी तंदुरुस्ती से खान-पान के संबंध का तार्किक आधार था। ऐसा लगता है कि उस वक्त, खाद्य संबंधी चयापचय की काफी जानकारी थी, यह समझ थी कि भोजन, सारी शारीरिक क्रियाओं के लिए उर्जा देने वाला और कोशिकाओं एवं उत्तकों को बनाने वाला एक स्त्रोत है। ऐसा माना जाता था कि अलग-अलग दैहिक और रोग संबंधी हालत और जीवन के विभिन्न चरणों के अनुसार विभिन्न भोजन अपेक्षित हैं। इसलिए समुचित आहार के चयन की जरूरत पर जोर दिया जाता था ताकि षरीर के सारे महत्वपूर्ण हिस्से को जरूरी पोषक-तत्व मिलता रहे। चिकित्सक, जो आहार और पोषण का अच्छा जानकार होता था, की सलाह पर व्यक्ति विशेष के अनुसार संतुलित आहार बनाने की राय दी जाती थी। स्वस्थ जीवन के एक आधार के तौर पर आहार नियम को बढ़ावा देने के समुचित सुझाव दिए जाते थे ताकि पौष्टिक और हानिकारक आहार तत्व और उनके सम्मिश्रण को पहचाना जा सके। य़हां, भोजन पकाने के उचित और साफ-सुथरे तरीके, उसके रख-ऱखाव और परोसने पर जोर दिया जाता था। साथ ही, हानिकारक खान-पान की आदत से परहेज पर भी जोर था। प्रतिदिन खान-पान के तौर-तरीके को स्पष्ट रूप से बताया गया है जिसे लागू करके सेहत और तंदुरूस्थी पायी जा सकती है। व्यक्ति विशेष की बनावट, पाचन-शक्ति, उम्र और परिवेश के हिसाब से आहार के चयन में फेरबदल पर भी ध्यान दिया गया था। आहार और रोग के कारण-उपचार संबंध को बताया गया था और स्वास्थ्य़ के विकास और रोग के रोक-थाम के लिए खान-पान के वैज्ञानिक सूझाव दिए गए थे। पाचन-तंत्र और इसके सुचारू काम-काज को अहम माना गय़ा क्योंकि अच्छी सेहत और लंबी उम्र  पौष्टिक-आहार की आपूर्ति और उपलब्धता पर निर्भर है। इन चिकित्सकीय ग्रंथों का गहन अध्ययन य़ह बताता हैतंदुरूस्त शरीर और दिमाग के साथ निरोग जीवन के ऱख-रखाव में पुरातन समझ और समग्र दृष्टि की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।


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