Friday, 8 November 2019

स्लिम दिखने की चाह यानी बीमारियों को बुलावा

नेहा दसवीं क्लास की छात्रा है। उसके नाक-नक्श काफी तीखे हैं और देखने में भी वह खूबसूरत और स्वस्थ लगती है। उसकी सहेलियां उसे अक्सर कहतीं कि तुम थोड़ी सी दुबली हो जाओ तो और भी खूबसूरत लगोगी। धीरे-धीरे नेहा को भी यह महसूस होने लगा कि वह थोड़ी मोटी है और तंग कपड़ों में उसका फीगर ठीक नहीं दिखता है। फिर तो उसने डायटिंग करने की ठान ली। उसने पहले तो सुबह का नाश्ता लेना बंद किया उसके बाद दिन और रात के भोजन में भी कटौती करने लगी। घर वालों ने उसे काफी समझाया लेकिन उस पर कोई असर नहीं पड़ा। दो महीने में ही उसने अपना वजन 8 किलो कम कर लिया। वह पहले से काफी दुबली नजर आने लगी लेकिन फिर भी उसने डायटिंग नहीं छोड़ा। उस पर तो अधिक से अधिक स्लिम होने का भूत सवार था। हमेशा खिला-खिला रहने वाला और रौनक भरा उसका आकर्षक चेहरा कुछ ही दिनों में कांतिहीन और बीमार सा नजर आने लगा और उसने बिस्तर पकड़ लिया। वह एनीमिया और एनोरेक्सिया नरवोसा नामक मानसिक बीमारी से पीड़ित हो गयी और वह अब अपना इलाज एक मानसिक अस्पताल में करवा रही है। उसकी पढ़ाई छूट गयी। उसके घर वाले भी उसे लेकर काफी परेशान हैं।


रवि एक विज्ञापन कंपनी में अधिकारी है। नौकरी लगने के बाद दिन भर ऑफिस में बैठे रहने के कारण उसका वजन थोड़ा बढ़ने लगा। उसके दोस्तों ने फब्तियां कसनी शुरू  कर दी। फिर तो उसने दुबला होने की ठान ली। उसने डायटिंग करना शुरू किया लेकिन वह खाने की इच्छा को दबा नहीं पाया। सुबह वह हल्का नाश्ता करता लेकिन दोपहर तक उसे इतनी तेज भूख लग जाती कि वह पहले से भी ज्यादा खाना खा लेता। परंतु खाने के बाद उसे अहसास हो ताकि उसे तो डायटिंग करनी है और उसने इतना ज्यादा खा लिया। ऐसा विचार आते ही वह जान-बूझ कर उल्टी कर देता। अपनी संतुष्टि के लिए तो वह भर पेट खाना खाता लेकिन खाने के तुरंत बाद ही वह सारे भोजन को उल्टी के जरिये बाहर निकाल देता। धीरे-धीरे यह उसकी आदत बन गयी। वह दुबला तो हो गया लेकिन बुलीमिया नामक मानसिक बीमारी से पीड़ित हो गया।


स्लिम और छरहरा दिखने की चाह सिर्फ नेहा और रवि को ही नहीं है बल्कि आज के अधिकतर युवक-युवती ऐसी सोच में तेजी से गिरतार हो रहे हैं। अभिनेता-अभिनेत्रियों और मॉडलों की देखादेखी आज की पीढ़ी स्लिम और छरहरा दिखने को उतावली हो रही है। समाज में बढ़ते आधुनिकीकरण और ग्लैमर के प्रभाव के कारण युवाओं में सुंदर दिखने की होड़ सी हो गयी है। आज किशोरावस्था और युवा वर्ग ही नहीं बल्कि 8-10 साल उम्र की लड़कियां भी फिल्म और टेलीविजन के प्रभाव के कारण मोटापा को अपना दुश्मन मानने लगी हैं। वे भर पेट खाना नहीं खातीं। उन्हें डर है कि अधिक खाने से वे मोटी हो जाएंगी। आधुनिकीकरण की दौड़ में वे भी पीछे रहना नहीं चाहतीं। इस कारण आज 5-12 साल उम्र की बच्चियां भी एनोरेक्सिया नरवोसा तथा डिसमोर्फिया जैसी गंभीर मानसिक बीमारियों से पीड़ित होकर मनोचिकित्सक से अपना इलाज करा रही हैं। इस प्रवृति को बढ़ाने में ब्यूटी पार्लरों, कॉस्मेटिक सर्जरी सेंटरों तथा स्लिमिंग सेंटरों की भी मुख्य भूमिका है।


आज जमाना स्लिम एंड ट्रिम का है। आज हर लड़की 36-24-36 के आंकड़े में ही फिट होना चाहती है। लेकिन हर किसी के लिए यह संभव नहीं है। हर व्यक्ति का शारीरिक ढांचा अलग- अलग होता है और इसमें परिवर्तन करना हानिकारक साबित हो सकता है। लेकिन ग्लैमर से प्रेरित होकर जब किशोर वर्ग खुद में खामियां देखना शुरू करता है तो सबसे पहले उसे अपना शरीर का थोड़ा सा मोटापा भी खटकने लगता है। मोटापा कम करने का सबसे सरल उपाय उसे डायटिंग ही लगता है। वसा को तो वे अपना दुश्मन ही मान बैठते हैं जबकि वसा हमारे शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक है। हालांकि कुछ युवक-युवतियां मोटापा कम करने के लिए डायटिंग के साथ-साथ व्यायाम का भी सहारा लेते हैं। वे खाने में कैलोरी तो कम लेते हैं लेकिन अपनी शारीरिक क्षमता से अधिक व्यायाम करते हैं जिससे कुछ ही दिनों में उनका वजन बहुत कम हो जाता है। लेकिन साथ ही वे अनेक बीमारियों से घिर जाते हैं। इनमें सबसे सामान्य बीमारी एनोरेक्सिया नरवोसा, बुलीमिया, डिसमोर्फिया आदि हैं।


नयी दिल्ली स्थित दिल्ली साइक्रेटिक सेंटर के मनोविशेषज्ञ डा. सुनील मित्तल के अनुसार एनोरेक्सिया नरवोसा से पीड़ित व्यक्ति जब अपना वजन कम करने के लिए बहुत कम खाना शुरू करता है तो कुछ ही दिनों में यह उसकी आदत बन जाती है। वह अपने दिमाग को पूरी तरह से नियंत्रित कर लेते हैं और भूख की इच्छा को आसानी से दबा लेता है। इसके विपरीत बुलीमिया से पीड़ित व्यक्ति अपने दिमाग को नियंत्रित नहीं कर पाता और अपनी भूख की इच्छा को दबा नहीं पाता और भर पेट खाना खा लेता है। लेकिन खाने के बाद जैसे ही उसे अहसास होता है कि इतना खाने से उसका वजन कम नहीं होगा बल्कि वजन और बढ़ जाएगा तो वह सारा खाना उल्टी के रूप  में बाहर निकाल देता है। डिसमोर्फिया से पीड़ित व्यक्ति को अपने शरीर में कोई खराबी नहीं होने अथवा मामूली खराबी होने पर भी उसे महसूस होता है कि वह बहुत बदसूरत है और सुंदर दिखने के लिए वह तरह-तरह के जतन करता है। वह हर समय तनावग्रस्त रहता है और किसी काम में उसका मन नहीं लगता।


हालांकि आज की युवा पीढ़ी वजन कम करने के लिए डायटिंग करती है। वह घर में कम खाना खाती है लेकिन कोल्ड ड्रिंक तथा फास्ट फूड का मोह त्याग नहीं पाती जिससे उसे कैलोरी तो मिल जाती है लेकिन शरीर के लिए आवश्यक पौष्टिक तत्व से वह वंचित रह जाती है जिससे मानसिक बीमारियों के साथ-साथ वह एनीमिया जैसी शारीरिक बीमारियों का भी शिकार हो जाती है जिसकी परिणति अक्सर घातक साबित होती है।


अधिक मोटापा शरीर के लिए हानिकारक है लेकिन अत्यंत दुबला होना भी बीमारियों को बुलावा देना है। इसलिए स्लिम दिखने के चक्कर में पौष्टिक आहार से वंचित न रहे और  बीमारियों को आमंत्रण न दें। आवश्यकतानुसार आहार लें और व्यायाम करें। अगर डायटिंग करना ही है तो किसी आहार विशेषज्ञ की निगरानी में करें। 


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