योग एवं शाकाहार से हृदय रोगों का उपचार

योग के बारे में अनेक पश्चिमी शब्दकोषों में गलत एवं अधूरी व्याख्या की गयी है। इसकी परिभाषा प्राचीन भारत में किये जाने वाले अभ्यासों के रूप में की गयी है। लेकिन दरअसल योग केवल कुछ आसनों का नाम नहीं है बल्कि यह जीने का सम्पूर्ण विज्ञान एवं कला है। योग एक सम्पूर्ण जीवन पद्वति है। योग साहित्य के अनुसार धूम्रपान, व्यसन एवं नशीले पदार्थों से परहेज, शाकाहार, खास तौर पर अधिक रेशेदार शाकाहारी आहार, शारीरिक व्यायाम तथा तनाव मुक्ति इस जीवन पद्वति के मुख्य हिस्से हैं। तनाव नियंत्राण एवं प्रबंधन योग की प्रमुख विशेषता है जो दवाइयों, मादक द्रव्यों एवं दर्द निवारकों से संभव नहीं है। अनेक अध्यनों से साबित हो चुका है कि योग एवं ध्यान की मदद से अनेक शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों को जन्म देने वाले तनाव पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।
हृदय रोगों में योग के फायदे के बारे में सबसे पहला अध्ययन अमरीका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में डीन आर्निस नामक वैज्ञानिक ने 1990 में किया था। उनके अध्ययन की रिपोर्ट चिकित्सा विज्ञान की प्रसिद्व पत्रिका लैंसेट में प्रकाशित हुयी। इस रिपोर्ट ने टाइम और न्यूजवीक जैसे लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं का ध्यान खींचा। डीन आर्निस ने अपनी रिपोर्ट में योग शब्द के बजाय जीवन पद्वति शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने अपने अध्ययन के लिये योग साहित्य एवं भारत के योग विशेषज्ञों की सहायता ली थी। डी आर्निस ने अपने अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकाला कि योग हृदय धमनियों में कोलेस्ट्राॅल के जमाव को दूर करने का वैज्ञानिक तरीका है। डीन आर्निस ने अपने अध्ययन में केवल 48 हृदय रोगियों को शामिल किया था। उन्होंने इन रोगियों को दो वर्ग में बांट कर एक वर्ग को कम वसा वाला आहार दिया तथा उन्हें यौगिक आसनों एवं व्यायामों की मदद से तनाव पर नियंत्रण रखने का तरीका सीखाया। एक साल के बाद इनकी दोबारा जांच करने पर पाया कि कम वसा वाले आहार का सेवन तथा योग अभ्यास करने वाले लोगों में कोलेस्ट्राॅल, रक्तचाप तथा तनाव घट गया। इन मरीजों में हृदय की रक्त धमनियों में कालेस्ट्राॅल का जमाव भी नौ प्रतिशत कम गया। इन लोगों में बाई पास एवं एंजियोप्लास्टी की आवश्यकता भी काफी हद तक घट गयी थी। इस अध्ययन के साथ कई समस्यायें एवं सीमायें थी लेकिन इसके बावजूद यह अध्ययन हृदय रोगों में योग एवं वसा रहित आहार के फायदे के बारे में पहला अध्ययन था जिसने चिकित्सकों एवं वैज्ञानिकों का 
ध्यान खींचा। डीन आर्निस के अध्ययन से जुड़ी समस्याओं एवं सीमाओं के कारण उनके अध्ययन को वैज्ञानिक एवं चिकित्सा जगत ने मान्यता नहीं दी । इसे ध्यान में रखकर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में व्यापक अध्ययन शुरू किया गया जो तीन साल तक चला। इस अध्ययन के दौरान तमाम वैज्ञानिक पहलुओं को ध्यान में रखा गया ताकि वैज्ञानिक एवं चिकित्सा जगत में इसे मान्यता मिले। इस दिशा में हमें कामयाबी मिली। इस अध्ययन के निष्कर्षों से उत्साहित होकर माउंट आबू में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एवं अनेक संस्थान के सहयोग से हृदय रोगों में योग, कम वसा रहित आहार एवं समुचित जीवन प्रणाली के में फायदे पर अध्ययन करने के लिये पांच साल की परियोजना आरंभ की गयी।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में किये गये अध्ययन में नयी दिल्ली के आध्यात्मिक साधना केन्द्र की मदद ली गयी जहां ध्यान की प्रेक्षा प्रणाली का प्रशिक्षण दिया जाता है। कुल मिलाकर ध्यान की 42 प्रणालियां हैं जिनमें प्रेक्षा भी एक है। इन सभी प्रणालियों की अपनी विशेषताएं हैं और ये सभी तनाव दूर करने तथा मानसिक शांति प्राप्त करने में मददगार हैं। हमने अपने अध्ययन के दौरान हृदय रोगियों के लिये जो दिनचर्या, आहार एवं योगाभ्यास निर्धारित किये वे उनके अनुकूल थे और उनका पालन करना आसान था।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में किए गए अध्ययन के निष्कर्षों से पाया कि योग जीवन अपनाने तथा कम वसा युक्त एवं अधिक रेशेदार आहार ग्रहण करने वाले रोगियों में एक साल में ही कोलेस्ट्राॅल का स्तर कम से कम 20 प्रतिशत घट जाता है जबकि अमरीका जैसे देशों में दवाइयों की मदद से इतनी अवधि के पश्चात् कोलेस्ट्राॅल के स्तर में मात्र सात प्रतिशत तक कमी आती है।
हृदय रोगों में प्रेक्षा ध्यान प्रणाली को लाभदायक पाया गया है इनमें तनाव दूर करने के लिये कायोत्सर्ग नामक आसन का प्रयोग किया जाता है। यह श्वसन के समान है और हर व्यक्ति इसे बहुत आसानी के साथ कर सकता है। इसे बहुत कम दिनों के अभ्यास से सीखा जा सकता है। कि यह आसन मांसपेशियों को रिलैक्स करता है और उपापचय में सुधार करता है और अन्ततः दिल के दौरे को रोकता है और रक्त चाप घटाता है। इसमें व्यक्ति को सबसे पहले समतल जमीन पर पीठ के बल लेटना होता है। इसके बाद अपना ध्यान श्वसन पर केन्द्रित करना पड़ता है। ध्यान यह रखा जाना चाहिये कि जब श्वास लिया जाये तब पेट उपर जाये और श्वास छोड़ा जाये तब पेट नीचे आये। श्वसन पर ध्यान केन्द्रित करने से सभी फालतू एवं अप्रासंगिक विचारों से मुक्ति पायी जा सकती है। जब पूरा ध्यान श्वसन पर केन्द्रित हो जाये तब पैर के अंगूठे से लेकर सिर तक के एक-एक अंग-प्रत्यंग को ढीला छोड़ना शुरू किया जाता है। इस तरह पूरे शरीर को ढीला छोड़ दिया जाता है। इस आसन के दौरान कई लोग पूर्ण निद्रा में चले जाते हैं जो और लाभदायक होता है। यह आसन अनिद्रा के शिकार व्यक्तियों को अच्छी नींद लाने में मदद करता है। इसके अलावा हृदय रोगियों के लिये सूर्य नमस्कार को भी बहुत उपयोगी पाया गया है।
खान-पान का भी हमारे हृदय के साथ गहरा संबंध है। विभिन्न अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि अधिक वसा युक्त आहार एवं मांसाहारी भोजन हृदय के लिये नुकसानदायक होते हैं, क्योंकि ये रक्त में कोलेस्ट्राॅल के स्तर को बढ़ाते हैं जिनके कारण हृदय को रक्त मुहैया कराने वाली धमनियों में कोलेस्ट्राॅल का जमाव हो जाता है और हृदय को काम करने के लिये आक्सीजन नहीं मिलती। यह स्थिति हृदय रोगों तथा जानलेवा हृदय रोगों के कारण बनते हैं।
हृदय रोगी के लिये आहार से रोजाना 65 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट तथा 30 प्रतिशत प्रोटीन ग्रहण करना अच्छा रहता है। हृदय रोगी को दूध से परहेज करना चाहिये क्योंकि इसमें कोलेस्ट्राॅल मौजूद होता है।
हृदय रोगियों को साइलम हस्क (इसबगोल) से भी बहुत अधिक फायदा पहुंचता है। आमतौर लोग इसे कब्ज दूर करने के लिये लेते हैं। यह घुलनशील रेशे का अच्छा स्त्रोत है और यह कालेस्ट्राॅल घटाता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में कुछ समय पहले किये गये अध्ययन से पता चला है कि एक माह तक रोजाना 15 ग्राम इसबगोल का सेवन करने से कोलेस्ट्रॅाल में 15 प्रतिशत तक कमी की जा सकती है।
इसबगोल मधुमेह तथा अनेक तरह के कैंसर को रोकने में भी मददगार है। विश्व भर में हुये अनुसंधानों से पता चला है कि अनेक तरह के फल एवं सब्जियां भी कोलेस्ट्राॅल घटाने में मददगार है। करीब 50 अध्ययनों से पता चला है कि लहसुन 10 प्रतिशत तक कोलेस्ट्राॅल घटा सकता है। इसके अलावा मेथी भी उपयोगी पाया गया। रोगियों को अपने आहार में अधिक एंटी आक्सीडेंट्स लेना चाहिये। एंटी आक्सीडेंट्स एथोरिक्लोरोसिस होने से रोकते हें। ये विटामिन सी, विटामिन ई और बीटा कैरोटिन में मौजूद होते हैं। नट को हृदय रोग में नुकसानदायक माना जाता है। लेकिन दरअसल नट लाभदायक है।
हृदय रोगियों को दूध वाली चाय से परहेज करना चाहिये क्योंकि इसमें कैलोरी अधिक होते हैं। ऐसे रोगियों के लिये बिना दूध व चीनी की चाय बहुत अधिक मुफीद है क्योंकि इसमें एंटी आक्सीडेंट्स होते हैं। दिन भर में से दो तीन कप ऐसी चाय पीना लाभदायक होता है।


 


Comments