Wednesday, 27 November 2019

गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी

गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की समस्या चिंता का विषय  है, क्योंकि यह मातृ मृत्यु दर, संक्रमण के खतरे, समय से पूर्व प्रसव और भ्रूण एवं नवजात शिशु की खराब सेहत की आशंका को बढ़ाती है। हमें एनीमिया को खत्म करने के लिए पहल करनी चाहिए और अगर हम अगर एनीमिया के असली कारणों का पता लगा पाएं तो इस समस्या को आसानी से दूर किया जा सकता है। हमने पाया है कि ज्यादातर मामलों में एनीमिया का कारण पौष्टिक पहलू होता है। परंपरागत रूप से भारतीय महिलाएं कम मात्रा में खाना खाती हैं और जिसके कारण उन्हें कम पोशण प्राप्त होता है और इसके कारण वे कुपोषित हो जाती हैं। अधिकतर महिलाएं शाकाहारी होती हैं और मांसाहारी स्रोतों की तुलना में शाकाहारी स्रोतों से मिलने वाले आयरन को हमारा शरीर कम अवशोषित कर पाता है। इसलिए इसके कारण महिलाएं जो आहार खाती हैं उससे आयरन की दैनिक आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो पाती है। आयरन की कमी का एक कारण कृमि संक्रमण है। ये कृमि छोटी आंत में रहते हैंए जहां वे आंतों की दीवार से चिपक जाते हैं और रक्त चूसते हैं। इस समस्या से ग्रस्त महिलाओं को आमतौर पर थकान होती है, वे थकी—थकी महसूस करती हैं, उन्हें बेचैनी होती है तथा कम काम करने पर ही उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगती हैं। इस तरह से उनके जीवन की समग्र गुणवत्ता में गिरावट आती है। 
अगर कोई महिला गर्भावस्था की शुरुआत से पहले से ही एनीमिया से ग्रस्त हैं तो गर्भावस्था के दौरान उनका स्वास्थ्य और खराब हो जाएगा और ऐसे में उनकी अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है और गर्भावस्था के दौरान उन्हें आहार के अलावा पूरक आहार देने चाहिए। माताओं के एनीमिया से ग्रस्त रहने का होने वाले बच्चे पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। एनीमिक माता के शिशु का विकास मां को एनीमिया होने के कारण प्रतिबंधित होता है क्योंकि मां के जरिए भू्रण को प्राप्त होने वाले रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा पर्याप्त नहीं होती है और इसलिए बच्चे का विकास कम होता है। 
स्तनपान के दौरान एनीमिक महिलाएं बच्चे को पर्याप्त स्तनपान नहीं करा पाती। स्तन पान नहीं होना या कम स्तन पान होना एनीमिक माताओं की एक दूसरी समस्या है। 
एनीमिक महिलाओं में समय से पूर्व प्रसव होने का खतरा अधिक सामान्य है। अगर महिलाएं एनीमिक हैं तो गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंषन की समस्या भी अधिक सामान्य है। 
लड़कियों में किशोरावस्था में आयरन की कमी होने की आशंका अधिक होती है क्योंकि इस दौरान शरीर का विकास तेजी से होती है, मासिक धर्म की शुरुआत होती है और खान—पान की आदतें खराब होती है। किशोर लड़कियां निकट भविष्य में बच्चे का पालन पोषण करने वाली होती हैं और अगर उनमें एनीमिया की समस्या है यह समस्या होने वाले बच्चे में भी स्थानांतरित होती है। इसलिए अगर किशोरावस्था में ही लड़कियों में आयरन की कमी को दूर किया जाए तो वे बेहतर आयरन स्तर के साथ गर्भवती होती हैं और भावी पीढ़ी पर उसका साकारात्मक असर पड़ता है। 


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