Saturday, 9 November 2019

इंडोस्कोपी से कुशिंग रोग एवं पिट्यूटरी ट्यूमर का इलाज

बच्चों एवं युवाओं में उच्च रक्त चाप, मधुमेह और चेहरे अथवा पूरे शरीर में सूजन तथा अविवाहित महिलाओं में माहवारी बंद होने तथा स्तन से दूध आने जैसे लक्षण कुशिंग रोग नामक गंभीर स्नायु बीमारी के संकेत हो सकते हैं। लेकिन जानकारी एवं जागरूकता के अभाव में लोग सामान्य फिजिशियन से इलाज कराते रहते हैं जिसके कारण उनकी बीमारी बढ़ती रहती है और कई बार खतरनाक नतीजे सामने आते हैं। 
आम तौर पर पिट्यूटरी ट्यूमर के कारण होने वाला कुशिंग रोग शरीर में कोटिसाॅल या स्टेराॅयड नामक हार्मोन के बढ़ जाने से होता है। शरीर में हार्मोन असंतुलन उत्पन्न हो जाने के कारण होने वाले इस रोग को हाइपरकोटिसोलिज्म भी कहा जाता है। यह दुर्लभ किस्म की बीमारी है और अक्सर 20 से 40 वर्ष उम्र के लोगों को होती है। लेकिन यह बीमारी बच्चों को भी हो सकती है।  
मनुष्य के जीवित रहने के लिये शरीर में इस हार्मोन की निर्धारित मात्रा की उपस्थिति बहुत आवश्यक है लेकिन इसकी मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाना खतरनाक साबित हो सकता है। 
कुशिंग रोग के लक्षणों में शरीर के ऊपरी भाग में मोटापा, चेहरे का गोलाकार हो जाना, गर्दन के चारों तरफ अधिक वसा जम जाना तथा हाथ एवं पैर पतले हो जाना प्रमुख है। इसके अलावा त्वचा पतली एवं कमजोर हो जाती है। इसके कारण त्वचा जल्दी फट जाती है। पेट, जांघ, पीठ के निचले हिस्से, बांह और छाती पर बैंगनी-गुलाबी निशान पड़ जाते हैं तथा उठने-बैठने जैसी रोजमर्रे की गतिविधियों के कारण कमर दर्द हो सकता है तथा छाती की हड्डियों एवं रीढ़ में फ्रैक्चर होने की आशंका रहती है। अनेक लोगों में थकान, उच्च रक्त चाप एवं उच्च रक्त शुगर के अलावा चिड़चिड़ापन, दुश्चिंता एवं अवसाद की भी शिकायत हो सकती है। 
इस रोग से ग्रस्त महिलाओं के चेहरे, गर्दन, छाती, पेट और जांघ में अधिक बाल हो जाते हैं। उनकी माहवारी या तो अनियमित हो जाती है या बंद हो जाती है। पुरुषों में प्रजनन क्षमता एवं सेक्स की इच्छा घट जाती है। 
कुशिंग रोग का सबसे बड़ा कारण पिट्यूटरी टूयमर है हालांकि यह ट्यूमर कैंसररहित होता है। पिट्यूटरी ट्यूमर को इंडोस्कोपी के जरिये निकाला जाना संभव हो गया है। इसके लिये मस्तिष्क में किसी तरह की चीर-फाड़ करने की जरूरत नहीं पड़ती है। इसके लिये नाक के जरिये इंडोस्कोपी यंत्र डालकर ट्यूमर को निकाल लिया जाता है।
बच्चों में भी पिट्यूटरी ट्यूमर हो सकता है लेकिन बच्चों में पिट्यूटरी ट्यूमर इतने छोटे आकार का होता है कि आम तौर पर इसका पता कैट स्कैन में नहीं चलता है। इसका पता उन्नत एम.आर.आई. से ही चलता है। 
अगर किसी व्यक्ति को उच्च रक्त चाप और मधुमेह हो तथा शरीर में सूजन एवं चेहरे का आकार बदल रहा हो तो उसे लापरवाही नहीं करनी चाहिये बल्कि किसी इंडोक्राइनोलाॅजिस्ट से यह जांच करानी चाहिये कि कोई हार्मोन असंतुलन तो नहीं है। महिलाओं में पिट्यूटरी ट्यूमर होने पर प्रोलेक्टिन हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है जिससे माहवारी बंद हो जाती है, गर्भधारण नहीं होता है तथा अविवाहित महिलाओं में स्तन से दूध आने लगता है। 
पुरुषों में इस ट्यूमर के कारण प्रोलेक्टिन हार्मोन के अधिक होने का पता नहीं चलता। उनमें इस ट्यूमर का तभी पता चलता है जब यह ट्यूमर बढ़ कर आंखों के नर्व को दबाने लगता है। इसके कारण कई बार आंख खराब हो जाने के कारण ही इसका पता लग पाता है लेकिन महिलाओं में इसका पता आरंभिक अवस्था में लग सकता है। देर से पता चलने पर जब ट्यूमर का आकार बड़ा हो जाता है तो इंडोस्कोपी के अलावा रेडियेशन के जरिये ट्यूमर के शेष भाग को भी नष्ट करना जरूरी होता है। 
जानकारी के अभाव में आम तौर पर लोग पिट्यूटरी ट्यूमर के लक्षणों को समझ नहीं पाते हैं और वे या तो इलाज में लापरवाही बरतते हैं या सामान्य चिकित्सक की दवाइयां खाते रहते हैं। डा. राजेन्द्र प्रसाद ने हाल में कुशिंग रोग से ग्रस्त 18 साल की उम्र के एक छात्र का इंडोस्कोपी से इलाज किया। इस रोग के कारण उसका चेहरा फूल कर बड़ा हो गया था। उसके घर एवं आसपास के लोग पहले तो यह समझते रहे कि वह मोटा हो रहा है। लेकिन उसे उच्च रक्त चाप, मधुमेह, पूरे शरीर में सूजन और जख्म होने पर उसे जब उनके पास लाया गया तो उन्नत किस्म की एम.आर.आई से पिट्यूटरी ट्यूमर का पता चल गया। यह ट्यूमर मात्र सात मिली मीटर का था। इंडोस्कोपी की मदद से उसके पिट्यूटरी ट्यूमर को निकाल देने पर वह छात्र पूरी तरह से ठीक हो गया। 
पिट्यूटरी ट्यूमर का दवाइयों से भी इलाज हो सकता है लेकिन इसके लिये लंबे समय तक दवाइयां खानी पड़ती है। जब तक दवाइयों का सेवन जारी रहता है ट्यूमर दबा हुआ रहता है लेकिन दवाईयों का सेवन बंद करने पर ट्यूमर दोबारा उभर आता है। जिन लोगों के लिये सर्जरी या इंडोस्कोपी अनुकूल नहीं होती उन्हें दवाइयां खाने की ही सलाह दी जाती है। 
इंडोस्कोपी की मदद से ट्यूमर हटाने के लिये मरीज को मात्र दो दिन अस्पताल में रहना पड़ता है। 


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