Thursday, 24 June 2021

कोविड - 19 के दौरान फेफड़े के कैंसर

– डा. सुरेंद्र कुमार डबास, वरिष्ठ निदेशक और विभागाध्यक्ष,सर्जिकल ओंकोलाजी और रोबोटिक सर्जरी

डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में फेफड़ों के कैंसर के कारण हर साल लगभग 20 लाख 9 हजार लोगों की मौत हो जाती है। भारत में स्त्रियों और पुरूषों में कैंसर के सभी नए मामलों में से 6.9 प्रतिशत मामले फेफड़ों के कैंसर के होते हैं जबकि कैंसर के कारण होने वाली सभी मौतों में से 9.3 प्रतिशत मौतें फेफड़ों के कैंसर के कारण होती है।

ग्लोबोकान के अनुसार, भारत में हर साल फेफड़ों के कैंसर के लगभग 70,000 नए मामले सामने आते हैं और लगभग 62,000 मौतें होती हैं।

भारत में फेफड़ों के कैंसर के मरीजों की अधिक मृत्यु दर होने का कारण फेफड़ों के कैंसर के लिए सामुदायिक आधारित समुचित एवं कारगर स्क्रीनिंग कार्यक्रम की कमी है। 

भारत में पहले से ही सामुदायिक स्क्रीनिंग कार्यक्रमों की स्थिति बदतर है और कोविड-19 की महामारी के कारण इसकी स्थिति और भी बदतर हो गई है। कोरोना के भय के कारण जिन लोगों में फेफड़े के कैंसर के संभावित लक्षण हैं वे जांच एवं इलाज के लिए अस्पताल आने से कतरा रहे हैं और इसके कारण उनकी सही समय पर जांच नहीं हो रही है और जिन लोगों में हाल में फेफड़े के कैंसर का पता चला है उनके इलाज को जारी रखने में समस्या आ रही है और जिनका पहले से इलाज चल रहा है वे अपनी कीमोथिरेपी या अपनी सर्जरी टाल रहे हैं। 

यह स्थिति इस कारण से भी जटिल हो रही है क्योंकि फेफड़े के कैंसर एवं कोविड - 19 के लक्षण एक दूसरे से मिलते- जुलते हैं। इन सब स्थितियों के कारण आरंभिक अवस्था वाला इलाज योग्य कैंसर धीरे-धीरे बढ़कर गंभीर अवस्था में प्रवेश कर जाएगा और जिस कैंसर का आज इलाज हो सकता है, समय पर इलाज नहीं होने के कारण बाद में वह लाइलाज बन जाएगा।

फेफड़ों के कैंसर की मृत्यु दर कोविड -19 की तुलना में अधिक है, इसलिए डाक्टरों और मरीजों को फेफड़े के कैंसर के इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए और चाहे किसी भी तरह का कैंसर हो उसका उपचार समय पर होना चाहिए। कोविड-19 की महामारी अभी शीघ्र जाने वाली नहीं है और इसलिए जीवन को पहले की तरह जारी रखा जाना चाहिए तथा कैंसर के इलाज में किसी तरह की कोताही नहीं बरती जानी चाहिए। 



आपके बच्चे के 'पहले हजार दिनों' को मजबूत करने के लिए जरूरी है स्तनपान

— डॉ शाची बवेजा, लैक्टेशन कंसल्टेंट, बाल चिकित्सा विभाग, बीएलके सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल।

किसी भी बच्चे के लिए ʺपहला हजार दिनʺ मां के गर्भधारण करने से लेकर बच्चे के दूसरे जन्म दिन तक का समय होता है। इसमें गर्भावस्था का समय और बच्चे के जीवन के पहले दो साल शामिल होते हैं।

इस अवधि में शरीर और मस्तिष्क दोनों का तेजी से विकास होता है। यह समय काफी महत्वपूर्ण और बच्चे की शारीरिक और मानसिक क्षमता को मजबूत करने वाला होता है, लेकिन साथ ही यह बहुत ही संवेदनशील समय भी होता है क्योंकि अगर चीजों को ठीक से प्रबंधित नहीं किया जाता है, तो इससे दीर्घकालिक परिणाम हो सकते हैं। यह अवधि हमें बच्चों को अधिक स्वस्थ बनाने और एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण करने का अनूठा अवसर प्रदान करती है।

इसके कई पहलू हैं, और इसमें पोषण की विशेष भूमिका है। इसलिए, गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान किसी महिला का पोषण और पहले 2 वर्षों में बच्चे का पोषण बच्चे के स्वास्थ्य की स्थिति को निर्धारित करता है, और अगर हम इसके व्यापक प्रभाव की बात करें तो यह राष्ट्र के विकास और समृद्धि को भी निर्धारित करता है।

इस प्रकार हर राष्ट्र के लिए एक बहुत ही स्मार्ट निवेश महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण में निवेश होगा (विशेषकर गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान), साथ ही स्तनपान को बढ़ावा देने, सुरक्षा प्रदान करने और समर्थन प्रदान करने और बच्चों को सही पूरक आहार देने के तरीकों के बारे में जानकारी प्रदान करना भी जरूरी है।

अगर कोई भी राष्ट्र इन में निवेश करने में विफल रहता है तो यह बहुत दुख की बात होगी!

दुनिया भर के आंकडों से पता चलता है कि माताओं और बच्चों के पोषण में सुधार के लिए किया गया प्रत्येक एक डॉलर का निवेश 35 डॉलर का रिटर्न देता है।

हमारा काम हमारे लिए कटआउट है, हमें माता और बच्चे के पोषण में निवेश करने की जरूरत है। हमारे शरीर के इष्टतम विकास, वृद्धि और प्रतिरक्षा के लिए शरीर को अच्छे पोषण की जरूरत होती है।

एक बच्चे के लिए उसके जीवन के पहले 6 महीने में इष्टतम पोषण उसकी अपनी माँ के दूध से ही मिलता है किसी और चीज से नहीं। इसके पीछे एक बहुत ही सरल तर्क है, कि माँ के दूध में बच्चे के 6 महीने तक के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं।

एक नवजात शिशु को अपनी खुद की प्रतिरक्षा विकसित करनी होती है (वे कुछ प्रतिरक्षा के साथ पैदा होते हैं, जो वे गर्भावस्था के दौरान और बाद में माता से त्वचा से त्वचा के संपर्क में आने पर प्राप्त करते हैं), इसलिए जब तक बच्चा प्रतिरक्षा के अच्छे स्तर को प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक माँ का दूध बच्चे को प्रतिरक्षा प्रदान करता है (और यह तब तक प्रदान करना जारी रखता है जब तक बच्चा स्तनपान जारी रखता है)।

स्तनपान न केवल तेजी से बढ़ते मस्तिष्क और शरीर के लिए उचित पोषण प्रदान करता है, बल्कि यह बच्चे को प्रतिरक्षा भी प्रदान करता है और इसके बारे में सबसे जादुई बात यह है कि यह प्रतिरक्षा गतिशील है, अर्थात बिना किसी अतिरिक्त खर्च के यह बच्चे की आवश्यकता के आधार पर बदलता है।

प्रकृति ने एक सुंदर, परिष्कृत और उच्च तकनीक प्रणाली बनाई है। इसलिए, जब माता को कोई संक्रमण होता है, तो वह अपने दूध में उस संक्रमण के खिलाफ एक पदार्थ (एंटीबॉडी) स्रावित करती है जो उस संक्रमण से उसे सुरक्षा प्रदान करता है। यही नहीं, यदि उसके बच्चे में कोई संक्रमण होता है, तो बच्चे की लार माँ के स्तनों के साथ संवाद करती है और माँ के स्तन स्तन दूध में सुरक्षात्मक पदार्थ (एंटीबॉडी) का उत्पादन शुरू कर देते हैं जो शिशुओं को उस संक्रमण से लड़ने में मदद करते हैं।

बच्चे के 6 माह के होने के बाद, बच्चे की आहार की आवश्यकता बढ़ जाती है और बच्चे के आहार में पूरक आहार को भी शामिल किया जाता है, साथ ही स्तनपान भी जारी रखा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का सुझाव है कि बच्चे को कम से कम 2 वर्ष की आयु तक स्तनपान (उचित पूरक खाद्य पदार्थों के साथ) कराया जाना चाहिए ।

कोविड-19 महामारी के इस समय में यह बहुत अधिक प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है। शोध हमें बताते हैं कि कोरोनो वायरस स्तन दूध के माध्यम से संचारित नहीं होते हैं और कोविड पॉजिटिव माताएं अपने स्तन दूध में सुरक्षात्मक एंटीबॉडी का स्राव करती हैं !!

लेकिन अफसोस की बात है कि देश भर से आने वाले आंकड़ों में हमारे स्तनपान दर में गिरावट देखी जा सकती है और इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं, मिथक और डर जिसका संबंध कोरोना वायरस संक्रमण और तैयारियों की कमी से है।

अच्छी खबर यह है कि इसका इलाज संभव है। हम सभी को मां के कोविड से प्रभावित होने के बावजूद, माँ से बच्चे का तुरंत त्वचा से त्वचा संपर्क और स्तनपान के बारे में सार्वभौमिक (डब्ल्युएचओ, यूनिसेफ, बीपीएनआई, एसोसिएशन ऑफ लैक्टेशन प्रोफेशनल्स इंडिया, आईएलसीए, सीडीसी) सिफारिशों के बारे में जागरूकता पैदा करने की जरूरत है।

मैं समझता हूं कि इसमें सरकार और स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की भूमिका है, लेकिन हम सभी इसमें एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें गर्भावस्था में अपना ध्यान रखने, स्तनपान के महत्व के बारे में पढकर या ʺस्तनपान तैयारी कक्षाओंʺ में भाग लेकर स्तनपान के बारे में जानकारी प्राप्त करने या स्तनपान के बारे में अपने डॉक्टर से बात करने की आवश्यकता है। यदि वे स्तनपान में किसी भी चुनौती का सामना करती हैं तो वे जल्द से जल्द एक कुशल ʺलैक्टेशन प्रोफेशनलʺ की मदद लें।

यदि हम संक्षेप में कहें तो स्तनपान करने वाले बच्चे और माताएं स्वस्थ रहते हैं और उनकी प्रतिरक्षा की स्थिति बेहतर होती है। स्तनपान सुरक्षात्मक और अनुशंसित है, भले ही मां कोविड पॉजिटिव हो।









 


लॉकडाउन के बाद जिम में अधिक और कठोर व्यायाम करने से युवाओं में गुर्दे खराब होने का खतरा

जिम धीरे-धीरे अनलॉक 3 में फिर से खुल रहे हैं और लोग महीनों तक घर पर रहने के बाद व्यायाम करने के लिए जिम का रुख कर रहे हैं। लेकिन दिल्ली के एक 18 वर्षीय युवा के जिम में अत्यधिक और कठोर व्यायाम करने के कारण उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड。ने का मामला सामने आया है। 

जिम को अत्यधिक पसंद करने वाले लक्ष्य बिन्द्रा लॉकडाउन में जिम के बंद होने के कारण जिम नहीं जा पाए थे और लॉकडाउन के तीन महीने बाद उनके पसंदीदा जिम के फिर से खुलने पर उन्होंने जिम में अधिक व्यायाम कर पिछले समय की भरपाई करना चाहा। इसलिए  उन्होंने जिम में उत्साह वश जोरदार तरीके से एक घंटे से अधिक समय तक व्यायाम किया। उसी शाम, उन्हें उल्टी के साथ मांसपेशियों में अत्यधिक थकान, शरीर में अकड़न और दर्द होने लगा। वह तीन दिनों तक घर में बीमार रहने के बाद बुरी हालत में, दिल्ली के पटपड़गंज के मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल पहुंचे।

मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज, नई दिल्ली के रेनल एंड किडनी ट्रांसप्लांट विभाग के सीनियर कंसल्टेंट डॉ दिलीप भल्ला ने कहा, “जब मरीज हमारे अस्पताल में आया था, तो उसके  पेट में तेज दर्द हो रहा था, उसे कम मात्रा में काले रंग का पेशाब आ रहा था, और उसके गुर्दे और लीवर ठीक से कार्य नहीं कर रहे थे। जांच करने पर उसमें राब्डोमायोलिसिस का निदान किया गया। यह एक ऐसी स्वास्थ्य समस्या है जिसमें मांसपेशियां तेजी से टूटने लगती हैं। इसके कारण रक्त प्रवाह में कुछ प्रकार के एंजाइम रिलीज होने लगते हैं, जिससे गुर्दे खराब होने लगते हैं। मरीज को तुरंत आईसीयू में ले जाया गया और हाइड्रेशन बनाए रखने और उसकी मांसपेशियों को पोषक तत्व प्रदान करने के लिए नसों के जरिए तरल पदार्थों को देना शुरू किया गया। उसकी मांसपेशियों को आराम पहुंचाने के लिए उसे कई दिनों तक हल्की फिजियोथेरेपी की गई। इसके अलावा, चूंकि उसकी किडनी ने पूरी तरह से काम करना बंद कर दिया था इसलिए उसे डायलिसिस के दो सत्रों की आवश्यकता थी। धीरे-धीरे, जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मरीज में सुधार होने लगा। उसकी मांसपेशियों में अकड़न और दर्द धीरे-धीरे कम होने लगा, यहां तक कि उसने धीरे-धीरे मांसपेशियों की शक्ति भी हासिल कर ली। ”

डॉ दिलीप भल्ला ने कहा: “हमें समय के बारे में नहीं पता है कि मरीज की किडनी कब प्रभावित हुई। लेकिन वह जिम में व्यायाम करने के तीन दिन बाद हमारे पास आया था। इस दौरान उसकी किडनी कभी भी खराब हो सकती थी। मांसपेशियों की इंजुरी के कारण जारी होने वाला एंजाइम मायोग्लोबिन गुर्दे की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। अगर समय रहते इसका पता नहीं लगाया गया, तो इससे किडनी पूरी तरह से खराब हो सकती है और जानलेवा तकलीफ हो सकती है। ऐसे युवा में किडनी के काम नहीं करने की घटना को देखना हमारे लिए भी आश्चर्यजनक था। सौभाग्य से, अस्पताल में एक सप्ताह रहने के बाद उसे पूरी तरह से ठीक करने में हम कामयाब रहे। उसकी किडनी पुनर्जीवित हो गई है और अब पूरी तरह से काम कर रही हैं। ”

मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज, नई दिल्ली के इमरजेंसी मेडिसिन के अटेंडेंट कंसल्टेंट डॉ अब्बास अली खताई ने कहा: “अत्यधिक शारीरिक गतिविधि से मांसपेशी टूट सकती है। यह राब्डोमायोलिसिस का एक सामान्य कारण है। हर व्यक्ति का शरीर अलग होता है और व्यायाम करने के लिए अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है। इसलिए व्यायाम करते समय किसी के अपने शरीर की सीमाओं को जानना, हाइड्रेटेड रहना और उचित प्रोफेशनल मार्गदर्शन प्राप्त करना आवश्यक है - चाहे वह भारोत्तोलन, योग, कार्डियो या क्रॉस-फिट हो। अधिक कठोर, बेहिसाब व्यायाम से मांसपेशियों में एसिड जमा होने लगता है जिससे मांसपेशियों के प्रोटीन टूटने लगते हैं। यह प्रोटीन तब रक्त प्रवाह में प्रवेश करता है जहां से यह गुर्दे में चला जाता है, जिससे किडनी खराब हो जाती है। ”

डॉ अब्बास अली खताई ने कहा: “लॉकडाउन की अपनी समस्याएं हैं, लेकिन अनलॉकिंग के चरण में लोग बेहिसाब जिम करने लगे हैं, जैसा कि इस मामले से पता चलता है। इसलिए सावधानी बेहद जरूरी है क्योंकि शरीर ज्यादा सहन नहीं कर सकता है। समस्या की शीघ्र पहचान और समय पर उपचार ने इस युवा को गंभीर परिणामों से बचाने में मदद की। जिम जाने वालों को हमारी सलाह है कि वार्म अप कर व्यायाम कार्यक्रम के लिए शरीर को धीरे-धीरे तैयार करें। जिम जाने वाले लोगों को ढेर सारा पानी भी पीना चाहिए और पोषक तत्व लेने चाहिए ताकि मांसपेशियों पर जोर न पड़े। व्यायाम करने के बीच उचित आराम करने की भी सलाह दी जाती है। आदर्श रूप से, एक योग्य जिम ट्रेनर को व्यायाम कार्यक्रम का मार्गदर्शन करना चाहिए। "


कोरोना काल में कराएं इंटेलीजेंट हिप सर्जरी

कोरोनावायरस के प्रकोप के कारण आज अलग–अलग बीमारियों के मरीजों का समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है। कोविड -19 से बचने के लिए कई मरीज इलाज के लिए अस्पताल आने में कतराते हैं जबकि कई अस्पतालों में आर्थोपेडिक सर्जरी एवं अन्य सर्जरी टाली जा रही है। यह देखा जा रहा है कि आर्थोपेडिक के मरीजों को सही समय पर समुचित इलाज नहीं मिल पाने के कारण पाने के कारण उनकी बीमारियां एवं विकलांगता बढ रही है। हालांकि कई अस्पतालों में सभी मरीजों का इलाज एवं उनकी सर्जरी सही समय पर समुचित तरीके से करने का इंतजाम किया गया है। इन अस्पतालों में मरीजों को हर तरह से संक्रमण से सुरक्षा प्रदान की जा रही है। यही नहीं आज आर्थोपेडिक चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसी तकनीकों का विकास हुआ है जिनकी मदद से आर्थोपेडिक के मरीजों की सर्जरी पूरी तरह से आसान एवं सुरक्षित हो गई है। इन तकनीकों में से एक तकनीक है इंटेलीजेंट हिप सर्जरी।

आज के समय में कूल्हे बदलने की सर्जरी काफी संख्या में की जाने लगी है। नई तकनीकों से सर्जरी करने पर यह सर्जरी काफी सफल साबित हो रही है। नई तकनीकों के विकसित होने के कारण कूल्हे बदलने की सर्जरी के परिणाम बेहतर हो रहे हैं मरीजों को कम दर्द का सामना करना पडता है अब कम चीरे लगाने पडते हैं तथा यह सर्जरी काफी कारगर साबित हो रही है। इंटेलीजेंट हिप सर्जरी की मदद से सर्जरी करने पर मरीज को एक से दो दिन में अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है, मरीज को रक्त चढाने की कोई जरूरत नहीं पडती, बहुत छोटा चीरा लगाकर सर्जरी की जा सकती है, सर्जरी से कोई भी मांसपेशी क्षतिग्रस्त नहीं होती है, सर्जरी के बाद मरीज की चाल में काफी सुधार होता है और मरीज बहुत जल्द सामान्य काम–काज करने लगता है।

इंटेलीजेंट हिप सर्जरी (डीएए) बिल्कुल नई और क्रांतिकारी किस्म की हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी है जिसमें मरीज को बहुत कम दर्द एवं दिक्कत का सामना करना पडता है और मरीज सर्जरी के तीन घंटे में अपने पैरों पर खडा हो सकता है और एक या दो दिन में अपने घर जा सकता है। इसमें कूल्हे के पीछे के बजाए कूल्हे के आगे चीरा लगाया जाता है जिसके कारण मांसपेशियों की क्षति कम होती है और कम दर्द होता है। परम्परागत विधि की तुलना में इस तकनीक से सर्जरी करने पर कूल्हे में खराबी आने की आशंका कम होती है। कूल्हे में खराबी आने पर मरीज के लिए जटिलताएं बढ जाती है।

इस नई तकनीक से सर्जरी कराने के बाद मरीज डेढ माह या उससे भी कम समय में हल्का–फुल्का खेल खेल सकता है। इस नई तकनीक के कारण मरीज को एक सप्ताह की तुलना में एक या दो दिन अस्पताल में रहने की जरूरत पडती है। इस नई तकनीक के कारण मरीज के अस्पताल से छुट्टी मिल जाने से अस्पताल पर मरीजों का दवाब भी घट जाता है और अस्पताल में नए जरूरतमंद मरीजों को भर्ती किया जा सकता है। इस तकनीक में मरीज के शीघ्र पुनर्वास को काफी महत्व दिया गया है। मरीज बहुत तेजी से स्वास्थ्य लाभ करता है’ उसे जटिलताएं होने का खतरा बहुत कम होता है’ उसकी कार्यकुशलता एवं गतशिीलता में बहुत तेजी से सुधार होता है।

यह सर्जरी तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इस तकनीक की कई विशेषताएं हैं। इस तकनीक में नाजुक एवं मुलायम उत्तकों को तथा कूल्हे के आसपास की मांसपेशियों को कम से कम नुकसान पहुंचाता है। रक्त की कम से कम क्षति होती है जिसके कारण अलग से रक्त् चढाने की जरूरत नहीं पडती है। चीरे के बहुत छोटे निशान रहते हैं। मरीज सर्जरी के बाद तीन घंटे के भीतर ही चलने फिरने लगता है। सर्जरी के दौरान या बाद में दर्द नहीं होता है। इसके अलावा पैरों की लंबाई पहले की तरह ही रहती है। मरीज बहुत जल्द सामान्य कामकाज करने लगता है। ज्यादातर मरीज आलथी–पालथी मारकर बैठ सकते हैं। सर्जरी के बाद चीरे या जख्म का कोई निशान नहीं रहता है।


पोषण और मात्रा : स्वस्थ भोजन की कला


सेहतमंद और कुशल रहने का मेरा मंत्र हमेशा से यह रहा है कि आप जो भी खाएं वह न तो ज्यादा हो और न ही कम हो। वर्षों से अपनी पुस्तकों में और अपने व्याख्यानों में मैं लगातार इसी बात को दोहराती रही हूं और मैं लगातार इसी बात पर दृढ रही हूं। आपको भोजन की थाली में से किसी खास व्यंजन या खाद्य पदार्थ को प्रतिबंधित करने की जरूरत नहीं है बल्कि जो अच्छा खाद्य पदार्थ है उसे अधिक मात्रा में लें और जो खराब खाद्य पदार्थ है उसे कम मात्रा में लें।

ऐसा करना हमेशा फायदेमंद होता है। और ऐसा होता है क्योंकि यह हमारी थाली की हमारी सदियों पुरानी परम्परा पर आधारित है। इसके दो मजबूत स्तंभ हैं – खाद्य पदार्थों में विविधता और सभी खाद्य पदार्थों की मात्रा का समुचित नियंत्रण।

आज हमारे देश में जीवनशैली की बीमारियों का प्रकोप है। हमारा देश मधुमेह की वैश्विक राजधानी बन गया है। यहां मोटापा और कुपोषण दोनों का बराबर का प्रकोप है। हृदय रोग भी बहुत व्यापक है और उच्च रक्तचाप गंभीर और मूक हत्यारा बना हुआ है। इन बीमारियों के मरीजों की संख्या तेजी से बढती जा रही है और यह संख्या बहुत डरावनी है। इन बीमारियों से लाखों लोग पीड़ित हैं और इन बीमारियों के उपचार पर भारी खर्च कर रहे हैं।

जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां आज महामारी बन चुकी हैं। इन बीमारियों के फैलने का कारण यह है कि पिछले कुछ दशकों के दौरान हमने सुविधाजनक और आरामतलब जीवन को अपना लिया है और हमने धीरे–धीरे करके अपने सभी पारंपरिक आहार तथा आहार मूल्यों को त्याग दिया है और हमने स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली नकारात्मक आहार आदतों को अपना लिया है। हमने खाने पीने के सदियों पुरानी उन परम्पराओं को छोड दिया है जो समय की कसौटी पर खरी साबित हुई थी। हमने आधी–अधूरी जानकारियों के आधार पर उन खाद्य पदाथों को अपना लिया है जिनके कारण हमारी सेहत को भारी कीमत चुकानी पड रही है।

हमने कई सारी गलतियां की है लेकिन मुझे जिस बात को लेकर सबसे अधिक दुख होता है वह है थाली में विभिन्न व्यंजनों को समुचित अनुपात में रखकर खाने की हमारी पुरानी परम्परा का त्याग कर दिया जाना। थाली प्रणाली में हर खाद्य पदार्थ की अलग–अलग मात्रा होती थी और स्वतः ही गुणवत्ता संबंधी नियंत्रण हो जाता थ।

हमारे साथ समस्या यह है कि अक्सर हम हर चीज (सही या गलत) का बहुत अधिक सेवन करते हैं। दोष पूरी तरह से हमारा नहीं है – हम अपने चारों तरफ – टेलीविजन पर, मॉल में, रेस्तरां में सब जगह खाने पीने की आकर्षक चीजों को देखते हैं और हम उन्हें खाने को लालायित हो जाते हैं – और हम बिना सोचे समझे इन सब चीजों को अधिक मात्रा में खा लेते हैं।

जबकि यह बात स्पष्ट रूप से गलत (उच्च वसा और कैलोरी) भोजन पर लागू होता है साथ ही यह बात कम कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों के लिए भी सही है। क्योंकि सही खाद्य पदार्थों की बहुत अधिक मात्रा लेने से भी कैलोरी अनियंत्रित हो जा सकती है। पानी को छोड़कर कोई भी भोजन शून्य कैलोरी वाली नहीं है। इसलिए यदि आप कोई भी खास खाद्य पदार्थ अधिक मात्रा में खाते हैं तो आप अधिक कैलोरी लेते हैं। इस तरह से कैलोरी जुडती चली जाती है भले ही वह कैलोरी सही भोजन के माध्यम से हमारे शरीर में जाती है। इसलिए वजन पर नियंत्रण रखने के लिए जरूरी है कि जो भी खाद्य पदार्थ ले रहे हैं वह सही मात्रा में लें और इसका पालन सुविचारित एवं सुव्यवस्थित तरीके से करें। इसके अलावा आपको सभी पोषक तत्वों की सही मात्रा को सुनिश्चित करना जरूरी है। यह मैक्रो पोषक तत्वों - प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा, साथ ही आवश्यक विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सिडेंट जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों के सही और संतुलित सेवन को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

हम जिस खाद्य पदार्थ को जिस मात्रा में खाते हैं उससे केवल यह तय नहीं होता है कि हम रोजाना कितनी मात्रा में अतिरिक्त कैलोरी ले रहे हैं या अतिरिक्त कैलोरी कम कर रहे हैं बल्कि यह भी तय होता है कि हम दैनिक आधार पर कितने आवश्यक पोषक तत्व को प्राप्त कर रहे हैं क्योंकि खाद्य पदार्थों की मात्रा और उनसे मिलने वाला पोषण एक दूसरे के साथ जुडा है। इसलिए यह जरूरी है कि हम विभिन्न खाद्य पदार्थों की मात्रा को भी सुविचारित तरीके से ग्रहण करें। क्योंकि हम वास्तव में हर दिन स्कोर करने में सक्षम हैं, क्योंकि मात्रा और पोषण एक साथ जुड़े हुए हैं। इसलिए जब तक यह एक स्वचालित आदत नहीं बन जाता, तब तक होशपूर्वक और दैनिक रूप से भाग नियंत्रण का अभ्यास करना महत्वपूर्ण है।

बदलाव का समय

बिगड़ती स्वास्थ्य समस्याओं को ठीक करने का अब समय गया है कि हम केवल अपने खाने पीने की चीजों, बल्कि हमारे खाने के तरीके को भी बदलें। इससे कम कुछ भी हमारे स्वास्थ्य को पटरी पर लाने में मदद नहीं करेगा।

यह स्वस्थ खाने के लिए सबसे आम चुनौती को समाप्त करने का समय है: हमें क्या खाना है और कितनी मात्रा में खाना है इसके बारे में भ्रम

यह समय पोषण (अच्छा पोषण) और अंश (मात्रा) दोनों के महत्व को जानने और थाली प्रणाली पर वापस जाने और सही मात्रा और विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों के साथ ʺमेरी थालीʺ बनाने का है।

प्रतिदिन इस तरह भोजन करनामेरी थाली की अवधारणा का पालन करना - जो हमें जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से सिर्फ बचाने में मदद करती है, उन्हें रोकने में भी मदद करती है, बल्कि यह उन्हें काफी हद तक उल्टा भी कर देती है।

यह समय है कि थालियों को फिर से बाहर निकाला जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि पूरा परिवार उनमें भोजन करे।

बारिश के मौसम में बीमारियों से बचने के लिए बरतें अधिक सावधानी

 

बारिश का मौसम निश्चित रूप से तेज गर्मी से राहत दिलाता है, लेकिन साथ ही साथ इस मौसम में रोगों से सुरक्षा करने की हमारी क्षमता – इम्युन क्षमता घट जाती है और हमें विभिन्न तरह की संक्रामक बीमारियां होने का खतरा अधिक होता है। साल के इन महीनों के दौरान वायरल संक्रमण, गले में खराश, खांसी और सर्दी जैसी समस्याएं बहुत आम हैं क्योंकि मानसून का मौसम सूक्ष्मजीवों के विकास और प्रजनन के लिए सही जलवायु प्रदान करता है। ऐसी परिस्थितियों में, आपको अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। 

मानसून के दौरान वायरल रोग सबसे आम हैं और लोगों को इन बीमारियों से बचने के लिए एहतियात बरतनी चाहिए। वायरल संक्रमण संक्रामक हैं और इसके कारण नियमित फ्लू, बुखार, पेट की समस्याओं से लेकर स्वाइन फ्लू जैसे गंभीर संक्रमण तक हो सकते हैं। बहुत आसान एहतियाती उपायों को अपना कर आप अपने आप को कीटाणुओं और संक्रमणों से सुरक्षित रख सकते हैं। 

मानसून के दौरान होने वाली बारिश चिलचिलाती गर्मी से राहत जरूर दिलाती है, लेकिन इससे सर्दी और खांसी जैसी कई बीमारियां और सांस की गंभीर बीमारियां भी होती हैं। तापमान में अचानक गिरावट के कारण वायरल एवं बैक्टीरियल संक्रमण खास तौर पर श्वसनतंत्र की समस्याएं और अन्य बीमारियां मामूली टॉन्सिलिटिस, सर्दी और सूखी खांसी के रूप में शुरू हो सकती हैं लेकिन वे धीरे-धीरे शरीर के बाकी हिस्सों में भी फैल सकते हैं।

मानसून रोग

मानसून में फ्लू या सामान्य सर्दी और निमोनिया बहुत ही आम हैं। बैक्टीरिया या वायरस के कारण, इन बीमारियों के लक्षण कुछ दिनों में धीरे-धीरे विकसित हो सकते हैं या तेजी से बढ़ सकते हैं। श्वसन संबंधी बीमारी का मुख्य लक्षण खांसी है। इससे ग्रस्त किसी भी व्यक्ति को इनमें से कम से कम एक लक्षण अवश्य होंगे – बलगम वाली खांसी, शरीर का अधिक तापमान, पसीना आना और कंपकंपी, सांस लेने में कठिनाई या सामान्य से अधिक तेजी से सांस चलना, सीने में दर्द या बेचैनी और भूख न लगना आदि। ये लक्षण अक्सर छाती में होने वाले संक्रमणों के समान होते हैं, जैसे कि ब्रोंकाइटिस, क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और अस्थमा आदि। 

रोग के प्रमुख कारण क्या हैं?

बारिश के दौरान भीगने से एलर्जी ट्रिगर होती है जिससे सर्दी–खांखी और गले में खराश जैसी समस्या होती है और अगर इनकी अनदेखी की जाए तो यह समस्या फेफड़ों तक जा सकती है और इससे बलगम वाली खांसी हो सकती है। इसके अलावा, छाती में संक्रमण से कुछ अतिसंवेदनशील व्यक्तियों की छाती में घरघराहट की समस्या पैदा हो सकती है जो अस्थमा में बदल सकता है। संक्रमण अस्थमा के प्राथमिक कारणों में से एक है, खासकर बच्चों में। पीले रंग के बलगम का आना गंभीर संक्रमण का संकेत है और इस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

संक्रमण होने और उसके खतरे को कम करने के लिए कुछ सुझाव 

खांसते या छींकते समय अपने मुंह और नाक टिश्यू पेपर से ढक लें। अपने आसपास के अन्य लोगों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करें। कीटाणुओं के फैलाव को कम करने के लिए अपने मुंह को अपनी कोहनी या अपनी बांह से ढक कर खांसें। उपयोग में लाए गए टिश्यू को जितना जल्द हो सकें फेंक दें। हाथ को बार–बार धोयें अथवा सैनिटाइजर जेल से हाथ साफ करें। ऐसी स्थितियों से बचें जिसमें आपको ठंड या फ्लू होने का खतरा हो सकता है। उन लोगों के संपर्क में आने से बचें जिनमें ठंड के लक्षण हैं। 

अगर आपके लिए बाहर का मौसम बहुत अधिक ठंडा है या आप अच्छा महसूस नहीं कर रहे हैं या आपको सांस लेने में परेशानी हो रही है, तो घर के अंदर रहें और अपने को गर्म रखे। यदि आपके पास रिलीवर इनहेलर है, तो बाहर जाने से आधे घंटे पहले इसका उपयोग करें। अपने साथ रिलीवर दवाई को साथ रखें और जैसे ही आपको सांस लेने में दिक्कत हो या श्वसन नली में संकरापन महसूस हो तो इसका प्रयोग करें। आप मुंह से सांस लेने के बजाय नाक से सांस लेने की कोशिश करें क्योंकि इससे आप जिस हवा को ले रहे हैं उसे गर्म रखने में मदद मिलेगी। आप स्कार्फ या कपड़े से नाक एवं चेहरे को ढक कर रखें ताकि आपके फेफडे एवं श्वसन मार्ग का बचाव हो। नाक एवं मुंह को ढकने के लिए मुलायम कपड़े का उपयोग करें। 

बारिश के मौसम में वायरल संक्रमण को रोकें

स्वच्छता

उचित स्वच्छता बनाए रखने से मानसून के दौरान वायरल संक्रमण को रोकने में मदद मिल सकती है। छींकने, खांसने, पेटिंग, बागवानी, वॉशरूम का उपयोग तथा भोजन से पहले और बाद में अपने हाथों को निश्चित तौर पर धोएं। इसके अलावा, यह सुनिश्चित करें कि चोट और जख्म आदि से बचे रहें ताकि आप बैक्टीरिया संक्रमण से बचे रहें। 

घर का बना खाना खाएं 

आप जो खाते हैं उससे यह निर्धारित होता है कि आपको वायरस और संक्रमण की चपेट में आने का खतरा कितना अधिक है। मानसून के दौरान, आप वैसे खाद्य पदार्थ लें जो आपकी प्रतिरक्षा को बढ़ावा देते हैं। बारिश के मौसम में बाहर के खाने से बचें। वैसे अनहेल्दी वातावरण में रहने से बचें क्योंकि ऐसे वातावरण में बहुत सारे कीटाणु पैदा होते हैं। बारिश के मौसम में, कटे हुए फल और सब्जियां खाने से भी परहेज करें। 

हाइड्रेटेड रहें 

अपने आप को अच्छी तरह से हाइड्रेटेड रखें। यह हर समय के लिए उपयोगी सलाह है और आपके हित में काम करेगा। इससे आप अपने आपको स्वस्थ महसूस करेंगे। इससे बीमारियों की चपेट में आने से बचे रहेंगे। वजन घटाने में सहायता प्रदान करने के अलावा हाइड्रेटेड रहने से कीटाणुओं और संक्रमणों से लड़ने में मदद मिल सकती है।

अच्छी नींद लें

स्वस्थ प्रतिरक्षा के लिए एक रात में अच्छी नींद आना महत्वपूर्ण है। अगर आप रोजाना सही तरीके से नींद नहीं लेते या आप रोजाना छह घंटे से कम की नींद लेते हैं तो आपकी नींद पूरी नहीं होगी जिससे आप थका हुआ महसूस करें। इससे शरीर कमजोर होता है और संक्रमण और वायरल बुखार होने का खतरा अधिक होता है। 

दूषित जल स्रोतों पर ध्यान दें

जितना हाइड्रेटेड रहना महत्वपूर्ण है, उतना ही यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि पानी शुद्ध और स्वच्छ हो।

खाना पकाने से पहले फलों और सब्जियों को धोएं

यह हर मौसम के लिए महत्वपूर्ण सलाह है। खाना पकाने से पहले, सब्जियों और फलों को अच्छी तरह से धो लें। आपको मिलने वाले फल एवं सब्जियां आप तक पहुंचने के पहले धूल–गंदगी और खतरनाक वैक्टीरिया से होकर आपके पास आते हैं और अगर इन्हें धोए एवं साफ किए बगैर खा लिया जाए तो इससे वायरल बुखार एवं संक्रमण हो सकता है। 

सर्दी या बुखार होने पर चीजों को साझा करने से परहेज करें

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, वायरल बुखार संक्रामक है। यदि आप पहले से किसी संक्रमण से पीड़ित हैं या आपको सर्दी या खांसी है, तो किसी के साथ अपने भोजन और पेय को साझा करने से बचें। केवल कुछ जीवाणु भी किसी संक्रमित व्यक्ति से किसी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करके संक्रमित कर सकते हैं। 

रोकथाम इलाज से बेहतर है

बारिश के मौसम में अपनी सुरक्षा करें। अपने आप को गर्म रखें और प्रतिरक्षा बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थों जैसे गर्म सूप और पत्तेदार हरी सब्जियों का सेवन करें। 

मानसून में कोविड — 19

नोवेल कोरोनावायरस के उद्भव के बाद से, इस बात पर अक्सर विवाद होता रहा है कि यह वायरस बदलते मौसम में किस तरह से व्यवहार करेगा। श्वसन वायरस के संक्रमण आम तौर पर गर्म तापमान में घटते हैं क्योंकि ऐसे वातावरण में वायरस के जीवित रहने की अवधि घट जाती है और साथ ही साथ इसका संक्रमण घट जाता है। हालांकि अब इस बात के प्रमाण मिल रहे हैं कि कोविड – 19 का प्रकोप घट नहीं रहा है यहां तक कि गर्मियों के महीनों में भी।

किसी भी वायरल संक्रमण का प्रसार मुख्य रूप से तीन कारकों पर निर्भर करता है - मौसमी परिवर्तन, मानव व्यवहार पैटर्न और वायरस की विशेषताएं। कोविड - 19 इन्फ्लूएंजा फ्लू जैसे समान लक्षणों वाली एक श्वसन बीमारी है, और मानसून के महीनों के दौरान मौसमी फ्लू के मामलों में वृद्धि होती है।

इस बात पर अभी तक कोई निर्णायक प्रमाण नहीं है कि मौसम के पैरामीटर नोवेल कोरोनावायरस के प्रसार को किस हद तक प्रभावित करते हैं। यह स्थापित ज्ञान है कि तापमान और आर्द्रता वायरस को प्रभावित करते हैं। एक बात स्पष्ट हो गई है कि अनेक कारक इस घातक वायरस के प्रसार को प्रभावित करते हैं और केवल मौसम के पैरामीटर इसके फैलाव को रोक नहीं सकते हैं। 

हालांकि वैज्ञानिक इस बात पर ध्यान रख रहे हैं कि मानसून के महीनों के दौरान कोविड - 19 किस तरह से बढ़ता है लेकिन हमारे लिए सोशल डिस्टेंसिंग एवं स्वच्छता को जारी रखना जरूरी है।


सही प्रोटीन प्रतिरक्षा को बढ़ाता है

 


हमें कितना कार्बोहाइड्रेट और वसा खाना चाहिए इस बात पर हमेशा से विवाद होता रहा है। साथ ही हमारे भोजन में इन दोनों में से कौन बडा खलनायक है इस पर बहस होती है और इस बहस के कारण भोजन में प्रोटीन के महत्व की लोग अनदेखी कर देते हैं जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रोटीन एक अत्यंत महत्वपूर्ण मैक्रो पोषक तत्व है जो हमें स्वस्थ, फिट और रोग मुक्त रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। प्रोटीन टूट कर अमीनो एसिड में बदल जाता है और अमीनो एसिड मांसपेशियों सहित शरीर के सभी ऊतकों के निर्माण के लिए ʺबिल्डिंग ब्लॉक” हैं। प्रोटीन की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। यह हमारे शरीर के द्रव्यमान (मास) या मांसपेशी और मांसपेशियों के द्रव्यमान के रखरखाव में भूमिका निभाता है और मांसपेशियों का द्रव्यमान (मसल मास) हमारे समग्र स्वास्थ्य और हमारे जीवन की गुणवत्ता का एक प्रमुख कारक है। इसके अलावा प्रोटीन हमारी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए भी आवश्यक है।

सौभाग्य से हम में से अधिकांश लोग अधिकाधिक प्रतिरक्षा क्षमता (इम्युनिटी) के साथ जन्म लेते हैं क्योंकि हमारा शरीर खुद ब खुद इससे लैस होता है। दुर्भाग्य से, समय के साथ, वातावरण संबंधी प्रभावों और हमारी अपूर्ण जीवनशैली, रोजमर्रा के तनाव और खान–पान की गलत आदतों के कारण कम उम्र में ही प्रतिरक्षा क्षमता कम हो जाती है ओर फिर धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है।

यही कारण है कि हमें नियमित रूप से अपनी प्रतिरक्षा को अधिकाधिक करने की कोशिश करते रहना चाहिए। वैसे भी हमारी पीढी कम प्रतिरक्षा वाली पीढी है जिसका कारण हमारी जीवनशैली में व्यापक बदलाव आना है। जीवनशैली में बदलाव के कारण हम पहले की तरह अधिक व्यायाम या शारीरिक श्रम नहीं कर रहे हैं और न ही स्वस्थ आहार ले रहे हैं। आज हम अधिक से अधिक स्थूल हो रहे हैं और फास्ट फूड को अपना रहे हैं। इसने न केवल अधिक से मोटापे से ग्रस्त आबादी को जन्म दिया है, बल्कि हमारी प्रतिरक्षा कमजोर हो गई है और जिसके कारण हम संक्रमणों एवं महामारियों के अधिक शिकार हो रहे हैं। ऐसे में हमें प्रतिरक्षा प्रणाली को हल्के में नहीं लेना चाहिए और हमें अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली पर पूरा ध्यान रखना चाहिए जिस तरह से यह हमारा ख्याल रखती है।

प्रोटीन, स्वस्थ कार्बोहाइड्रेट और वसा तथा अच्छी मात्रा में सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार आपकी इम्युनिटी का निर्माण करने के लिए आवश्यक हैं। प्रोटीन एमिनो एसिड की आपूर्ति करता है और हमारा शरीर इनका उपयोग एंटीबॉडी का निर्माण करने के लिए करता है जो विभिन्न संक्रमणों से हमारी रक्षा करती है। वास्तव में प्रोटीन ही शरीर की रक्षा प्रणाली, एंटीबॉडी, एंजाइम और हार्मोन की रूपरेखा बनाता है। कई अध्ययनों से पता चला है कि प्रोटीन की कमी प्रतिरक्षा में बाधा डालती है और संक्रमण होने के खतरे को बढ़ाती है। इस प्रकार आज के समय में प्रोटीन युक्त आहार लेना अत्यंत आवश्यक है। इसीलिए हमें प्रोटीन के बारे में अधिक बात करने की आवश्यकता है।

तो हमें कैसे पर्याप्त प्रोटीन मिल सकता है। इसे प्राप्त करना बहुत आसान है।

रोज प्रोटीन का सेवन करें

हमें लगातार यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हमारे आहार में हर दिन प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा हो। प्रोटीन की आवश्यकता दैनिक आधार पर होती है क्योंकि यह शरीर में जमा नहीं होता है।

इस पूरे दिन में सेवन करें

कई लोग इस महत्वपूर्ण तथ्य को नहीं जानते हैं कि अगर आप दिन में समय–समय पर प्रोटीन ग्रहण करें तो शरीर इसे अच्छी तरह अवशोषित करता है और इसलिए आप प्रोटीन का सेवन एक बार नहीं बल्कि नाश्ते, दोपहर के भोजन और रात के खाने के दौरान समान रूप से करें।

गुणवत्ता सुनिश्चित करें

पशुओं से मिलने वाले प्रोटीन पूर्ण प्रोटीन होते हैं जिसमें सभी आवश्यक अमीनो एसिड होते है। आप इसकी जगह पर वनस्पति से मिलने वाले प्रोटीन का सेवन अधिक मात्रा में कर सकते हैं। आप हर बार अच्छी गुणवत्ता वाला विश्वसनीय प्रोटीन सप्लीमेंट 8-10 ग्राम प्रोटीन ले सकते हैं। शरीर में पूरक प्रोटीन को अत्यधिक मात्रा में लेने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि जब हर बार इसे लेंगे तो आप अपने शरीर में अतिरिक्त प्रोटीन भर देंगे जिससे आपको कोई अतिरिक्त लाभ नहीं होगा बल्कि शरीर के अंगों में ये अनावश्यक रूप से जमा होंगे।

सही चुनाव करें

संतुलित आहार का सेवन हमारे आहार में पर्याप्त प्रोटीन सुनिश्चित करने का तरीका है। बस आपको यह जांचने के लिए अपनी प्लेट को बारीकी से देखना होगा कि आप पर्याप्त उच्च गुणवत्ता वाला पूरा प्रोटीन खा रहे हैं या नहीं। मीट, अंडे, डेयरी, समुद्री भोजन, नट और बीज, और फलियां और बीन्स आदि प्रोटीन की अच्छी मात्रा प्रदान करते हैं। कुछ अनाज जैसे क्विनोआ, बाजरा, कूटू (बकव्हीट) और चौलाई (ऐमारैंथ) भी अच्छी मात्रा में प्रोटीन प्रदान करते हैं। इसके अलावा चुकंदर, मटर, फ्रेंच बीन्स जैसी कुछ सब्जियां भी प्रोटीन प्रदान करती हैं।

लेकिन जैसा कि कहा गया है यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि अच्छी मात्रा में पूर्ण प्रोटीन हो। प्रोटीन के सभी खाद्य स्रोतों में हमारे शरीर के लिए आवश्यक सभी 9 आवश्यक अमीनो एसिड नहीं होते हैं। भारतीय आहार में प्रोटीन का अधिकांश हिस्सा शाकाहारी स्रोतों से आता है और ऐसे में हमारे आहार में गुणवत्ता वाले प्रोटीन कम होते हैं। ऐसे मामलों में जिनकी प्रोटीन की जरूरत पूरी नहीं हो रही है या जिन्हें प्रोटीन की अधिक जरूरत है (जैसे बुजुर्गों, किशोरों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली महिलाओं या बीमारी से उबरने वाले लोग) उन्हें उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन स्रोत के साथ सप्लीमेंट भी लेना चाहिए जिससे इस कमी को पूरा किया जा सके।

आहार में अंतर को पाटने में मदद करें

प्रोटीन मांसपेशियों की वृद्धि, मरम्मत और रखरखाव के लिए काफी महत्वपूर्ण है, लेकिन यह अन्य काम भी करता है, जिसमें हार्मोन और एंजाइम उत्पादन, त्वचा की मरम्मत, प्रतिरक्षा प्रणाली का निर्माण और यहां तक ​​कि ऊर्जा की आपूर्ति भी शामिल है। वास्तव में हमारे शरीर में प्रत्येक कोशिका में प्रोटीन होता है और उसे प्रोटीन की आवश्यकता होती है, इसलिए आप रोज जो खा रहे हैं उसमें प्रोटीन की मात्रा और गुणवत्ता पर ध्यान दें।