Wednesday, 30 October 2019

इस अनोखी बीमारी में आपका शरीर दैत्य की तरह महाकाय हो सकता है


आपने रामायण—महाभारत अथवा प्राचीन समय की कहानियों में उन  दत्यों या राक्षसों के बारे में पढ़ा —सुना होगा। इनके शरीर महाकाय होते थे। यह वास्तविकता है या कल्पना कहना मुश्किल है लेकिन वास्तव में हमारा शरीर राक्षस या दैत्य की तरह विशाल काय हो सकता है। यह दरअसल हमारे शरीर में बनने वाले हार्मोन का कमाल है। जब कुछ हार्मोन अधिक हो जाते हैं तो हमारे शरीर के विभिन्न् अंगों में असामान्य वृद्धि होने लगती है। 
ये हार्मोन पिट्यूटरी ग्रंथि से उत्सर्जित होते हैं। जब पिट्यूटरी ग्रंथि में ट्यूमर हो जाते हैं तो इस ग्रंथि से कुछ हार्मोन बहुत अधिक निकलते हैं। हार्मोन असंतुलन के कारण मनुष्य का आकार बहुत बड़ा हो जाता है। अविवाहित महिलाओं के स्तन से दूध, महिलाओं के चेहरे पर बाल, महिलाओं के शरीर पुरूषों की तरह हो जाते हैं। ऐसी ढेर सारी असमान्य विकृतियां उत्पन्न होती है। आप इस वीडियो में फोर्टिस हास्पीटल के न्यूरो सर्जरी विभाग के निदेशक डा. राहुल गुप्ता से जानेंगे कि पिट्यूटरी ग्रंथि क्या है, इसका क्या महत्व है, इससे निकलने वाले हार्मोन का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है और अगर इस ग्रंथि में ट्यूमर हो जाए तो इलाज क्या है।  कि आखिर यह कैसे होता है और इसका इलाज क्या है।



 


Tuesday, 29 October 2019

सबकुछ है पर कुछ नहीं है।

 



मशहूर व्यंग्यकार स्वर्गीय शरद जोशी ने 1988 में यह व्यंग्य लिखा था लेकिन यह आज भी प्रासंगिक है। 

प्रतिदिन लोग एक छोटी सी शिकायत दर्ज कराते हैं कि साहब! नल है, मगर उसमें पानी नहीं आता। वे शायद नहीं जानते कि इस देश में चीजें होती ही इसलिए हैं ताकि उनमें वह न हो जिसके लिए वे होती हैं। नल में पानी नहीं आता। हैंडपंप हैं, मगर वे चलते नहीं हैं। नदियां हैं, मगर वे बह नहीं रहीं। विभाग है, जो काम नहीं करता। टेलिफोन लगाया, मगर लगा नहीं। अफसर है, मगर छुट्टी पर है। बाबू है, मगर उसे पता नहीं।
आवेदन दिया था, पर मंजूर नहीं हुआ। रिपोर्ट लिखाई थी, मगर कुछ हुआ नहीं। जांच हुई, पर परिणाम नहीं निकले। योजना स्वीकृत है, पर बजट मंजूर नहीं हुआ। बजट स्वीकृत है, पैसा नहीं आया। पद हैं, मगर खाली हैं। आदमी योग्य था, मगर तबादला हो गया। अफसर ठीक है, उसके मातहत ठीक नहीं हैं। मातहत काम करना चाहते हैं, मगर ऊपर से ऑर्डर तो मिले। मशीन आ गई, बिगड़ी पड़ी है। मशीन ठीक है, बिजली नहीं है। बिजली है, मगर तार खराब है। उत्पादन हो रहा है, मगर बिक नहीं रहा। मांग है तो पूर्ति नहीं। पूर्ति है तो मांग नहीं। यात्री हैं, मगर टिकट नहीं मिल रहा। टिकट मिल गया, रेल लेट है। रेल आई, मगर जगह न थी। जगह थी, उस पर सामान रखा था। एयर से जा रहे हैं, मगर वेटिंग लिस्ट में हैं। सीट कनफर्म है, फ्लाइट कैंसल हो गई। घर पहुंचे, मिले नहीं। मिले, मगर जल्दी में थे। तार भेजा था, पहुंचा नहीं। चिट्ठी भेजी, जवाब नहीं आया। पोस्टमैन गुजरा था, हमारा कोई लेटर नहीं था। आए, मगर आते ही बीमार हो गए। इंजेक्शन दिया, मगर कुछ हुआ नहीं। अस्पताल गए, बेड खाली नहीं था। बेड पर पड़े हैं, कोई पूछ नहीं रहा।
शिकायत करें, मगर कोई सुनने वाला नहीं है। नेता है, मगर कौन सुनता है। उसने सुन लिया, मगर कुछ कर नहीं सका। शिलान्यास हुआ था, इमारत नहीं बनी। इमारत बनी है, दूसरे काम में आ रही है। काम चल रहा है, पर हमें क्या फायदा। स्कूल है, एडमिशन नहीं है। पढ़ने गए थे, बिगड़ गए। टीम भेजी थी, हारकर लौटी। प्रोग्राम हुआ, मगर जमा नहीं। हास्य का था, हंसी नहीं आई।
कहा था, बोले नहीं। खबर थी, मगर वह अफवाह निकली। अपराध था, न्याय नहीं हुआ। संपादक के नाम पत्र भेजा था, छपा नहीं। कविता लिखी थी, कोई सुनने वाला नहीं। किताब छपी थी, बिकी नहीं। चाहिए, पर मिल नहीं रही। आई थी, चली गई। गए थे, मुलाकात न हुई। कुर्सी पर बैठा है, ऊंघ रहा है। फॉर्म भरा था, गलती हो गई। क्या बोले, कुछ समझ न आया। वादा किया था, भूल गए। याद दिलाया, तब तक उनका विभाग बदल गया।
फोन किया, बाथरूम में गए थे। दफ्तर किया, मीटिंग में थे। डिग्री मिल गई, नौकरी नहीं मिली। जब अनुभवी हुए, रिटायर कर दिए गए। अकाउंटेंट हैं, गबन कर गए। ढूंढ़ा बहुत, मिले नहीं। पुलिस है, चोर से मिली हुई है। पैसा है, ब्लैक का है। पूंजी जुटाई, मशीन के भाव बढ़ गए। फ्लैट खाली हैं, दे नहीं रहे। बेचना है, कोई खरीदार नहीं है। लेना चाहते हैं, मगर बड़ा महंगा है।
बरसात आ गई, पानी नहीं गिरा। दिल है, कहीं लगता नहीं। मनुष्य है, मानवता नहीं। जीवित है, आत्मा मर गई।
कितना कुछ होकर भी इस देश में वह नहीं है, जिसके लिए इतना कुछ है।
आप हैं कि नल में पानी नहीं आने की शिकायत कर रहे हैं।
(11 जून 1988 को प्रकाशित, सभार नवभारत टाइम्स)


बच्चों ने दीपावली के मौके पर भाईचारे और प्यार बांटने का संदेश दिया 

ग्रेटर नौएडा, 29 अक्तूबर। नोएडा एक्सटेंशन के द विज़डम ट्री स्कूल के बच्चों ने रौशनी पर्व दिवाली को प्यार, खुशियों, सहयोग और आपसी भाईचारे के साथ मिलकर मनाने का संदेश देते हुए एक नाटक का आयोजन किया।


स्कूल में दिवाली के मौके पर विशेष प्रार्थना की गई जिसका उद्देश्य बच्चों को भारतीय संस्कार और संस्कृति से परिचित कराना था तथा  बच्चों के बीच आपस में प्रेमपूर्वक मिलजुल कर रहना और खुशियाँ बाँटना था। विद्यालय की अध्यापिकाओं ने बच्चों को विभिन्न प्रकार क्रियाकलाप, ड्राइंग, पेंटिग, रंगोली और आर्ट एण्ड क्राप्ट के द्वारा बच्चों को दिवाली के महत्व को समझाया। इस आयोजन के दौरान  स्कूल के चेयरमैन श्री के. के. श्रीवास्तव और प्रिंसिपल सुनिता ए. शाही ने बच्चों को प्रदूषण मुक्त दिवाली और सुरक्षित दिवाली मनाने को कहा।


Saturday, 26 October 2019

ठंड बढ़ने से जोड़ों में दर्द, ब्रेन स्ट्रोक और माइग्रेन की समस्याएं बढ़ी

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में तापमान में भारी गिरावट होने के साथ कंपकपाने वाली ठंड के कारण स्ट्रोक, जोड़ों की समस्याएं, माइग्रेन एवं अन्य स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। पिछले कुछ दिनों के दौरान एनसीआर में न्यूनतम तापमान चार डिग्री के नीचे पहुंच गया और इसके कारण स्वास्थ्य समस्याओं में बढ़ोतरी हो रही है।


फोर्टिस हॉस्पिटल (नौएडा) के न्यूरो एवं स्पाइन सर्जन डॉ. राहुल गुप्ता बताते हैं कि सर्दियों में ब्रेन स्ट्रोक और खास तौर पर हेमोरेजिक स्ट्रोक के मामले अन्य महीनों की तुलना में करीब तीन गुना अधिक बढ़ जाते हैं। उनके अनुसार सर्दियों में शरीर का रक्त चाप बढ़ता है जिसके कारण रक्त धमनियों में क्लॉटिंग होने से स्ट्रोक होने के खतरे बढ़ जाते हैं। ब्रेन स्ट्रोक का एक प्रमुख कारण रक्त चाप है। रक्तचाप अधिक होने पर मस्तिष्क की धमनी या तो फट सकती है या उसमें रुकावट पैदा हो सकती है


इसके अलावा इस मौसम में रक्त गाढ़ा हो जाता है और उसमें लसीलापन बढ़ जाता है, रक्त की पतली नलिकाएं संकरी हो जाती है, रक्त का दबाव बढ़ जाता है। धमनियों की लाइनिंग अस्थायी रूप से क्लॉट के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। अधिक ठंड पड़ने या ठंडे मौसम के अधिक समय तक रहने पर खासकर उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों में स्थिति अधिक गंभीर हो जाती है। इसके अलावा सर्दियों में लोग कम पानी पीते हैं जिसके कारण रक्त गाढ़ा हो जाता है और इसके कारण स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। उनका सुझाव है कि सर्दियों में अधिक मात्रा में पानी तथा तरल पीना चाहिये।


डॉ. राहुल गुप्ता के अनुसार बहुत ठंड के कारण हृदय के अलावा मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों की धमनियां सिकुड़ती हैं, जिससे रक्त प्रवाह में रुकावट आती है और रक्त के थक्के बनने की आशंका अधिक हो जाती है। ऐसे में ब्रेन स्ट्रोक, दिल के दौरे तथा शरीर के अन्य अगों में पक्षाघात होने के खतरे अधिक होते हैं। डॉ. राहुल गुप्ता के अनुसार कई अध्ययनों से पता चला है कि कम तापमान होने पर स्ट्रोक होने तथा स्ट्रोक के कारण मौत होने का खतरा बढ़ता है, खास तौर पर अधिक उम्र के लोगों में। इसलिये लोगों को अपने शरीर को गर्म रखने के लिये अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। इसके अलावा स्ट्रोक से बचने के लिये शराब और धूम्रपान का सेवन कम करना चाहिए।


डा. राहुल गुप्ता के अनुसार सर्दी के महीनों में, जिन लोगों को न्यूरोलॉजिकल समस्याएं हैं उनकी समस्याएं बढ़ सकती है। तापमान घटने से नर्व में दर्द बढ़ सकता हैडॉ. राहुल गुप्ता का सुझाव है कि जिन लोगों को नर्व दर्द, रीढ़ में दर्द, ट्राइजेमिनल न्यूरेल्जिया, मांसपेशियों में कड़ापन और संवेदना में कमी जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याएं हैं उन्हें अधिक ठंड से बचना चाहिए।


डा. राहुल गुप्ता बताते हैं कि सर्दियों में तापमान बहुत अधिक कम हो जाने के साथ ही गर्दन दर्द, पीठ दर्द और कमर दर्द जैसी समस्याएं बढ़ने लगती हैं।


नई दिल्ली के वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज एवं सफदरजंग अस्पताल के बाल चिकित्सा एवं बाल स्वास्थ्य के डॉ. मुर्तजा कमाल कहते हैं कि अत्यधिक ठंड का मौसम शुरु होते ही, बच्चों में सिर दर्द होने का खतरा 15-20 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। ऐसा विषेश रूप से उन बच्चों को अधिक होता है जो माइग्रेन से ग्रस्त होते छोटे बच्चे सिर दर्द या अन्य समस्याओं के बारे में ठीक से नहीं बता पाते हैं, बल्कि वे इसे अन्य तरीकों से प्रकट करते हैं। जैसे, वे चिड़चिड़े और जिद्दी हो जाते हैं और उन्हें सोने और खाने में समस्या हो सकती है। उनके अनुसार अत्यधिक ठंडा मौसम नर्व को प्रभावित करता है जो विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। यह प्रभाव उसी प्रकार का होता है जैसा तेज या बहुत कर्कश आवाज का होता है। यह विशेष रूप से वैसे बच्चों को अधिक प्रभावित करता है जिन्हें वंशानुगत कारणों से अक्सर माइग्रेन के रूप में सिर दर्द होता है। इसके अलावा, सर्दी के इस मौसम में बच्चों को वायरल संक्रमण और नाक, कान एवं गले (ईएनटी) की समस्याओं से भी ग्रस्त होने की अधिक संभावना होती है। ठंड के कारण बच्चों में सिर दर्द की समस्या तब अधिक होती है, विशेषशकर तब, जब बच्चे सिर और कान जैसे बाहरी अंगों की ठीक से सुरक्षा नहीं करते हैं।


 


बहुत अधिक चंचल और शरारती बच्चे अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) का शिकार हो सकते हैं

अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) बहुत ही सामान्य बाल मानसिक विकार है जिसके कारण बच्चों में एकाग्रता की कमी हो जाती है और वे बहुत अधिक चंचल एवं शरारती हो जाते हैं और इस विकार के कारण बच्चों के मानसिक विकास एवं उनकी कार्य क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अगर बच्चे पढ़ाई या किसी अन्य काम में अपना ध्यान नहीं लगा पाते, बहुत ज्यादा बोलते हों, किसी भी जगह टिक कर नहीं बैठते हों, छोटी-छोटी बातों पर बहुत अधिक गुस्सा करते हों, बहुत अधिक शरारती और जिद्दी हों तो वे अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर से ग्रस्त हो सकते हैं। अक्सर माता-पिता इस विकार से ग्रस्त बच्चे को काबू में रखने के लिए उनके साथ डांट-फटकार और मारपीट का सहारा लेते हैं लेकिन इसके कारण बच्चों में नकारात्मक सोच आ जाती है और वह पहले से भी ज्यादा शरारत करने लगते हैंविश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की पूर्व संध्या पर नौएडा के मानस गंगा क्लिनिक में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. मनु तिवारी ने कहा कि अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर का इलाज आसान है। जरूरत इस बात की है कि ऐसे बच्चे की सही समय पर पहचान हो और उसे इलाज के लिए मनोचिकित्सकों के पास लाया जाए। माता-पिता को चाहिए कि अगर उन्हें अपने बच्चे में एडीएचडी के लक्षण दिखे तो वे बच्चे के साथ डांट-डपट करने या बच्चे की शरारत की अनदेखी करने के बजाए मनोचिकित्सक से परामर्श करें और अपने बच्चे को ठीक होने का मौका दें।


गौरतलब है कि अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर के बारे में जागरूकता कायम करने के उद्देश्य से अक्तूबर विश्व एडीएचडी जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने बताया कि नौएडा के मानस गंगा क्लिनिक ने अब तब इस समस्या से ग्रस्त सैकड़ों बच्चों को ठीक होने में मदद की है। मानस गंगा क्लिनिक का लक्ष्य है कि समाज में इस बीमारी के प्रति जागरूकता आए और इस समस्या से ग्रस्त बच्चे को इलाज के लिए मनोचिकित्सक के पास लाया जा सके ताकि बच्चे अपनी पूरी क्षमता को हासिल कर सकेंडॉ. मनु तिवारी ने बताया कि इस समस्या के कारण बच्चों में आत्म विश्वास की कमी हो सकती है, बच्चों में उदासीनता (डिप्रशन) और चिडचिड़ापन जैसी समस्या हो सकती है और बच्चे की कार्य क्षमता प्रभावित हो सकती है इसलिए ऐसे बच्चे का समय पर इलाज कराना चाहिएमानस गंगा क्लिनिक एवं मेट्रो हास्पीटल्स की मनोचिकित्सक डॉ. अवनी तिवारी का कहना है कि सबसे पहले लक्षणों की पहचान होते ही अभिभावकों को इस बीमारी के प्रति जागरुक होना पड़ेगा। बच्चे के अलावा अभिभावकों की काउंसलिंग की जरुरत होती हैइसके इलाज से पूर्व बच्चे की क्लिनिकल एवं साइकोलॉजिकल जांच की जाती है। इसके आधार पर काउंसलिंग की जाती है। बिहैवियर थिरेपी की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर दवाइयां दी जाती है जो बच्चों में एकाग्रता बढ़ाने में मददगार साबित होती


बाल न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. रेखा मित्तल बताती हैं कि इस समस्या से ग्रस्त बच्चों की जिन लक्षणों के आधार पर पहचान की जा सकती है वे हैं – एकाग्रता की कमी, ध्यान में कमी, अति चंचलता, अति आवेग, स्कूल में पढ़ाई में कमजोर, स्कूल में अक्सर चीजें छोड़ कर आना, एक जगह पर शांत नहीं बैठना, जानकारी एवं बौद्धिक क्षमता के बावजूद परीक्षा में अच्छे


नम्बर नहीं आना, किसी भी कार्य से जल्दी मन उचट जाना. तेज गस्सा आना. स्कल और खेल मैदान में बात-बात पर झगड़ा करना, धैर्य की कमी और खेल-कूद में अपनी बारी आने का इंतजार नहीं कर पाना। डॉ. मनु तिवारी कहते हैं कि मुख्य तौर पर आनुवांशिक कारणों से यह समस्या उत्पन्न । होती है। यह देखा गया है कि जिन बच्च्चों में यह समस्या होती है वे स्मार्ट फोन आदि का बहुत अधिक इस्तेमाल करते हैं। आधुनिक जीवन शैली तथा भागदौड भरी अत्यंत व्यस्त जिंदगी के कारण अक्सर माता-पिता बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते। शहरों में एकल परिवार में अक्सर बच्चे अकेलेपन से जूझ रहे हैं। इन सब कारणों से बच्चे गुस्सैल, चिड़चिड़े या हाइपर एक्टिव हो रहे हैं। कई माता-पिता जागरूकता के अभाव में अपने बच्चों में पनप रही हाइपर एक्टिविटी को या तो पहचान नहीं पाते या उसकी अनदेखी कर देते हैं।


उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) के बारे में लोगों में तथा चिकित्सकों में अधिक जागरूकता आई है और इस कारण पहले की तुलना में आज अधिक बच्चे इलाज के लिए मनोचिकित्सकों के पास लाए जाने लगे हैं


विभिन्न अध्ययनों के अनुसार स्कूल जाने वाले 2 से 14 प्रतिशत बच्चे एडीएचडी से ग्रस्त होते हैं और लड़कियों की तुलना में लड़कों में यह समस्या अधिक पाई जाती है।


माता-पिता के लिए ध्यान देने योग्य बातें


• डांट या मार समस्या का समाधान नहीं है।


• माता-पिता को चाहिए कि हाइपरएक्टिव बच्चे की उर्जा को बचपन से ही सकारात्मक काम में लगाने की कोशिश करें अगर ऐसे बच्चों की उर्जा को सही दिशा में में लगाया जाए वे बहुत ही इनोवेटिव काम कर सकते


• माता पिता को जितना मुमकिन हो उतना बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाना चाहिए।


• अगर बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लगता है तो इसमें मदद करनी चाहिए


• एडीएचडी से ग्रस्त बच्चे अपने माता-पिता एवं शिक्षकों का पूरा अटेंशन चाहते हैं।


• अगर माता-पिता उनकी तरफ ध्यान देंगे, तो वे एग्रेसिव नहीं होते हैं


• बेहतर है कि उसे अकेले में प्यार से समझाएं कि कब कौन सा काम उसे करना चाहिए और कौन सा नहीं।


• कई बार हाइपर एक्टिव बच्चे पैरेंट्स का ध्यान अपनी तरफ करने के लिए बार-बार सवाल पूछते हैं।


लेजर से तिल-तिल कर मारेगा तिल

तिल और दाग-धब्बे न केवल अच्छे भले चेहरे को विकृत कर देते हैं बल्कि ये कई बार कैंसर जैसी बीमारियों के संकेत होते हैं। प्रसिद्ध कास्मेटिक सर्जन एवं नई दिल्ली के ग्रेटर कैलाश, पार्ट-1 स्थित कास्मेटिक लेजर सर्जरी सेंटर आफ इंडिया के निदेशक डा. पी. के तलवार कहते हैं कि चेहरे की सुंदरता को बदसूरत करने वाले इन तिलों एवं दाग-धब्बों को केमिकल पीलिंग एवं सर्जरी के जरिये हटाया जा सकता है लेकिन कार्बन डाई ऑक्साइड लेजर की मदद से तिलों को हमेशा के लिये हटाया जा सकता है।


तिल त्वचा के स्वास्थ्य की दृष्टि से अहानिकर धब्बे (लीशन) हैं ।  लेकिन ये चेहरे और शरीर के खुले रहने वाले अंगों की खूबसूरती बिगाड़ देते हैं।  चिकित्सकीय भाषा में इन्हें मेलानोसाइटिक अथवा पिगमेंटेड नैवी कहा जाता है। तिल त्वचा के समतल या उभरे हुये हो सकते हैं। इनके आकार एवं रंग अलग-अलग हो सकते हैं। ये गुलाबी, गहरे भूरे से लेकर काले रंग के हो सकते हैं। किस व्यक्ति को कितने और किस तरह के तिल होंगे यह आनुवांशिक कारणों और धूप के संपर्क पर निर्भर करता है। तिल का उगना जन्म के बाद से ही शुरू हो जाता है लेकिन नये तिल किसी भी उम्र में उग सकते हैं। धूप में अधिक समय तक रहने तथा गर्भावस्था के दौरान तिल का रंग काला होता जाता है। वयस्क होने पर तिल रंग छोड़ सकते हैं और अधिक उम्र में ये गायब भी हो सकते हैं। जन्म के समय से मौजूद तिल को कंजेनिटल पिगमेंटेड नेवस कहा जाता है। अनुमानों के अनुसार करीब एक सौ शिशुओं में से एक शिशु को जन्म से ही तिल होता है। जन्मजात तिल का आकार अलग-अलग हो सकता है। कुछ तिल का व्यास कुछ मिलीमीटर हो सकता है जबकि कुछ शिशु की पूरी त्वचा के आधे हिस्से में फैला हो सकता है। बहुत बड़े तिल के बाद में कैंसर में तब्दील होने की आशंका होती है। इसलिये जन्मजात तिल में कोई बदलाव नजर आने पर चिकित्सक से जांच करानी चाहिये।


कई बार तिल के चारों तरफ की त्वचा रंग खोकर सफेद हो जाती है। इस स्थिति को हालो नैवस कहा जाता है। ऐसा बच्चों और किशोरों में अधिक होता हैयह हानिरहित होता है और कुछ समय बाद तिल और उसके चारों तरफ के सफेद घेरे गायब हो जाते हैं। गोरे गोरे लोगों खास तौर पर लाल बालों एवं भूरी आंखों वाले लोगों में छोटे-छोटे भूरे समतल तिल अधिक सामान्य होते हैं। इन्हें फ्रीक्लस कहा जाता है। ये तिल शरीर के उन हिस्सों में होते हैं जो धूप के सीधे संपर्क में आते रहते हैं। गर्मी के दिनों में इनका रंग काला होता जाता हैकुछ तरह के तिलों को एटाइपिकल नैवी कहा जाता है और ये कैंसरजन्य तिलों (मेलोनोमा) से मिलते-जुलते हैं। ये तिल कैंसर में बदल सकते हैं। 


हालांकि ज्यादातर तिल अहानिकर होते हैं लेकिन ये कई बार सौंदर्य को बिगाड़ देते हैं इसलिये इन्हें कई बार हटाना लाजिमी हो जाता है। लेकिन कई तिल कैंसर एवं अन्य बीमारियों के संकेत हो सकते हैं और इसलिये इनकी जांच कराकर इनका इलाज कराया जाना चाहियेखास कर उन तिलों का इलाज जरूरी है जिनसे रक्त निकलता हो, जिनका आकार असामान्य हो, जो तेजी से बढ़ रहे हों, जिनके रंग बदल रहे हों और कपड़े, कंघी या रेजर के संपर्क में आने पर जिनमें खुजलाहट होती हो। बदसूरती पैदा करने वाले तिलों को हटाने के लिये केमिकल पीलिंग जैसी अनेक विधियों से हटाया जा सकता है लेकिन आजकल इन्हें कारगर एवं कष्टरहित तरीकों से दूर करने के लिये लेजर का इस्तेमाल हो रहा है। लेजर के बाद त्वचा को धूप से बचाना जरूरी होता है। तिलों को मिटाने के लिये कार्बन डाइ ऑक्साइड लेजर का इस्तेमाल होता है। जब इस लेजर की किरणें त्वचा पर डाली जाती है तो यह केवल त्वचा के ऊपरी सतह पर असर डालता है। इस लेजर का प्रयोग तिल आदि को हटाने में होता है। इन लेजर किरणों के प्रयोग से त्वचा से रक्त नहीं निकलताचिकित्सक तिल के आधार पर यह तय करता है कि कितनी देर तक लेजर किरणें डाली जाये ताकि त्वचा को किसी तरह की हानि नहीं हो। इन किरणों से तिल की परत को जला दिया जाता है लेकिन भीतरी त्वचा सुरक्षित रखी जाती है। 



डा. पी के तलवार, वरिष्ठ कास्मेटिक सर्जन एवं निदेशक, कास्मेटिक लेजर सर्जरी सेंटर आफ इंडिया, ग्रेटर कैलाश-पार्ट-1, नई दिल्ली


जननी सुरक्षा योजना क्या है और कैसे लें इसका लाभ

जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एचएचएम) के तहत सुरक्षित मातृत्व क्रियाकलाप है। इसे गर्भवती महिलाओं के बीच संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के द्वारा मात एवं नवजात शिश मत्य दर को कम करने के उद्देश्य के साथ लागू की जा रही हैजेएसवाई केन्द्रीय प्रायोजित योजना है जो प्रसव व प्रसवोत्तर __परिचर्या को नकद सहायता से एकीकृत करती है। यह योजना सरकार व गर्भवती महिलाओं के बीच प्रभावी संबंध के रूप में प्रत्यायित समाजिक कार्यकर्त्ता (आशा) के रूप में निर्धारित की गई है।


जेएसवाई की प्रमुख विशेषताएं


यह योजना गर्भवती महिलाओं पर केन्द्रित है, जिसमें कम संस्थागत प्रसव दर वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, राजस्थान. ओडिशा और जम्मू कश्मीर के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। इन राज्यों को कम निष्पादन वाले राज्य (एलपीएस) के रूप में नामित किया गया है। शेष राज्यों को उच्च निष्पादन वाले राज्यों (एचपीएस) का नाम दिया गया है। 3.5.2 नकद सहायता के लिए पात्रता जननी सुरक्षा योजना के तहत नकद सहायता के लिए पात्रता नीचे दर्शाई गई है:



संस्थागत प्रसव के लिए नकद सहायता (रुपए में) सभी श्रेणी की माताओं के लिए नकद पात्रता इस प्रकार है:



*ग्रामीण क्षेत्र में 600 रुपए के आशा पैकेज में एएनसी घटक के लिए 300 रुपए तथा संस्थागत प्रसव हेतु गर्भवती महिलाओं को लाने के लिए 300 रुपए हैं। *शहरी क्षेत्र में 400 रुपए के आशा पैकेज में एएनसी घटक के लिए 200 रुपए तथा संस्थागत प्रसव हेतु गर्भवती महिलाओं को लाने के लिए 200 रुपए हैं।


सीजेरियन सेक्शन की छूट-प्राप्त लागत


जेएसवाई योजना में सरकारी संस्थानों में प्रसूति समस्याओं के प्रबंधन हेतु अथवा सीजेरियन सेक्शन करने हेतु निजी विशेषज्ञों की सेवाएं लेने का प्रावधान है जहां सरकारी विशेषज्ञ पदस्थ नहीं है।


घर पर प्रसव के लिए नकद सहायता


घर पर प्रसव को प्राथमिकता देने वाली गरीबी रेखा से नीचे की गर्भवती महिलाएं प्रति प्रसव के लिए 500 रुपए की नकद सहायता के लिए पात्र होती हैं भले ही उनकी आयु कुछ भी हो और उनके कितने भी बच्चे हों।


निजी स्वास्थ्य संस्थान को प्रत्यायित करना


प्रसव परिचर्या संस्थानों के विकल्प में बढोतरी के लिए राज्यों को प्रसव सेवाएं प्रदान करने के लिए कम से कम दो इच्छुक निजी संस्थान प्रति ब्लाक प्रत्यायित करने हेतु प्रोत्साहित किया जाता है।


जेएसवाई के तहत प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी)


जननी सरक्षा योजना के तहत भगतान प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) भुगतान प्रक्रिया के माध्यम से किए जा रहे हैं। इस पहल के अंतर्गत आधार से जुड़े बैंक खातों/इलेक्ट्रोनिक निधि अंतरण के माध्यम से गर्भवती महिलाएं सीधे जेएसवाई लाभ प्राप्त करने के लिए हकदार होती हैं।


वास्तविक और वित्तीय प्रगति


इस योजना में कवर की गई माताओं की संख्या तथा स्कीम पर किए गए व्यय दोनों के संदर्भ में जेएसवाई की सराहनीय सफलता रही हैं। वर्ष 2005-06 में 7.39 लाख लाभार्थियों के औसत आंकड़ों से यह स्कीम फिलहाल प्रति वर्ष एक करोड़ से अधिक लाभार्थियों को लाभ प्रदान करती है। साथ ही स्कीम के व्यय वर्ष 2005-06 में 38 करोड़ से बढ़ाकर वर्ष 2016-17 में 1835 करोड़ रुपए कर दिया गया है। वित्तीय वर्ष 2018-19 में सूचित व्यय 1743.46 करोड़ रुपए (अनंतिम) है।


जेएसवाई की वर्ष-वार वास्तविक और वित्तीय प्रगति निम्नानुसार है:



* वि.व. 18-19 के आंकड़े अनंतिम है।


उपलब्धि के संदर्भ में जेएसवाई को प्रसव परिचर्या सेवाओं के लिए गर्भवती महिलाओं द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा केंद्रों के अधिकाधिक उपयोग में महत्वपूर्ण कारकों में से एक के रूप में माना जाता है जैसाकि नीचे दर्शाया गया है:



  • सांस्थानिक प्रसवों में बढ़ोतरी, जो 47% (जिला स्तरीय घरेलू सर्वेक्षण-III, 2007-08) से बढ़कर 78.9% (एनएफएचएस-4, 2015-16) हो गई है मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर), जो वर्ष 2004-06 में 254 मातृ मौतें प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों से गिरकर वर्ष 2014-16 के दौरान 130 मातृ मौतें प्रति 1,00,000 जीवित जन्म तक रह गई हैं

  • आईएमआर वर्ष 2005 में 58 प्रति 1000 जीवित जन्मों से कम होकर वर्ष 2017 में 34 प्रति 1000 जीवित जन्मों तक रह गई है

  • नवजात शिशु मृत्यु दर (एनएमआर) वर्ष 2006 में 37 प्रति 1000 जीवित जन्मों से कम होकर वर्ष 2016 में 24 प्रति 1000 जीवित जन्म रह गई है


भारत में जन्म देते समय कितनी माताओं की मौत होती है


मातृ और किशोर स्वास्थ्य 


मातृ स्वास्थ्य महिलाएं किसी भी जीवंत समाज की मजबूत स्तंभ होती हैं। इस प्रकार देश का सतत विकास तभी हो सकता है जब हम अपनी महिलाओं और बच्चों की समग्र देखभाल करेंगेमातृ स्वास्थ्य में सुधार करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत भारी और रणनीतिक निवेश किया गया है। बढ़ती समानता और घटती गरीबी को देखते हुए किसी भी देश के विकास के लिए मातृ स्वास्थ्य एक महत्वपूर्ण पहलु हैंमाताओं की उत्तरजीविता तथा कल्याण न केवल उनके अपने अधिकार हैं अपितु वे व्यापक आर्थिक, सामाजिक और विकासपरक चुनौतियों से निपटने के लिए भी महत्वपूर्ण हैं


मातृ मृत्यु दर अनुपात (एमएमआर)


भारत में मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) वर्ष 1990 में काफी अधिक था अर्थात् प्रति सौ हजार जीवित जन्मों पर बच्चों को जन्म देते समय 556 महिलाओं की मृत्यु हो जाती थी। गर्भावस्था और बाल जन्म से जडी जटिलताओं के कारण प्रतिवर्ष लगभग 1.38 लाख महिलाओं की मृत्यु हो रही थी। उस समय वैश्विक एमएमआर 385 पर अत्यंत कम था। तथापि, भारत में एमएमआर में तेजी से गिरावट आती रही है। देश में एमएमआर में वैश्विक 216 एमएमआर (2015) के मुकाबले 130 (एसआरएस 2014-16) तक गिरावट आई है। मातृ मौतों की संख्या में 77 प्रतिशत तक कमी आई है।


एमएमईआईजी की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक मातृ मौतों में भारत की हिस्सेदारी में अत्यधिक गिरावट आई है सतत् विकास लक्ष्य (एमडीजी) 3 मातृ स्वास्थ्य से संबंधित है जिसका लक्ष्य मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) में कमी लाना है। (वर्ष 2030 तक प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 70 से कम एमएमआर किया जाना है


वैश्विक रूप से 2.3% की औसत वार्षिक गिरावट के साथ वर्ष 1990 में 385 की एमएमआर से वर्ष 2015 में अनुमानित 216 मातृ मौतों में प्रति 100,000 जीवित जन्म तक विगत 25 वर्षों के दौरान विश्व के एमएमआर में लगभग 44 प्रतिशत तक की गिरावट आई। भारत में 25 वर्षों में मातृ मृत्यु में 77% की गिरावट दर्ज की गई है।


                       वैश्विक संदर्भ में एमडीजी-5 पर भारत की प्रगति



स्रोतः “मातृ मृत्यु दर में रुझान वर्ष 1990 से 2015 तक यूएन इंटर एजेंसी एक्सपर्ट समूह तथा आरजीआई - एसआरएस


गिरता हुआ मातृ मृत्यु दर अनुपात (एमएमआर) मात संबंधी मौतौं का डाटा भारतीय महापंजीयक (आरजीआई) द्वारा अपनी प्रतिदर्श पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) के जरिए मातृ मृत्यु दर अनुपात (एमएमआर) के रूप में उपलब्ध करवाया जाता है। भारत के महापंजीयक प्रतिदर्श पंजीकरण


प्रणाली (आरजीआई-एसआरएस) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत की एमएमआर ने वर्ष 2007-09 की अवधि में 212 प्रति 100,000 जीवित जन्मों से वर्ष 2011-13 की अवधि में 130 प्रति 100,000 जीवित जन्मों तक गिरावट दर्शाई है।


भारत के संबंध में एमएमआर में गिरावट की तेज गति



स्रोतः आरजीआई – एसआरएस


 


 


क्या दीवाली के बाद स्मॉग के कारण आपकी तबियत खराब रहती है?

दिवाली को रोशनी का त्यौहार कहा जा सकता है। हालांकि आजकल यह आतिशबाजी और उसके कारण पैदा हुए धुएं और सांस से संबंधित बीमारियों का पर्याय बन गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार पटाखों के जलने से बड़ी मात्रा में वायु प्रदूषक, विशेष रूप से सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर कण वायुमंडल में छोड़े जाते हैं। किसी बच्चे को बीमार देखना हालांकि कष्टदायक होता है लेकिन अगर बच्चे को सांस की बीमारियों के कारण सांस लेने में कष्ट होते देखना माता-पिता के लिए सबसे अधिक कष्टकारी होता है। हालांकि ज्यादातर माता-पिता को अपने बच्चों को ऐसी जगहों पर ले जाने की सलाह दी जाती है जहां अपेक्षाकृत कम प्रदूषण हो। लेकिन कुछ माता-पिता कई कारणों से अपना शहर को नहीं छोड़ सकते हैं। प्रसिद्ध होम्योपैथ विशेषज्ञ डॉ. बत्रा ग्रूप ऑफ कंपनीज के संस्थापक और सेवानिवृत अध्यक्ष डॉ. मुकेश बत्रा ने ऐसे सुझाव दिये हैं, जिन पर अमल कर प्रदूषण से संबंधित श्वास की समस्याओं और श्वसन रोगों से निपटने में आपको मदद मिलेगी और आप अपने शहर में ही अपने को अपने कमरे में बंद रखने के बजाय आप दिवाली का आनंद उठा सकेंगे। पर्यावरण से संबंधित समस्याओं के लिए कुछ सलाह एयर प्युरिफायर खरीदें और इसे साफ रखें। अपने एयर कंडीशनर (एसी) के फ़िल्टर को साफ रखें। • घरों के अंदर कम प्रदूषण करें - फर्नीचर की डस्टिंग करें पुरानी कुशन और तकिए को धो दें जिनमें शायद वर्षों से धूल कण जमा हो गए हैं। रेस्पिरेटर पहनें – हालांकि फेस मास्क आपको बड़े प्रदूषक कणों से बचाते हैं, जबकि रेस्पिरेटर मास्क चेहरे को पूरी तरह से ढक लेते हैं और दूषित हवा को आपके मुंह या नाक में प्रवेश करने से रोकने के लिए फ़िल्टर करते हैं। ऑफ-आवर में व्यायाम करें – लोकप्रिय धारणा के विपरीत, बिल्कुल सुबह या देर शाम में व्यायाम न करें क्योंकि दिन के इन समय के दौरान ठंडी हवा प्रदूषकों के कारण भारी होती है जो पृथ्वी के करीब आ जाती हैं। अस्थमा प्रबंधन के लिए कुछ टिप्स अपने घर में धूल और पराग कणों को साफ करेंपराग के मौसम के दौरान, खिड़कियों को बंद रखें और एयर कंडीशनर का उपयोग करें। टाइल या लकड़ी के फर्श पर कालीनों को बदलकर धूल को कम करें। वैसे पर्दे और ब्लाइंड का इस्तेमाल करें जिन्हें धोया जा सकता है। • वैक्यूम- गद्दे वाले फर्नीचर और मैट्रेस की नियमित रूप से सफाई करें और साथ ही अपने पालतू जानवर के बिस्तर भी साफ रखेंधूल साफ करते समय या बाहर जाने के दौरान अपनी नाक और मुंह पर एक स्कार्फ पहन लें। खुली हवा में योग व्यायाम या एक्सरसाइज करें।


• छींक आते ही आरंभ में ही ठंड और फ्लू का इलाज करेंब


च्चों के लिए कुछ टिप्स


• घर के अंदर रहें


- वायु प्रदूषण से बचने के लिए सबसे स्पष्ट समाधान इससे दूर रहना है, विशेष रूप से उस समय जब स्मॉग अपने चरम पर रहता है। स्कूल या चिकित्सक के पास जाने जैसी बहुत जरूरी गतिविधियों के दौरान अपने बच्चों के प्रदूषण के जोखिम को कम करने का प्रयास करें


कई गतिविधियों को एक साथ करें - यदि आपको और आपके बच्चों को बाहर जाने की ज़रूरत है, तो रोज के काम / गतिविधियों को एक ही साथ करने का प्रयास करें ताकि आप कई बार बाहर जाने से बच सकें। शहर के मुख्य इलाकों और वाणिज्यिक इलाकों में जाने से परहेज करें और वैसे जगहों की तलाश करने का प्रयास करें जो उपनगरों में स्थित हों या धुएं और प्रदूषण के स्रोतों से दूर हों।


कचरा नहीं जलाएं – दुर्भाग्य से कई भारतीय घर अभी भी कचरे के प्रबंधन के रूप में ऐसा करते हैं। प्लास्टिक जैसी ज्वलनशील चीजें हवा की गुणवत्ता को और खराब कर सकती हैं। कचरे से छुटकारा पाने के लिए पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ उपाय की तलाश करेंकाफी मात्रा में तरल पदार्थ पीएं – परिवार में सभी को, विशेष रूप से बच्चों को काफी मात्रा में तरल पदार्थ का सेवन की सलाह दी जाती है। यह शरीर को डिटॉक्सिफाइ करने और शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है जो लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। कठिन गतिविधि से बचें – जब बच्चे श्रमसाध्य खेल खेलते हैं तो वे हांफने लगते हैं। वे तेजी से सांस लेने लगते हैं। इससे उनकी सांस के जरिये आसपास के विभिन्न प्रदूषकों के उनके शरीर में प्रवेश करने की दर में वृद्धि हो जाती है। स्वच्छ हवा वाले दिनों में ही खेल और भारी गतिविधियां करें। समुचित आहार का सेवन करें - अधिक वायु प्रदूषण के समय के दौरान, अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाएं। ऐसे फलों और सब्जियों का सेवन करें जिनमें विटामिन सी और ओमेगा फैटी एसिड अधिक मात्रा में हों। घरों में हवा को शुद्ध करने वाले पौधे लगाएं - अपने घर की हवा को साफ रखने का एक प्राकृतिक तरीका वैसे इनडोर पौधों को रखना है जो हवा को शुद्ध करते हों। अरेका पाम, एलो वेरा, अजलेआ और तुलसी जैसे पौधे आपके घर में ताजापन का अहसास कराने में मदद करते हैं।


तेरी आंखों के सिवा इस दुनिया में रखा क्या है।

आंखें कुदरत की अनमोल वरदान हैं। आंखें सबसे बड़ी नेमत हैं। अगर आंखों न होती तो इस दुनिया में क्या रखा होता। इस दुनिया की सारी खूबसूरती हमारी आंखों की बदौलत है जो खुद इतनी खूबसूरत हो सकती है कि किसी पर जादू कर दे। आंखें चेहरे के सौंदर्य का आधार हैं। काली कजरारी आंखें, झील से गहरी आंखें, नीले गगन सी आंखें, बिल्लौरी आंखें, मदभारी शराबी आंखों इस धरती के सबसे कीमती, सबसे खूबसूरत और बेहतरीन नगीने हैं।


कुदरत ने इन आंखों को केवल देखने की शक्ति ही नहीं बल्कि अभिव्यक्ति की क्षमता भी दी है। इसलिये तो आंखों को दिल की जुबान कहा गया है। आंख कुछ बोले बगैर भी सब कुछ बोल देती हैं। आंखों की अभिव्यक्ति की यह क्षमता कथकली जैसी उत्कृष्ट नृत्य कला का आधार है। हमारी भाव भंगिमा आंखों पर ही आधारित है।


हम अपनी आंखों को सजाने, संवारने के लिए तरह-तरह के जतन करते हैं। आंखों को सुंदर बनाने के लिए काजल लगाने का तरीका प्राचीन काल से चला आ रहा है। लेकिन आज कॉस्मेटिक कांटैक्ट लेंस का इजाद हो चुका है जिसकी बदौलत आंखों को मनचाहा रंग दिया जा सकता है। अगर आप अपने भूरे रंग की आंखों से संतुष्ट नहीं हैं तब अपने मनचाहे रंग वाले कांटेक्ट लेंस लगा कर आंखों को मनचाहा आकर्षण एवं सौंदर्य प्रदान कर सकते हैं। आप चाहें तो हर दिन आंखों का रंग बदल सकते हैं। अगर आप हाई सोसायटी के हैं तो आप हर दिन अपनी आंखों को अपनी पसंद का रंग देना चाहेंगे। कॉस्मेटिक कांटेक्ट लेंसों की बदौलत काली कजरारी, गहरी व हल्की नीली, भूरी, एवं हल्की भूरी, बिल्लौरी आसमानी आंखों पायी जा सकती हैं। फैशन, ब्यूटी तथा प्रतिस्पर्धा के आज के युग में


फैशन, ब्यूटी तथा प्रतिस्पर्धा के आज के युग में आधुनिक पीढ़ी युवक, युवतियों की आंखों में निहित सुंदरता एवं सफलता को जान लिया है और वे आंखों को खूबसूरत बना कर अपने व्यक्तित्व को निखारने की कोशिश करने में किसी से पीछे नहीं रहना चाहते। लेकिन कुदरत ने कुछ लोगों की आंखों में ऐसे नुक्श छोड़ दिये हैं जिनके कारण उनकी आंखों को चश्में की बैशाखी की जरूरत पड़ जाती है जिसके कारण उनकी आंखों की खूबसूरती नहीं बल्कि मानों उनका व्यक्तित्व ही चश्में में दब सा जाता हैइन नुक्श के कारण व्यक्ति को पास या दूर अथवा पास एवं दूर दोनों की चीजें साफ नहीं दिखती। इन्हें मायोपिया एवं


हाइपरमेट्रोपिया कहा जाता है। इसके लिये व्यक्ति को चश्मा लगाने की जरूरत पड़ जाती है। लेकिन फैशन एवं प्रतिस्पर्धा के युग में यह चश्मा अक्सर सुदरता और सफलता के मार्ग में बाधक बन जाता है। मृदुला पेशे से मॉडल है लेकिन अपने दृष्टिदोष के कारण नहीं चाहकर भी चश्मा पहनने को मजबूर है। वह कहती है चश्में के बगैर मैं इस दुनिया को नहीं और चश्में के कारण दुनिया मुझे नहीं देख सकती। मोनिका को मिस इंडिया बनने की तमन्ना है लेकिन अपने दृष्टि दोष के कारण वह अपने इस सपने को मन में ही कुचल देती है। विवेक पायलट बनना चाहता था लेकिन वह पायलट बन नहीं सकता क्योंकि मायोपिया नामक इस दृष्टि दोष के कारण उसे चश्मा पहनना पड़ता है।


हालांकि आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के कारण इन दृष्टि दोषों का इलाज कराकर चश्में से मुक्ति पाना संभव हो गया है। कांटेक्ट लेंस इनसे उबरने का सस्ता और सुरक्षित साधन है। इन कांटैक्ट लेंसों को सोने से पहले उतारना


इन कांटैक्ट लेंसों को सोने से पहले उतारना और जागने पर आंखों में चिपकाना पड़ता है। कई लोगों के लिये ऐसा करना परेशानी का कारण होता है। इसके अलावा कांटैक्ट लेंस के कारण आंखें में संक्रमण होने का भी खतरा रहता है। आधुनिक तकनीक ने इस परेशानी का भी हल पेश किया है। यह हल एक्जाइमर एवं लै सिक लेजर के रूप में सामने आया है। इसके विकास से पहले आंखों में हीरे की चाकू से चीरे लगाकर चश्में से मुक्ति दिलायी जाती थी। लेकिन अब आंखों में किसी तरह के चीरे लगाने की जरूरत नहीं रही। नयी दिल्ली के प्रसिद्व नेत्रा चिकित्सक डा. संजय चौधरी का कहना है कि लै सिक लेजर को दुनिया भर में चश्में से मुक्ति दिलाने वाली सर्वश्रेष्ठ तकनीक के रूप में स्वीकारा गया है और लाखों लोगों ने इसका फायदा उठाया है।


नयी दिल्ली के दरियागंज स्थित चौधरी आई सेंटर एवं लेजर विजन में सैकड़ों लोगों को चश्मे से छुटकारा दिलाकर उनकी सुदरता एवं सफलता के सपने को सरकार करने वाले डा. संजय चौधरी का कहना है कि नयी पीढ़ी के लोग इस तकनीक का विशेष तौर पर फायदा उठा रहे हैं। कई लोग चश्में से मुक्ति पाने के बाद वर्षों से दबी कुठा से भी मुक्ति पा लेते हैं। उनमें आत्म विश्वास आ जाता है। 


 


रिश्ते में आता खुलापन 

हाल के वर्षों में भारतीय समाज में परम्परागत मूल्यों और जीवन के तौर-तरीकों में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। इन बदलावों की एक कड़ी है - पारिवारिक रिश्तों में आने वाला खुलापन। आज ज्यादातर माता-पिता बच्चों के साथ डांट-डपट करने के बजाय दोस्ताना व्यवहार करने लगे हैं और उन्हें हर संभव खुश रखने की कोशिश करते हैं। आज ज्यादातर महिलायें मां के बजाय अपनी बेटी की दोस्त कहलाने पर गर्व महसूस करती हैं। वे अपनी बेटियों के मामले में दखलअंदाजी या रोक-टोक नहीं करतीं और न ही उन पर अपने विचार या निर्णय थोपती हैं। इस तरह का खुलापन दाम्पत्य संबंधों में भी आया है। आज कई पति-पत्नी एक दूसरे के मामले में पहले की तरह दखलअंदाजी नहीं करते हैं।
पारिवारिक संबंधों में आ रहे बदलाव जैसे विषयों पर देश-विदेश में 200 से अधिक संगोष्ठियों का आयोजन करने वाले दिल्ली के विशेषज्ञ डा. पतंजलि देव नैयर कहते हैं कि ज्यादातर युवा दोस्ताना व्यवहार करने वाले माता-पिता और अपने दोस्तों के बीच स्पष्ट अंतर नहीं कर पाते हैं। जो माता-पिता बच्चों के सिर्फ दोस्त होते हैं वे उन्हें केवल लाड़-न्यार और सुरक्षा देते हैं लेकिन अन्य बातों की ओर ध्यान नहीं देते। बच्चे कौन से मूल्य सीख रहे हैं और किसी तरह की गतिविधियों में लिप्त हो रहे हैं, इसके बारे में वे ज्यादा ध्यान नहीं देते। इस कारण बच्चे गलत रास्ते पर भी बढ़ सकते हैं। पहले के समय में माता-पिता बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखते थे, लेकिन उस समय बच्चों को समझाने का उचित वातावरण नहीं था जिसके कारण बच्चों को ऐसा लगता था कि माता-पिता उन पर अपने विचार थोप रहे हैं। हालांकि इससे बच्चों की चेतना और सोच प्रभावित होती थी, लेकिन बच्चों के गलत गतिविधियों में लिप्त होने की आशंका कम रहती थी।
दिल्ली में रहने वाली 18 वर्षीय स्नेहा और 15 वर्षीय नेहा की मां मधु कहती हैं, ''हमलोग भी उस समय छोटे स्कर्ट पहनते थे और बॉयफ्रैंड रखते थे, लेकिन हमारी सीमाएं बिल्कुल स्पष्ट थीं। हमलोग देर रात तक घरों से बाहर नहीं रहते थे और हमारे हर क्रियाकलापों की जानकारी माता-पिता को रहती थी। लेकिन अब चीजें तेजी से बदल रही हैं। अब माता-पिता और बच्चों में बहुत अधिक वाद-विवाद होता है और वे अपने विचार एक दूसरे पर थोपने की कोशिश करते हैं। बच्चों को आजादी देने से पूर्व बच्चों को मूल्यों की शिक्षा देनी चाहिए और उसके बाद बच्चों के विवेक पर छोड़ देना चाहिये कि वे क्या करना चाहते हैं। लेकिन बच्चों को मूल्यों की शिक्षा कड़ाई और डांट-डपट कर नहीं दी जानी चाहिये।''
दूसरी तरफ मॉडलिंग एवं अभिनय के क्षेत्र में जगह बनाने की कोशिश कर रही दिल्ली की श्वेता  कृष्णन कहती हैं, ''पहले लोगों की यह शिकायत होती थी कि उनके माता-पिता हर समय उनके साथ रहते हैं। लेकिन मेरी मां ने मुझे स्वतंत्र छोड़ दिया। मैं अब किसी भी परिस्थिति का मुकाबला स्वयं कर सकती हूं।''
उनकी मां उमा कहती हैं कि हमारे जमाने और आज के जमाने में बहुत बदलाव आ गया है। मां और बच्चा दो अलग-अलग प्राणी होते हैं इसलिए एक दूसरे की जिंदगी में दखल कैसे दिया जा सकता है। कृष्णन कहती हैं कि जब मैं और मॉम किसी पार्टी में एक साथ जाते हैं तो हमलोग मां-बेटी कम और दोस्त ज्यादा होते हैं।
देश के दूसरे भागों में भी मां-बेटी का रिश्ता दोस्ताना होता जा रहा है। जब कल्पना ने 28 साल पहले अपने माता-पिता का घर छोड़ा था उस समय लोगों में एक दूसरे के मामले में दखल देने की आदत बहुत अधिक थी। माता-पिता यहां तक कि पड़ोसी और रिश्तेदार भी हर मामले में दखलअंदाजी करते थे, लेकिन जब कल्पना की बेटी जूही ने उनका घर छोड़ा तो उसने अपनी मां को एक मददगार के रूप में पाया। जब कल्पना को महसूस हुआ कि उसकी बेटी अलग रहना चाहती है तो उसने तुरंत सहमति दे दी। हालांकि जूही को अपने पति को इसके लिए तैयार करना पड़ा था। लेकिन जूही को लगता है कि उसकी मां अपने घर में अपने ढंग से अकेली रहकर भी खुश रहेगी। जूही को काम के सिलसिले में अक्सर रात भी बाहर बितानी पड़ती है, लेकिन उसके पड़ोसी उसके मामले में कभी ताक-झांक नहीं करते।
दिल्ली के एक कॉलेज की प्रोफेसर सोनाली सिंह रिश्तों में खुलापन आने से खुश हैं। वे कहती हैं कि खुलापन आने से वह और उनके विद्यार्थी बिना किसी रोक-टोक के अपनी मर्जी से रह सकते हैं। लड़के-लड़कियों के रिश्ते में खुलापन आने से किसी लड़की को छेड़ना मुश्किल होता जा रहा है। लड़कियां किसी लड़के पर अधिक समय तक निर्भर रहना पसंद नहीं करती हैं और वे परिवर्तन चाहती हैं। लेकिन अधिकतर युवा इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग करना नहीं चाहते। उनके कॉलेज की एक छात्रा कहती है कि मैं जब भी जहां जाना चाहती हूं, चली जाती हूं। इसके बारे में सिर्फ अपने माता-पिता को बता देती हूं।
हमारे देश में संबंधों में आ रहे खुलापन में अब भी सबसे बड़ी बाधा शादी है। ज्यादातर पति आज भी अत्यंत व्यस्त रहने वाली पत्नी से अपने लिए अलग से समय चाहते हैं। पति के लिए समय और पति का आदर करना हमारे समाज का मूल मंत्र है। जबकि घरेलू कार्यों में पति का सहयोग अब भी नहीं के बराबर ही है। अध्ययनों से पता चलता है कि घरेलू कार्यों का जिम्मा अब भी महिलाओं यहां तक कि कामकाजी महिलाओं पर भी है।



आज शादी के मानदंड भी अस्पष्ट होते जा रहे हैं और पति-पत्नी के बीच तीसरे या चौथे व्यक्ति का समावेश होता जा रहा है। ऐसा रंगरेलियां मनाने के उद्देश्य से नहीं किया जा रहा है, बल्कि पति या पत्नी के अलावा एक संवेदनशील साथी की जरूरत के कारण ऐसा हो रहा है। 
दीपाली कहती हैं, ''पति के अलावा मेरा एक पुरुष दोस्त भी है जिससे मुझे काफी सहयोग मिलता है। मेरे पति को मेरे रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मुझे पता है कि वे उससे कुछ दूरियां चाहते हैं। ऐसा मेरे साथ भी होता है। जब भी मैं अपने पति के साथ किसी महिला को देखती हूं तो उनकी नजदीकियों से मुझे ईर्ष्या होने लगती है। लेकिन इन सब बातों का प्रभाव हमारी शादी पर नहीं पड़ता।'' 
दूसरी तरफ एक प्राइवेट कंपनी में कार्य करने वाले अविवाहित राकेश गुप्ता का कहना है कि शादी के पहले या शादी के बाद दोस्त के साथ होने वाला भावनात्मक लगाव प्यार में भी बदल सकता है। ऐसा तब होता है जब पति और पत्नी एक साथ एक दफ्तर में कार्य नहीं करते हैं और घर में एक साथ बहुत कम समय बिताते हैं जबकि सहकर्मी के साथ रोजाना 12 से 15 घंटे बिताने पड़ते हैं।
मनोचिकित्सकों का कहना है कि सीमा से परे संबंधों का प्रचलन आजकल पूरे विश्व में तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए शादी के नियमों को फिर से लिखा जाना चाहिए। हालांकि ऐसे संबंध वास्तव में बहुत गंभीर नहीं होते हैं। फिर भी अधिकतर पति को पत्नी से और पत्नी को पति से दोस्त रखने पर तब तक कोई आपत्ति नहीं होती है जब तक कि उसमें सेक्स शामिल नहीं होता है।
एक पी.आर. कंपनी में कार्य करने वाले सुमित और बीमा कंपनी में कार्य करने वाली अनुराधा में शादी के बाद तीन साल साथ रहने के बाद तलाक हो गया। अनुराधा कहती हैं कि तलाक के बाद भी हम अच्छे दोस्त हैं। हमलोग एक दूसरे के दोस्तों को अच्छी तरह जानते हैं। तलाक के कारण के बारे में वह बताती हैं कि सुमित नहीं चाहता था कि मैं कोई प्राइवेसी रखूं लेकिन वह अक्सर शाम में एक महिला दोस्त के साथ होता था और उस समय मुझे कोई अहमियत नहीं देता था।
दूसरी तरफ सुमित का कहना है, ''मैंने इस बात पर कभी ध्यान नहीं दिया कि मेरी पत्नी अपने पुरुष दोस्त के साथ फिल्म देखने या कॉफी पीने जा रही है। यह बात मुझे जरूर चुभती थी कि देर रात में दफ्तर का काम खत्म होने पर जब उसके दोस्त उसे घर छोड़ने आते थे और उसे उनका एहसान जताना पड़ता था। हमलोग परिस्थिति में बदलाव नहीं ला सकते थे, इसलिए अलग हो जाना ही उचित समझा।''
काउंसलर रीमा माथुर कहती हैं, ''दोस्ती शादीशुदा जिंदगी में ताजगी का झोंका लाती है। मेरा पति एक बीमा कंपनी में कार्य करता है। कभी-कभी उसे देर रात तक दफ्तर में रुकना पड़ता है। उसके पास गाड़ी नहीं है लेकिन उसके कई पुरुष और महिला दोस्तों के पास गाड़ी है और वे उसे देर रात में घर छोड़ने आते हैं। लेकिन मुझे उसके महिला दोस्तों से कोई ईर्ष्या नहीं होती है। मैं खुद भी कार्य के दौरान कई हैंडसम पुरुषों से मिलती हूं। लेकिन अगर मिलने-जुलने वालों से और सहकर्मी से प्यार होने लगता तो अब तक मैं दर्जर्नोंं पुरुषों से प्यार कर चुकी होती।''
आशा बनर्जी कहती हैं कि विपरीत लिंग के साथ दोस्ती के मूल्य गिरते जा रहे हैं। यदि किसी की शादी किसी तीसरे व्यक्ति के कारण टूटती है तो यह स्वभाविक है कि तीसरे व्यक्ति के साथ पति या पत्नी की दोस्ती बंधनों को तोड़ चुकी है। जब कोई पति या पत्नी विपरीत लिंग वाले दोस्त के बारे में अधिक सोचने और उसकी अधिक परवाह करने लगता है तो यह अपने पार्टनर के साथ विश्वासघात होता है। इसलिए समझदार लोग दोस्ती की खातिर अपनी शादीशुदा जिंदगी को जोखिम में नहीं डालते। 


 


जागरूकता से रूक सकती है स्तन कैंसर से होने वाली मौतें

नई दिल्ली : भारतीय मरीजों में स्तन कैंसर के ग्रेड और चरण अन्य देशों की तुलना में अधिक उच्च होते हैंयहां तक कि पढ़ी-लिखी जो महिलाएं स्तन कैंसर का इलाज कराती हैं वे भी इलाज के लिए वैकल्पिक विधियों को अपनाती हैंकीमोथेरेपी या मास्टेक्टोमी सर्जरी के बारे में कई गलतफहमी और जागरूकता की कमी है और इसके कारण ज्यादातर महिलाएं समय पर इलाज नहीं कराती हैं और ज्याद दातर वैकल्पिक दवाइयों के विकल्प को चुनती हैं। हालांकि प्रारंभ में ऐसे उपचार मरीजों के लिए लुभावने लगते हैं लेकिन जैसे ही बीमारी के चरण बढ़ते हैं और बीमारी उनके नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो वे एलोपैथिक उपचार का विकल्प चुनती हैं। इस कारण वे समय पर इलाज नहीं करा पाती हैं। मैक्स सपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, शालीमार बाग, नई दिल्ली के ब्रेस्ट ओंकोलॉजी की वरिष्ठ कंसल्टेंट डॉ. एस. वेदा पद्म प्रिया ने कहा, " भारत में, सालाना हर पच्चीस में से एक महिला में स्तन कैंसर का निदान किया जाता है, जो अमेरिका / ब्रिटेन जैसे विकसित देशों की तुलना में कम है जहां सालाना 8 में से 1 रोगी में स्तन कैंसर का निदान किया जाता हैहालांकि इस तथ्य के कारण कि विकसित देशों में जागरूकता की काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही है और वहां वहां शुरुआती चरणों में ही ऐसे अधिकतर मामलों का निदान और इलाज किया जाता है और इसलिए वहां जीवित रहने की दर बेहतर होती है। लेकिन जब हम भारतीय परिदृश्य पर विचार करते हैं, तो हम पाते हैं कि यहां उच्च जनसंख्या अनुपात और कम जागरूकता के कारण जीवित रहने की दर काफी कम है। जिन मरीजों में स्तन कैंसर की पहचान होती है उन मरीजों में से हर दो रोगियों में से एक रोगी की अगले पांच वर्षों में मौत हो जाती है जो 50 प्रतिशत मृत्यु दर के लिए जिम्मेदार होते हैं। शहरों में कई रोगियों में रोग की पहचान दूसरे चरण में की जाती है जब टी 2 घाव ऐसे गांठ होते हैं, जिन्हें स्पर्श करने पर महसूस किया जा सकता है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के मामलों में, इन घावों का पता मेटास्टैटिक ट्यूमर में परिवर्तित होने के बाद ही चलता है


स्तन कैंसर दुनिया भर में कैंसर से ग्रस्त मरीजों में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक हैग्लोबैकन 2017 के हाल के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय महिलाओं में स्तन कैंसर दुनिया भर में सबसे ज्यादा होता है। कैंसर की मरीजों के सबंध में नई प्रवृतियां सामने आ रही है और अस्पताल आने वाली नई मरीजों के आयु समूह में धीरे-धीरे गिरावट आ रही है और यह 55 वर्ष से कम होकर 40 वर्ष से भी कम उम्र तक गिर गया है। आईसीएमआर 2017 में दर्ज आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल भारत में 1.5 लाख से अधिक स्तन कैंसर की मरीजों को दर्ज किया गया है। वैश्विक स्तर पर, 40 साल से कम उम्र की 7 प्रतिशत आबादी स्तन कैंसर से पीड़ित है, जबकि भारत में, यह दर दोगुनी है यानी 15 प्रतिशत है। और जिनमें 1 प्रतिशत रोगी पुरुष हैं, जिसके कारण विश्व स्तर पर भारत से स्तन कैंसर रोगियों की सबसे ज्यादा संख्या हो जाती हैस्तन कैंसर वंशानुगत होता है, इसके अलावा, कई अन्य जोखिम कारक जैसे निष्क्रिय जीवनशैली, शराब का सेवन, धूम्रपान, युवाओं में मोटापा और तनाव में वृद्धि और खराब आहार के सेवन को भी युवा भारतीय महिलाओं में स्तन कैंसर के मामलों में वृद्धि के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। एनसीबीआई 2016 द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, शाकाहारी महिलाओं को स्तन कैंसर होने का खतरा 40 प्रतिशत कम होता है।


पिछले दशक में, हालांकि स्तन कैंसर के मामलों में वृद्धि हुई है, लेकिन कैंसर देखभाल के प्रति जागरूकता, पहुंच और नजरिये में परिवर्तन के कारण स्तन कैंसर से होने वाली मौतें धीरे-धीरे कम हो रही है। सरोज सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के मेडिकल ओन्कोलॉजी के वरिष्ठ कंसल्टेंट डॉ. पी. एन उप्पल ने कहा, "लोगों में यह जागरूकता पैदा की जानी चाहिए कि प्रारंभिक चरणों में ही अधिकांश स्तन कैंसर का पता लग जाता है, क्योंकि स्तन कैंसर वाली अधिकांश महिला मेटास्टेसिस (जब ट्यूमर शरीर के अन्य अंगों में फैलता है) के बाद अस्पताल आती हैं। कैंसर के मेटास्टैटिक या उन्नत चरणों में, इसका पूरी तरह से इलाज नहीं हो पाता है और उपचार का उद्देश्य रेमिशन (जहां ट्यूमर सिकुड़ता है या गायब हो जाता है) प्राप्त करना होता है।"


 


रौशनी के पर्व दिवाली के मौके पर सेहत के साथ मिठास का लुत्फ उठायें

शिल्पा ठाकुर, प्रमुख आहार विषेशज्ञ, एशियन इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस


दिवाली रौशनी का पर्व है। हर भारतीय इस पर्व का इंतजार करता है। यह भारत का सबसे रंगारंग और खुशियों से भरा पर्व है। मैं जब भी रौशनी के पर्व के बारे में सोचती हूं, मेरे दिमाग में सबसे पहले पटाखों का ख्याल आता है। दिवाली में फोड़े जाने वाले पटाखे दिवाली की मस्ती को बढ़ाते हैं। इसके अलावा मिठाइयां एवं स्नैक्स वे अन्य कारण हैं, जिनके कारण हम दिवाली की प्रतीक्षा करते हैं। हम आपको ऐसे उपाय बताते हैं जिससे आप बिना किसी चिंता एवं तनाव के दीवाली के पकवान का आनंद उठा सकेंगे। दिवाली के बारे में यह सही ही कहा गया है कि 
हे प्रभु
हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो
हमें अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले चलो,
मौत से अमरता की ओर ले चलो
मुझे रास्ता दिखाओ, मेरे प्रभु।
इस ब्रह्माण्ड में शांति का वास हो। 


हिन्दू धर्म की एक प्रार्थना


मिठाइयां मिठी दावत है। मिठाइयां दिवाली उत्सव का मुख्य हिस्सा है और मिठाइयां की सौगात परिवारजनों एवं दोस्तों को भेंट की जाती हैं। इस बात में कोई षक नहीं है कि मिठाइयों में अधिक मात्रा में षक्कर एवं वसा मौजूद होते हैं। लेकिन चूंकि दिवाली एक साल में एक बार आती है और ऐसे में दिवाली में अपने पसंदीदा व्यंजन खाने से परहेज करने की जरूरत नहीं है, केवल इस बात पर ध्यान रखें कि आप कितना खा रहे हैं। यहां कुछ स्वास्थ्यवर्द्धक टिप्स दिये जा रहे हैं जिनकी मदद से मिठाइयों के मजे दोगुने हो जायेंगे। 
दिवाली की मिठाइयां, कुछ अलग हट कर
छुट्टी की भावना में भर कर अपनी मिठाई खुद बनाने के लिये अपने परिवार को साथ लें। इस तरह से कम षक्कर मिलाकर, कम वसा वाले दूध और तेल का इस्तेमाल करके तथा घी के स्थान पर कम वसा वाले स्प्रेड का इस्तेमाल करके अपने परिवार को सेहत मंद रख सकते हैं। मिठाइयों का सेवन आप ज्यादा नहीं कर सकें, इसके लिये एक उपाय यह है कि आप उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें और उसके साथ सूखे फल एवं नट्स मिला लें। आप मिठाइयों एवं स्नैक्स का चयन सोच-समझ कर करें और स्वास्थ्यकारी विकल्प को अपनायें।
यहां आपके लिये कुछ स्वास्थ्यकारी उपाय बताये जा रहे हैं ताकि आप शानदार दावत का भरपूर आनंद ले सकेंगे। जब आप तरह-तरह के व्यंजनों से घिरे हैं, ऐसे में अपने आप पर से नियंत्रण हट जाना स्वभाविक है लेकिन आप इन विकल्पों को आजमा सकते हैं।
सबसे पहले बादाम के टुकड़े अथवा सूखे फल जैसी कुछ विषेश सामग्रियों को षामिल करें। अथवा विभिन्न तरह की सब्जियां में से चुनाव करें। उन सब्जियों का चुनाव करें जिन्हें आम तौर पर छोड़ दिया जाता है।  
ऽ कुछ हल्के स्नैक्स में पिस्ता बादाम के साथ खजूर अथवा अंजीर अथवा ताजे फल के टुकड़े मिलायें।
ऽ साबुत अनाज अथवा चोकर का इस्तेमाल करें तथा उसमें तेल अथवा नमक मिलाने से परहेज करें। 
ऽ घी अथवा मक्खन के स्थान पर कम मात्रा में तेल का इस्तेमाल करें।
ऽ घर पर ही कम वसा वाले दूध की पनीर बनायें और टुकड़ों को तलने के बजाय ग्रिल करें। 
ऽ अधिक तले हुए प्रचलित स्नैक्स की बजाय, उन्हें हल्के तेल में भुनने की कोशिश करें या गर्म ओवन में सुनहरा होने तक बेक करें।
ऽ देर शाम में नियमित भोजन करें और भारी भोजन लेने से परहेज करें। यह आपको स्नैक्स लेने को रोकने और दिन के दौरान अतिरिक्त मीठा लेने से रोकने में मदद करेगा।
ऽ जब आप खा रहे हों तो समय पर थोड़ी मात्रा में खाने की कोशिश करें। और दूसरी बार लेने से परहेज करने की कोषिष करें, यहां तक अगर आप अपने किसी अजीज रिष्तेदार के साथ भी हों तब भी अपने पर नियंत्रण रखें। यह सुनिश्चित करें कि आप दिन के दौरान काफी मात्रा में पानी पीयें। हालांकि जब आप व्यस्त हों तो इसे भूलना आसान है।
ऽ मधुमेह रोगियों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है कि वे एक जगह नहीं बैठें। यहां तक कि वे षुगर फ्री मिठाइयों विशेषकर सुक्रोलोज या एफडीए स्वीकृत चीजों का सेवन कर अपना इलाज कर सकते हैं जो सेवन के लिए सुरक्षित हैं।
ऽ रंगयुक्त मिठाइयों के सेवन से बचें क्योंकि इन्हें गैर खाद्य पदार्थों से तैयार किया जा सकता है।
ऽ रोजाना थोड़ा सक्रिय रहें। यदि आप वास्तव में थोड़ी कैलोरी जलाना चाहते हैं तो स्थानीय मंदिर/पार्क तक परिवार के साथ पैदल जाने की कोशिश करें।
इस तरह आप उत्सव के दौरान कुछ स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों के स्वाद का आनंद ले सकते हैं। और इस तरह सिर्फ कुछ परिवर्तन कर अपनी दीवाली को थोड़ा स्वस्थ रूप से मना सकते हैं। दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं।


ई सिगरेट पर से प्रतिबंध वापस लिया जाए

इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट ट्रेड एसोसिएशन ने ई सिगरेट पर प्रतिबंध को लेकर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा


• इस पत्र में इस तथ्य की ओर मुख्यमंत्री का ध्यान आकृष्ट किया गया है कि भारत सरकार ने एक अध्यादेश के माध्यम से पारंपरिक सिगरेट के लिए एक सुरक्षित विकल्प पर प्रतिबंध लगाया है। यह एक ऐसा विकल्प है जो मध्य प्रदेश में सिगरेट पीने वाले दस लाख लोगों को उपलब्ध कराया जाना चाहिएपत्र में मप्र सरकार से आग्रह किया गया है कि है कि वह नागरिकों के हितों में काम करते हुए केन्द्र सरकार से कहे कि राज्य के स्वास्थ्य विभाग को पारम्परिक सिगरेट के उभरते हुए विकल्प ई सिगरेट का मूल्यांकन करने के लिए स्वतंत्र अध्ययन करने की अनुमति प्रदान करे जिसे अन्य 70 देशों ने प्रतिबंधित करने के बजाय उनका नियमन किया है।


भारत में ई- सिगरेट पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक अध्यादेश लाने के केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के हालिया कदम के मद्देनजर, स्वयंसेवी संगठन ट्रेंड्स (टीआरईएनडीएस) ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर उनसे इस बात का मूल्यांकन करने का अनुरोध किया है कि वह खुद देखें कि राज्य के नागरिक के सर्वोत्तम हित में क्या है। ट्रेंड्स इलेक्ट्रॉनिक निकोटीन डिलीवरी सिस्टम (ईएनडीएस) उपकरणों के आयातकों, वितरको और विक्रेताओं का एक समूह है जो भारत में इलेक्ट्रॉनिक निकोटीन डिलीवरी सिस्टम (ईएनडीएस) के व्यापार प्रतिनिधियों का स्वैच्छिक संगठन हैमध्य प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ को लिखे अपने पत्र में, ट्रेंड्स (टीआरईएनडीएस) ने इस बात को रेखांकित किया है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने तंबाक सेवन करने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले विभिन्न तरीकों से जुड़े जोखिमों का तुलनात्मक आकलन या अध्ययन या कोई शोध नहीं किया है और उसने सभी राज्यों को ई सिगरेट पर प्रतिबंध लगाने का परामर्श भेज दिया हैमंत्रालय ने भारत में ई- सिगरेट पर प्रतिबंध लगाने के अपने फैसले को सही ठहराने के लिए अमेरिका से प्राप्त आंकड़ों को आधार बनाया हैट्रेंड्स (टीआरईएनडीएस) के संयोजक प्रवीण रिखी ने मुख्यमंत्री से गुहार लगाते हुए कहा, 'हम आपसे अनुरोध करते हैं कि मध्य प्रदेश के नेता के रूप में आप केंद्र सरकार से कहें कि वह राज्य के स्वास्थ्य विभाग को इस बारे में अपना शोध और अध्ययन करने की अनुमति दे ताकि कोई ऐसा तर्कसंगत फैसला लिया जा सके जो राज्य के ज्यादा से ज्यादा लोगों के हित में हो।" उन्होंने कहा, “स्वास्थ्य राज्य विषयक मामला है और तंबाकू के सेवन से जुड़ी बीमारियों के इलाज पर होने वाले अत्यधिक खर्च का बोझ राज्य के खजाने पर पड़ता है। अगर हमारे पास सिगरेट सेवन का एक सुरक्षित विकल्प है, जो कैंसर होने के मामलों में 50 प्रतिशत तक कमी कर देता है, तो आपके राज्य को धूम्रपान करने वालों के समक्ष इस विकल्प को क्यों नहीं पेश करना चाहिए? खासकर जब मध्य प्रदेश में तंबाकू सेवन करने वालों और सिगरेट पीने वालों का प्रतिशत क्रमशः 34.2 प्रतिशत और 10.4 प्रतिशत है।"


ट्रेंड्स (टीआरईएनडीएस) ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के समक्ष इस बात को रेखांकित किया कि ई सिगरेट पर प्रतिबंध लगाने वाला केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का अध्यादेश "चुनिंदा वैज्ञानिक और चिकित्सकीय राय" पर आधारित है हितधारकों की एक भी बैठक के बगैर इस तरह का फैसला लेना लोकतांत्रिक तौर तरीकों की हत्या के अलावा कुछ और नहीं है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉ. अतुल अंबेर समेत विश्व के प्रसिद्ध चिकित्सकों एवं वैज्ञानिकों ने आईसीएमआर के उन चार दावों में से हर दावे को खारिज किया है जिन दावों के आधार पर ई सिगरेट पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव किया गया और जिन दावों के आधार पर यह प्रतिबंध लगाया गयाट्रेंड्स ने मुख्यमंत्री का ध्यान ई सिगरेट से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर भी दिलाया है जिन पर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने समुचित ध्यान नहीं दिया। पत्र में कहा गया है कि 70 देशों ने ई- सिगरेट श्रेणी को सुरक्षित तरीके से संबंधित सुरक्षा उपायों के साथ धूम्रपान करने वालों व्यस्कों तक पहुंच को अनुमति दी है। ये सुरक्षा उपाय ई लिक्विड घटकों, विज्ञापन, प्रचार, ट्रेडमार्क, स्वास्थ्य चेतावनी संबंधी लेबल और बाल सुरक्षा मानदंडों समेत बिक्री, उत्पादन, वितरण, उपयोग और उत्पाद डिजाइन से संबंधित हैं। इस समय केवल 28 देशों ने प्रतिबंध लगाया है जिनमें से कई विनियमित करने के बारे में विचार कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर यूएई ने हाल ही में प्रतिबंध हटा लिया। जिन देशों में ई- सिगरेट को विनियमित किया जा रहा है वहां धूम्रपान की दर में काफी गिरावट आई है (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और कई अन्य)। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अनेक टेपानी 5 देश की सरकारें एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान परम्परागत सिगरेट की तुलना में ईसिगरेट को काफी हद तक सुरक्षित मानते हैं (पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड, कैंसर रिसर्च, ब्रिटेन, रॉयल कालेज आफ फिजिशियंस, सेंटे प्यूब्लिक फ्रांस और कई अन्य)


आफ फिजिशियंस, सेंटे प्यूब्लिक फ्रांस और कई अन्य)ट्रेंड्स (टीआरईएनडीएस) ने अपने पत्र में मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ से अनुरोध किया कि वे पद का उपयोग करते हुए केन्द्र सरकार, खास तौर पर केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से अनुरोध करें कि संसद के अगले सत्र में ई- सिगरेट पर प्रतिबंध लगाने के बारे में अंतिम फैसला लेने से पहले सार्वजनिक स्वास्थ्य, राज्य के खजाने, किसान और व्यापार रोजगार और वयस्क उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर विचार-विमर्श किया जाए।


Friday, 25 October 2019

अधिक फैशन कहीं आपकी कमर के लिए कहर न बन जाए

 


 



डा. (प्रो.) राजू वैश्य ,,अध्यक्ष, आर्थराइटिस केयर फाउंडेशन,,तथा वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन,,अपोलो हास्पीटल

महिलायें आम तौर पर पुरुषों की तुलना में कमर दर्द से अधिक पीड़ित रहती हैं जिसके लिए बढ़ता फैशन भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। आज आधुनिक एवं पढ़ी-लिखी महिलायें अपने को छरहरा एवं खूबसूरत दिखाने के लिये ऊंची एड़ी की चप्पल-जूतियों का अंधाधुंध प्रयोग करती हैं। लेकिन उन्हें शायद ही पता है कि उनका यह दिखावापन उनकी नाजुक कमर के लिये कहर साबित होता है। ऊंची एड़ी के जूते-चप्पलों का प्रयोग महिलाओं में कमर दर्द का प्रमुख कारण है। ऊंची एड़ी के जूते-चप्पल पहनने वाली महिलाओं के कमर दर्द से अधिक पीड़ित होने का कारण यह है कि ऐसे जूते-चप्पल पहनने से शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है जिससे कमर में खिंचाव पैदा होता है। इसके अलावा इससे रीढ़ पर भी अधिक दबाव पड़ता है। गर्भवती महिलाओं के आखिरी महीनों में होने वाले पीठ एवं कमर दर्द का भी कारण यही है। गर्भावस्था में भू्रण का भार कटि-क्षेत्र को आगे की ओर झुका देता है जिससे पीठ एवं कमर पर अधिक दबाव पड़ता है। महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान स्पाइनल एनेस्थिसिया देने से भी लंबे समय तक कमर दर्द होता है। महिलाओं में अधिक कमर दर्द के लिए उनकी शारीरिक संरचना एवं काम-काज की प्रकृति के अलावा जैविक कारण भी जिम्मेदार हैं।
महिलाओं में कमर दर्द का प्रकोप
अध्ययनों के अनुसार लगभग 41 प्रतिशत से ज्यादा महिलायें कमर दर्द से पीड़ित हैं। करीब एक करोड़ महिलायें हर साल कमर दर्द से ग्रस्त होती हैं। लगभग 80 प्रतिशत महिलाओं का कमर दर्द एक साल से पुराना होता है। सभी आयु वर्ग की महिलायें कमर दर्द से प्रभावित हैं लेकिन 16-24 वर्ष के आयु वर्ग की हर तीसरी महिला और 45 से 64 आयु वर्ग की हर दूसरी महिला कमर दर्द से पीड़ित होती है। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में कमर दर्द अधिक समय तक बना रहता है। पुरुषों को छोटे समयांतराल के लिए और तेज दर्द होता है। महिलाओं में कमर दर्द का एक प्रमुख कारण मासिक धर्म है। गर्मावस्था और बच्चे की देखभाल भी महिलाओं को कमर दर्द का शिकार होने का खतरा बढ़ा देता है। अमेरिकी अध्ययन के अनुसार 40 से 60 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं कमर दर्द का शिकार होती हैं।
कमर दर्द का उपचार


कमर दर्द के इलाज के लिये सबसे पहले इसके कारणों का पता लगाया जाता है। कमर दर्द के कारणों की सही-सही और सबसे अधिक जानकारी मैग्नेटिक रिजोनेंस इमेजिंग (एम.आर.आई.) से मिलती है। इससे यह पता चल जाता है कि किस नस पर कितना दबाव पड़ रहा है। आरंभिक स्थिति में कमर दर्द के इलाज के तौर पर चिकित्सक मरीज को आराम करने तथा व्यायाम करने की सलाह देते हैं। कई चिकित्सक मरीज को टै्रक्शन लगाने की भी सलाह देते हैं। लेकिन मरीज को कमजोरी, सुन्नपन और पेशाब करने में दिक्कत होने पर आपात स्थिति में ऑपरेशन करने की जरुरत पड़ सकती है। कमर दर्द के कारगर एवं कष्टरहित इलाज की खोज के लिये दुनिया भर में अध्ययन-अनुसंधान चल रहे हैं। इनकी बदौलत कमर दर्द के इलाज की अनेक कारगर एवं कष्टरहित विधियां एवं तकनीकें उपलब्ध हो गयी हैं।
कमर दर्द से कैसे बचें
आपके खड़े होने, बैठने, चलने-फिरने, चीजों को उठाने और ले जाने के तरीकों का आपकी कमर पर खासा प्रभाव पड़ता है। रोजमर्रे के जीवन में काम काज के दौरान कुछ सावधानियां बरत कर कमर दर्द से बचा जा सकता है। भारी वजन उठाते समय हमेशा अपने घुटनों को मोड़ें। लगातार बैठ कर काम करने से बचें। हर 15 मिनट पर खड़े हो जाएं और थोड़ा टहल लें। अपने लिए उचित तरीके से डिजाइन की गई कुर्सियां का ही इस्तेमाल करें। टेलीविजन देखते समय कुर्सी पर आराम से सीधे बैठकर और सही दूरी से टेलीविजन देखें। वाहन चलाते समय अपनी सीट को पीछे की तरफ सरका लें ताकि पैरों को ज्यादा जगह मिल सके। वाहन चलाते समय अपनी सीट में कमर के पीछे एक तकिया या कुशन रखने से कमर को सहारा और आराम मिलेगा। नियमित व्यायाम कमर की कमजोर मांसपेशियों की परेशानियों से दूर रखेगा। तैरना, थोड़ा एरोबिक्स और टहलने जैसे व्यायाम कमर की मांसपेशियों को मजबूत बनाते हैं। व्यायाम से दोहरा लाभ मिलता है। इससे न केवल कमर दर्द से राहत मिलती है, बल्कि कमर दर्द से बचाव भी होता है। धूम्रपान से परहेज करें। स्थूल जीवनशैली के साथ-साथ मोटापा कमर दर्द का कारण है। मोटापा से बचने के अलावा शरीर की चुस्ती-तंदुरूस्ती भी कमर दर्द से बचाव के लिये आवश्यक है। कमर दर्द से बचने के लिये खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिये। हमारे आहार में प्रोटीन पर्याप्त मात्रा में होना चाहिये, क्योंकि इससे ऊतकों का निर्माण तेजी से होता है। इसके अलावा आहार में ताजे फल एवं सब्जियां भी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिये, क्योंकि इनसे शरीर को विटामिन मिलती है।

मानसिक रोगियों को इलाज के लिए 50 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है


  • केवल 49 प्रतिशत मरीजों को उनके घर के 20 किलोमीटर के दायरे में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिलती है।

  • भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर हुए अब तक के सबसे बड़े स्वतंत्र सर्वेक्षण से हुआ बड़ा खुलासा।

  • विश्व मानसिक स्वास्थ्य फेडरेशन (डब्ल्यूएफएमएच) के सहयोग से नई दिल्ली स्थित कासमोस इंस्टीच्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड बिहैवियरल साइंसेस (सीआईएमबीएस) की ओर से किया गया यह सर्वेक्षण।

  • सात राज्यों में 10,233 हजार लोगों पर सर्वेक्षण किया गया।


नई दिल्ली: मौजूदा समय में मानसिक बीमारियां महामारी का रूप ले रही है लेकिन हमारे देश में मानसिक बीमारियों से ग्रस्त ज्यादातर लोगों के लिए इलाज की सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। इस सर्वेक्षण से पता चला कि हमारे देश में कई क्षेत्रों में मानसिक बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को 50 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।  

विश्व मानसिक स्वास्थ्य फेडरेशन (डब्ल्यूएफएमएच) के सहयोग से नई दिल्ली स्थित कासमोस इंस्टीच्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड बिहैवियरल साइंसेस (सीआईएमबीएस) की ओर से देश के सात राज्यों में 10 हजार लोगों पर किए गए एक व्यापक अध्ययन से यह निष्कर्ष सामने आया है। इस अध्ययन की रिपोर्ट विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की पूर्व संध्या पर आज यहां आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में जारी किया गया। 

इस अध्ध्यन में शामिल 43 लोगों ने कहा कि उनके परिवार या दोस्तों में मानसिक रोगी हैं लेकिन इनमें से करीब 20 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनके घर के 50 किलोमीटर के दायरे में कोई मानसिक चिकित्सा केन्द्र या क्लिनिक नहीं है। हमारे देश में केवल 49 प्रतिशत मरीजों को उनके घर के 20 किलोमीटर के दायरे में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पाती है। 

इसी तरह से 48 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे जानते हैं कि उनके परिवार या दोस्तों में कोई व्यक्ति नशे की लत का शिकार है लेकिन इनमें से 59 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनके घर के आसपास नशा मुक्ति केन्द्र नहीं है। 

इस अध्ययन की रिपोर्ट जारी करते हुए सीआईएमबीएस के निदेशक डॉ. सुनील मित्तल ने कहा कि ''मानसिक बीमारियां न केवल मरीजों के लिए बल्कि पूरे परिवार के लिए अत्यंत दुखदाई और तकलीफदेह होती है और यह आज के समय की बहुत बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है। हालांकि इन बीमारियों का इलाज पूरी तरह से संभव है लेकिन हमारे देश में मानसिक रोगों से पीड़ित लोगों में से ज्यादातर को इलाज नहीं मिल पाता है। इसका कारण मानसिक बीमारियों को लेकर समाज में कायम गलत धारणाएं, इन बीमारियों को लेकर जागरूकता का अभाव तथा मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं का सुलभ नहीं हो पाना है।

यह अध्ययन भारत में मानसिक बीमारियों के प्रति जागरूकता, मानसिक बीमारियों के प्रति लोगों के व्यवहार एवं इन बीमारियों के उपचार की सुलभता की स्थिति का पता लगाने के लिए किया गया जो इस विषय पर भारत में किया गया सबसे बड़ा स्वंतत्र सर्वेक्षण है। इस सर्वेक्षण से भारत में मानसिक बीमारियों के प्रति जागरूकता, मानसिक बीमारियों के प्रति लोगों के व्यवहार एवं इन बीमारियों के उपचार की सुलभता के बारे में बहुत ही चौंकाने वाली जानकारी मिली है। इस सर्वेक्षण को वल्र्ड डिग्निटी प्रोजेक्ट के तहत सहायता प्रदान की गई।

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे (एनएमएचएस), 2015-16 के अनुसार हमारे देश में मानसिक बीमारियों का प्रकोप 13.7 प्रतिशत है जबकि मानसिक बीमारियों के कारण आत्महत्या करने का खतरा 6.4 प्रतिशत है। इस सर्वे में मानसिक बीमारियों के प्रकोप तथा इन बीमारियों के लिए उपचार सुविधाओं की उपलब्धता में भारी अंतर का पता चला। 

सीआईएमबीएस की क्लिनिकल साइकोलाजिस्ट सृष्टि जाजू ने कहा कि हमारे देश में चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता एक बड़ा मुद्दा है और आज के समय में टेक्नोलाजी जैसे, मोबाइल फोन, एप्स और टेली मेडिसीन इस दिशा में काफी मददगार साबित हो सकते हैं। 

इस अध्ययन से एक चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि इस सर्वेक्षण में शामिल 80 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनके पास या तो स्वास्थ्य बीमा नहीं है या वे यह नहीं जानते कि मानसिक बीमारियों का उपचार स्वास्थ्य बीमा के दायरे में आता है। सीआईएमबीएस की साइकिएट्रिस्ट डॉ. शोभना मित्तल ने कहा कि इस सर्वेक्षण में देखा गया कि केवल आठ प्रतिशत लोगों को यह पता था कि मानसिक बीमारियों का इलाज चिकित्सा बीमा के दायरे में आता है तथा केवल 26 प्रतिशत लोगों ने कहा कि सरकार मानसिक रोगियों के इलाज की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराती है।

डॉ. शोभना मित्तल ने कहा कि इस सर्वेक्षण के आधार पर कहा जा सकता है कि लोगों को मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 2017 के बारे में जानकारी बहुत कम है जिसमें चिकित्सा बीमा कंपनियों को शारीरिक बीमारियों के इलाज की तरह ही मानसिक बीमारियों के इलाज के लिए बीमा प्रदान करने का निर्देश दिया गया है लेकिन इस बारे में जागरूकता की कमी के कारण काफी मरीज मानसिक बीमारियों का इलाज नहीं करा पाते या बीमे का लाभ नहीं ले पाते। 

डॉ. सुनील मित्तल ने कहा कि इस सर्वेक्षण के आधार पर मानसिक स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देने के लिए तीन प्रमुख सुझाव सामने आए हैं। करीब 37 प्रतिशत लोगों ने अधिक से अधिक संख्या में मानसिक चिकित्सा केन्द्र खोलने का सुझाव दिया, 28 लोगों ने कहा कि मानसिक रोगियों की सेवा - सुश्रुशा करने वाले लोगों के लिए प्रक्रिया को आसान बनाया जाए ताकि वे मानसिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों का इलाज सुगमता से करा सकें तथा 24 प्रतिशत लोगों ने लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाने का सुझाव दिया। 

मानसिक स्वास्थ्य में सुधार के लिए सक्रिय रूप से शामिल सुप्रीम कोर्ट के वकील मृणाल कंवर ने कहा, ''राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को अपर्याप्त मेंटल हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को संबोधित करने के लिए 1982 में शुरू किया गया था और 1996 में हर जिले में एक मानसिक स्वास्थ्य सेवा केंद्र शुरू करने की योजना बनाई गई थी। लेकिन, दशकों बाद भी, इसके इंफ्रास्टक्चर में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ है।''

मृणाल कंवर ने कहा कि इसका मुख्य कारण अधिकारों के बारे में जागरूकता का अभाव है। नया कानून व्यक्तियों को कई अधिकार प्रदान करता है, लेकिन व्यक्ति इनका लाभ तब तक नहीं उठा पाते हैं जब तक कि उन्हें जागरूक और तैयार नहीं किया जाता है।''

सीआईएमबीएस की मनोचिकित्सक डॉ. दीपाली बंसल ने कहा कि 55 प्रतिशत लोग मानसिक बीमारियों वाले लोगों को खतरनाक मानते हैं। लेकिन यह एक गलत धारणा है। मानसिक बीमारी वाले लोग दूसरों के लिए तो खतरनाक साबित नहीं होते हैं लेकिन उनके दूसरों के द्वारा दुव्र्यवहार या पीड़ित होने की अधिक संभावना होती है। लोगों में ऐसी धारणा को सिनेमा जैसे मनोरंजन के लोकप्रिय माध्यम ने अधिक बढ़ावा दिया है।

मिताली श्रीवास्तव ने कहा, ''सर्वेक्षण में एक दिलचस्प बात पायी गयी कि केवल 43 प्रतिशत लोगों ने महसूस किया कि मानसिक समस्या से पीड़ित व्यक्ति को अस्पताल ले जाने की नौबत आ सकती है, जबकि 44 प्रतिशत लोगों ने महसूस किया कि व्यक्ति को परिवार के सदस्यों द्वारा काउंसलिंग की जा सकती है या स्थानीय चिकित्सक या बाबा / तांत्रिक के पास ले जाया जा सकता है।''

 

प्रदूषण की मार से कहीं आपकी सेहत ना हो जाए बेकार


- डा. अनिता सिंगला, विजिटिंग कंसल्टेंट, आब्स्टेट्रिक्स एंड गाइनेकोलॉजी , फोर्टिस हाॅस्पीटल एवं जेपी हास्पीटल, नौएडा
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पिछले कई दिनों से नौएडा, ग्रेटर नौएडा सहित दिल्ली -एनसीआर में प्रदूषण काफी बढ़ गया है। सर्दी के आगमन के साथ ही आसमान पर स्मॉग की चादर तनने लगी है। दिवाली में वैसे भी आतिशबाजी के कारण प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। प्रदूषण न केवल घर के बाहर बल्कि घर के भीतर भी होता है। अक्सर घरों में बेहतर वेंटिलेशन सिस्टम की कमी होती है। लेकिन जब बाहर भी प्रदूषण होता है तो दरवाजों और खिड़कियों को भी बंद रखना पड़ता है। इसके कारण घर का प्रदूषण बाहर नहीं निकल पाता। दिल्ली-नौएडा सहित एनसीआर में घरों के अंदर कई हानिकारक गैसों की मात्रा सुरक्षित सीमा से बहुत अधिक पाई गई है। घरों में किचन से निकलने वाली गैसें, वाशरूम से निकलने वाली गंध, केमिकल क्लीनिंग सोल्युशन, ऐडहीसिव, ऑयल डिफ्यूजर, डियोड्रेंट, परफ्यूम, मॉस्किटो रिपेलेंट, कारपेट, पेंट, लकड़ी के फर्नीचर और घर के अन्य सामानों से निकलने वाले हानिकारक गैसें और गंध कई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देती हैं।
महिलाओं पर प्रदूषण का असर
घर और बाहर के प्रदूषण से कई बीमारियां होती हैं जिनमें श्वास संबंधी बीमारियां, हाइपरटेंशनए कैंसर और हृदय रोग प्रमुख है। जिन्हें सांस और साइनस है उन्हें अधिक हो सकता है। यही नहीं प्रदूषण से महिलाओं की प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है और समयपूर्व प्रसव एवं गर्भपात का खतरा बढ़ सकता है। प्रदूषण से गर्भवती महिलाएं ही नहीं बल्कि अजन्मे बच्चे भी प्रभावित हो सकते हैं। दरअसल, वायु प्रदूषण से खतरनाक और काफी महीन कण नाक और मुंह के रास्ते फेफड़ों तक पहुंचते हैं। ये सांस की नली में सूजन बढ़ा देते हैं।
ये हानिकारक कण गर्भवती महिलाओं के अलावा बुजुर्गों और खास तौर पर सांस के मरीजों के लिए ज्यादा नुकसानदेह होते हैं। गर्भ में पल रहे बच्चे को भी नुकसान पहुंचाते हैं।
दिवाली में गर्भवती महिलाएं खास ख्याल रखें
दिवाली के दौरान बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पटाखों के धुएं और शोर से बचकर रहना चाहिए। इस धुएं के कारण बच्चों को सांस की समस्या हो सकती हैं। इसके अलावा पटाखों में खतरनाक केमिकल होता है जिसके कारण बच्चों में भी टॉक्सिन्स का लेवल बढ़ जाता है और उनके विकास में रुकावट पैदा करता है। इसके साथ ही इस धुएं के कारण गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए पटाखों से दूरी बना कर रहें। जितना हो सके घर के अंदर ही रहे, धुएं और पटाखों के संपर्क में आने से बचें।
बच्चों और बुजुर्गों का भी रखें ख्याल
महिलाओं को अपने से अधिक परिवार के अन्य सदस्यों का ध्यान रखना पड़ता है। उन्हें छोटे बच्चों और बुजुर्गों का दिवाली मौके पर खास ख्याल रखना होगा। क्योंकि इनके फेफड़े बहुत ही ज्यादा कमजोर होते है। इतना ही नहीं कई बार बुजुर्ग और बीमार व्यक्ति पटाखों के शोर के कारण दिल के दौरे का शिकार हो जाते हैं।
प्रदूषण से कैसे करें बचाव
— प्रदूषण अधिक होने पर मास्क का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन माॅस्क अच्छी क्वालिटी की हो। एन 95 मास्क ही प्रदूषण से रोकथाम में सबसे कारगर होते हैं। गर्भवती महिलाएं घर में भी मास्क पहनें।
— एलर्जी होने पर गर्म पेय पदार्थ ज्यादा पिएं। अस्थमा या एलर्जी वाले लोग दिक्कत होने पर चिकित्सक से संपर्क करें। एलर्जी से बचने के लिए अपने मुंह पर रूमाल या फिर कपड़ा बांधे।
— सुबह और शाम के समय दिक्कत लगे तो रुमाल से नाक-मुंह ढक लें।
— कोशिश करें कि पटाखे न जलाएं और घर के अन्य लोगों को भी आतिषबाजी से दूर रहने को प्रेरित करें क्योंकि इससे निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर ऑक्साइड जैसी गैसें स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।
अगर आप दमा की मरीज हैं तो हमेशा अपने साथ इन्हेलर रखें ताकि सांस की समस्या होने पर तुरंत यूज कर सके।
— दिवाली की रात घर के दरवाजे और खिड़कियां बंद करके रखें। जिससे पटाखों का धुंआ अंदर प्रवेश न कर पाए।
— अगर आप खर्च वहन कर सकती हैं तो झाडू की जगह वैक्यूम क्लीनर का इस्तेमाल करें।
— अपने घर में और आसपास की जगहों पर ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाएं जो हवा को साफ रखने का काम करते हैं।
— सांसों से शरीर में पहुंचे जहर को बाहर निकालने के लिए पानी बहुत जरूरी है। दिन में तकरीबन 4 लीटर तक पानी पिएं। घर से बाहर निकलते वक्त भी पानी पिएं।
— खाने में जितना हो सके विटामिन-सी, ओमेगा-3 को प्रयोग में लाएं. शहद, लहसुन, अदरक का खाने में ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें।
— सुबह के वक्त प्रदूषण का स्तर ज्यादा होता है इसलिए मॉर्निंग वॉक पर नहीं जाएं।


पोर्टेबल नेविगेशन तकनीक से मिलेगा बेहतर परिणाम

प्रौद्योगिकी विकास और सर्जिकल उपलब्धियों वाली नई आपरेटिंग तकनीकें गाजियाबाद के वैशाली स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हास्पीटल के आर्थोपेडिक एवं ज्वांइट रिप्लेसमेंट विभाग में उपलब्ध हैं जिनके कारण सर्जरी के परिणाम में सुधार होता है तथा मरीज कम समय में स्वास्थ्य लाभ करते हैं। ऐसा ही एक तकनीकी विकास है आर्थोएलाइन जिससे घुटना बदलवाने का आपरेशन कराने वाले लोग जल्दी ठीक होते हैं तथा मरीज जल्द से जल्द बिना किसी कष्ट के चलने-फिरने में सक्षम होते हैं। इस नवीनतम तकनीक की मदद से परम्परागत मैकेनिकल गाइड्स तथा परम्परागत कम्प्यूटर एक्सेस सर्जरी प्रणालियों की तुलना में एलाइनमेंट में उल्लेखनीय सुधार होता है।
गाजियाबाद के वैशाली के मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हास्पीटल में आर्थोपेडिक एवं ज्वाइंट रिलेसमेंट सर्जरी विभाग के निदेशक एवं विभाग प्रमुख डाॅ. बी. एस. मूर्ति बताते हैं, ''यह आसानी से संचालित होने वाला हथेली के आकार का उपकरण है जिससे आपरेशन के परिणाम में सुधार आता है, घुटने की स्थिरता को बढ़ावा देता है, आपरेशन का समय कम करता है और इसके कारण मरीज को कम समय तक अस्पताल में रहना पड़ता है। डाॅ. मूर्ति आपरेशन की सटीकता एवं उसमें लगने वाले समय में कमी लाने के लिए सर्जरी के साथ तकनीकों के एकीकरण के लिए जाने जाते हैं। आर्थोएलाइन के उपयोग ने इस तथ्य को साबित किया है।
आर्थोएलाइन हाथों से पकड़ कर संचालित किया जाने वाला नैविगेशन उपकरण है जो ऑपरेटिंग थियेटर में रखी जाने वाली मंहगी मशीन के जटिल उपयोग को कम करता है। यह एकल-उपयोग प्रणाली है और इसके कारण आपरेषन थियेटर में उपयोग हो सकने वाली महंगी नैविगेशन मशीनें खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। इसका उपयोग कहीं भी किया जा सकता है। पारंपरिक कंप्यूटर आधारित सर्जरी में सर्जन को एक बड़े से कंसोल में देखना पड़ता है जबकि यह नई तकनीक बहुत ही सुविधाजनक एवं उपयोगी है और सर्जरी को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए सर्जन को रियल टाइम फीडबैक प्रदान करती है।
डाॅ. मूर्ति ने यह जानकारी देते हुए बताया, ''यह तकनीक सर्जन को बिल्कुल सटीक एवं सही जानकारी देती है। इस नई तकनीक की मदद से घुटने को सही तरीके से संतुलित किया जा सकता है। इसकी मदद से इम्प्लांट लंबे समय तक काम करते हैं तथा स्वस्थ क्षेत्र को नुकसान पहुंचने से बचाते हैं।''
आर्थोएलाइन मौजूदा आपरेशन थियेटर में जगह की कमी को दूर करने का सम्पूर्ण समाधान है और जिसके कारण मरीज को संक्रमण होने की आशंका कम होती है। इसकी बेहतरीन एलाइनमेंट विशेषता के कारण जोड़ के गलत तरीके से जुड़ने तथा उसमें विकृति रह जाने की आशंका नहीं होती है और इस कारण मरीज को दोबारा सर्जरी कराने के खर्च एवं कष्ट से बचाव होता है। 


दिवाली में कैसे रखें सही खान-पान

दीवाली खुशियों, मौज-मस्ती और लजीज पकवानों का त्यौहार है लेकिन इस दौरान खाने-पीने में सावधानी रखें अन्यथा हो सकता है कि जब लोग खुशियां मना रहे हों तो आप पकवान खाने के बजाए दवाइयां खा रहे हो और खुशियां मनाने के बजाए डाक्टरों के चक्कर काट रहे हों।
दिवाली में स्वादिष्ट व्यंजनों और मिठाइयों का लुत्फ उठाएं लेकिन सावधानी के साथ। खास तौर पर डायबटिज के मरीज। कई लोग इतना पकवान, घी की मिठाइयों, नमकीन और ड्राईफ्रूट्स खा लेते हैं उनका शुगर लैवल और ब्लड प्रैशर बहुत अधिक बढ़ जाता है। यह देखा गया है कि कई लोग त्यौहार के दौरान अपना वजन 20 प्रतिशत तक बढ़ा लेते हैं।
दिवाली के दौरान आपको बाजार से खरीदी गई मिठाइयों से परहेज करना चाहिए। ऐसी मिठाइयों में मिलावट हो सकती है जिनके खाने से आप बीमारियों का शिकार बन सकते हैं। बाजार में त्यौहार से कई दिनों पहले से मिठाइयां बननी शुरू हो जाती हैं और आपके घर पहुंचते - पहुंचते खराब और बासी हो जाती हैं। मिठाइयां हमेशा अच्छी दुकानों से खरीदें। बेहतर तो यही है कि मिठाइयां घर में ही बनाएं।
इसके अलावा आप फल और सब्जियों का सेवन अधिक करें। उनमें से अधिकांश में एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होते हैं और इस प्रकार हमारे शरीर को हानिकारक फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं।
व्यायाम भी है जरूरी
दिवाली में जो अतिरिक्त कैलोरी ग्रहण करते हैं उन्हें बर्न करने के लिए एक्सरसाइज करना नहीं भूलें। त्यौहारों की तैयारी में अक्सर महिलाएं व्यायाम करना भूल जाती हैं। लेकिन उन्हें व्यायाम के लिए समय निकालना चाहिए। नियमित एक्सासाइज से कैलोरी बर्न होगी तथा शुगर लेवल नियंत्रित रखेगा। अगर आप किसी भी बीमारी से पीडि़त नहीं हैं, तो प्रति दिन आधे घंटे तेज चलें, अन्यथा अपने डॉक्टर द्वारा बताए गए फिजिकल एक्सररसाइज का पालन करें।
हाइड्रेशन का रखें ध्यान
दीवाली के अवसर पर मौसम में भी काफी हद तक बदलाव आ जाता है, जिसके कारण जल्दी से या बहुत अधिक प्यास नहीं लगती। लेकिन त्योहार के दौरान शरीर के हाइड्रेजन के स्तर को सही रखे। पानी के अलावा नींबू पानी, नारियल पानी व छाछ आदि भी लें। शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि आप बहुत सारा पानी पीएं, नियमित व्यायाम करें तथा विटामिन, मिनरल और एंटीऑक्सीडेंट से समृद्ध एक संतुलित आहार लें। दिवाली के दौरान अतिरिक्त खाने की भरपाई करने के लिए अगले कुछ दिनों के खाने के बारे में सावधान रहें।
डायबिटिज के मरीज क्या सावधानी रखें
अगर आप डायबिटीज के मरीज हैं तो मीठी चीजों और हाई कोलेस्ट्रॉल वाली चीजों से परहेज करना चाहिए। हालांकि जो लोग इंसुलिन पर निर्भर नहीं है, वे सीमित मात्रा में मिठाई को अपने आहार में शामिल कर सकते हैं। एहतियातन उन्हें त्योहार के दौरान समय-समय पर अपना ब्लड शुगर चेक करते रहना चाहिए, ताकि खतरे की सीमा रेखा पार न की जाए। डायबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए बाजार में मौजूद कई ब्रांड, शुगर फ्री मिठाई लेकर आते हैं। ऐसे में आपको अच्छी गुणवत्ता वाले शुगर फ्री मिठाई का सेवन करना चाहिए। डायबिटिज या अन्य रोगों के मरीज दिवाली की मौज-मस्ती में अपनी दवाईयों को बिल्कुल न भूलें। सही समय पर दवाएं लें। कोई भी दिक्कत हो तो तत्काल डाक्टर से परामर्श करें।

- डा. अजय अग्रवाल, निदेशक एवं विभाग प्रमुख, इंटरनल मेडिसीन, फोर्टिस हास्पीटल, नौएडा

दिवाली के पूर्व साफ-सफाई के दौरान एलर्जी से बचकर रहें

घरों की साफ-सफाई और रंग-रौगन दिवाली की तैयारी का जरूरी हिस्सा हे। इन दिनों महिलाएं दीपावली के स्वागत के लिए घरों की साफ-सफाई में व्यस्त होती हैं। धूल, मिट्टी, पेंट आदि से कई महिलाओं को एलर्जी होती है। ऐसे में उन्हें नाक व श्वास संबंधी कई दिक्कतें होती हैं। इनमें सर्दी, खांसी, जुकाम, कफ, नेजल ब्लाकेज, सांस लेने में तकलीफ, अस्थमा, फेफड़ों में संक्रमण आदि शामिल है। अक्सर धूल, पेंट, डिटर्जेट आदि एलर्जी पैदा करते हैं और इनसे श्वास संबंधी समस्याओं एवं त्वचा में एलर्जी होने का खतरा होता है। यह देखा जाता है कि साफ-सफाई करते समय महिलाएं अपनी सेहत के प्रति लापरवाही बरतती हैं।
क्या है एलर्जी
जब हमारा शरीर किसी बाहरी चीज को लेकर अत्यधिक प्रतिक्रिया करता है तो उसे एलर्जी कहते हैं। एलर्जी किसी खाने की चीज, पालतू जानवर, मौसम में बदलाव, कोई फूल-फल-सब्जी के सेवन, खुशबू, धूल, धुआं, दवा यानी किसी भी चीज से हो सकती है। इन चीजों को एलर्जन कहते हैं। हमारा इम्यून सिस्टम एलर्जी पैदा करने वाली चीजों /एलर्जन/ को स्वीकार नहीं कर पाता और नतीजा ऐसी प्रतिक्रिया होती है जिससे हमें कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं होती है जैसे शरीर पर लाल-लाल चकत्ते निकलना, नाक और आंखों से पानी बहना, जी मितलाना, उलटी होना, सांस लेने में दिक्कत होना, सांस तेज चलना और बुखार आदि शामिल है। आमतौर पर ज्यादातर एलर्जी खतरनाक नहीं होतीं, लेकिन कभी-कभार समस्या गंभीर भी हो सकती है।
दिवाली के दौरान होने वाली एलर्जी
वैसे तो अलग-अलग प्रकार की एलर्जी अलग-अलग लोगों में होती है, लेकिन दिवाली की सफाई करते वक्त जो आमतौर पर एलर्जी की शिकायतें मिलती हैं, वह होती हैं श्वास संबंधी एलर्जी की। इस तरह की एलर्जी गंभीर बीमारी नहीं है लेकिन समय पर सावधानी बरत कर इससे बचा जा सकता है।
कई महिलाओं को धूल से एलर्जी होती है। दिवाली के समय आमतौर पर महिलाएं कोने-कोने से धूल, मिट्टी, जाला आदि निकालती हैं। काफी पुरानी धूल में फंगस हो जाता है। इसके बैक्टीरिया महिलाओं के नाक पर अटैक करते हुए सीधे श्वसन प्रणाली को नुकसान पहुंचाते
पेंट्स में मौजूद कुछ रसायन भी श्वसनन प्रणाली में दिक्कत पैदा कर सकते हैं। पेंटिंग के रंगों में बेंजीन नामक केमिकल एलर्जिक लोगों के लिए नुकसानदायक है। इससे बचने के लिए जहां कलर हो रहा हो वहां जाने से बचें।
कई महिलाओं को  जिन्हें सर्फ, वॉशिंग सोडा, विम पाउडर क्लीनिंग लिक्विड्स, फिनाइल की गंध आदि से एलर्जी होती है। किसी को इनकी गंध नहीं भाती तो किसी को इनसे खुजली हो जाती है। इनके संपर्क में आने पर त्वचा संबंधी एलर्जी होती है। त्वचा में खुजली हो सकती है। हालांकि इस तरह की एलर्जी कुछ समय बाद ठीक हो जाती है।
दीपावली में पटाखों से निकलने वाला धुआं न केवल वायु-प्रदूषण को बढ़ाता है बल्कि कई लोगों की परेशानी का सबब भी बन जाता है। इन पटाखों में विस्फोटकों का इस्तेमाल होता है। इससे निकलने वाले धुएं से कई लोगों को एलर्जी होती है।
कैसे बचें
जिन महिलाओं को धूल-मिट्टी से एलर्जी है तो कोशिश करें कि वे इनसे दूर रहें। हो सके तो दूसरों से सफाई करवाएं। जिस कोने की सफाई हो रही हो वहां न जाएं। साफ होने के कम से कम दो दिन तक उस जगह से दूरी बनाएं रखें। बहुत जरूरी है तो नाक पर गीला कपड़ा बांधकर सफाई करें, इससे डस्ट पार्टिकल्स कपड़े पर चिपकेंगे।
एक के बाद एक एक करके घर के कमरों, किचन आदि का रंगरोगन करवाएं। जिस कोने में पेंटिंग का काम जारी है वहां जाने से बचें। आजकल केमिकल रहित पेंट्स बाजार में उपलब्ध हैं, उनका इस्तेमाल करवाएं। कम से कम डिटरजेंट का इस्तेमाल करें। ग्लव्ज पहनकर डिटर्जेट से सफाई करें। यह ध्यान रखें कि अगर आप इनहेलर या फिर कोई दवाई ले रही हों उसे समय पर लेती रहें। अगर दिक्कत अधिक हो या जल्दी ठीक नहीं हो रही हो तो चिकित्सक से परामर्श करें।


डा. राकेश कुमार, वरिष्ठ इंटरनल मेडिसीन विशेषज्ञ, इंद्रप्रस्थ अपोलो हास्पीटल, नई दिल्ली


अब हृदय को खोले बिना बदले जा सकते हैं दिल के वाल्व

मानव हृदय में चार वाल्व होते हैं जो हृदय की लय के साथ तालमेल बिठाते हुए खुलते और बंद होते हैं। हृदय के भीतर और बाहर रक्त प्रवाह के सही दिशा में बहाव को सुनिश्चित करने में हृदय के वाल्व अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ताकि मानव शरीर में समुचित रक्त की आपूर्ति हो सके। जब कोई हृदय वाल्व ठीक से काम नहीं करता है, तो रोगी के सीने में दर्द, धड़कन का तीव्र होना, सांस की तकलीफ, थकान, कमजोरी, नियमित गतिविधि के स्तर को बनाए रखने में असमर्थता, या यहां तक कि चक्कर आने जैसे विशिष्ट लक्षण प्रकट हो। सकते हैं। इस रोग की पहचान के लिए हृदय रोग विशषज्ञ मुख्य रूप से इकोकार्डियोग्राम (इको), सीटी एजियोग्राम आर कुछ अन्य पराक्षणा का अध्ययन करते हैं। इसक इलाज क तार पर रक्त का पप करने की हृदय की क्षमता बढ़ाने के लिए दवाए दी जा सकती है जो ठीक से काम नहीं कर रहे वाल्य को ठीक से काम करने में मदद कर सकता हा हालांकि, रोगग्रस्त हृदय वाल्व एक यांत्रिक समस्या है जिसे मात्र दवा से ठीक नहीं किया जा सकता है, और क्षतिग्रस्त वाल्व को ठीक करने या बदलने के लिए अक्सर सर्जरी की आवश्यकता होती है। सबसे पहले जब यह निर्धारित कर लिया जाता है कि रोगग्रस्त हृदय वाल्व को इलाज की आवश्यकता है, तो इसके इलाज के उपलब्ध विकल्प वाल्व की मरम्मत या वाल्व प्रतिस्थापन में से किसी एक का चुनाव किया जाता है। वाल्व प्रतिस्थापन ज्यादातर ओपन हार्ट सर्जरी के माध्यम से किया जाता है जिसमें रोगग्रस्त वाल्व के स्थान पर नया टिश्यू नया टिश्यू मेकैनिकल प्रोस्थेटिक वाल्य लगाया जाता है। एशियन अस्पताल ने इस नई तकनीक के माध्यम से फरीदाबाद में एक 68 वर्षाय माहला का पहला ट्रास कथटर एओर्टिक हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट 17 (टीएवीआर) किया। इस तकनीक का इस्तेमाल कर - उनके दिल के क्षतिग्रस्त वाल्व को बटल दिया गया। टीएवीआर तकनीक से यह पहला वाल्व प्रतिस्थापन प्रक्रिया डॉ ऋषि गप्ता और डॉ. सब्रत अखौरी ने किया। इस टीम में डॉ. सिम्मी मनोचा डॉ. उमेश कोहली और डॉ. कमल गुप्ता भी शामिल थे। थोपन हार्ट सर्जरी एक इनवेसिव - प्रक्रिया है और इसमें रिकवरी में लंबा समय लगता है। यह रोगियों (65 वर्ष से अधिक आयु) के लिए एक चुनौती है। जबकि ट्रांस कैथेटर एओर्टिक हाट वाल्व रिलासन (टापार) तकनीक वैसे लोगों के लिए एक नई उपचार तकनीक है जो ओपन हार्ट सर्जरी के लिए तैयार नहीं होते हैं या ओपन हार्ट सर्जरी के खतरों को झेलने के लिए फिट नहीं होते हैं। इस मिनिमली इनवेसिव प्रक्रिया में रोगी की जांघ में बड़ी धमनी (पेट और जांघ के बीच में बड़ी धमनी) के । माध्यम से नए वाल्व लगाए जाते हैं। - इन प्रक्रियाओं को छोटे छिद्रों (1 सेमी) के माध्यम से किया जा सकता है और इसलिए इस प्रक्रिया के बाद रोगी की रिकवरी जल्द होती है। मेरिल एओर्टिक हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट थेरेपी उपलब्ध कराने वाली पहली भारतीय कंपनी है, जिसने देश भर में 100 से अधिक रोगियों को एओर्टिक हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट उपलब्ध कराया है। दिसंबर 2018 में, भारत सरकार ने रोगियों के इलाज के लिए इस वाल्व को मान्यता दे दी। मेरिल दनिया भर के 100 से अधिक देशों में काम करने वाली एक वैश्विक चिकित्सा उपकरण कंपनी है। टांस कैथेटर एओर्टिक हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट (टीएवीआर) के लाभ यह ऐसे रोगियों में किया जाता है . जिन्हें अधिक उम्र के कारण ओपन हार्ट सर्जरी से खतरा होता है। • जिनका वजन अधिक है। • जिनमें किसी अन्य बीमारियों के कारण ओपन हार्ट सर्जरी संभव नहीं है।


डॉ. ऋषि गुप्ता अध्यक्ष इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी एशियन डार्ट सेंटर rishi.gupta@aimsindia.com 


Thursday, 24 October 2019

भारत में नैनोफार्मास्युटिकल के मूल्यांकन के लिए दिशा.निर्देश जारी

नई दिल्ली, 24 अक्तूबर। केन्द्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकीए पृथ्वी विज्ञान तथा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन ने नई दिल्ली में एक समारोह में आज भारत में नैनोफार्मास्युटिकल के मूल्यांकन के लिए दिशा.निर्देश जारी किए। 
डॉ. हर्ष वर्धन ने बताया कि ये दिशा—निर्देश नवीन नैनोफार्माक्युलेशन की गुणवत्ताए सुरक्षा और कुशलता के मूल्यांकन को निरुपित करने के अत्यंत महत्वपूर्ण कदमों में से एक हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इन दिशा.निर्देशों का उद्देश्य भारत में नोफार्मास्युटिकल के लिए पारदर्शीए सतत और संभावित नियामक मार्ग दिखाना है। 
नैनोकैरियन आधारित दवा पहुंचाना एक उभरता हुआ क्षेत्र है और यह बाजार में नैनोफार्मास्युटिकल के बाजार में प्रचलन से संबंधित है। नैनोफार्मुलेशन अधिक दक्षताए कम नशीला है और ये पारंपरिक दवाओं से अधिक सुरक्षित है। इससे भारतीय अनुसंधानकर्ताओं को नियामक दिशा.निर्देशों के अनुरूप अनुसंधान करने में सहायता मिलेगी और आशा है कि यह उद्योग अनुसंधान की श्रृंखला शुरू करने से लेकर उत्पाद विकास और वाणिज्यीकरण तक की यात्रा में इसमें शामिल रहेगा। इसके अलावाए नियामक प्रणाली को इन दिशा.निर्देशों से मजबूती मिलने के कारण निजी निवेश भी आकर्षित किया जाएगा। 
इन दिशा.निर्देशों से नियामक आवश्यकताओं के साथ अनुवाद अनुसंधान की श्रृंखला शुरू करने में भी सहायता मिलेगी। इनसे नैनो टेक्नोलॉजी पर आधारित नए उत्पादों की स्वीकृति देने के समय नियामक को निर्णय लेने में आसानी होगी और इसी तरह अनुसंधाकर्ता भी अपने उत्पाद को बाजार में शुरू करने के लिए स्वीकृति ले सकेंगे। इनसे उत्पादों का उपयोग करने वालों को भी फायदा होगा क्योंकि उन्हें दिशा.निर्देशों के अनुरूप बाजार में गुणवत्ता आश्वस्त उत्पाद मिल सकेंगे। इन दिशा.निर्देशों से कृषि उत्पादोंए सौंदर्य प्रसाधनोंए नैनो टैक्नोलॉजी के माध्यम से प्रत्यर्पित किए जाने वाले उपकरणों जैसे क्षेत्रों में भी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी। ये दिशा.निर्देश अतिउन्नत प्रौद्योगिकी के माध्यम से सभी के लिए वाजिब स्वास्थ्य देख.रेख के मिशन में योगदान देने हेतु भी मार्ग प्रशस्त करेंगे।
इन दिशा.निर्देशों को जैव प्रौद्योगिकी विभागए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और केन्द्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन ने मिलकर विकसित किया है और इसके लिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग को अंतर.मंत्रालय प्रयासों के बीच सहयोग और समन्वय करना पड़ा है। 


प्रथम ग्लोबल बॉयो इंडिया की शिखर बैठक अगले माह नई दिल्ली में होगी। 

नई दिल्ली, 24 अक्तूबर। भारत में पहली बार नई दिल्ली में जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित पक्षों का विशाल सम्मलेन.ग्लोबल बायो इंडियाए 2019 का आयोजन 21.23 नवंबरए 2019 के बीच किया जा रहा है। इस शिखर बैठक के कर्टेन रेजर कार्यक्रम में केन्द्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकीए पृथ्वी विज्ञान तथा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री डा. हर्ष वर्धन ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि भारत पहली बार जैव प्रौद्योगिकी से संबधित समुदाय के लिए विशाल आयोजन की मेजबानी कर रहा है ताकि निवेशए हमारी स्वदेशी शक्ति का प्रदर्शन और स्वदेशी प्रतिभा पूल की आकांक्षाओं और आशाओं के प्रेरक फ्यूल को आकर्षित किया जा सके। 


इस अवसर पर डा. हर्ष वर्धन ने वैज्ञानिक अनुसंधानए इसके रूपांतर और वाणिज्यीकरण के प्रति भारत की वचनबद्धता जारी रखने की बात कही और इस विशाल आयोजन से किस प्रकार भारत की शक्ति का प्रदर्शन किया जा सकेगा और नई भागीदारियों का विकास होगा और निवेश के अवसर बढ़ सकेंगेए इन सभी बिन्दुओं पर विचार व्यक्त किए।


जैव प्रौद्योगिकी विभाग की सचिव डा. रेणु स्वरूप ने इसी प्रकार की भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि मेक इन इंडिया 2ण्0 में जैव प्रौद्योगिकी चयनित प्रमुख क्षेत्रों में से एक है। इस आयोजन के माध्यम से इस क्षेत्र की हमारी क्षमता और शक्ति का प्रदर्शन करने की इच्छा है और हम चाहते हैं कि समूचा विश्व यह जान जाए कि निवेश के लिए भारत उत्तम विकल्प है। 


इस अवसर पर कर्टेन रेजर के दौरान ग्लोबल बायो इंडिया.2019 की पुस्तिका जारी की गई। 


भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी विभाग अपने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमोंए जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद के साथ मिलकर इस शिखर बैठक का आयोजन कर रहा है। 


इस शिखर बैठक में 30 देशों से संबंधित पक्ष, 250 स्टार्ट.अपए 200 प्रदर्शनी आयोजक केन्द्र और राज्य सरकार के मंत्रालयए नियमाक संस्थाएंए निवेशक यानी सब मिलकर 3500 लोग शामिल होंगे। 


आशा है कि इससे स्वदेशी अनुसंधान क्षमताओंए जैव उद्यमशीलताए निवेश तथा समूचे ग्रामीण भारत और दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहरों तक अंतिम गंतव्य तक प्रौद्योगिकी पंहुचाने को बढ़ावा मिलेगा। 


यह उल्लेखनीय है कि जैव प्रौद्योगिकी भारत की 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य प्राप्त करने में प्रमुख प्रेरक का काम करेगी और यह देश की सकल घरेलू उत्पाद को गति देने के लिए आवश्यक क्षेत्रों में से एक मानी जा रही है। भारत को आज लगभग 51 बिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था माना जा रहा है और इसे 150 बिलियन अमेरिकी डॉलर की दिशा में आगे बढ़ना है। 


यह शिखर बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पहली बार विश्वभर से जैव प्रौद्योगिकी से जुड़े पक्षों का विशाल समागम दिखाई देगा। 


कैसा है फैशन का आपके मानसिक स्वास्थ्य पर असर


 


आज हर तरफ भागमभाग और प्रतियोगी बनकर सब लोग दौड़ रहे हैं। हर किसी को शॉटकर्ट तरीके से आगे निकलना है। संयुक्त परिवार से अलग होकर छोटे-छोटे घरों में लोग शिफ्ट हो रहे हैं। बच्चे शिक्षा और युवा रोजगार के लिए दूर जा रहे हैं। परिवार में संस्कार परंपरा बंधन की डोर शिथिल हो गई है। महिलाओं, बड़े बुजुर्गों के प्रति आदर भाव कम हो रहा है और सबसे बड़ी बात यह है कि लोग इंसानियत को भूलकर स्वार्थप्रवृत्ति के हो रहे हैं।


हम सब सुबह सुबह दिन के लिए तैयार होते हैं। दिन के लिए कपड़े बदलने का काम कोई यूं ही तो कोई ज्यादा सोच समझ कर करता है। लेकिन जाने अनजाने जैसे भी आप ये करते हैं - होता ये है कि आपके कपड़े आपके बारे में बाहर की दुनिया से बिना बोले कुछ बता रहे होते हैं फैिशन को खुद को व्यक्त करने का एक तरीका माना जाता है। कई बार इससे हमारी पहचान जुड़ जाती है तो कई बार उससे हमारा मूड भी प्रभावित होता है। हर दिन हम जो कपड़े पहनते हैं वे दिखाते हैं कि हम खुद को कैसे देखते हैं और बाकी लोगों को अपनी कैसी छवि दिखाना चाहते हैं। इससे भी बढ़कर पाया तो ये गया है कि कपड़े हमारे ज्ञान संबंधी कौशल पर भी असर डालते हैं। सन 2012 में अमेरिका के नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने पाया कि कुछ खास चीजें पहनने से पहनने वाले के सोच और प्रदर्शन पर असर पड़ता है। रिसर्चर इस नतीजे पर पहुंचे कि कपड़ों का अपना एक सांकेतिक अर्थ होता है। जब हम एक खास अर्थ वाले कपड़ों को पहनते हैं तो उससे हमारी मनोदशा पर भी असर पड़ता है। इसे 'एनक्लोद्ड कॉग्निशन' कहा गया। उदाहरण के तौर पर, एक लैब कोट को बुद्धिमत्ता और वैज्ञानिक सोच के साथ जोड़ कर देखा जाता है। अपने रिसर्च में उन्होंने पाया कि जब कोई इंसान किसी विशेष काम को करने से पहले ऐसा लैब कोट पहनता है तो कोट से जुड़े ये मूल्य पहनने वाले के प्रदर्शन पर सकारात्मक असर दिखाते हैं। स्टडी में पाया गया कि जो कपड़ों से जुड़े ऐसे मानसिक असर को मापा भी जा सकता है। सुबह सुबह कपड़े चुनना कभी कभी बड़ी चुनौती जैसा लग सकता है।


लंदन कॉलेज ऑफ फैशन से एप्लाइड साइकोलॉजी में मास्टर्स डिग्री ले चुकी कैमी एब्राहम बताती हैं, 'यह प्रयोग दिखाता है कि कपड़े कैसे हमारी एकाग्रता, दक्षता और अपने बारे में हमारी सोच को प्रभावित करते है।' जाहिर है कि अगर इसका अच्छा असर पड़ता है तो बुरा भी पड़ता होगा। इस बारे में एब्राहम कहती हैं, 'अगर किसी खास कपड़े को नकारात्मक चीजों से जोड़ कर देखा जाता है तो आपकी मानसिक दशा पर भी उनका वैसा ही असर पड़ेगा।' इस तरह 'एनक्लोद्ड कॉग्निशन' असल में दोनों तरह से काम करती है। जिन दिनों हम अंदर से अच्छा महसूस नहीं कर रहे हैं उन दिनों सही कपड़े हमें बेहतर महसूस करवा सकते हैं और एक कवच की तरह काम आ सकते हैं। लेकिन कई बार ऐसी मानसिक स्थिति में लोगों के लिए सही कपड़ों के बारे में सोचना तक मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कुछ लोग किसी दूसरे व्यक्ति की स्टाइल की नकल करने की कोशिश करते हैं लेकिन फिर काफी असहज महसूस करने लगते हैं। फैशन के बारे में लिखने वाली पत्रकार एब्राहम बताती हैं कि ऐसा 'कॉग्निटिव डिजोनेंस' और फैशन के बीच के संबंध के कारण होता 'कॉग्निटिव डिजोनेंस' का मतलब है ऐसी मानसिक प्रक्रिया 'कॉग्निटिव डिजोनेंस' का मतलब है ऐसी मानसिक प्रक्रिया जहां हमारे अपने मूल्यों के साथ मेल ना खाने वाला कोई काम करने से मानसिक परेशानी महसूस होती है। इससे उबरने के लिए या तो हम ऐसा कोई काम करना बंद कर सकते हैं या फिर अपने आपको ये समझा सकते हैं कि भले ही वह निजी मूल्यों से मेल ना खाता हो हम करना वही चाहते हैं। कपड़ों से जुड़े मामले में या तो जो आपको सूट नहीं कर रहा वह आप कभी नहीं पहनेंगे या फिर निर्णय लेंगे कि वही पहनना है। एब्राहम बताती हैं, 'जब आपको समझ आता है कि कोई स्टाइल आपके विचारों, मूल्यों और आस्थाओं से मेल नहीं खाते तो मानसिक रूप से आप बेचैन हो जाते हैं और अपनी स्टाइल बदल कर वो बेचैनी दूर करने की कोशिश करते हैं। इसीलिए आप जिन कपड़ों में आर । म महसूस करते हैं - बार बार वही पहनना चाहते या फिर, खुद को मना लेते हैं कि जिस अलग अंदाज के कपड़ों को आपने पहना है असल में उनकी मदद से आप अपने व्यक्तित्व के किसी नए पहलू को सामने लाना चाहते हैं। अब सवाल ये उठता है कि क्या आपको वैसे कपड़े पहनने चाहिए जैसा आप महसूस कर रहे हैं या फिर वैसे कपड़े जैसा आप महसूस करना चाहते हैं? इस विषय की एक्सपर्ट एब्राहम बताती हैं, 'मेरे हिसाब से आपको वैसे कपड़े पहनने चाहिए जैसा आप महसूस करना चाहते हैं। ऐसी कोशिश करनी चाहिए कि आप इस पर फोकस करें कि आप कैसा महसूस करना चाहेंगे।' ऐसा करने से बाहरी दुनिया को आपके बारे में पॉजिटिव संदेश जाता है।


सोशल मीडिया के तनावों से छुटकारा दिलाएगा योग

खजुराहो में आयोजित होगा सफलता एवं टेक्नो स्ट्रेस प्रबंधन में योग पर अंतराष्ट्रीय सम्मेलन

नई दिल्ली, 24 अक्तूबर। आधुनिकता और भागदौड़ से भरे जीवन में सोशल मीडिया और टेक्नोलाॅजी के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण उत्पन्न तनाव से मुक्ति पाने में क्या भारत की प्राचीन विद्या योग कारगर साबित हो सकती है। इस विषय पर विचार—विमर्श के लिए खजुराहो में अगले महीने एक अंतराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है जिसमें दुनिया भर के 10 देशों के योग विशेषज्ञ हिस्सा लेंगे। यह सम्मेलन खजुराहो के होटल रामांदा में 16 से 18 नवम्बर तक होगा।
''सफलता एवं तकनीकी तनाव प्रबंधन के लिए योग'' विषय पर अंतराष्टीय सम्मेलन के संयोजक एवं स्वामी विवेकानंद विष्वविद्यालय के योग विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष गगन सिंह ठाकुर ने आज नई दिल्ली के कंस्टीचयूशन क्लब में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में यह जानकारी देते हुए बताया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ''फिट इंडिया मूवमेंट'' की प्रेरणा से आयोजित होने वाले इस सम्मेलन में राजनीति, समाज सेवा और चिकित्सा जैसे विभिन्न क्षेत्रों की प्रमुख हस्तियों के अलावा बालीवुड हस्तियां भी हिस्सा लेंगी। इस सम्मेलन में केन्द्रीय आयुष मंत्री श्रीपद नाइक ने अपनी उपस्थिति की मंजूरी दी है। इसके अलावा बालीवुड की जिन हस्तियों के इस सम्मेलन में हिस्सा लेने की संभावना हैं उनमें रवि किशन, शिल्पा शेट्टी और आशुतोष राणा प्रमुख हैं।
पंडित नरेन्द्र शर्मा ने बताया कि यह अंतराष्ट्रीय सम्मेलन देश की प्रतिभाओं को भी एक अवसर प्रदान करने तथा स्वास्थ्य के प्रति समाज में जागरूकता लाने के उदेश्श्य से आयोजित किया जा रहा है।
श्री गगन सिंह ठाकुर ने बताया कि आम के समय में सोशल मीडिया तथा विभिन्न तकनीकों के बढ़ते उपयोग के कारण खास तौर पर युवा पीढ़ी विभिन्न मानसिक समस्याओं एवं तनाव से ग्रस्त हो रही है। योग तथा भारतीय जीवन प्रणाली की मदद से इन तनावों से छुटकारा पाया जा सकता है। इस विशय पर विचार - विमर्श एवं शोध को आगे बढ़ाने में यह अंतराष्ट्रीय सम्मेलन महत्वपूर्ण साबित होगा।


कौन—कौन बनेंगे 'फरिश्ते दिल्ली के'

दुर्घटना के शिकार लोगों को शीघ्र पहुंचाएं अस्पताल : अर​विन्द केजरीवाल
नई दिल्ली। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के लोगों से दुर्घटना के शिकार लोगों की मदद करने और उन्हें अस्पताल पहुंचाने का अनुरोध किया। केजरीवाल दुर्घटना के शिकार हुए लोगा. को अस्पताल ले जाने के लिए मदद करने वालों को पुरस्कृत करने के वास्ते सरकार की एक पहल 'फरिश्ते दिल्ली' के औपचारिक शुभारंभ के दौरान संबोधित कर रहे थे। इस दौरान कई फरिश्ते को मुख्यमंत्री ने सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया। इस दौरान उन तीन लोगों ने अपनी कहानी भी बताई, जिनकी दुर्घटना के तत्काल बाद अस्पताल पहुंचाने से जान बची। फरिश्ता बने कुछ लोगों ने भी अपना अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा कि मैं चाहता हूं कि दिल्ली का हर नागरिक फरिश्ता बने। आपको दुर्घटना के शिकार लोगों, झुलसने वालों और तेजाबी हमले के शिकार लोगों की मदद करनी चाहिए और उन्हें अस्पताल लेकर जाना चाहिए।


मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर हादसे के एक घंटे के भीतर पीड़ितों को अस्पताल पहुंचा दिया जाए तो उनकी जान बचायी जा सकती है। केजरीवाल ने कहा कि यह बहुत अनमोल समय होता है और अगर उस दौरान पीड़ित को अस्पताल पहुंचा दिया जाया तो उसके बचने की बहुत उम्मीद होती है। उन्होंने कहा कि हमने खबरों में पढ़ा था कि निर्भया एक घंटे तक सड़क में एटीएम गेंग सक्रिय पर पड़ी रही और किसी ने उसकी मदद नहीं की। अगर समय पर लोगों को भर्ती करा दिया जाए तो उनकी जान बचायी जा सकती है।


इस मौके पर स्वास्थ्य मंत्री सतेंद्र जैन ने कहा कि हमारे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का पसंदीदा गाना ही है इंसान का इंसान से हो भाईचारा। इस तरह का गाना पसंद करने वाला व्यक्ति ही घायलों के इलाज की मुफ्त स्कीम ला सकता है। मुझे अफसोस है कि अब भी 80 फीसद लोगों को इस स्कीम की जानकारी नहीं है। जबकि दिल्ली के हर व्यक्ति को इसके बारे में पता होना चाहिए। हमारे लिए हर जान कीमती है। दिल्ली के फरिश्ते की कहानी सभी को बताया जाना चाहिए। जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग घायलों की मदद को सामने आए। सुप्रीम कोर्ट ने जब घायलों के इलाज से इन्कार पर रोक लगाई तो सबसे बड़ी समस्या यह खड़ी हुई कि अस्पताल को पैसा कौन दे। अरविंद केजरीवाल सरकार ने यह जिम्मा अपने कंधे पर लिया। घायल को दिल्ली के किसी अस्पताल में ले जाए, सारा खर्च सरकार उठाएगी। अगर घायल को पहले छोटे अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है और उसे बड़े अस्पताल ले जाना है तो एंबुलेंस का खर्च भी सरकार देगी। साथ ही अस्पताल ले जाने वाले को दो हजार रुपये दिया जाएगा। हालांकि अभी तक का अनुभव है कि लोग पैसे लेने से मना कर देते हैं। अस्पताल किसी को भर्ती करने से मना करता है तो उसका लाइसेंस निरस्त कर दिया जाएगा। प्रारंभ में दिक्कत आ रही थी, अस्पताल संचालकों के साथ बैठक की गई। जिसके बाद यह समस्या खत्म हो गई।


महात्मा फुले ब्राह्मणें के नहीं, ब्रह्यणवाद के विरूद्ध थे

सामान्यतः सामाजिक शैक्षणिक क्रान्ति के जनक महात्मा जोतीराव फुले की जीवनी उनके कार्यों की बात आती है, तो यह अवधारणा बनी हुई है, कि फुले तो ब्रह्यणों के विरूद्ध थे, जबकि फुले की समझ स्पष्ट थी, उनके किसी भी ग्रन्थ में, उनके बारे में लिखे गये किसी भी साहित्य में ब्रह्यणों के विरूद्ध हो, वास्तविकता यह कि फुले ब्रह्यणवाद, पोंगा पंडितवाद, अवैज्ञानिक, तर्क, साहित्य, स्वरूप, तथाकथित दैववाद, अशिक्षा, अंधविश्वास, अश्प्रश्यता, असमानता, भेदभाव, कुरीतियाँ, कर्मकाण्ड मूर्तिपूजा, ढोंग, बेईमानी, भृष्टाचार, महिलाओं की दासता, नारी का अपमानजनक जीवन, आदि आदि बुराईयों के विरूद्ध उन्होने कमर कसली थी, और लिखने बोलने के किसी भी माध्यम से उन्होंने मानवता, विज्ञानवाद, सबको निशुल्क
और रोजगार पूरक शिक्षा, स्वास्थ्य, सहकार, न्याय, ईमानदारी, सदाचार, परोपकार, जैसे मानव जीवन को सहज, सरल, रूप
से जीने के लिए सम्पूर्ण जीवन न्योछावर कर दिया था ।
उनके साहित्य का अध्यन करने से ज्ञात होता है कि महात्मा फुले की मिशन में सभी जाति, धर्म वर्ण के लोगों का योगदान है। बचपन में उनका साथ मुस्लिम गफ्फार बेग, फातिमा शेख, क्रिश्च्यिन, लिजिट साहेब सनातनी ब्राह्यमण सदाशिव बल्लाल गोवंडे, मोरोपंत विट्ठल वालवेकर, सखाराम यशवंत पराजये, वासुदेव, बलवंत पड़के,  कमान्य तिलक, न्यायमूर्ति माधव, गोविन्द रानडे, बालशास्त्री जांभेकर, गोपालहरि देशमुख, आदि के साथ जीवन की अनेक घटनाऐं एक दुसरे के सहयोगी रहे।
फुले कट्टरता पूर्वक मानवतावाद की मिशन पूरा करने में जुटे रहे, उन्होंने कभी समझोता करके हार नहीं मानी, किन्तु उनके अनेक परिचितों ने समय के साथ समझोता करके घुटने टेक दिये थे। एक उदाहरण है किः- दिनांक 4 अक्टूबर 1890 को पुणे की ''पंचंचकोटेट मिशन'' नामक ईसाई संस्था के सामरोह में पुणे के संभा्रत बा्रह्यण उपस्थित थे, उस समारोह में उस्थित बा्रह्यणों ने ईसाईयों की बनाई हुई, चाय पी, इसलिए कट्टरपंथियों ने उनको बहिष्कृत किया । उनके लोकमान्य तिलक और माधव गोविन्द रानडे और तिलक ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तिलक जी ने चाय पीने के बाद काशी जाकर प्रायश्चित किये जाने का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया। अन्य आठ लोगों ने दोष निवारर्णाथ प्रायश्ति के लिये आवेदन किया।
लोकमान्य तिलक चिरोल मुकदमों के मामले में इंग्लेण्ड गये थे, लोटने पर उन्होने सागरपार गमन का सन् 1919 में प्रायश्चित किया ।
राजा राममोहन राय आर्य समाज सुधारक माने जाते है, उन्होने नियम ही बनाया था, कि बा्रह्यमों समाज के धर्म प्रचारक ब्राहम्ण ही होने चाहिए ।
इन उदाहरणों से पता चलेगा कि उस समय के लगभग सभी समाज सुधारक नेताओं ने बहिष्कार के आगे गर्दने झुकाई थी। किन्तु केवल जोतीराव ही ऐसे नेता थे जिन्होनें बहिष्कार की रात्तीभर भी चिंता नहीं की । वे झुकने इस प्रथा को समाप्त कर देना चाहते थे।
बा्रह्यणवाद के मानवतावाद से अनेक दोषों का फुले ने बहिष्कार ही नहीं किया वल्कि समतामय समाज रचना के लिये सर्व प्रथम शिक्षा का महत्तव सम्पूर्ण मानवता को समझाया और स्ंवय ने ही अपनी पत्नि सावित्रीबाई फुले को शिक्षित कर प्रथम प्रशिक्षिक शिक्षिका बनाकर विद्यालय प्रारम्भ कर 18 विद्यालय संचालित कियें, फुले का कार्य और व्यवहार में कोई अन्तर नहीं होता था, वे निडर होकर मानवतावाद के लिए संघर्ष शील रहे। उन्होनें घिसी पीटी धार्मिक अवधारणाओं से मुँह मोड़कर मानवता समता भाव जाग्रत करने के लिए सार्वजनिक सत्यधर्म की स्थापना की 24 सितम्बर 1873 को ''सत्यशोधक
समाज'' बनाकर समाज की रीतिरिवाज में आमूलचूल परिवर्तन कर दिये जो सहज सरल सबको समझने व मानने लायक थे।
हमारे देश में यदि फुले नहीं होते तो पाखण्ड के जीवन से मानव को कब निजात मिलती यह गर्त में छिपा ही रहता । फुले ने सभी धर्मों के ग्रन्थों का अध्यन कर मानवता धर्म की अवधारणा से सामाजिक क्रान्ति की है । आज शिक्षा और नारी शिक्षा के खुले द्वार का हम भारतवासी लाभ उठा रहे है। इसका सम्पूर्ण श्रेय फुले दम्पत्ति को ही जाता है । खासकर शूद्रों तथा नारी को शिक्षा-समानता- मानवता के जो अधिकार हमारे संविधान में बाबा साहेब ने हमें दिये है।, ये भी उनके गुरू महात्मा फुले के जीवन उनके कार्य उनके रचित ग्रन्थों को पढ़-समझ कर ही संविधान के रूप् में मानव समाज को मिले है। 
महात्मा जोतीराव फुलों पर जितना भी शोध किया जाय वह सब प्रेरणा दायक है, प्रत्येक मानव अपने जीवन में फुले के आदर्श उतारकर आचरण करने लायक बन जाय तो दरिद्रता भू , अशिक्षा अंधविश्वास से छूटकारा मिल सकता है। इसलिए भारत के प्रायः सभी लोग चाहते है, कि फुले दम्पत्ति को भरत रत्न दिया जाय। प्रसन्नता है कि महाराष्ट्र चुनाव के संकल्प पत्र में भाजपा ने फुले दम्पत्ति को भारत रत्न दिये जाने का संकल्प लिया है। इसी प्रकार अनेक प्रदेशों के मुख्य
मंत्री, मंत्री विधायक केन्द्र के सांसद मंत्री, समाज सेवी संस्थाऐं निरन्तर भारत सरकार से मांग करती है कि फुले दम्पत्ति को
भारत रत्न दिया जाय।
फुले का सम्पूर्ण जीवन बा्रह्यणवाद के विरूद्ध भरा पड़ा हैं वे बा्रह्यणों के भी साथि थे । फुले के जीवन से प्रेरणा लेकर मानवता से जीने का लाभ मिलता है। हम फुले दम्पत्ति के त्रृणी है। 28 नवम्बर 1890 को फुले का परिनिर्वाण हुआ। 
लेखक : मनारायण चैहान,  महात्मा फुले सामाजिक शिक्षण संस्थान, गाजीपुर,  दिल्ली


Wednesday, 23 October 2019

अभिनेत्री काजल अग्रवाल बनीं खेलप्ले रमी का चेहरा

 



23 अक्तूबर, 2019 : अभिनेत्री काजल अग्रवाल को रमी खेलना बहुत पसंद है और शायद यही कारण है कि वह खेलप्ले रमी से जुड़ी है। खेलप्ले रमी का चेहरा बनने पर स्वयं काजल ने बताया, ''एक आम भारतीय की तरह मैं भी मनोरंजन के लिए रमी खेलती हूं। मुझे खेलप्ले रमी का आधिकारिक तौर पर हिस्सा बनने की बेहद खुशी है क्योंकि यह भारत में आॅनलाइन रमी की प्रमुख कम्पनियों में एक है।''



काजल ने बताया, ''केपीआर की पहल से भारत आनलाइन गेमिंग का हिस्सा बनेगा जो आज ज़रूरी है। लोग डिजिटल दुनिया में रमी का आनंद ले पाएंगे। भारत में रमी का बढ़ता जुनून देख कर मैं दंग हूं। केपीआर की इस पहल से आज की पीढ़ी डिजिटल माध्यम से इस गेम में दिलचस्पी लेगी।''




इस करार पर श्री चैतन्य सालुंके, मार्केटिंग प्रमुख- खेल ग्रुप ने कहा, ''काजल का हमारे ब्राण्ड का चेहरा बनना बहुत खुशी की बात है क्योंकि इससे हमारे ब्राण्ड और इस खेल के बारे में अधिक से अधिक लोग जानेंगे। इसके अतिरिक्त इस करार से लोग रमी से जुड़ेंगे और यह जानेंगे कि यह कौशल का खेल है जिसमें मस्ती और रोमांच भी है। हम भारत में रमी के पायनियर हैं और खेलप्ले रमी के रोमांचक प्लैटाॅर्म पर अधिक से अधिक यूजरों का स्वागत् करते हैं।''


भारत की आनलाइन इंडस्ट्री का 2023 तक 11,900 करोड़ रूपए का हो जाने का अनुमान है। केपीएमजी रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में 22 प्रतिशत सीएजीआर की दर से यह तेजी से बढ़ रही है। इसमें और तेजी लाने के मकसद से खेलप्ले रमी ने 30 लाख यूजरों का डाटाबेस तैयार किया है। 



खेलप्ले रमी प्लैटफाॅर्म देने के पीछे मकसद ऐसे ग्राहकों के हिसाब से और खास उनके लिए सुविधा देना है जिन्हें डाटा और स्मार्टफोन/ कम्प्युटर की सुविधा है। रमी के दीवानों को अक्सर गेमिंग वेबसाइट की तलाश होती है जहां उन्हें एक जगह रमी के वैरियंट के साथ आर्थिक लेन-देन की संपूर्ण सुरक्षा और प्रोफाइल की सही जानकारी और निःशुल्क और नकद कार्ड गेम खेलने की सुविधा मिले।