Saturday, 30 November 2019

स्ट्रोक : रोके जा सकते हैं स्ट्रोक के 90 प्रतिशत मामले

भारत में हर साल स्ट्रोक के 15 से 20 लाख नये मामले दर्ज किये जा रहे हैं और स्ट्रोक भारत में नयी महामारी के रूप में उभर रहा है। हर साल देश के विभिन्न इलाकों में स्ट्रोक के मामले बढ़ रहे हैं। हालांकि इसकी वास्तविक संख्या अधिक होने की संभावना है क्योंकि स्ट्रोक से पीड़ित कई रोगी कभी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं तक नहीं पहुंच पाते हैं। भारत में हर दिन लगभग 3000-4000 स्ट्रोक होते हैं और 2-3 प्रतिशत से अधिक स्ट्रोक का इलाज नहीं किया जाता है। दुनिया भर में हर साल एक लाख की आबादी में स्ट्रोक के 60-100 मामले होते हैं जबकि भारत में हर साल एक लाख की आबादी में स्ट्रोक के करीब 145 मामले होते हैं। भारत में स्ट्रोक के बढ़ते मामलों का कारण यहां लोगों में बीमारी के बारे में जागरूकता और रोकथाम के तरीकों के बारे में जानकारी की कमी है।
डॉ. विवेक गुप्ता ने कहा कि स्ट्रोक दो प्रकार के होते हैं: इस्केमिक और हेमोरेजिक। इस्केमिक स्ट्रोक में क्लाॅट के कारण मस्तिष्क के एक हिस्से में रक्त की आपूर्ति बंद हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क को क्षति पहुंचती है। यह दिल के दौरे के समान है जिसमें हृदय के एक हिस्से में रक्त की आपूर्ति अवरुद्ध हो जाती है और इसीलिए इसे ब्रेन अटैक कहा जाता है। दूसरे प्रकार का स्ट्रोक हेमोरेजिक होता है जिसमें मस्तिष्क में रक्तस्राव होता है।



भारत में हर साल स्ट्रोक के 15 लाख से 20 लाख नये मामले सामने आते हैं
स्ट्रोक भारत में अकाल मृत्यु और विकलांगता का एक महत्वपूर्ण कारण बनता जा रहा है 
दुनिया भर में हर साल स्ट्रोक से 2 करोड़ लोग पीड़ित होते हैं, जिनमें से 50 लाख लोगों की मौत हो जाती है और अन्य 50 लाख लोग अपाहिज हो जाते हैं
स्ट्रोक के 90 प्रतिषत मामलों का संबंध 10 ऐसे खतरों से होता है जिनसे बचना संभव है 



इस्केमिक स्ट्रोक के इलाज के तहत दवा का इंट्रावेनस इंजेक्शन द्वारा किया जाता है जिससे थक्के घुल सकते हैं। हालांकि यह एक उत्कृष्ट उपचार है, लेकिन यह केवल तभी प्रभावी होता है जब थक्का छोटा हो और स्ट्रोक होने के साढ़े चार घंटे के भीतर दिया जाए। पहले, स्ट्रोक होने के 4-5 घंटे के बाद पहुंचने वाले रोगियों के इलाज के कोई निश्चित विकल्प नहीं थे और उन्हें सहायक देखभाल से परंपरागत रूप से प्रबंधित किया जाता था।
“मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी” नामक एक नई तकनीक के कारण, इन रोगियों का इलाज स्ट्रोक होने के 6 घंटे तक और चुनिंदा मामलों में 24 घंटे तक किया जा सकता है। इस तकनीक में मस्तिश्क को खोले बिना क्लॉट को या सोख लिया जाता है या स्टेंट की मदद से मस्तिष्क से बाहर निकाल लिया जाता है। हाल ही में अमेरिकन स्ट्रोक एसोसिएशन ने भी अपने दिशानिर्देशों में  संशोधन किया है और स्ट्रोक के रोगियों के लिए मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी उपचार की सिफारिश की है। इस प्रकार, उन अस्पतालों के बारे में जानकारी होना बहुत महत्वपूर्ण है जहां ये उपचार उपलब्ध हो सकते हैं। लेकिन स्ट्रोक होने पर केवल अस्पतालों तक पहुंचना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्ट्रोक के इलाज की सुविधाओं से युक्त वैसे हाॅस्पिटल तक पहुंचने की आवश्यकता है जहां पहुंचते ही मरीज का तत्काल इलाज षुरू हो जाए। 
दूसरे प्रकार के स्ट्रोक में रक्तचाप बढ़ने के कारण या सेरेब्रल एन्युरिज्म के कारण रक्तस्राव हो सकता है, जिसमें मस्तिष्क की धमनी कमजोर होकर गुब्बारे की तरह उभर आती है और अंततः फट जाती है। ऐसे रोगियों में से एक तिहाई रोगियों की अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत हो जाती है, और जो रोगी समय पर पहुंचते हैं उनमें से आधे गंभीर विकलांगता से बचे रहते हैं।
वर्षों से एन्यूरिज्म स्ट्रोक का एकमात्र उपचार मस्तिष्क की ओपन सर्जरी थी। लेकिन अब नयी तकनीकों के इजाद होने से हम मस्तिष्क को खोले बिना ही मिनिमली इंवैसिव तरीके से एन्यूरिज्म का इलाज करते हैं। पूरा इलाज पैर में एक छोटे से 3 मिमी छेद के जरिये किया जाता है जिसमें बिल्कुल नहीं या बहुत कम रक्त की हानि होती है। सामान्य शब्दों में यह पद्धति एन्यूरिज्म की “काॅइलिंग“ के रूप में जानी जाती है क्योंकि इसमें एन्यूरिज्म के इलाज के लिए प्लैटिनम कॉइल / तारों का उपयोग किया जाता है।
डाॅ. अजय बिष्ट ने कहा, ''भारत जैसे विकासशील देशों को संचारी और गैर संचारी रोगों के दोहरे बोझ का सामना करना पड़ रहा है। स्ट्रोक भारत में मौत और विकलांगता के प्रमुख कारणों में से एक है। किसी व्यक्ति के चेहरे, हाथ, आवाज और समय (एफएएसटी) में परिवर्तन होने पर उस पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है क्योंकि उस व्यक्ति को जल्द ही किसी भी समय स्ट्रोक हो सकता है। चेहरे का असामान्य होना जैसे, मुंह का लटकना, एक हाथ का नीचे लटकना और अस्पश्ट आवाज स्ट्रोक के कुछ सामान्य लक्षण हैं। स्ट्रोक के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात समय का सदुपयोग है। एक स्ट्रोक के बाद, हर दूसरे स्ट्रोक में 32,000 मस्तिष्क कोशिकाओं की मृत्यु हो जाती है। इसलिए स्ट्रोक होने पर रोगियों को निकटतम स्ट्रोक उपचार केंद्र में जल्द से जल्द ले जाया जाना चाहिए और समय पर उपचार होने पर इसे होने से रोकने में मदद मिल सकती है। कई बार, हीमैटोमा बन जाने के बाद, जो मस्तिष्क में दबाव को बढ़ा देता है या स्ट्रोक के काफी बड़ा होने पर हमें मरीज की जान बचाने के लिए मस्तिश्क के दबाव को हटाने के लिए या मस्तिश्क के मृत भाग को निकालने के लिए न्यूरो सर्जरी करनी पड़ती है। स्ट्रोक के इलाज के लिए अस्पताल में स्ट्रोक की व्यापक देखभाल की सुविधा, आपातकालीन चिकित्सकों, न्यूरोलॉजिस्ट, इंटरवेंशनल न्यूरो-रेडियोलॉजिस्ट, न्यूरोसर्जनों, एनेस्थेटिस्ट और क्रिटिकल केयर चिकित्सकों की बहु-विषयक टीम होनी चाहिए। इसके अलावा समर्पित और प्रशिक्षित नर्सिंग देखभाल और फिजियोथेरेपी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, अस्पताल में स्ट्रोक के इलाज के लिए स्ट्रोक का निदान करने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली इनडोर सीटी / एमआरआई मशीनें होनी चाहिए और विंडो पीरियड के भीतर ही उचित इलाज करने में सक्षम होना चाहिए। 
वर्तमान में, भारत के कई शहरों में, स्ट्रोक रोगियों में से सिर्फ तीन प्रतिषत रोगियों को ही थक्के को हटाने के लिए थ्रोम्बो एम्बोलाइटिक दवाइयां मिल पा रही हंै क्योंकि उन्हें समय पर अस्पताल लाया जाता है। बाकी रोगियों को देर से सुपर स्पेषलिटी हाॅस्पिटल लाने और इसके कारण थक्के को घोलने वाली दवा नहीं मिल पाने के कारण वे लकवा से ग्रस्त हो जाते हैं। इसलिए हमें इन रोगों, इनके सही इलाज और इनके रोकथाम के उपायों के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए एक सचेत प्रयास करने की जरूरत है जिससे लोगों को इन समस्याओं से निपटने में मदद मिलेगी। 


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सेल्फी आत्मविश्वास घटाती है और रूप-रंग को लेकर एंग्जाइटी को बढ़ाती है और लोगों को काॅस्मेटिक सर्जरी कराने के लिए प्रेरित करती है

नई दिल्ली : सेल्फी लेना और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करना आज के समय में फैशन बन चुका है लेकिन एक ताजा अध्ययन के निष्कर्ष आपको सेल्फी के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर देंगे। अगर आप अपनी सेल्फी लेने जा रहे हैं तो इससे पहले दो बार सोचें! आज सेल्फी शब्द काफी बदनाम हो चुका है क्योंकि अपने फोन के कैमरे से सेल्फी लेने के दौरान कई दुर्घटनाएं हो चुकी है और सेल्फी लेने के चक्कर में कई लोग अपनी जान गवां चुके हैं। 
एक ताजा अध्ययन से निष्कर्ष निकला है कि सेल्फी लेने की प्रवृति का बहुत ही विनाशकारी मनोवैज्ञानिक प्रभाव होता है जिसके कारण सेल्फी लेने वाले अधिक चिंतित महसूस करते हैं, उनका आत्मविश्वास कम हो जाता है और वे शारीरिक आकर्षक में कमी महसूस करते हैं। सेल्फी लेने वाले कई लोगों में अपने रूप-रंग को लेकर हीन भावना इस कदर बढ़ जाती है कि वे अपने रूप-रंग और चेहरे में बदलाव के लिए काॅस्मेटिक सर्जरी कराने के लिए पे्ररित होते हैं। यह निष्कर्ष एस्थेटिक क्लिनिक्स की ओर से किए गए एक अध्ययन का है जिसके तहत उन 300 लोगों पर अध्ययन किया गया जो  कॉस्मेटिक सर्जरी कराने के लिए कोलकाता, दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद स्थित एस्थेटिक क्लिनिक गए। 



- यह अध्ययन देश के चार शहरों में 300 लोगों पर किया गया और अध्ययन से यह पाया गया कि सेल्फी लेने, उनमें परिवर्तन करने तथा उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की प्रक्रिया आत्मविश्वास और शारीरिक छवि को लेकर धारणा पर नाकारात्मक प्रभाव डालती है और साथ ही अपने शरीर की बनावट एवं रूप-रंग को लेकर हीन भावना को बढ़ाती है। 
- इन निष्कर्षों का मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की रोकथाम और उनके लिए उपचार के लिए नैदानिक निहितार्थ हैं और ये निष्कर्ष सोशल मीडिया के उपयोग और सेहत को लेकर चिंता पैदा करते हैं।


- दिल्ली में, 68 प्रतिषत पुरुषों और 82 प्रतिशत महिलाओं में सोशल मीडिया पर अपनी सेल्फी पोस्ट करने के बाद उनकी एंग्जाइटी के स्तर में वृद्धि देखी गई जबकि 71 प्रतिशत पुरुषों और 80 प्रतिशत महिलाओं में आत्मविश्वास में कमी दर्ज की गई। इसके अलावा शारीरिक आकर्षण को लेकर लोगों की भावना में भी गिरावट दर्ज की गई। 



इस अध्ययन में पाया गया कि किसी फिल्टर का उपयोग किए बिना सेल्फी पोस्ट करने वाले लोगों में चिंता में उल्लेखनीय वृद्धि और आत्मविश्वास में कमी देखी जाती है। जो लोग सेल्फी में सुधार किए बिना या सुधार करके भी सेल्फी पोस्ट करते हैं उनमें शारीरिक आकर्शण को लेकर उनकी भावना में उल्लेखनीय कमी देखी गयी। आम तौर पर सेल्फी लेने और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के परिणाम स्वरूप मूड में गिरावट होती है और खुद की छवि को लेकर व्यक्ति की भावना में कमी आती है। जो लोग सोशल मीडिया पर अपनी सेल्फी को पोस्ट करने से पहले दोबारा सेल्फी लेते हैं या उन्हें सुधार करते हैं वे भी मूड में कमी एवं एंग्जाइटी महसूस करते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि सेल्फी पोस्ट करने वाले अधिकांश लोग अपने लुक को बदलने के लिए कॉस्मेटिक सर्जरी और प्रक्रियाओं से गुजरना चाहते हैं। 
औसतन 16-25 वर्ष के बीच के पुरुष और महिलाएं प्रति सप्ताह 5 घंटे तक सेल्फी लेते हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर अपनी व्यक्तिगत प्रोफाइल पर अपलोड करते हैं। इस अध्ययन के निष्कर्षों को मानसिक स्वास्थ्य समस्यों की रोकथाम और उनके उपचार के लिए उपयोग किया जा सकता है। ये निष्कर्ष सोशल मीडिया और सेहत को लेकर महत्वपूर्ण चिंता पैदा करते हैं। 
प्रसिद्ध फेसियल काॅस्मेटिक सर्जन तथा एस्थेटिक क्लिनिक्स के निदेशक डॉ. देबराज शोम ने कहा, ''चार शहरों में किए गए अपनी तरह के इस पहले अध्ययन में पाया गया कि सेल्फी लेने, उन्हें बदलने और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की प्रक्रिया आत्मसम्मान और अपने शरीर को लेकर व्यक्ति की धारणा को नाकारात्मक रूप से प्रभावित करती है और अपने शरीर को लेकर हीन भावना को बढ़ाती है। सेल्फी लेने और उन्हें पोस्ट करने का नाकारात्मक प्रभाव शारीरिक आकर्शण को लेकर मूड एवं भावनाओं पर पड़ता है। अध्ययन में पाया गया कि मरीजों ने सेल्फी लेने और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के बाद अधिक चिंतित, आत्मविश्वास में कमी और शारीरिक रूप से आकर्षक में कमी महसूस किया। यही नहीं, जब मरीजों ने अपनी सेल्फी बार- बार ली तथा अपनी सेल्फी में बदलाव की तो सेल्फी के हानिकारक प्रभाव को महसूस किया। हमने पाया कि सेल्फी लेने तथा उन्हें सोषल मीडिया पर पोस्ट करने की प्रक्रिया अपने रूप- रंग को लेकर हीन भावना को बढ़ाती है तथा काॅस्मेटिक सर्जरी एवं काॅस्मेटिक प्रक्रियाओं के जरिए अपने लुक में बदलाव लाने की तीव्र इच्छा को बढ़ाती है।''
कॉस्मेटिक डर्मेटोलॉजिस्ट और द एस्थेटिक क्लीनिक्स की सह-संस्थापक डॉ. रिंकी कपूर ने कहा, ''सोशल मीडिया इंटरैक्शन अब बिल्कुल सामान्य हो गए हैं। फोन को बेचने में कैमरे की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी है। यह बात अब हर किसी को पता है कि सेल्फी लेने से व्यक्ति के जीवन और अंगों के लिए खतरा बढ़ जाता है। सैकड़ों लोगों की मौत सेल्फी लेते समय गिरने से हुई या वे घायल हो चुके हैं। इस अध्ययन में पहली बार देखा गया है कि सेल्फी का किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व पर भी प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। इसका दुष्प्रभाव उन लोगों पर अधिक पड़ता है जिनमें आत्म विष्वास की कमी होती है और जो अपनी शर्म और सामाजिक एंग्जाइटी को कम करने के लिए सार्वजनिक रूप से लोगों से जुड़ने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं। हम सेल्फी लेने के एक भी अच्छे पहलू का पता नहीं लगा सकतेे हैं, और हम सरकार से दृढ़ता से अनुरोध करते हैं कि सरकार मोबाइल फोन में फ्रंट-फेसिंग कैमरों पर प्रतिबंध लगाने पर गंभीरता से विचार करे। लोगों को सेल्फी लेने से हतोत्साहित करने के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करने की आवश्यकता है।''
डॉ. देबराज शोम ने कहा, ''सोशल मीडिया पर सेल्फी पोस्ट करने से युवा महिलाओं और पुरुषों की आत्म-छवि और मनोदशा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उनके खान-पान के तौर- तरीकों में भी बदलाव आ सकता है, उनके मूड में उतार- चढ़ाव और एंग्जाइटी डिसआर्डर से पीड़ित होने की संभावना बढ़ जाती है। बार-बार सेल्फी लेने को बॉडी चेकिंग बिहेवियर माना जा सकता है, जैसे बार-बार अपना वजन लेना और दर्पण में अपने षरीर को बार- बार चेक करना। इसे मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से एक जोखिम भरा ऑनलाइन स्वास्थ्य-संबंधी व्यवहार माना जाना चाहिए, क्योंकि इससे वजन और अपने षरीर के आकार को लेकर असंतोष बढ़ता है।''
इस अध्ययन में लोगों पर सेल्फी के नकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव सबसे अधिक दिल्ली के लोगों में पाए गए, उसके बाद मुंबई, हैदराबाद और कोलकाता के पुरुषों और महिलाओं दोनों में देखे गए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी सेल्फी पोस्ट करने के बाद लोगों के व्यवहार को देखने वाले पूरे देश में किये गये इस अध्ययन में, 60 प्रतिशत पुरुषों और 65 प्रतिषत महिलाओं में एंग्जाइटी में वृद्धि देखी गयी। इस अध्ययन में शामिल सभी लोगों  से, 61 प्रतिषत पुरुषों और 70 प्रतिशत महिलाओं ने अपनी सेल्फी पोस्ट करने के बाद आत्मविश्वास में कमी पायी। यही नहीं, इस अध्ययन में शामिल 61 प्रतिशत पुरुषों और 67 प्रतिषत महिलाओं में शारीरिक आकर्षण को लेकर भी अपनी भावनाओं में उल्लेखनीय कमी आई, जिसके कारण 62 प्रतिषत पुरुषों और 65 प्रतिषत महिलाओं में कॉस्मेटिक सर्जरी से खुद के षरीर में बदलाव कराने की इच्छा पैदा हुई। 
दिल्ली में, 68 प्रतिषत पुरुषों और 82 प्रतिशत महिलाओं ने सोशल मीडिया पर अपनी सेल्फी पोस्ट करने के बाद अपनी एंग्जाइटी के स्तर में वृद्धि देखी, और 71 प्रतिषत पुरुषों और 80 प्रतिषत महिलाओं ने आत्मविश्वास में कमी पायी। शारीरिक आकर्षण को लेकर उनकी भावनाओं ने भी गिरावट दर्ज की गई और 76 प्रतिशत पुरुष और 77 प्रतिषत महिलाएं अपने लुक से असंतुष्ट थीं। इससे कारण दिल्ली में 64 प्रतिषत पुरुषों और 77 प्रतिशत महिलाओं में कॉस्मेटिक सर्जरी से अपने लुक मंे बदलाव लाने की इच्छा पैदा हुई।
डा. देबराज शोम ने कहा, ''शरीर को लेकर बहुत अधिक असंतोष खानपान संबंधी विकारों के होने का प्रमुख कारण है और इसका संबंध हीन भावना तथा डिप्रेशन से है। सोशल मीडिया पर बहुत अधिक सक्रिय रहने से किसी व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक स्थितियों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को कम करने या खत्म करने के लिए चिकित्सकीय हस्तक्षेप की जरूरत इस अध्ययन से रेखांकित होती है।'' 


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घुटने के दर्द से पीड़ित रोगियों के लिए घुटना प्रत्यारोपण की आधुनिक प्रक्रियाएं वरदान साबित हो रही हैं

मेरठ: आजकल लोगों की जीवन शैली अस्वस्थ होती जा रही है और साथ ही उनकी दिनचर्या भी षारीरिक रूप से निश्क्रिय होती जा रही है जिसके कारण मोटे लोगों को 40 साल के बाद ही जोड़ों से संबंधित समस्याएं होने लगी है। 
डाॅ. अखिलेष यादव ने कहा, ''उम्र बढ़ने के साथ- साथ घुटने की समस्याओं में वृद्धि होना आम है, लेकिन इसका समय पर पता लगाना और कंप्यूटर की सहायता से मिनिमली इनवेसिव तकनीक के साथ टोटल नी रिप्लेसमेंट के क्षेत्र में हुई प्रगति अब बेहतर रिकवरी और जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए एक बेहतर मार्ग प्रदान कर रही है। सर्जरी अब अत्यधिक विशिष्ट और उन्नत वातावरण में की जाती है, जिसके कारण रोगी को अस्पताल से डिस्चार्ज करने का समय कम हो गया है और दर्द भी नहीं होता है। इससे रोगी को अस्पताल में कम समय तक रहना पड़ता है, तेजी से रिकवरी होती है और रोगी को अधिक संतुश्टि मिलती है।'' 
ऐसी जटिलताएं अक्सर रोगी के द्वारा लापरवाही के कारण उत्पन्न होती हैं। षुरू में, जोड़ों का दर्द अधिक तकलीफदेह नहीं होते हैं, लेकिन समय के साथ स्थिति बिगड़ती जाती है और दर्द बढ़ता जाता है। इसके बाद ही मरीज इलाज कराना चाहते हैं।
उन्होंने कहा, ''श्री गजराज जब यूपी पुलिस में डीएसपी के पद पर तैनात थे और अपनी सेवाएं दे रहे थे तो उनके दोनों घुटनों में चोट लगी थी। इससे धीरे-धीरे उनके दैनिक काम भी प्रभावित होने लगे। उनके घुटने धीरे-धीरे कमजोर होते गए और उन्हें खड़े रहने या कम समय तक चलने में भी काफी दर्द हो रहा था। कुछ समय तक तो वह दर्द को नजरअंदाज करते रहे लेकिन जब हालत गंभीर हो गई तो वह इलाज के लिए आए। लेकिन दवा से उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था, इसलिए ऑर्थोपेडिक्स टीम ने उन्हें टोटल नी रिप्लेसमेंट कराने की सलाह दी। सर्जरी के बाद, वह सामान्य रूप से चलने में सक्षम है और दर्द रहित सामान्य जीवन जी रहे हैं। इसलिए शुरुआती जांच के महत्व को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इष्टतम परिणामों के लिए उचित उपचार को निर्धारित करने मंे मदद करता है।'' 
यह सर्जरी मिनिमली इंवैसिव तकनीक से की जाती है जिससे रोगी की तेजी से रिकवरी होती है और वह जल्द ही अपनी पूर्ण दैनिक गतिविधियां करने लगता है। मरीज अपने नए ज्वाइंट्स को सामान्य घुटने की तरह ही महसूस करता है और घुटने में सामान्य घुटने की तरह ही स्थिरता पाता है। इस सर्जरी के बाद रोगी को 20 वर्षों तक किसी अन्य या बार-बार नी रिप्लेसमेंट सर्जरी कराने की आवश्यकता नहीं होती है।


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मुंह का कैंसर भारत में पुरुषों की असामयिक मौत का एक प्रमुख कारण है

ग्वालियर। महानगरों के अलावा अन्य षहरों में भी कैंसर के बढ़ रहे प्रकोप देखते हुए ग्वालियर में एक जन जागरूकता अभियान चलाया गया। इस अभियान का उद्देश्य बीमारी की समय पर पहचान करने, उन्नत उपचार के तौर-तरीकों, और जीवन शैली में सुधार करने के बारे में लोगों को जानकारी प्रदान करना था।
चिकित्सकों के अनुसार, भारत में पुरुषों और महिलाओं में समय से पहले मृत्यु का एक प्रमुख कारण कैंसर है। ग्लोबाकैन 2018 के भारत के आंकड़ों के अनुसार, कैंसर के 11.57 लाख नए मामले दर्ज किए गए, जिनमें से 11.42 प्रतिषत मौत के लिए मुंह के कैंसर को जिम्मेदार ठहराया गया। होंठ, ओरल कैविटी और इसोफैगल कैंसर सहित विषेशकर पुरुशों में सिर और गर्दन के कैंसर दूसरे स्थान पर हैं। इस तरह के कैंसर कुल मिलाकर लगभग 25 प्रतिषत मृत्यु दर के लिए जिम्मेदार हैं, और पिछले साल भारत में दर्ज किए गए नए कैंसर रोगियों की संख्या में 18 प्रतिषत की वृद्धि हुई है।
सिर एवं गर्दन के कैंसर की सर्जरी के सीनियर कंसल्टेंट डाॅ. शुभम गर्ग ने कहा, ''सिर और गर्दन से संबंधित जटिलताओं की शिकायत करने वाले रोगियों की संख्या में वृद्धि हुई है जिसमें मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, ओरल कैविटी, थायरॉयड, इसोफेगस, फैरिंक्स और लार ग्रंथियां शामिल हैं। जागरूकता की कमी के कारण लोग आमतौर पर शुरुआती लक्षणों की उपेक्षा करते हैं और अक्सर बीमारी के एक उन्नत चरण में अस्पताल पहुंचते हैं। कैंसर के इलाज और जीवन षैली में थोड़ा सा बदलाव करके और स्व-परीक्षण से इसे रोकने के तरीकों को समझना और जागरूकता कायम करना महत्वपूर्ण है। अब कैंसर के इलाज की बेहतर और उन्नत तकनीकें तो उपलब्ध हैं, लेकिन जल्द पहचान के बारे में जागरूकता कायम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि आम तौर पर इसके लक्षणों की उपेक्षा की जाती है और देर से निदान किया जाता है। 
ग्लोबाकैन डेटा 2018 के अनुसार, पिछले साल दर्ज किए गए कुल 11.57 लाख नए कैंसर रोगियों में से 2.75 लाख रोगी सिर और गर्दन के कैंसर से पीड़ित हुए, जो कैंसर के कुल मामलों का लगभग 24 प्रतिशत है। इसी तरह, इस तरह के कैंसर से होने वाली मृत्यु दर 1.80 लाख (22 प्रतिषत) दर्ज की गई, जिसमें से पुरुषों में ओरल कैविटी का कैंसर सबसे ऊपर था। 2017 की तुलना में, अधिक व्यापक मामलों की संख्या में भी 20 प्रतिषत की वृद्धि हुई है और 5 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। 
डाॅ. गर्ग ने कहा, ''भारत में, हर साल 5,00,000 से अधिक रोगी इलाज के लिए आते हैं और भारत में नए रोगियों का वार्षिक पंजीकरण दर 3,00,000 है, लेकिन कैंसर रोग विषेशज्ञ की संख्या बहुत सीमित है। लोगों को जागरूक होना चाहिए और समझना चाहिए कि उपलब्ध नवीनतम और उन्नत उपचार विकल्पों की बदौलत, अब इस बीमारी से मुक्त होना और जटिल मामलों में भी जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना संभव है। लीनियर एक्सेलरेटर जैसी मिनिमली इनवेसिव तकनीक और साइबरनाइफ जैसी कंप्यूटर एडेड एडवांस तकनीक ने कैंसर के इलाज में काफी क्रांति ला दी है।''
भविष्य की जटिलताओं को रोकने के लिए लोगों को प्रारंभिक लक्षणों के बारे में पता होना चाहिए। मुंह के घाव जैसे सामान्य लक्षण जो ठीक नहीं हो रहे हों, निगलने में कठिनाई और दर्द, और मुंह के अंदर लगातार रहने वाले सफेद या लाल धब्बे को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इस तरह के लक्षणों को नजरअंदाज करने से गांठ का विकास हो सकता है और यह कैंसर पैदा करने वाले घातक ट्यूमर में परिवर्तित हो सकता है।
अधिकांश रोगियों को कैंसर के इलाज के लिए उपलब्ध उन्नत उपचार विकल्पों के बारे में  लोगों को सभी प्रकार के कैंसर से निपटने के लिए जोखिम कारकों और प्रारंभिक पहचान के महत्व के बारे में बताना आवश्यकता है।
उन्होंने कहा, ''उन्नत तकनीकों के तहत स्वस्थ ऊतकों और अंगों को नुकसान पहुंचाए बिना बड़ी सटीकता और निपुणता के साथ ट्यूमर की जगह पर अधिक ऊर्जा वाली किरणों को पहुंचाया जाता है। हम गुणवत्ता पूर्ण देखभाल और उन्नत उपचार विकल्प प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं; लेकिन प्रारंभिक पहचान के बारे में लोगों को जानकारी उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके लक्षणों की अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है या लक्षणों की देर से पहचान की जाती है।''


 


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आधुनिकतम वैस्कुलर तकनीकें बचा सकती हैं कई रोगियों का जीवन

मुरादाबाद : खानपान की गलत आदतें, निश्क्रिय जीवन शैली और दुर्घटना के कारण धमनी से संबंधित बीमारियां तेजी से बढ़ रही है। लेकिन, वैस्कुलर सर्जरी के क्षेत्र में हो रही प्रगति से धमनी संबंधी जटिलताओं, नसों से संबंधित रोगों और हेमोडायलिसिस कराने वाले रोगियों को अब लाभ हो सकता है। आम लोगों को वैस्कुलर क्षेत्र में हो रही प्रगति का महत्व बताने और उन्हें जागरूक करने के लिए, मैक्स हाॅस्पिटल वैशाली ने मुरादाबाद में बड़े पैमाने पर  जन जागरूकता अभियान चलाया।
मैक्स हाॅस्पिटल वैशाली के वैस्कुलर सर्जरी के वरिश्ठ कंसल्टेंट और प्रभारी डाॅ. कपिल गुप्ता ने कहा, “हेमोडायलिसिस कराने वाले क्रोनिक रीनल फेल्योर वाले कई रोगियों में आर्टेरियोवेनस फिस्टुला (एवी फिस्टुला) बनाने की आवश्यकता होती है, जो उनके रक्त को छानने में अहम भूमिका निभाता है। रीनल फेल्योर से पीड़ित 48 वर्षीय श्री फैयाज अहमद के साथ भी ऐसा ही हुआ था, जिन्हें मैक्स हाॅस्पिटल वैशाली में तत्काल हेमोडायलिसिस की आवश्यकता थी। उनकी हालत इतनी गंभीर थी कि उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया था। पूरी जांच करने पर पता चला कि एवी फिस्टुला बनाने के लिए मरीज की नसें बहुत खराब थीं। मामला जटिल होने के बावजूद, टीम ने एक एवी फिस्टुला बनाने का फैसला किया, जो उनके स्वास्थ्य और कार्यक्षमता के लिए आवश्यक था।'' 
मैक्स हाॅस्पिटल वैशाली में सर्जनों की ऐसी टीम है जिसे निदान, उपचार, धमनी का पुनर्निमाण, सर्जरी और एंडोवैस्कुलर तकनीकों सहित सभी प्रकार के वैस्कुलर रोगों से पीड़ित रोगियों का हर प्रकार से इलाज करने का अत्यधिक अनुभव है। उनके उन्नत तकनीकों का ज्ञान और कौशल के साथ, रोगियों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार व्यापक देखभाल प्रदान की जाती है।
समय पर रोग की पहचान और इलाज करने से धमनी से संबंधित रोगों के बेहतर प्रबंधन में मदद मिलती है और वैस्कुलर प्रक्रियाओं में हो रही प्रगति समय के साथ और बेहतर हो रही है।
हाल ही में मुरादाबाद के 23 साल के एक युवा को गंभीर सड़क दुर्घटना का सामना करना पड़ा जिसके कारण  उसका बायां घुटना पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया और काफी अधिक रक्तस्राव हुआ। मुरादाबाद में इस तरह की जटिल प्रक्रिया के लिए उन्नत चिकित्सा सुविधा नहीं होने के कारण उसे आगे के इलाज के लिए मैक्स हाॅस्पिटल लाया गया। जांच के दौरान पाया गया कि उसकी धमनी फट गई थी, जिसके कारण काफी अधिक रक्तस्राव हुआ था और पैर काटने की नौबत आ गई थी। शल्य चिकित्सा टीम ने एक्सटर्नल नी फिक्सेषन के साथ आर्टेरियल बाईपास किया और बाद में आर्थोस्कोपी से घुटने के लिगामेंट का पुनर्निमाण किया। तेजी से उपचार और इस तरह की जटिल सर्जरी से न केवल उसका पैर बच गया, बल्कि रोगी अब अपने दम पर चलने में सक्षम है।
शहरी क्षेत्रों में खानपान की गलत आदतें और निश्क्रिय जीवन शैली का चलन काफी बढ़ रहा है जिसके कारण धमनी से संबंधित रोगों वाले रोगियों की संख्या बढ़ रही है। पेरिफेरल आर्टेरियल रोगों (पीएडी), डीप वेन थ्रोम्बोसिस (डीवीटी) और आर्टेरियोस्क्लेरोसिस पैदा करने वाले अन्य रोगों का समय पर निदान और इलाज से रोगी बेहतर गुणवत्ता पूर्ण जीवन जी सकता है।


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पौलीट्राॅमेटिक चोटों के इलाज के बारे में जागरूकता के लिए जन अभियान चलाया

मल्टीपल इंज्युरिज के षिकार लोग तीन सप्ताह के गहन उपचार के बाद सामान्य जीवन जीने लगते हैं।
एक साथ कई चोटों के षिकार तथा गंभीर रूप से जख्मी व्यक्ति के इलाज के क्षेत्र में हुई प्रगति की बदौलत अब न केवल दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल लोगों के जीवन को बचाया जा सकता है बल्कि वे उपचार के बाद बेहतर जीवन जी सकते हैं। ऐसी पाॅली ट्राॅमा केयर के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए अटलांटा हास्पीटल जन जागरूकता अभियान चलाया। 
इस अवसर पर अटलांटा अस्पताल, गाजियाबाद के आईसीयू एवं क्रिटिकल केयर के प्रमुख डा. हेमंत गर्ग एवं अस्पताल के फैसिलिटी निदेशक डा. अमित सिंह उपस्थित थे। इस अभियान के तहत सड़क दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल लोगों के उपचार तथा उन्हें प्रदान की गई उपचार सेवाओं के कारण उनके सकुषल होने के विभिन्न मामलों पर चर्चा की गई। 
अटलांटा हास्पीटल, गाजियाबाद के आईसीयू एवं क्रिटिकल केयर के प्रमुख डा. हेमंत गर्ग ने इस मौके पर कहा, ''हाल ही में, मेरठ के निवासी मेरठ राजमार्ग पर एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें षरीर में कई अंगों में चोट लगी। उनके बाएं पंजे में फ्रैक्चर था, दाहिने ह्यूमरस और प्यूबिक बोन में चोट लगी थी। बांया सुपीरियर क्रैम्प उनके मूत्राशय को क्षतिग्रस्त कर रहा था। शुरुआत में उन्हें मेरठ के एक स्थानीय अस्पताल में ले जाया गया और बाद में उन्हें अटलांटा अस्पताल लाया गया। आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. अमित त्यागी के नेतृत्व में चिकित्सकों की टीम ने घायल का इलाज षुरू किया और इस बीच सर्जिकल ओटी को तुरंत तैयार किया गया। जांच रिपोर्टो। के आधार पर चिकित्सकीय टीम ने कई तरह की षल्य क्रियाएं करने का फैसला किया जिनमें लेफ्ट आईसीडी इन सीटू, ट्रेकियोस्टोमी और रेडियल नर्व की एक्सप्लोरेषन सहित ओआरआईएफ जैसी सर्जरी षामिल थी। मरीज को तीन सप्ताह से अधिक समय तक आईसीयू में रखा गया। मरीज ने तेजी से स्वास्थ्य लाभ किया। 
डॉ हेमंत गर्ग के मार्गदर्शन में, रोगी को गहन देखभाल प्रदान की गई। अनुभवी नर्सों और सहायक कर्मचारियों ने भी पूरी देखभाल की और इस तरह से गंभीर रूप से घायल मरीज को जल्दी ठीक होने में मदद मिली। 
अटलांटा हास्पीटल में आईसीयू अपने प्रकार का एक विषिश्ट आईसीयू है और यहां मरीजों के लिए अत्याधुनिक सुविधाएं हैं। यह सुसज्जित और आधुनिक परिष्कृत तकनीक से भरपूर है और मरीज की देखभाल एवं चिकित्सा अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ द्वारा की जाती है। 
अटलांटा हास्पीटल, गाजियाबाद के फैसिलिटी निदेषक डा. अमित सिंह ने कहा, ''आमतौर पर आईसीयू में उपचार बहुत महंगा होता है और खास तौर पर पाॅलीट्रॅामेटिक मामलों में। रोजाना का खर्च ही इतना अधिक होता है कि आम तौर पर इतना अधिक खर्च मरीज उठा नहीं पाते हैं और कई मरीज गंभीर अवस्था में ही आईसीयू से बाहर निकलना चाहते हैं। ऐसे में मरीज को आईसीयू में कम समय तक रहना पड़े, इसके लिए अस्पताल ने आपातकालीन विभाग में ही क्रिटिकल केयर इकाइयां लगाई है और इसके कारण कम खर्च में ही आपात स्थिति में भर्ती होने वाले विभिन्न मरीजों के चिकित्सा प्रबंधन में क्रांतिकारी सुधार लाया है।'' 
अस्पताल चैबीसों घंटे मरीजों को अत्याधुनिक माॅनिटरिंग उपकरणों और प्रषिक्षित नर्सों की मदद से मल्टीडिस्पलिनरी केयर प्रदान करता है। आईसीयू में नर्सिंग कर्मचारियों की अधिक विषिश्ट भूमिका होती है। साथ ही साथ नर्सों एवं मरीजों का अनुपात भी अधिक रखा गया है। 


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खराब हवा बढ़ा रही है सांस की बीमारियां

नई दिल्ली: दिल्ली की आवोहवा दिनोंदिन खराब होती जा रही है। हवा की गुणवत्ता के सूचकांक (एक्यूआई) में गिरावट हो रही है। हवा की गुणवत्ता में गिरावट के कारण सांस की बीमारियों से संबंधित ओपीडी में आने वाले नए रोगियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। वायु प्रदूषण और धूल के कणों के स्तर में वृद्धि के कारण अधिक संख्या में लोग घरघराहट, सांस की तकलीफ और सीने में जकड़न से पीड़ित हो रहे हैं।
'देश में वायु प्रदूषण के बढ़ने के कारण सभी लोगों का स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। विशेषकर बच्चों के लिए यह स्थिति अधिक चिंताजनक है क्योंकि इसका सामना करने के लिए उनके महत्वपूर्ण अंग पर्याप्त रूप से परिपक्व नहीं होते हैं। यह बच्चों में उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को भी नष्ट कर देता है और संक्रमण, छींक आने और सांस में घरघराहट जैसी समस्याएं पैदा करता है। सांस से संबंधित समस्याओं का पता लगाने के लिए पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (पीएफटी) किया जाता है जिससे यह पता चलता है कि फेफड़ों में कितनी हवा रह सकती है, कोई व्यक्ति अपने फेफड़ों से कितनी जल्दी हवा को अंदर और बाहर ले जा सकता है, और फेफड़े कितनी अच्छी तरह से ऑक्सीजन लेते हैं और शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकालते हैं। इस जांच से फेफड़ों की बीमारियों का भी पता लगाया जा सकता है और इसकी गंभीरता को मापा जा सकता है। पीएफटी की रिपोर्ट खराब आने का मतलब है कि फेफड़े की कार्यक्षमता और पल्मोरनी रोग होने की अधिक संभावनाएं हैं। 
प्रदूषण के सबसे घातक रूप के रूप में वायु प्रदूषण उभरा है और यह दुनिया भर में समय से पहले होने वाली मौतों का चैथा प्रमुख जोखिम कारक है। दुनिया भर में समय से पहले होने वाली कुल मौतों में से एक - चैथाई से अधिक मौत भारत में होती है।
विष्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यु एच ओे) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में सबसे आगे है। शीर्ष 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 शहर भारत के हैं। दिल्ली का प्रदूषण सालाना 43 लाख मौतों में योगदान देता है जो निमोनिया, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर, हृदय रोग और क्रोनिक आॅब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के कारण होती हैं।
पीएम 2.5 का बढ़ना अधिक उम्र के लोगों के लिए समस्या पैदा करता है। इसके कारण 5 साल से कम उम्र के बच्चों में सांस लेने में तकलीफ होने लगती है क्योंकि इसके कारण उनका इम्यून सिस्टम खराब हो जाता है। जबकि बुजुर्गों को सीने में जकड़न, साइनुसाइटिस, अस्थमा और सांस लेने में कठिनाई की शिकायत होती है। चूंकि पीएम 2.5 अत्यंत बारीक होता हैै, इसलिए यह बच्चों के विकसित हो रहे फेफड़ों में बैठ सकता है और अस्थमा और अन्य श्वसन समस्याओं को और बदतर कर सकता है।'
पर्यावरण में कोयला से होने वाला प्रदूषण भारत में हमेशा महत्वपूर्ण होगा क्योंकि यह ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख स्रोत है। इसके सूक्ष्म कण इतने हल्के होते हैं कि वे हवा में तैरते रहते हैं और फेफड़ों में गहराई में बैठ जाते हैं। फेफड़ों के कैंसर, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस और हृदय रोग से भी इसका संबंध है। 
इसलिए, लोगों को स्मोक जैसी ष्वसन संबंधित परेशानियां पैदा करने वाली चीजों से बचने की सलाह दी जाती है। उन्हें अधिक ट्रैफिक वाले समय के दौरान सैर नहीं करने और पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थों के साथ अच्छे पौष्टिक आहार (हरी पत्तेदार सब्जियां और मौसमी फल) लेने की सलाह दी जाती है। स्वास्थ्य से संबंधित किसी प्रकार की समस्या होने पर खुद दवा लेने से बचें और डॉक्टरों की सलाह पर नियमित रूप से इनहेलर का उपयोग करें। इसके अलावा घरों के अंदर वायु गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए एयर प्यूरिफायर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि बाहर जाना जरूरी हो, तो बाहर जाते समय एन95 मास्क का उपयोग करें।
वायु की खराब गुणवत्ता को देखते हुए लोगों की जागरूकता बढ़ाने और समस्या को प्रभावी ढंग से हल करने के तरीके खोजने की तत्काल आवश्यकता है।


डा. विवेक सिंह मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी, साकेत के पल्मोनोलॉजी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर और लंग ट्रांसप्लांट मेडिसिन के प्रमुख हैं। 


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लीवर हीमैंजियोमा का अब समय पर कराएं कारगर इलाज

नई दिल्ली: लीवर हीमैंजियोमा कैंसर रहित गांठ होता है। शुरुआती अवस्था में इसके कोई लक्षण प्रकट नहीं होते हैं लेकिन कुछ समय बाद यह कई तरह की समस्याएं पैदा कर सकता है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति की बदौलत, लीवर हीमैंजियोमा का न सिर्फ सर्जरी से इलाज किया जा सकता है, बल्कि इलाज के बाद रोगी गुणवत्ता पूर्ण जीवन भी जी सकता है।
मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हाॅस्पिटल, शालीमार बाग, नई दिल्ली के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं हेपाटोलॉजी के निदेशक डॉ. राजेश उपाध्याय ने कहा, ''आम तौर पर लीवर हीमैंजियोमा लीवर में रक्त वाहिकाओं में कैंसर रहित (बिनाइन) गांठ होता है जिसमें अक्सर दर्द नहीं होता है और इससे कोई नुकसान नहीं होता है। लेकिन अगर इसका इलाज नहीं कराया जाये, तो इन गांठों का आकार बढ़ने लगता है और दर्द और परेशानी होने लगती है और साथ ही अन्य लक्षण भी प्रकट होने लगते हैं। भले ही ये गांठ कैंसर रहित होते हंै, लेकिन उनमें से कुछ त्वचा पर और कुछ लीवर के अंदर होते हैं जिनकी संख्या कई हो सकती है।''
लीवर हीमैंजियोमा के लक्षण कुछ समय के बाद प्रकट हो सकते हैं, क्योंकि आम तौर पर लोगों में छोटे आकार का और एक लीवर हीमैंजियोमा होता है। ज्यादातर मामलों में, बड़ा हीमैंजियोमा फट सकता है, लीवर की कार्य क्षमता को प्रभावित कर सकता है और पेट में रक्तस्राव शुरू कर सकता है, या व्यापक रूप से रक्त के थक्के बना सकता है और यह हार्ट फेल्योर भी पैदा कर सकता है। हालांकि, कुछ लोगों के लीवर में कई हीमैंजियोमा हो सकते हैं। यदि हीमैंजियोमा का आकार व्यास में 4 सेमी से बड़ा है, तो तत्काल सर्जरी की सलाह दी जाती है।
उन्होंने कहा, ''यदि ट्यूमर का आकार छोटा है और इसके कारण कोई असुविधा नहीं हो रही है, तो इसका इलाज कराना जरूरी नहीं है। लेकिन अगर आपको दर्द या अन्य लक्षण षुरू हो गए हों तो हालत में सुधार करने के लिए इलाज की आवश्यकता हो सकती है। ज्यादातर मामलों में, ट्यूमर को हटाने के लिए सर्जरी की आवश्यकता होती है। यदि हीपैटिक हीमैंजियोमा का सर्जरी से आसानी से इलाज हो सकता है तो डाॅक्टर लीवर के ऊतकों को कम नुकसान पहुंचाने के प्रयास में सिर्फ ट्यूमर को हटाने का निर्णय ले सकते हंै। अन्य मामलों में, डॉक्टर को आपके लीवर के एक हिस्से को हटाने की आवश्यकता हो सकती है - जिसे ट्यूमर के साथ रिजेक्शन कहा जाता है।''
लीवर हीमैंजियोमा का निदान आम तौर पर 30 से 50 वर्ष की आयु के लोगों में किया जाता है। इसके अलावा, लीवर में होने वाले ये रक्त के थक्के पुरुषों की तुलना में महिलाओं में पांच गुना अधिक होने की संभावना होती है। इन गांठों के विकसित होने का अभी तक कोई कारण पता नहीं चल पाया है, लेकिन कई षोधों से यह पता चला है कि यह एक आनुवंशिक गड़बड़ी हो सकती है, या यह जन्मजात हो सकती है। लीवर के इन ट्यूमर की वृद्धि का संबंध शरीर में एस्ट्रोजन के स्तर में वृद्धि के साथ हो सकता है, खासकर गर्भावस्था के दौरान।
डॉ. उपाध्याय ने कहा, ''इसके अलावा, चिकित्सक हेपेटिक आर्टरी लिगेषन नामक सर्जिकल प्रक्रिया के माध्यम से या आर्टेरियल एम्बोलिज़ेशन नामक इंजेक्शन के माध्यम से ट्यूमर में रक्त की आपूर्ति को रोकने की कोशिश कर सकते हैं। दुर्लभ मामलों में, जब हीपैटिक हीमैंजियोमा का आकार और दायरा अधिक होता है, तो इसेे ऊपर उल्लिखित अन्य प्रक्रियाओं द्वारा नहीं निकाला जा सकता है, तो ऐसे मामलों में लीवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता हो सकती है। इसके अलावा, ट्यूमर के आकार को छोटा करने के लिए रेडियेषन थेरेपी का विकल्प अपनाया जा सकता है।''


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ऑक्सीटोसिन उत्पादन में सरकार के हस्तक्षेप अनुचित है: आईएमए

नई दिल्ली: डेयरी क्षेत्र में दूध के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए उपयोग में लाई जाने वाली ऑक्सीटोसिन के दुरुपयोग को रोकने के लिए, भारत सरकार ने आक्सीटोसिन के उत्पादन की जिम्मेदारी विषेश तौर पर केएपीएल (कर्नाटक एंटीबायोटिक्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड) को सौंपी है। 
इस दवाई का उपयोग प्रसव के दौरान बच्चे को जन्म देने वाली माताओं को होने वाले रक्त स्राव को रोकने के लिए किया जाता है। जीवन रक्षक दवाई के रूप में आॅक्सीटोसिन के महत्व को देखते हुए, आईएमए सरकार से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग करता है क्योंकि यदि सरकार अपना निर्णय वापस लेती है तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकेगी। 
आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सांतनु सेन कहते हैं, ''आईएमए को पशु चिकित्सा संबंधी उद्देश्यों के लिए ऑक्सीटोसिन के निर्माण की जिम्मेदारी केएपीएल को दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इस जीवन रक्षक दवा के निर्माण पर रोक लगाने से इस दवाई की उपलब्धता में कमी आएगी और अनावश्यक अड़चन पैदा होगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस दवाई को आवश्यक दवाओं की सूची में सूचीबद्ध किया है और इस नाते, सिर्फ एक कंपनी को इस दवाई के निर्माण की अनुमति देने से बच्चे के जन्म के बाद रक्तस्राव होने के कारण कई माताओं के जीवन को खतरा हो सकता है तथा रुग्णता और मृत्यु दर में वृद्धि हो सकती है।”
जीवन रक्षक दवा होने के नाते, गर्भवती महिलाओं को भी प्रसव के दौरान और बाद में रक्तस्राव को नियंत्रित करने के लिए ऑक्सीटोसिन दिया जाता है। अब तक, अधिकांश पशु चिकित्सा उपयोग के लिए इस दवा को अवैध रूप से पड़ोसी देशों से आयात किया जाता रहा है और आईएमए का मानना है कि इसके निर्माण को रोकना तर्कसंगत समाधान नहीं है।
आईएमए के मानद महासचिव डॉ. आर. वी. अशोकन ने कहा, “दिलचस्प बात यह है कि कंपनी केएपीएल के पास इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभालने का न तो अनुभव है और न ही क्षमता है। कंपनी के रिकॉर्ड के अनुसार, किसी भी थोक उत्पादन में 4 साल का समय लगेगा, तो सवाल यह उठता है कि क्या सार्वजनिक क्षेत्र की कोई एक कंपनी पूरे देष की आॅक्सीटोसिन की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम है। आईएमए का कहना है कि अगर ऑक्सीटोसिन की कमी होती है और इस कमी के दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम सामने आते हैं तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार होगी।'' 
दुनिया भर में गर्भावस्था और प्रसव के कारण होने वाली मौतों में से 20 प्रतिषत मौतें केवल भारत में होती है। भारत में हर साल 56 हजार ऐसी मौतें होती है। नवीनतम आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि पोस्ट पार्टम हेमरेज (पीपीएच) भारत में मातृ मृत्यु दर के लगभग 22 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार है और इसलिए डॉक्टरों और प्रसूति रोग विशेषज्ञों को इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त करना स्वाभाविक है।


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बच्चों में नेत्र कैंसर के लिए सेंटर फॉर साइट ने जागरूकता अभियान चलाया

बच्चों में नेत्र कैंसर और नेत्र कैंसर प्रबंधन (ऑक्यूलर ऑन्कोलॉजी) के क्षेत्र में हालिया प्रगति के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करने और प्रसार करने के लिए समर्पित उद्देश्य और सतत प्रयास के तहत सेंटर फॉर साइट ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स ने राश्ट्रीय राजधानी में वॉकथॉन का आयोजन किया। 
विश्व कैंसर दिवस के अवसर पर, सेंटर फॉर साइट एंड वूमेनाइट ने मानव विकास और परिवार सशक्तीकरण विभाग (एचडीएफई) के सहयोग से 'बच्चों में नेत्र कैंसर' पर एक जन जागरूकता अभियान चलाया। इसकी योजना बहुत पहले से चल रही थी। सबसे पहले रेटिनोब्लास्टोमा के बारे में लोगों को जागरूक करने की परियोजना नवंबर 2017 में एक छात्र संकाय पहल के रूप में शुरू हुई थी, जिसके तहत छात्रों ने स्वास्थ्य केंद्रों में टीकाकरण कार्यक्रम से खुद को जोड़ा। उन्होंने स्मार्ट फोन से इसकी स्क्रीनिंग के बारे में जागरूकता पैदा की।
इस अभियान में छात्र, संकाय, कैंसर विषेशज्ञ, नेत्र रोग विशेषज्ञ और रेटिनोब्लास्टोमा से निजात पा चुके एक व्यक्ति षामिल थे। इस परियोजना की परिकल्पना निर्मला मुरलीधर (परियोजना समन्वयक) के द्वारा डॉ. संतोष जी होनवर और डॉ. विकास मेनन के मार्गदर्शन में की गई थी। 
डॉ. पदमश्री अवार्डी और सेंटर फॉर साइट ग्रुप आॅफ हाॅस्पिटल्स के अध्यक्ष और चिकित्सा निदेशक डॉ. महिपाल सचदेव ने कहा, “रेटिनोब्लास्टोमा के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए आगे बढ़ने जैसी जागरूकता पहल इस बात की पुश्टि करती है कि अब लोगों को हर साल व्यापक नेत्र परीक्षण कराकर अपने बच्चे के नेत्र स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिष्चित कराने की आवश्यकता है। यहां तक कि तकनीकी प्रगति से इसके उपचार के परिणामों में लगातार सुधार हो रहा है - लेकिन चुनौती केवल इन उपचारों को सभी के लिए सुलभ बनाना है। इस अवसर पर हम पूरे समाज को सचेत करना चाहते हैं कि समय पर निदान हो जाने पर ट्यूमर का इलाज होने की पूरी संभावना होती है। ऑक्यूलर ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। इसका समय पर पता लगाने से न केवल ट्यूमर का इलाज किया जा सकता है, बल्कि आंखों में दृष्टि को भी सुरक्षित रखा जा सकता है।”
रेटिनोब्लास्टोमा दुनिया भर में बच्चों में सबसे आम प्रकार का आंखों का कैंसर है। भारत में हर साल रेटिनोब्लास्टोमा के 1500 से अधिक मामले सामने आते हैं। इससे आमतौर पर 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चे प्रभावित होते हैं। इसके सामान्य लक्षणों में व्हाइट आई रिफ्लेक्स (पुतली का सफेद होना/ ल्यूकोकोरिया), आंख का असामान्य विचलन (भैंगापन), नजर कमजोर होना, आंख का लाल होना और दर्द होना और उभरी हुई आंखें षामिल हैं। लगभग 40 प्रतिषत मामलों में यह ट्यूमर माता-पिता से बच्चे में पारित (हेरिटेज) हो सकता है, इसलिए रेटिनोब्लास्टोमा में आनुवंशिक जांच भी महत्वपूर्ण है। रेटिनोब्लास्टोमा का प्रबंधन षुरूआत से ही लंबा सफर तय कर चुका है। इसका फोकस अब जीवन को बचाने से लेकर आंख बचाने पर है और अब इसका फोकस दृष्टि को बचाने पर ही केंद्रित हो गया है।
नेत्र कैंसर का समय पर निदान महत्वपूर्ण है। सेंटर फॉर साइट ग्रुप नेत्र देखभाल प्रदाता होने के नाते ऑक्यूलर ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में अग्रणी रहा है और उसने रेटिनोबलास्टोमा से पीड़ित कई बच्चों का सफलतापूर्वक इलाज किया है। केंद्र अच्छी तरह से विश्व स्तर की सुविधाओं से सुसज्जित हैं और ऑक्यूलर ऑन्कोलॉजी सेवाएं पश्चिमी दुनिया में हुई प्रगति के तर्ज पर ही प्रदान की जाती हैं। इससे कई लोगों की जान बचाने, आंखों के नुकसान को रोकने और रेटिनोब्लास्टोमा बच्चों में अच्छी दृष्टि प्रदान करने में मदद मिली है।
डॉ. महिपाल ने कहा, “लोगों को इसके प्रारंभिक लक्षणों को आसानी से पहचानने और पता लगाने के लिए, स्थिति से अवगत होने की आवश्यकता है। यदि किसी व्यक्ति की आंख के कॉर्निया में सफेद रिफ्लेक्स दिखता है, तो उसे तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। माता-पिता से अनुरोध है कि वे अपने बच्चे की दृष्टि पर बारीकी से नजर रखें और उनकी आंखों की नियमित जांच कराएं।”
रेटिनोब्लास्टोमा कैंसर जानलेवा है और इस संबंध में जागरूकता सर्वोपरि है। इस छोटे से प्रयास से हम वही हासिल करना चाहते हैं।


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शरीर की प्राकृतिक शुद्धता के लिए विषाक्तता से मुक्त खाद्य पदार्थों और सब्जियों का सेवन करें

जब हम 'डिटाॅक्सिफिकेशन' शब्द सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में बहुत सारे विचार आ सकते हैं। मानव शरीर अपनी विभिन्न प्रणालियों के जरिए विषाक्त और अवांछित पदार्थों को दूर करने के लिए लगातार काम करता है। हमारे दैनिक आधुनिक जीवन में, विभिन्न प्रकार के जंक फूड, शराब, और कैफीन, ड्रग्स, तनाव, अवसाद और पर्यावरण में पाये जाने वाले विषाक्त पदार्थ हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारा आहार या जीवन शैली कितनी स्वस्थ है, हमें शरीर को रिचार्ज करने और विशाक्त पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने के लिए बाहरी कारकों को भी मौका देने की आवश्यकता है जिससेे हम अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाये रख सकते हैं और लंबे समय तक उर्जावान बने रह सकते हैं। जब हमारे महत्वपूर्ण अंगों पर बहुत अधिक दबाव पड़ता है और वे ठीक से और कुशलता से काम करने के लिए असमर्थ हो जाते हैं तो बीमारी और रोग प्रकट हो सकते हैं।
डिटाॅक्स हमारे शरीर को विराम देने और कुषलता से काम करने के लिए हमारे स्वयं की सफाई और स्वयं-चिकित्सा प्रक्रियाओं को एक अवसर प्रदान करता है। हमारा शरीर बुद्धिमान हैं और सफाई का समय रीसेट बटन पर क्लिक करने और आपको स्वस्थ, खुशहाल और अधिक ऊर्जावान करने के लिए एक पथ पर आगे बढ़ना शुरू करने का सबसे अच्छा तरीका है!
आपके शरीर को स्वाभाविक रूप से होने वाले लाभः -
ऽ पुरानी बीमारियों की रोकथाम
ऽ मजबूत प्रतिरक्षा
ऽ ऊर्जा का बढ़ना
ऽ दीप्तिमान, चमकती त्वचा
ऽ चमकदार, स्पष्ट आँखें
ऽ मानसिक स्पष्टता
ऽ बेहतर आत्मविश्वास और सशक्तिकरण
शरीर को डिटाॅक्स करने वाले प्रमुख खाद्य पदार्थ और सब्जियां: -
1. नींबू पानी (लेमोनेड) - लेमोनेड क्लींज के लिए आप पानी, नींबू का रस, मेपल सिरप और केयेन काली मिर्च का एक पेय बना कर तीन से दस दिनों तक विशेष रूप से सेवन करें। लेमोनेड क्लींज आपको अपनी प्रणाली से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है और प्रभावी रूप से वजन घटाने में भी सहायता करता है।
2. सेब - सेब में विटामिन, फाइबर और खनिज तो भरपूर मात्रा में होते ही हैं, फाइटोकेमिकल और पेक्टिन भी पर्याप्त मात्रा में होते हैं। ये सभी मिलकर डिटाॅक्स में मदद करते हैं। सेब सबसे फायदेमंद तब होता है जब इसे कच्चा खाया जाता है और छिलके के साथ इसका सेवन करने पर यह विटामिन सी और फाइबर का अच्छा स्रोत है। 3. बेरीज - सभी बेरीज; स्ट्रॉबेरी, रास्पबेरी, ब्लैकबेरी, ब्लैककुरेंट और ब्लूबेरी विटामिन सी और फाइबर के बहुत अच्छे स्रोत हैं। बेरीज का सेवन करने पर बटरेट के उत्पादन में मदद मिलती है, जो एक फैटी एसिड होता है जो वजन घटाने में मदद करता है और शरीर को दुबला बनाता है। 4. अनानास - अनानास में ब्रोमलेन प्रचुर मात्रा में होता है जो प्रोटीन को तोड़ने और इसके पाचन में मदद करता है। यह सूजन को कम करने में भी मदद करता है जिससे आगे चलकर आर्थराइटिस से राहत मिलती है और चोटों से शीघ्र स्वस्थ होने में मदद मिलती है।
5. अनार - अनार में पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी और फाइबर होते हैंै। इसे एक दवा के रूप में भी माना जाता है क्योंकि यह हृदय को स्वस्थ रखने और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मदद करता है।
6. चुकंदर - चुकंदर कमाल की चीज है। यह पोषक तत्वों से भरपूर होता है और विटामिन बी 3, बी 6 और सी, के अलावा बीटा-कैरोटीन, मैग्नीशियम, कैल्शियम, जस्ता, और लोहे का बड़ा स्रोत है। यह विषाक्त पदार्थों को तोड़ने में हमारे यकृत और पित्ताशय की सहायता करता है, और इसका फाइबर पाचन और मल त्याग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
7. लहसुन - कच्चा लहसुन पूरी तरह से अद्भुत होता है। इसमें शक्तिशाली एंटीवायरल, एंटीसेप्टिक और एंटीबायोटिक गुण होते हैं। लहसुन डिटॉक्सिफिकेशन एंजाइम का उत्पादन करने के लिए लिवर को उत्तेजित करने में मदद करता है जो पाचन तंत्र से विषाक्त पदार्थों को फ़िल्टर करने में मदद करते हैं।
8. ब्रोकली - ब्रोकली स्प्राउट्स में महत्वपूर्ण फाइटोकेमिकल्स होते हैं जो डिटॉक्स प्रक्रिया में सहायता करते हैं। ये फाइटोकेमिकल्स पाचन तंत्र में डीटाॅक्सीफिकेषन एंजाइमों को उत्तेजित करते हैं और इसमें एंटीऑक्सिडेंट्स भी अत्यधिक होते हैं!


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दिल के दौरे के लक्षणों को कैसे पहचानें और तत्काल क्या करें

बदलती जीवन शैली और खराब सामाजिक-आर्थिक कारकों के कारण इस्केमिक हृदय रोग से पीड़ित रोगियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। एक्यूट कोरोनरी सिंड्रोम (एसीएस) या आम तौर पर हार्ट अटैक के रूप में जाना जाने वाला हृदय रोग, भारत जैसे विकासशील देशों में प्रमुख घातक बीमारियों में से एक है। विशेष रूप से 40 वर्ष से अधिक आयु के 20 प्रतिशतत से अधिक लोगों में कई प्रकार के हृदय रोग हो रहे हैं।
अब 20 से 50 वर्ष की उम्र में ही अधिक लोग दिल की बीमारियों से पीड़ित हो रहे हैं। आधुनिक जीवन के बढ़ते तनाव ने कम उम्र के लोगों में हृदय रोगों के खतरे पैदा कर दिया है। हालांकि किसी व्यक्ति की आनुवांशिक प्रवृत्ति और पारिवारिक इतिहास अब भी सबसे आम और नियंत्रित नहीं किये जा सकने वाले जोखिम कारक बने हुए हैं, लेकिन युवा पीढ़ी में हृदय रोगों का संबंध अत्यधिक तनाव और लंबे समय तक काम करने के साथ- साथ नींद के अनियमित पैटर्न से भी है, जो इंफ्लामेशन पैदा करता है और हृदय रोग के जोखिम को बढ़ाता है। धूम्रपान और निष्क्रिय जीवन शैली 20 से 30 वर्ष की आयु के लोगों में इसके जोखिम को और बढ़ा देती है।'' 
हार्ट अटैक या एसीएस इस्केमिक हृदय रोग की एक तीव्र अभिव्यक्ति है, जिसके कारण कोरोनरी धमनियों के रुकावट के कारण हृदय की मांसपेशियों की रक्त की आपूर्ति में अचानक रुकावट आ जाती है। इससे हृदय की मांसपेशियों को ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति बाधित होती है और रक्त की आपूर्ति तुरंत बहाल नहीं होने पर मांसपेशियों की मृत्यु हो जाती है। हालांकि, अलग- अलग रोगियों में दिल के दौरे के लक्षण अलग-अलग होते हैं और कुछ रोगियों में हिचकी जैसे असामान्य लक्षण हो सकते हैं। दर्द हल्का से लेकर गंभीर भी हो सकता है। कभी-कभी, इसका पहला लक्षण सडन कार्डियक अरेस्ट हो सकता है जिसमें रोगी अचानक गिर सकता है। इसका सबसे पहला चेतावनी संकेत छाती में बार- बार दर्द या दबाव (एंजाइना) हो सकता है जो थकावट से बढ़ जाता है और आराम करने से कम होता है। एंजाइना हृदय में रक्त के प्रवाह में अस्थायी कमी के कारण होता है।
दिल के दौरे के प्रबंधन के लिए समय का काफी महत्व है। इसका मतलब यह है कि प्रत्येक गुजरने वाले सेकंड के साथ, हृदय की मांसपेशी प्रभावित होती जाती है और अंततः मर जाती है। एक बार जब हृदय की मांसपेशी मर जाती है, तो यहां तक कि रक्त की आपूर्ति को बहाल करने के बाद भी इसके कार्य को बहाल करना मुश्किल हो सकता है। 
मृत मांसपेशी दिल के लय में घातक गड़बड़ी का भी कारण बनती है जिसकी परिणति अचानक मौत के रूप में भी हो सकती है। ऐसे संदिग्ध मामलों में, जागरूक होना और तत्काल चिकित्सीय मदद लेना जरूरी है।'


दिल के दौरे में आम तौर पर 15 मिनट से अधिक समय तक सीने में दर्द होता है, लेकिन इसके कोई लक्षण भी नहीं हो सकते हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि दिल के दौरे में सीने में दर्द के अलावा अपच या लगातार गर्दन या जबड़े का दर्द जैसे अन्य लक्षण हो सकते हैं, लेकिन कई लोगों में चेतावनी के संकेत और लक्षण घंटांे, दिनों या हफ्तों पहले शुरू हो जाते हैं।
समय पर पता लगाने और रोगी को जल्द से जल्द नजदीकी अस्पताल की इमरजेंसी में लाने से लक्षणों को रिवाइव करने और दिल के कामकाज को बहाल करने में मदद मिल सकती है।


हृदय रोग विशेषज्ञ अटैक की गंभीरता का पता लगाने के लिए कार्डियेक बायोमार्कर और इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी) जैसी कुछ चिकित्सा प्रक्रियाएं करते हंै। हार्ट अटैक के उपचार के तहत प्राइमरी कोरोनरी एंजियोप्लास्टी नामक प्रक्रिया के द्वारा अवरुद्ध कोरोनरी धमनी को खोला जाता है, जिसमें धमनी को गुब्बारे के माध्यम से खोला जाता है और अवरुद्ध धमनी की क्षमता को बहाल करने के लिए धमनी में एक स्टेंट रखा जाता है। साथ ही रक्त के पतला करने वाली और हृदय संबंधी अन्य दवाएं भी दी जाती है।


हालांकि हार्ट फेल्योर खतरनाक लगती है, लेकिन इसका इलाज बेहतर देखभाल और निदान के साथ किया जा सकता है। हार्ट फेल्योर को रोकने का एकमात्र और सबसे आसान तरीका वैसी जीवन शैली और भोजन की आदतों से बचना है जो मोटापे, मधुमेह, उच्च रक्तचाप को प्रोत्साहित करते हैं।''


डॉ. विवेका कुमार मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत के कैथ लैब के सीनियर डायरेक्टर हैं। 


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स्मार्ट मीटर से बिजली की खपत को मापना होगा आसान

तकनीकी प्रगति चीजों को बदल देती है, या सरल कर देती है। इसकी बदौलत विद्युत के क्षेत्र में भी काफी तरक्की हुई है। अब बिजली उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए विद्युत को मापना और संचारित करना काफी सरल हो गया है। दुनिया भर में इस तरह की प्रगति, जो काफी प्रसिद्धी हासिल कर रही है, वह है ऊर्जा क्षेत्र में स्मार्ट मीटरिंग प्रौद्योगिकियों का उपयोग।
स्मार्ट मीटर मूल रूप से बिजली मीटर होते हैं जो कम अंतराल में ऊर्जा की खपत को मापने और रिकॉर्ड करने दोनों में सक्षम हैं। वे ऊर्जा प्रदाताओं और बिजली के उपभोक्ताओं के बीच दो-तरफा संचार की सुविधा प्रदान करते हैं।
भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और बिजली की बढ़ती मांग के साथ, यहां स्मार्ट मीटरिंग प्रौद्योगिकियों के प्रयोग से कई प्रकार के लाभ हो रहे हैं और विद्युत क्षेत्र की कुछ सबसे अधिक चुनौतियों का समाधान करने में मदद मिल रही है।
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (सीईए) के दिशानिर्देश में स्टैटिक मीटर के उपयोग को अनिवार्य कर दिया गया है, जिससे भारतीय ऊर्जा मीटर बाजार पहले के इलेक्ट्रोमेकैनिकल मीटर से स्टैटिक मीटर में बड़े पैमाने पर तब्दील हो गया है। देश में मीटरिंग की पूर्ण विकसित स्थिति और सरकार की बढ़ती रुचि और समर्थन के साथ, स्मार्ट मीटरिंग प्रौद्योगिकियों को अपनाना सबसे प्रासंगिक अगले चरण के रूप में उभर रहा है। यह प्रौद्योगिकी उपयोगिताओं और उपभोक्ताओं दोनों के लिए उचित तरीके से डेटा का मिलान कर और संवाद कर, स्मार्ट मीटर भारतीय उपयोगिताओं को सक्षम करेगी, बेहतर प्रबंधन करेगी और संभवतः पीक पावर को कम करने में मदद करेगी। यह प्रौद्योगिकी आपूर्तिकर्ताओं को मीटर को मैन्युअल रूप से पढ़े बिना ही सटीक बिल प्रदान करने के लिए सक्षम बनाती है, दूर के ़क्षेत्र में आपूर्ति और वितरण का प्रबंधन करने में मदद करती है और उपभोक्ताओं को उनकी बिजली की खपत पर बिल्कुल सही समय पर डाटा प्रदान करके उनकी खपत को कम करने में मदद करती है, जिसका आकलन जितनी बार आवश्यक हो किया जा सकता है (हालांकि आधे घंटे की अंतराल सामान्य है)। अक्सर इन मीटर की आपूर्ति डिस्प्ले यूनिट के साथ की जाती है ताकि उपभोक्ता सही समय में इसे देख सकें कि वे कितना बिजली का प्रयोग कर रहे हैं।
स्मार्ट मीटरिंग का उपयोग करने के मुख्य लाभों में से एक लाभ वाणिज्यिक घाटे में कमी है। यह विशेष रूप से भारत के लिए प्रासंगिक है, जहां दुनिया में सबसे अधिक समेकित तकनीकी और वाणिज्यिक नुकसान होता है।
चूंकि स्मार्ट मीटर सीधे उपयोगिता से जुड़े होते हैं, जिसके कारण किसी विशेष घर / संपत्ति के लिए बिजली को कनेक्ट करना / डिस्कनेक्ट करना बहुत आसान हो जाता है। इससे तकनीशियन के घर जाकर बिजली की आपूर्ति को कनेक्ट करने / डिस्कनेक्ट करने की जरूरत नहीं पड़ती है।
स्मार्ट मीटर न केवल बिजली के बिल बनाने और इन्हें भेजे जाने वाली सुविधा को बढ़ाते हैं, बल्कि ये सही समय पर उपभोग के डेटा प्रदान करके किसी भी व्यक्ति की बिजली खपत पर बेहतर नियंत्रण प्रदान करते हैं।  स्मार्ट मीटर बिजली पर खर्च के बारे में भी पूरी जानकारी देते हंै जिससे उपभोक्ताओं को बिजली बचाने में काफी मदद मिलती है और इस तरह यह ऊर्जा के सतत घटने वाले गैर-अक्षय स्रोतों के दबाव को कम करते हैं। स्मार्ट ग्रिड से जुड़े सभी स्मार्ट मीटर का नेटवर्क बिजली उत्पादन, संचरण और वितरण के उपायों और तरीकों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा।
वाणिज्यिक प्रक्रिया में सुधार के लिए स्मार्ट मीटरिंग के संभावित लाभों में कोई संदेह नहीं है। इसके संभावित लाभों में षामिल हैं: तेजी से मीटर रीडिंग और राजस्व प्रबंधन, ग्राहक के बिजली की आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलन, ऊर्जा दक्षता के लिए विनियामक आवश्यकताओं की पूर्ति, ऊर्जा के उपयोग के प्रति ग्राहक को जागरूक करना और बिजली के खर्च में बचत आदि।
हालांकि, इसकी कुछ सीमाएं हैं जो स्मार्ट मीटरिंग के बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन को रोक रही हैं। उदाहरण के लिए, यह एक नई पहल है और इस अधिक महंगे मीटरिंग के सभी लाभों का औचित्य सिद्ध करने के लिए कोई पर्याप्त जानकारी या डेटा उपलब्ध नहीं है। दूसरी बात यह है कि यह बहुत महंगा है और समय लेने वाली प्रक्रिया है जिसके लिए अधिक पैसे खर्च करने की आवश्यकता होती है। साथ ही, वर्तमान इलेक्ट्रोमेकैनिकल या पुराने स्टैटिक मीटर के उन्नयन के लिए काफी मात्रा में पैसे खर्च करने होते हैं, इसलिए नियामक के साथ-साथ उपयोगिता के परिप्रेक्ष्य में भी स्मार्ट मीटरिंग के लिए दोबारा पैसे खर्च करना मुश्किल होगा।
हालांकि पायलट स्तर पर उपयोगिताओं में स्मार्ट पैमाना में कुछ प्रगति हुई है, लेकिन, इस परियोजना के बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन की योजना से पहले एक महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास और क्षमता निर्माण समस्या का समाधान करने की आवश्यकता है। इसलिए, इसके तकनीकी और प्रबंधकीय मुद्दों को समझने के लिए त्वरित व्यवहार्यता अध्ययन की आवश्यकता है और स्मार्ट मीटर को लगाने से पहले उन मुद्दों को दूर करने की योजना बनाने की आवश्यकता है।


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खर्राटों के कारण दिन में आती है थकान या झपकी 

44 वर्षीय श्री विकास गुप्ता को रात में जल्दी बिस्तर पर जाने और सही समय पर जागने के बावजूद, अलार्म की आवाज सुनने पर रोने का मन करता था। जब वह जागते थे तो बिल्कुल तरोताजा महसूस नहीं करते थे और दिन का काम करने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं रहते थे। उन्हें दिन के दौरान झपकी आती रहती थी जो कि ठीक नहीं था। इसके कारण का पहला संकेत उनकी पत्नी से मिला जो वर्षों से उनके खर्राटों की शिकायत कर रही थी। उनकी पत्नी ने उन्हें डॉक्टर से परामर्श करने का सुझाव दिया कि वह हर समय थकावट महसूस क्यों करते हैं और पूरी तरह से जांच करने पर पता चला कि स्लीप डिसआर्डर से पीड़ित थे जिसे आबस्ट्रक्टिव स्लीप एप्निया (ओएसए) कहा जाता है।
स्लीप एप्निया एक क्रोनिक स्थिति है। नींद के दौरान मांसपेषियांे के रिलैक्स होने पर मुलायम ऊतक कालैप्स होकर वायुमार्ग को अवरुद्ध कर देते हैं, उसी के कारण यह होता है। इसके कारण, बार-बार सांस रुकती है जिसके कारण अक्सर ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है। रुक-रुक कर सांस लेने के बाद नींद खुलती रहती है जिससे नींद बाधित होती है।''
स्लीप एप्निया से पीड़ित अधिकांश लोगों में इसका पता नहीं चलता। स्लीप एप्निया से 20-30 प्रतिषत लोगों के पीड़ित होने का अनुमान है, लेकिन इनमें से 90 प्रतिषत लोगों को इसका पता नहीं होता है और वे इस कारण वे इसका इलाज नहीं कराते हैं। लेकिन इसका इलाज नहीं कराने पर अक्सर नीेद के दौरान अत्यधिक नींद या थकान महसूस होती है, साथ ही सुबह के समय सिरदर्द होता है और याददाष्त में कमी आने लगती है। स्लीप एप्निया का इलाज नहीं होने पर यह उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक, हृदय रोग, मधुमेह और क्रोनिक एसिड रिफ्ल्स जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को बढ़ाती है।
स्लीप एप्निया का पता लगाने के लिए सबसे बेहतर तरीका स्लीप स्डटी है। इसके तहत मुंह में कुछ निरीक्षण किया जाता है जिससे संभावित स्लीप एप्निया का पता चलता है।
इसके उपचार के विकल्पों में कंटीनुअस पाॅजिटिव एयरवे प्रेषर (सीपीएपी) या बिलीवेल पॉजिटिव एयरवे प्रेशर (बीपीएपी) थेरेपी, ओरल अप्लायन्स थेरेपी और सर्जरी शामिल हैं। स्लीप एप्निया का सबसे आम उपचार सीपीएपी थेरेपी है। इसके तहत वायुमार्ग को खोलने के लिए वायुमार्ग में लचीली ट्यूब के माध्यम से अधिक दबाव के साथ हवा डाली जाती है।


डॉ. गुरमीत सिंह चाबरा रेस्पिरेटरी एंड स्लीप मेडिसिन के वरिष्ठ कंसल्टेंट और विभागाध्यक्ष, क्यूआरजी हास्पीटल 


 


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हार्ट डाटा के बलबूते हार्ट अटैक इलाज का चुनाव

अब डाटा बतााएगा हार्ट अटैक के बाद मरीज के लिए कौन सा इलाज सबसे ज्यादा फायदा होगा। 
दिल का दौरा पड़ने या छाती में दर्द होने के बाद मरीज के जीवित रहने की संभावना को बेहतर बनाने के लिए इंटरवेंषनल कार्डियोलाजी विषेशज्ञ ऐसी नवीनतम तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं जो मरीज के हृदय के भीतर की विस्तृत जानकारियां प्रदान करती है। 
यह जानकारी नई दिल्ली के मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हास्पीटल के इंटरवेंशनल कार्डियोलाॅजी के सहायक निदेशक एवं विभाग प्रमुख डा. नवीन भामरी ने दी। 
डॉ भामरी ने बताया कि हम लोगों से अपील कर रहे हैं कि सांस लेने में दिक्कत, पसीना आने अथवा छाती में दर्द जैसे दिल के दौरे के लक्षण प्रकट होते ही जल्द से जल्द आसपास के चिकित्सक से संपर्क करें। ऐसा करना इसलिए जरूरी है ताकि इंटरवेंशनल कार्डियोलाॅजिस्ट एंजीयोप्लास्टी या स्टेंट जैसी चिकित्सकीय प्रक्रियाओं की मदद से जल्द से जल्द मरीज का इलाज कर सके और मरीज के जीवित रहने की संभावना बढ़ सके।'' 
उन्होंने कहा, ''मरीज को दिल का दौरा पड़ने पर जिस तरह से समय महत्वपूर्ण होता है उसी तरह से मरीज के जीवित रहने की संभवाना को बढ़ाने के लिए नई तकनीकें महत्वपूर्ण है।''
उन्होंने बताया कि एफएफआर तकनीक का उपयोग करके हम मरीज की हृदय धमनियों के भीरत के रक्त प्रवाह या रक्त के दवाब के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल की जा सकती है। ऐसी जानकारियों की मदद से हम मरीज को बता सकते हैं कि उन्हें स्टेंट की जरूरत है या नहीं।''
उन्होंने कहा, ''एफएफआर डाटा की मदद से इलाज कराने वाले दिल के दौरे के 15 मरीजों पर किए गए एक अध्ययन की रिपोर्ट से पता चलता है कि ऐसा करने पर स्टेंटिंग की जरूरत 30 प्रतिषत तक घट जाती है। जिन कुछ मामलें में जब ब्लाॅकेज करीब 80 प्रतिषत होता है, उन मामलों में भी स्टेंट की जरूरत घट जाती है। इन परीक्षणों से जो डाटा प्राप्त होते हैं वे एफडीए अनुमोदित होते हैं और उनकी सफलता की दर 95 प्रतिषत होती है।'' 
डा. भामरी ने बताया कि जिन मरीजों को स्टेंट की जरूरत होती है उन्हें अगर सही जगह पर, सही आकार के और सही तरीके से स्टेंट लगा दिया जाए तो उनके जीवित रहने की संभावना अधिकतम हो जाती है। 
उन्होंने बताया, ''ओसीटी तकनीक का उपयोग करके हम अवरुद्ध धमनी के अंदर के क्षेत्र के उच्च रिजोल्युषन वाली तस्बीरें प्राप्त कर पाने में सक्षम हो रहे हैं। इन तस्बीरों से प्राप्त जानकारियों का उपयोग करके हम मरीज को अधिक सही तरीके से स्टेंट लगा पाने में सक्षम हो पाते हैं।''
उन्होंने कहा कि मरीजों को अच्छी तरह से स्टेंट लगाने के लाभ बहुत अधिक होते हैं। इससे उपचार संबंधित जटिलताओं, स्टेंट प्रेरित थ्रम्बोसिस और भावी जटिलताओं में उल्लेखनीय कमी आ जाती है। 
उन्होंने कहा कि साल दर साल हृदय रोग की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। लोग अस्वास्थ्यकर भोजन और निष्क्रिय जीवन शैली को अपना रहे हैं तथा धूम्रपान कर रहे हैं या चाबने वाले तंबाकू का उपयोग कर रहे हैं। ऐसे सभी जोखिम कारकों के कारण लोगों में दिल के दौरे का खतरा बढ़ रहा है।''
उन्होंने कहा, ''अब स्टेंट की कीमतों पर नियंत्रण के कारण एफडीए अनुमोदित स्टेंट भी कम कीमत में उपलब्ध हैं। एफडीए अनुमोदन से यह सुनिष्चित होता है कि स्टेंट में उच्च गुणवत्ता एवं उच्च सुरक्षा मानक हैं। 
डा. भामरी ने सलाह दी कि मरीजों को दिल के रोग रोकने की दिषा में जरूर प्रयास करने चाहिए। रोज व्यायाम करके, स्वास्थ्यवर्धक भोजन का सेवन करके, अच्छी नींद सोकर, तनाव एवं रक्त चाप एवं षुगर पर नियंत्रण करके दिल के रोगों को रोका जा सकता है। 


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बच्चों ने मनाया जन्मदिन का जश्न

प्रत्येक छात्र के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण उसका जन्म दिन होता है। द विज़डम ट्री स्कूल ने जन्मदिन के महत्व को बनाए रखने के लिए  अपने प्री-प्राइमरी विंग के बच्चों के लिए जन्मदिन का आयोजन किया।
समारोह की शुरुआत बड़े धूम-धाम से हुई। जन्मदिन मनाने के लिए प्री-प्राइमरी विंग के सभी बच्चों को  एम. पी. हॉल में एकत्रित किया गया। प्री-प्राइमरी के सभी बच्चे रंग-बिरंगें ड्रेस में आए थे। इस समारोह  का मुख्य आकर्षण डोरेमोन के आकार का एक विशाल चॉकलेट केक था । केक काटने की रस्म के बाद नन्हे बच्चें म्यूजिक की धुन पर थिरकने लगे और सभी ने बहुत मज़े किए ।
विद्यालय के अध्यक्ष श्री के. के. श्रीवास्तव ने जन्मदिन के अवसर पर सभी बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य और उनकी खुशियों की कामना की । प्रधानाध्यापिका श्रीमती सुनीता ए. शाही ने सभी बच्चों को बर्थडे का ताज और टियारा पहनाया तथा उन्हें जीवन में सफल होने के लिए आशीर्वाद दिया।


 


तुरत परिणाम पाने के लिए कराएं मिनी बैरिएट्रिक सर्जरी

जो लोग सर्जरी से वजन कम कराना चाहते हैं, लेकिन इसकी जटिलताओं को लेकर आशंकित हैं, उनके लिए अपोलो स्पेक्ट्रा हाॅस्पिटल्स में एक नयी तकनीक की पेशकश की जा रही है। मिनी गैस्ट्रिक बाईपास सर्जरी नामक यह प्रक्रिया परंपरागत बाईपास सर्जरी की तुलना में अधिक सरल और कम जटिल है। अपोलो स्पेक्ट्रा हाॅस्पिटल्स, करोल बाग में बेरिएट्रिक सर्जन डाॅ. एस. एस. सग्गू ने कहा, ''वजन कम करने, वजन को बढ़ने नहीं देने और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करने की क्षमता के मामले में यह प्रक्रिया अन्य शल्य चिकित्सा उपचार के समान ही सफल है। इस प्रक्रिया से आपरेशन में कम समय लगता है, यह प्रक्रिया सरल है और इसमें जटिलताएं होने का कम खतरा रहता है।''
50 वर्षीय श्रीमती कोहली उन रोगियों में से हैं जिन्होंने यह प्रक्रिया करायी है और काफी उत्साहित हैं। वह कहती हैं, ''मैंने छह महीने पहले यह प्रक्रिया करायी थी, लेकिन मैं खुद में अंतर महसूस कर सकती हूं और अन्य लोग भी मुझमें अंतर देख सकते हैं। मेरी त्वचा में चमक आनी शुरू हो गयी है और मैं काफी युवा और ऊर्जावान महसूस करती हूं। प्रक्रिया से पहले, मेरा वजन 131 किलो था। मैंने अपने जीवन से समझौता कर लिया था। मुझे मधुमेह, उच्च रक्तचाप और स्लीप एपनिया था। मैं चल-फिर नहीं सकती थी और इसलिए मैं पारिवारिक समारोहों में षामिल नहीं हो पाती थी। मेरा वजन लगभग 50 किलो कम हुआ है और मैंने मधुमेह और उच्च रक्तचाप की दवा लेनी बंद कर दी है। अब मैं ठीक से सो सकती हूं, इसलिए मैं बीआईपीएपी मशीन बंद कर रही हूँ।''
मिनी गैस्ट्रिक बाइपास एक मिनिमल इनवेसिव शल्य चिकित्सा पद्धति द्वारा की जाती है। यह प्रक्रिया भोजन का सेवन और भोजन से पोषक तत्वों के अवशोषण को कम कर देती है। पोषक तत्वों का अवशोषण इसलिए सीमित हो जाता है क्योंकि आंतों का बाइपास कर दिया जाता है और उनका उपयोग नहीं होता है। यह एक नई प्रक्रिया है, इसलिए कई सर्जन इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक करने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं।
मोटापा न सिर्फ आपको सुस्त बनाता है और आपके समग्र, भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि यह आपकी हड्डियों, जोड़ों और मांसपेशियों को अपरिवर्तनीय क्षति भी पहुंचा सकता है।


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बच्चों में गुर्दा प्रत्यारोपण

कई लोगों को लगता है कि गुर्दे की बीमारियां केवल वयस्कों में होती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि बच्चों को भी गुर्दा की कई बीमारियां हो सकती हैं जिनका इलाज यदि समय पर नहीं कराया जाये तो क्रोनिक किडनी फेल्योर भी हो सकता है। 
बच्चों में गुर्दे की बीमारी निम्न कारणों से हो सकती है:
— जन्म दोष
— वंशानुगत बीमारियां
— संक्रमण
— नेफ्रोटिक सिंड्रोम
— सिस्टेमिक बीमारियां
— आधात (ट्राॅमा) 
— मूत्र में रुकावट या रिफ्लेक्स
लक्षण
— चेहरे, पैर और शरीर में सूजन, कम मूत्र का बनना, मूत्र के साथ रक्त, झाग, प्रोटीन, एल्बुमिन और मवाद का आना।
— रक्तचाप अधिक है, तो गुर्दे की बीमारी होने की संभावना हो सकती है। बच्चों में रक्तचाप की जाँच की जानी चाहिए। 
— बच्चों में मूत्र मार्ग में संक्रमण आम नहीं है। अगर पेशाब करते समय जलन हो रही हो या पेशाब के साथ मवाद आ रहा हो, या ऐसा बुखार हो जिसके कारण का पता नहीं चल पा रहा हो तो मूत्र में रुकावट का पता लगने के लिए गुर्दे की पूरी तरह से मूल्यांकन करना आवश्यक हो जाता है। इस तरह की समस्या का अगर जल्दी पता लगाकर इलाज करा लिया जाये तो ऐसे बच्चों में भविष्य में किडनी फेल्योर को रोका जा सकता है।
— गुर्दे की बीमारी की पहचान के अन्य लक्षणों में पेशाब करने में परेशानी होना या बहुत अधिक या बहुत कम मूत्र का निकलना, अंतरवस्त्र (अंडर गार्मेंट) का मूत्र से हमेशा गीला रहना, रात में बिस्तर पर पेशाब होना, सो कर जागने के बाद आंखों के चारों ओर सूजन होना आदि शामिल हो सकते हैं।
गुर्दे की विटामिन डी को सक्रिय करने और हमारी हड्डियों को मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बच्चों में विटामिन डी की कमी के लक्षण और सही ढंग से विकास नहीं हो पाना भी गुर्दे की बीमारी के संकेत हो सकते हैं।
पहचान
गुर्दे से संबंधित बीमारियों की पुष्टि करने के लिए, गुर्दा रोग विशेषज्ञ निम्नलिखित एक या अधिक परीक्षण करा सकते हैं:
— मूत्र परीक्षण
एल्बुमिन के लिए डिपस्टिक परीक्षण। मूत्र में एल्बुमिन की मौजूदगी का संकेत है कि गुर्दे क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।
यूरिन एल्बुमिन- टू- क्रिएटिनिन रेशियो। यह एक और अधिक सटीक परीक्षण है। गुर्दे की बीमारी की पुष्टि करने के लिए यूरिन एल्बुमिन-टू-क्रिएटिनिन रेशियो परीक्षण आवश्यक हो सकता है। 
— गुर्दे की फिल्टर करने की क्षमता का पता लगाने के लिए यूरिया और क्रिएटिनिन स्तर जैसे रक्त परीक्षण।
— गुर्दे के आकार को देखने के लिए और किसी भी प्रकार की संरचनात्मक असामान्यताओं की पहचान करने के लिए अल्ट्रासाउंड, इंट्रावीनस पायलोग्राफी (आईवीपी), मिक्टुरेटिंग सिस्टो यूरेथ्रोग्राम (एमसीयू) और सीटी स्कैन जैसी इमेजिंग।
— गुर्दे में स्कार की पहचान करने के लिए डीएमएसए और गुर्दे के कार्य करने के प्रतिशत का पता लगाने के लिए डीटीपीए जैसे न्यूक्लियर स्कैन।
— गुर्दे की बीमारी का कारण और गुर्दे को हुए नुकसान का पता लगाने के लिए गुर्द की बायोप्सी।
प्रारंभिक चरण का उपचार: बच्चों में गुर्दे की बीमारी का उपचार बीमारी के कारणों पर निर्भर करता है। बच्चे के गुर्दे का मुख्य लाभ यह है कि, बच्चों में गुर्दे का विकास हो रहा होता है, इसलिए यदि समय पर उपचार कराया जाये तो इसमें ठीक होने की क्षमता होती है। नेफ्रोटिक सिंड्रोम का इलाज संभव है। गुर्दे में किसी भी प्रकार की संरचना संबंधित असमान्यता की पहचान कर उसे ठीक किया जाना चाहिए।
क्रोनिक अवस्था: बच्चों में किडनी फेल्योर का कारण बनने वाली गुर्दे की बीमारी का गुर्दे के सही ढंग से काम करने के लिए उपचार अवश्य किया जाना चाहिए। इसके उपचार के दो प्रकार के विकल्प उपलब्ध हैं - डायलिसिस और गुर्दा प्रत्यारोपण। बच्चों में ब्लड डायलिसिस में कठिनाइयां पैदा हो सकती है, क्योंकि बच्चों में रक्त वाहिकाएं छोटी होती हैं और अधिकतर मशीन मुख्य रूप से वयस्कों के लिए ही बनाये गये हैं। पेरिटोनियल डायलिसिस एक और विकल्प है। गुर्दा प्रत्यारोपण हालांकि चुनौतीपूर्ण है, लेकिन सबसे अच्छा विकल्प है।
गुर्दा प्रत्यारोपण के दो प्रकार के होते हैं: जीवित-दाता प्रत्यारोपण और निर्जीव-दाता प्रत्यारोपण। भारत में जीवित-दाता प्रत्यारोपण अधिक लोकप्रिय है। इसमें बच्चे में उसके करीबी या प्रिय व्यक्ति का गुर्दा प्रत्यारोपण किया जाता है जो अभी भी जिंदा है। एक स्वस्थ गुर्दा दो असफल गुर्दे का काम कर सकता है, इसलिए कुछ अन्य अंगों के विपरीत, गुर्दा जीवित दाता द्वारा दान किया जा सकता है। लेकिन परिवार के छोटा होने और इस कारण ब्लड ग्रूप के मैच नहीं कर पाने के कारण कभी-कभी उपयुक्त दाता उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। लोगों के द्वारा मस्तिष्क मृत्यु को स्वीकार करने और मृत्यु के बाद अंगों को दान करने की प्रतिज्ञा लेने से अंगों की कमी कम हो सकती है और कई लोगों की जान बचाई जा सकती है।


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प्रोस्टेट आर्टरी एम्बोलाइजेशन की मदद से बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (बीपीएच) का इलाज बिना सर्जरी के

हाल ही में नौएडा के जेपी अस्पताल में डॉक्टर सी.पी.एस. चौहान ने प्रोस्टेट आर्टरी एम्बोलाइजेशन द्वारा बढे हुए प्रोस्टेट का इलाज किया। मरीज़ अब सभी लक्षणों से मुक्त सामान्य ज़िन्दगी जी रहा है। 
दरअसल बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (बीपीएच) जिसे प्रोस्टेट एनलार्जमेंट भी कहते हैं, यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें पुरुषों के प्रोस्टेट का आकार बढ़ जाता है हालांकि यह नॉन कैंसरस होता है। इसमें लगातार पेशाब आना, पेशाब करते समय तकलीफ होना, परेशानी होना, या ब्लैडर पर ही कंट्रोल न रहना जैसे लक्षण शामिल हैं। बीपीएच 60 वर्ष से अधिक उम्र के तकरीबन 50 फ़ीसदी पुरुषों को और 70 वर्ष से अधिक उम्र के तकरीबन 80 फ़ीसदी पुरुषों को प्रभावित करता है।
साधारण तौर पर बीपीएच के लिए सर्जरी को विकल्प माना जाता है, लेकिन अब बहुत से कम जोखिम भरे इलाज भी उपलब्ध हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि 100 ग्राम से अधिक बढ़े प्रोस्टेट में सर्जरी के विकल्प की सलाह नहीं दी जाती क्योंकि इसमें बहुत बड़ा जोखिम होता है, जबकि जेपी अस्पताल में 125 ग्राम बढ़े हुए प्रोस्टेट को प्रोस्टेट आर्टरी एम्बोलाइजेशन द्वारा ठीक किया गया जो कि एक असरदार और सुरक्षित इलाज के विकल्प के रूप में उभर रहा है। दरअसल प्रोस्टेट आर्टरी एम्बोलाइजेशन में प्रोस्टेट के बढ़े हुए आकार को सामान्य किया जाता है। इसके तहत प्रोस्टेट ग्लैंड के ब्लड वेसल्स को एन्जियोग्राफी तकनीक से ब्लाक किया जाता है। यह एक ऐसा तरीका है जिसमें एनेस्थीसिया तक की ज़रूरत नहीं होती और मरीज़ को इलाज के ठीक उसी दिन डिस्चार्ज किया जा सकता है। 
58 वर्षीय मरीज़ को जब जेपी अस्पताल लाया गया, तो उसका प्रोस्टेट का 125 ग्राम बढ़ा हुआ अकार था, जिसके कारण उसकी ब्लेडर ब्लॉक हो चुकी थी, जिसके लिए उनके पिछले इलाज के अंतर्गत कैथेटर डाली गई थी ताकि यूरिन पास हो सके।
डॉक्टर सी.पी.एस. चौहान, एडिशनल डायरेक्टर, रेडियोलोजी एंड इंटरवेंशनल रेडियोलोजी, जेपी अस्पताल नोएडा ने कहा कि, “मरीज़ की बीमारी की पूरी हिस्ट्री देखने के बाद कुछ टेस्ट किये गए और निर्णय लिया गया कि प्रोस्टेट के बढ़े अकार को कम करने के लिए नॉन सर्जीकल इलाज यानि प्रोस्टेट आर्टरी एम्बोलाइजेशन किया जाए, और ट्रीटमेंट के बाद मरीज़ को अस्पताल से छुट्टी भी उसी दिन दे दी गई। प्रोस्टेट आर्टरी एम्बोलाइजेशन होने के 6 दिन बाद हम मरीज़ के यूरिनरी कैथेटर को भी निकालने में सफल रहे, अब वे एकदम सामान्य जिंदगी जी रहे हैं।”
यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि समाज में पुरुषों की कठोर छवि व्याप्त होने के चलते बहुत से तबकों में उनकी शारीरिक तकलीफों के प्रति संवेदनहीनता और भ्रांतियां फैली हुई हैं। सामाजिक दबाव के चलते बहुत से पुरुष अपनी ऐसी तमाम तकलीफों पर चुप रह जाने को मजबूर होते हैं। वक़्त की ज़रूरत है कि पुरुषों की भी तकलीफों के प्रति जागरुकता फैलाई जाए और ऐसी बीमारियों से लड़ने के लिए उनके बारे में खुलकर चर्चा की जाए। 


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फाइब्राॅयड यूटेरस के बारे में महिलाओं को क्या जानना जरूरी है?

32 वर्षीय श्रीमती सरिता गाइनी ओपीडी में आयीं। उनकी शादी तीन साल पहले हुई थी और वह पिछले तीन साल से गर्भ धारण नहीं कर पा रही थी। उन्हें पिछले छह महीने से माहवारी के दौरान अधिक रक्तस्राव हो रहा था। उन्होंने कई क्लिनिकों में इनफर्टिलिटी का इलाज कराया और उनमें फाइब्राॅयड यूटेरस की पहचान हुई जिसका आकार 4 गुना 5 सेंटीमीटर था।
फाइब्राॅयड्स प्रजनन उम्र वाली महिलाओं में गर्भाशय का सबसे सामान्य नाॅन-कैंसरस ग्रोथ है। यह करीब 40-50 प्रतिशत महिलाओं में होता है और उम्र के साथ बढ़ता जाता है। फाइब्राॅयड का वास्तविक कारण अज्ञात है लेकिन इसके होने के कई कारण माने जाते हैं, जैसे- एस्ट्रोजन की अधिकता, देर से शादी, देर से बच्चे पैदा करना, माहवारी का जल्द शुरू होना और शराब का सेवन। फाइब्राॅयड एक हो सकता है या कई भी हो सकता है और इसका आकार छोटा हो सकता है या बड़ा हो सकता है। इसका आकार इतना बड़ा भी हो सकता है कि यह पूरे पेट में हो। फाइब्राॅयड की संख्या, आकार और स्थान के आधार पर ही इसके लक्षण प्रकट होते हैं और इनका इलाज किया जाता है।
फाइब्राॅयड के कई प्रकार के लक्षण प्रकट हो सकते हैं: मासिक चक्र में व्यवधान, दर्द, इनफर्टिलिटी (गर्भधारण करने में असक्षम), बार-बार गर्भपात और दबाव के लक्षण।
इसकी पहचान के लिए अल्ट्रासोनोग्राफी सबसे बेहतर विकल्प है। कुछ मामलों में एमआरआई कराने की भी सलाह दी जाती है। 
बड़े फाइब्राॅयड और इससे संबंधित सभी समस्याओं को सर्जरी से ठीक किया जा सकता है। रजोनिवृति से पूर्व महिलाओं में यूटेरिन फाइब्राॅयड होना सामान्य है और यह स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चिंता का विशय है। इन महिलाओं में इसे निकालने के लिए हिस्टेरेक्टाॅमी की जाती है। बच्चे की चाह रखने वाली महिलाआं में हिस्टेेरोस्कोपिक तथा लैप्रोस्कोपिक मायोक्टमी जैसी यूटेरिन स्पेयरिंग सर्जरी कराने की सलाह दी जाती है।  
मायोमेक्टमी के लिए लैपरोस्कोपिक तरीका परंपरागत ओपन तरीके से काफी बेहतर है। इसमें न सिर्फ अस्पताल में रहने की जरूरत कम होती है, बल्कि यह काॅस्मेटिक दृष्टि से भी बेहतर है, रोगी अपना काम-काज जल्द करने लगती है, कम लागत आती है, रक्त का कम नुकसान होता है, गर्भावस्था दर अधिक है, तेजी से रिकवरी होती है और ऐडहीशन बनने की कम संभावना होती है।
लैपरोस्कोपिक मायोक्टमी ने कई निःसंतान दम्पतियों और बीमारी से पीड़ित महिलाओं में उम्मीद पैदा की है। यूटेरिन फाइब्राॅयड घातक बीमारी नहीं है और इसके इलाज के बेहतर परिणाम आ सकते हैं।  


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हादसे में जब मस्तिष्क हो जाए घायल 

दुर्घटनाओं में मस्तिष्क को लगने वाली चोटें अर्थात ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजुरीज (टीबीआई) भारत में एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या हैए जिसके कारण हमारे समाज के युवा और सक्रिय लोगों की मृत्यु हो रही है, वे घायल और विकलांग हो रहे हैं। दुनिया में भारत में सिर पर चोट लगने की दर सबसे अधिक है। भारत में कुछ रिपोर्टों के अनुसार, यहां हर साल 15 लाख से 20 लाख लोगों के सिर को गंभीर चोट पहुंचती है और एक लाख 20 हजार से अधिक लोगों की जान चली जाती है। ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजुरीज (टीबीआई) के 60 प्रतिशत से अधिक मामले सड़क यातायात दुर्घटनाओं के कारण होते हैं।
यह कैसे होता है
वाहन दुर्घटनाओं के अलावा, खेल—कूद के दौरान चोट लगना और उंचाई से गिर जाना भी इसका प्रमुख कारण है। ऐसा होने पर सिर में चोट भी लग सकती है। यह किसी को भी, किसी भी उम्र में हो सकता है, और इससे मस्तिष्क को नुकसान पहुंच सकता है। मस्तिष्क को नुकसान तब होता है जब सिर और मस्तिष्क में अचानक झटका लगने के कारण मस्तिष्क खोपड़ी में बाउंस या ट्व्स्टि आ जाता है, जिससे मस्तिष्क कोशिकाओं में खिंचाव आता है, इंजुरी होती है और रासायनिक परिवर्तन भी होता है जिससे मस्तिष्क का सामान्य कार्य बाधित होता है।
टीबीआई का परिमाण
जरूरी नहीं है कि सिर में लगने वाली सभी चोटों का परिणाम टीबीआई के रूप में ही हो। लेकिन जब ऐसा होता है, तो टीबीआई हल्की (जैसे मानसिक स्थिति या चेतना में हल्का बदलाव) से लेकर) गंभीर तक हो सकती है (जैसे कि चोट लगने के बाद लंबे समय तक बेहोशी या सोच और व्यवहार में काफी समस्याएं)। मस्तिष्क आघात भी हल्की टीबीआई का ही एक रूप है।
ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजुरी वाले बच्चों में न्यूरो साइकिएट्रिक डिसआर्डर होने का खतरा बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजुरी वाले बच्चों में इंजुरी के पांच साल तक सिरदर्दए डिप्रेशन और मानसिक या बौद्धिक विकार होने का खतरा अधिक होता है।
लक्षण
हल्की टीबीआई के लक्षण हैं . सिरदर्द, भ्रम, नजर का धुंधला होना और व्यवहार में परिवर्तन। मध्यम और गंभीर टीबीआई में भी ये लक्षण शामिल हो सकते हैं साथ ही बार—बार उल्टी या मिचली आना, आवाज का स्पष्ट होना, हाथ या पैर में कमजोरी और सोचने की क्षमता में समस्या जैसे लक्षण भी हो सकते हैं।
सिर की चोट का निदान करने के लिए एक चिकित्सीय परीक्षण पहला कदम है। मूल्यांकन में आमतौर पर न्यूरोलॉजिकल परीक्षणए दर्द रहित परीक्षण किये जाते हैं जिनमें सोच, मोटर फ़ंक्शन (मूवमेंट), सेंसरी फ़ंक्शन, समन्वय और रिफ्लेक्स का मूल्यांकन शामिल होता है।
जटिलताएं
सिर की चोट से मस्तिष्क सहित केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के महत्वपूर्ण हिस्सों को नुकसान हो सकता है। यह व्यक्ति के समग्र स्वास्थ्य और सेहत को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। यहां तक कि सिर की चोट के एक मामूली मामले में भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं यदि इसका समय पर इलाज नहीं किया जाता है। इसलिए, किसी भी चोट के बाद प्रारंभिक चिकित्सा सहायता लेना महत्वपूर्ण है। यह याददाश्त में कमी, पक्षाघात और यहां तक कि मृत्यु जैसी जटिलताओं को रोकने में मदद कर सकता है।
टीबीआई रोगियों के लिए उपचार
— प्रारंभिक उपचार — ऐसे रोगी का इलाज जल्द से जल्द एम्बुलेंस में और फिर आपातकालीन कक्ष में शुरू हो जाता हैए और इसमें रिसस्सिटेशन, स्टैबलाइजेशन और सपोर्टिव केयर शामिल होती है। टीबीआई के मामले में एबीसी सिद्धांतों — एयरवेए ब्रीदिंग और सर्कुलेशन का पालन किया जाता है।
एक्यूट उपचार — चिकित्सक का लक्ष्य सेकंडरी ब्रेन इंजुरी को कम करना होता है और इसमें मेडिकल वेंटिलेशन, मस्तिष्क दबाव की निगरानी और मस्तिष्क में ऑक्सीजन और रक्त प्रवाह को बनाए रखने के उपचार शामिल हैं।
सर्जिकल उपचार — कुछ मामलों में रक्त के थक्के को निकालने या मस्तिष्क को डिकंप्रेस करने के लिए सर्जरी की आवश्यकता होती है।
ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजुरी (टीबीआई) का इलाज हो जाने के बाद अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर से छुट्टी मिलने का मतलब यह नहीं है कि रोगी पूरी तरह से ठीक हो गया है। रोगी के पूरी तरह से ठीक होने के लिए उचित फौलोअप केयर की आवश्यकता होती है।
महत्वपूर्ण अवधि
भारत में, 95 प्रतिशत ट्रॉमा पीड़ितों को सिर में चोट लगने के बाद गोल्डन ऑवर की अवधि के दौरान उचित देखभाल या उचित प्रबंधन की सुविधा नहीं मिल पाती है, और टीबीआई से मरने वालों में से आधे लोगों की मौत चोट के पहले 2 घंटों के भीतर ही हो जाती है।
रोकथाम
यहां तक कि सबसे सरल सिर की चोट का भी किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य और सेहत पर गंभीर परिणाम हो सकता है। सबसे अच्छी बात यह है कि दुर्घटना होने वाली जगह में सिर की चोटों को रोकना है। इसे सुरक्षा उपकरणों का उपयोग करके और विशेष रूप से खतरनाक वातावरण में हर समय सुरक्षा दिशानिर्देशों का पालन करके आसानी से रोका जा सकता है।
हमारे सिर और मस्तिष्क को चोट से बचाने के कई तरीके हैं। सिर की गंभीर चोटों को रोकने में सरल तरीकों का भी महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकता है। सबसे अच्छा तरीका सुरक्षा उपकरणों के उपयोग के लिए अत्यधिक सुरक्षा सावधानियों का पालन करना है।
यहां कुछ आसान सलाह दी गई है जिनका पालन करने पर सिर की गंभीर चोट को रोकने में मदद मिल सकती हैंः
1. ऑटोमोबाइल में हमेशा सीटबेल्ट पहनें।
2. बच्चों के लिए उपयुक्त सुरक्षा सीट का उपयोग करें।
3. नशीली दवाओं या शराब का सेवन का वाहन न चलाएं।
4. साइकिल, स्कूटर या मोटरसाइकिल चलाते समय हमेशा हेलमेट पहनें।
5. सीढ़ियों से ऊपर जाते / नीचे उतरते समय रेलिंग पकड़े रहें और सीढ़ि़यों पर कभी भी नहीं दौडें।
6. खड़ी सीढ़ियों जैसे खतरनाक क्षेत्रों में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था करें।
7. सभी श्रमिकों को सही सुरक्षा उपकरण प्रदान करें।
8. कार्यस्थल में सुरक्षा संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदर्शित करें।


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क्रोनिक किडनी रोग में आहार

क्रोनिक किडनी रोग (सीकेडी) में जब डायलिसिस की नौबत आ जाती हैए तो आहार रोगी को दोबारा ठीक करने संबंधी देखभाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्हें फिट रहने के लिए अच्छी तरह से संतुलित आहार आवश्यक है क्योंकि उनकी किडनी उनके रक्त से अपशिष्ट उत्पादों और तरल पदार्थ को निकालने के लिए अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रही होती है। डायलिसिस रोगियों के लिए हर दिन सही मात्रा में प्रोटीनए कैलोरी, तरल पदार्थ, विटामिन और खनिज लेना आवश्यक है। अपने डॉक्टर से बात करें। वे आपको एक आहार चार्ट तैयार करके देंगे जिसका आप नियमित रूप से पालन करें।
प्रोटीन : हालांकि रोगियों को डायलिसिस से पहले की अवधि के दौरान प्रोटीन का कम से कम सेवन करने की सलाह दी जाती हैए लेकिन डायलिसिस के दौरान उन्हें अधिक प्रोटीन का सेवन करने के लिए कहा जाता है। डायलिसिस के दौरान कुछ मात्रा में प्रोटीन निकल जाता है और इसलिएए डायलिसिस कराने वाले रोगियों को डायलिलिसस नहीं कराने वाले रोगियों की तुलना में अधिक प्रोटीन का सेवन करने की आवश्यकता होती है। प्रोटीन की सही मात्रा का सेवन करने से डायलिसिस के रोगियों को फिट रहने में मदद मिलेगी क्योंकि अपर्याप्त प्रोटीन के सेवन से वजन कम हो सकता है, मांसपेशियां कमजोर हो सकती है, संक्रमण से लड़ने की क्षमता कम हो सकती है और इस तरह कुपोषण का खतरा पैदा हो सकता है। ऐसे रोगियों के लिए मांसए मुर्गी, मछली और अंडे का सफेद हिस्सा सबसे उपयुक्त है। दही, दूध और पनीर जैसे अधिकांश डेयरी उत्पादों में भी उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन होते हैं।
सोडियम : मरीजों को अपने आहार में सोडियम की मात्रा को सीमित करना चाहिए। सोडियम एक तरह से हाइड्रेटेड स्पंज है जो द्रव को अवशोषित करता है। इसके अधिक सेवन से आप अधिक प्यास महसूस करेंगे और अधिक पानी पीने की इच्छा होगी। तरल पदार्थ के अधिक सेवन से आपका वजन अधिक बढ़ेगा और फिर रक्तचाप में वृद्धि हो सकती है। गुर्दे की बीमारी में सोडियम का कम सेवन करने से द्रव में सामान्य संतुलन को बनाए रखने में मदद मिलती है। डिब्बाबंद और पैक्ड खाद्य पदार्थ न खाएं क्योंकि इनमें सोडियम की मात्रा अधिक होती है।
पोटेशियम : यह तंत्रिकाओं और मांसपेशियों के कार्य के लिए महत्वपूर्ण है। रक्त में पोटेशियम को सुरक्षित स्तर पर बनाए रखने की आवश्यकता होती है। रक्त में पोटेशियम का स्तर अत्यधिक होने पर यह मांसपेशियों की कमजोरीए असामान्य हृदय गति और कई मामलों मेंए हार्ट फेल्योर का कारण बन सकता है। इसलिए अधिक पोटेशियम वाले भोजन (यह मुख्य रूप से कुछ फलों और सब्जियों में पाया जाता है) से बचना और कम और मध्यम पोटेशियम वाले भोजन लेना महत्वपूर्ण है। कोल्ड ड्रिंक और सॉस से परहेज करें।
फास्फोरस : रोगियों को फास्फोरस का सेवन कम करने की सलाह दी जाती है। चूंकि गुर्दे अपशिष्ट उत्पादों को फ़िल्टर करने में कम प्रभावी हो जाते हैंए जिससे रक्त में फॉस्फेट का स्तर बढ़ जाता है। जब यह रक्त में बनना शुरू होता हैए तो हड्डी से कैल्शियम निकल जाता है। कैल्शियम फॉस्फेट उत्पाद रोगी के ऊतकों में कठोर रूप से जम जाता बनाता है जिससे त्वचा में खुजलीए जोड़ों में दर्द और आंखों में जलन होती है और उनकी रक्त वाहिकाएं सख्त हो जाती हैं। इसलिए ऐसे मरीजों को मूलीए गाजर और चुकंदर जैसे जड़ वाले खाद्य पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए।
द्रव का सेवन : डायलिसिस के रोगी अधिक मात्रा में तरल पदार्थों को निष्कासित नहीं कर सकते हैं, इसलिए, उनके शरीर में अतिरिक्त तरल पदार्थ जमा हो सकता है, जिसके कारण उनके रक्त परिसंचरण पर अधिक दबाव पड़ता है। इसमें सांस लेने में तकलीफए उच्च रक्तचाप और पैरों में सूजन जैसे लक्षण हो सकते हैं।
एनीमिया को रोकें
डायलिसिस के रोगियों में एनीमिया आम है और यह कुपोषण से पीड़ित या अधिक प्रोटीन का नुकसान वाले रोगियों में अधिक सामान्य होता है। क्रोनिक बीमारी के रोगियों में एनीमिया का मुख्य कारण गुर्दे द्वारा एरिथ्रोपोइटिन (ईपीओ) का कम उत्पादन है। ईपीओ लाल रक्त कोशिकाओं को अस्थि मज्जा बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। जब गुर्दे के कार्य करने की क्षमता कम हो जाती हैए तो ईपीओ का उत्पादन कम हो जाएगा। प्रोटीन, आयरन, विटामिन सी, विटामिन बी 12 और फोलेट का पर्याप्त सेवन एनीमिया की रोकथाम और उपचार में महत्वपूर्ण है क्योंकि ये पोषक तत्व नई लाल रक्त कोशिकाओं को बनाने में महत्वपूर्ण तत्व हैं।


 


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एक्टिव धूम्रपान करने वालों को इनफर्टिलिटी का खतरा अधिक 

धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अपने रोजमर्रा के जीवन में आपको हर जगह धूम्रपान करने वालों का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन फिर भी, आप इसके दुष्प्रभाव से अनभिज्ञ रहते है। धूम्रपान न केवल फेफड़े को नुकसान पहुंचाता है बल्कि हृदय, गुर्दे और शुक्राणुओं को भी नहीं छोड़ता है। यह पुरुषों और साथ ही साथ महिलाओं में भी इनफर्टिलिटी पैदा कर सकता है। धूम्रपान के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले सामान्य दुष्प्रभावों में, इनफर्टिलिटी सबसे आम है। यह कहना गलत नहीं होगा कि बहुत अधिक धूम्रपान करने वाले लोगों में धूम्रपान नहीं करने वाले लोगों की तुलना में इनफर्टिलिटी संबंधित समस्याएं होने का अधिक खतरा रहता है। शोध के अनुसार, एक सिगरेट के धुएं मेे पूरे शरीर में फैल जाने वाले 7000 रसायन होते हैं, जो लंबे समय में अंगों को प्रभावित करते हैं। सिर्फ सक्रिय धूम्रपान ही नहीं, यहां तक कि दूसरे लोगों द्वारा किए गए धूम्रपान के धुएं या धूम्रपान करने वालों के संपर्क में रहना भी खतरनाक है। धूम्रपान चाहे सक्रिय हो या निश्क्रिय, यह प्रजनन अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है, शिशुओं में आनुवांशिक ऊतकों (गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान करने पर) को नुकसान पहुंचा सकता है, ओवुलेशन संबंधित समस्याएं पैदा कर सकता है और कैंसर और गर्भपात के खतरे को बढ़ा सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार 2015 तक, भारत में दुनिया के 12 प्रतिशत तम्बाकू सेवन करने वाले लोग होंगे और यहां धूम्रपान करने वालों की संख्या 10 करोड़ 80 लाख हो जाएगी।
इस बात के मजबूत प्रमाण उपलब्ध हैं कि धूम्रपान संबंधित व्यवहार सामाजिक कारकों से संबंधित होते हैं, विशेष रूप से माता-पिता और सहकर्मियों का अधिक प्रभाव पड़ता है। तंबाकू का स्वाद और गंध भी लोगों को धूम्रपान करने को प्रेरित करता है क्योंकि यह होंठ, मुंह और गले के संवेदी अंगों में स्पर्श, स्वाद और जलन की उत्तेजना प्रदान करता है। इसके अलावा, यह भी सुझाव दिया गया है कि अधिक नकारात्मक मूड और मूड में अधिक उतार-चढ़ाव के कारण भी लोग धूम्रपान की लत के गिरफ्त में आ सकते हैं।
कई अध्ययनों ने गर्भावस्था के दौरान माता के द्वारा किए जाने वाले धूम्रपान के विशिष्ट प्रभावों की पहचान की है, जिसमें भ्रूण के विकास का बाधित होना, नवजात शिशु की मृत्यु, गर्भावस्था संबंधी जटिलताएं, समय से पहले प्रसव और स्तनपान पर संभावित प्रभाव और जीवित बच्चों पर दीर्घकालिक प्रभाव शामिल हैं। इसके अलावा, इस बात के भी संकेत मिले हैं कि धूम्रपान करने से महिलाओं में प्रजनन क्षमता कम हो जाती है, माहवारी संबंधित असामान्यताएं होने की संभावना बढ़ जाती है और सहज रजोनिवृत्ति की आयु कम हो जाती है। पुरुषों के मामले में, यह सुझाव दिया गया है कि धूम्रपान उनकीे प्रजनन प्रक्रिया में शामिल हर प्रणाली को प्रभावित करता है। धूम्रपान करने वालों के स्पर्माटोजोआ में निशेचन क्षमता कम हो जाती है, और भ्रूण में इंप्लांटेशन दर कम हो जाती है।
धूम्रपान किसी भी अंगों या कोशिकाओं को नहीं छोड़ता है, और इसलिए, धूम्रपान के कारण शुक्राणु के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव अपरिहार्य है। अध्ययनों में धूम्रपान नहीं करने वालों की तुलना में धूम्रपान करने वाले पुरुषों में वीर्य की गुणवत्ता में कमी देखी गई है और शुक्राणु की सांद्रता में 23 प्रतिशत की कमी देखी गई है। धूम्रपान का शुक्राणु की गतिशीलता पर भी प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण अंडे का निशेचित होना मुश्किल हो जाता है। और अगर अंडे निषेचित हो भी जाते हैं, तो भ्रूण और बढ़ते भ्रूण पर हानिकारक रसायनों के दुष्प्रभाव के कारण भ्रूण के जीवित करने की संभावना कम हो सकती है। पुरुषों में धूम्रपान करने से गैर-व्यवहार्य गर्भावस्था का खतरा बढ़ जाता है और इसलिए महिला में गर्भपात का खतरा अधिक हो जाता है।
धूम्रपान करने वाली महिलाओं या धूम्रपान करने वालों के संपर्क में रहने वाली महिलाओं में इनफर्टिलिटी का अधिक खतरा रहता है और वे देर से गर्भ धारण करती हैं। सिगरेट में मौजूद विषाक्त पदार्थों के कारण, धूम्रपान गर्भपात की संभावना को बढ़ा देता है। यह गर्भावस्था के दौरान समय पूर्व प्रसव पीड़ा और एक्टोपिक गर्भावस्था जैसे कई स्वास्थ्य जोखिमों को भी बढ़ाता है। कई अध्ययनों के अनुसार, प्रतिदिन 10 या अधिक सिगरेट पीने पर महिलाओं को गर्भ धारण करने की क्षमता में काफी नुकसान होता है। इसके अलावा, धूम्रपान करने वाली या धूम्रपान करने वालों के संपर्क में रहने वाली महिलाओं के 50 वर्ष से पहले ही रजोनिवृत्त होने की संभावना होती है। इसलिए प्रजनन क्षमता को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा तरीका धूम्रपान छोड़ना है। हालांकि धूम्रपान करने वाली गर्भवती महिलाओं के लिए धूम्रपान छोड़ना मुश्किल हो सकता है यदि उसका पार्टनर धूम्रपान करता हो। अनुसंधान से पता चलता है कि जब लोग अपने पार्टनर के साथ धूम्रपान छोड़ने की योजना बनाते हैं तो धूम्रपान बंद करना बहुत आसान होता है। एक साथ धूम्रपान छोड़ने का निर्णय लेना प्रजनन क्षमता बढ़ाने और स्वस्थ बच्चे पैदा होने की संभावना में सुधार करने का एक बढ़िया तरीका है।
स्वस्थ आहार का सेवन करना, नियमित व्यायाम करना, ध्यान करना, योग करना आदि स्वस्थ जीवन के लिए बहुत आवश्यक हैं। इससे न केवल आपके गर्भवती होने की संभावना में वृद्धि होगी, बल्कि इससे स्वस्थ बच्चे के जन्म की संभावना भी बढ़ जाती है। आपमें अपनी बेहतरी के लिए अपने जीवन को बदलने की क्षमता है! पहला कदम है, खुद के साथ ईमानदार होना; दूसरा कदम है मदद और सहयोग मांगना!


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गर्भवती महिलाओं को स्ट्रोक का खतरा अधिक होता है

स्ट्रोक युवा महिलाओं को लंबे समय तक अक्षम बनाने वाले सबसे आम कारणों में से एक है जो वैस्कुलर कारण से मस्तिश्क के अचानक काम नहीं करने के कारण होता है। सभी मातृ मृत्यु में से 12 प्रतिशत मृत्यु से अधिक के लिए स्ट्रोक ही जिम्मेदार होता है। हालांकि असामान्य रूप से, स्ट्रोक अधिक विनाशकारी होता है जब यह किसी युवा गर्भवती महिला में होता है जो अपना परिवार शुरू करने की कोशिश कर रही होती है। यह भी देखा गया है कि प्रसव से संबंधित 89 प्रतिषत स्ट्रोक या तो प्रसव या प्रसव के बाद होता है। स्ट्रोक के कुछ सामान्य लक्षणों में चेहरे का लटकना, हाथ / पैर में कमजोरी या सुन्न होना, बोलने में कठिनाई, या बहुत तेज सिरदर्द आदि शामिल हो सकते हैं। उच्च रक्तचाप स्ट्रोक के लिए नंबर एक जोखिम कारक है, और इसका रोकथाम संभव है। उच्च रक्तचाप रहित महिलाओं की तुलना में, उच्च रक्तचाप से पीड़ित महिलाओं में गर्भावस्था अधिक जटिल होती है और उनमें स्ट्रोक होने की संभावना छह से नौ गुना अधिक होती है।
गर्भावस्था से संबंधित स्ट्रोक के लिए कई अन्य जोखिम कारक भी जिम्मेदार होते हैं जिनमें 35 साल से अधिक उम्र में गर्भधारण, हृदय रोग, धूम्रपान, मधुमेह, माइग्रेन, शराब और मादक पदार्थों का इस्तेमाल, सीजेरियन डिलीवरी, फ्ल्यूड तथा इलेक्ट्रोलाइट डिसआर्डर, कई बार गर्भ धारण करना आदि शामिल हैं। युवा महिलाओं में अधिक मोटापा होने पर भी गर्भवती महिलाओं में स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। ऐसा माना जाता है कि स्ट्रोक का सबसे अधिक खतरा आमतौर पर प्रसव के दौरान या प्रसव के तुरत बाद होता है। ऐसा गर्भावस्था से लेकर गर्भावस्था के बाद रक्त प्रवाह में बदलाव के साथ-साथ रक्त के थक्के की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण होता है।
धूम्रपान
स्ट्रोक के लिए कई संभावित जोखिम कारक हैं, जिनमें से एक मुख्य जोखिम कारक धूम्रपान है। धूम्रपान रक्त के थक्के बनने और धमनी में अवरोध के खतरे को बढ़ाता है। इन दोनों खतरों का संबंध स्ट्रोक से है। धूम्रपान रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा को कम कर देता है, जिसके कारण स्ट्रोक होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। जब आपके खून में कम ऑक्सीजन होता है, तो आपके दिल को शरीर में रक्त को पंप करने के लिए धूम्रपान नहीं करने वाले लोगों की तुलना में कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।
धूम्रपान से खून के थक्के भी बनने की संभावना अधिक होती है और आपके धमनियों में प्लाक बिल्डअप की मात्रा बढ़ जाती है। रक्त के थक्के और बढ़ी हुई प्लेक का संयोजन स्ट्रोक होने के लिए सही स्थितियां हैं।
आपके मस्तिष्क की ओर जाने वाली धमनियों को धूम्रपान से क्षति पहुंचने का अधिक खतरा होता है। चूंकि ये धमनियां संकुचित और कड़ी होती हैं, इसलिए आपके मस्तिष्क में पर्याप्त रक्त प्रवाह असंभव हो सकता है और एन्यूरिज्म होने के लिए सही परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं। धूम्रपान छोटी रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाता है, जिसके कारण उनके फटने की अधिक संभावना होती है।
— स्ट्रोक को रोकने में मदद के लिए जीवन शैली में बदलाव लाएं।
— नमक का सेवन कम करें। अपने भोजन में अलग से नमक न लें और संसाधित खाद्य पदार्थ के सेवन से बचें जिनमें बहुत अधिक नमक होता है।
— हर दिन अपने भोजन में कम से कम पांच हिस्सा फल और सब्जियों का रखें।
— यदि आपको वजन कम करने की आवश्यकता हो तो वजन कम करें।
— वसा का सेवन सीमित मात्रा में करें।
— अपने खान-पान में चीनी की मात्रा सीमित करें।
— धूम्रपान छोड़ दें।
— शराब का सेवन कम करें और बिंज ड्रिंकिंग से बचें।
— अधिक सक्रिय रहें।
— अपने तनाव के स्तर को कम करें और आराम करने के लिए समय निकालें।


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भारत में जीवित डोनर से प्राप्त जिगर (लिवर) का प्रत्यारोपण ही अधिक सुरक्षित होता है

हमारे देश में जिगर (लिवर) को अधिक से अधिक कारगर, सर्वसुलभ, समानता आधारित एवं न्यायसंगत बनाया जाना चाहिए और इसके लिए देश के नागरिकों के बीच पूरी तरह से जागरूकता जरूरी है। देश के लोगों के बीच जिगर प्रत्यारोपण को लेकर जागरूकता बढ़ रही है और इसलिए देश के लोग आज अधिक संख्या में जीवित डोनर के तौर पर अपने अंगों को दान देने के लिए आगे आ रहे हैं। साथ ही साथ वे मृत्यु होने की स्थिति में अंग दान के लिए सहमति भी दे रहे हैं। भारत का लिवर प्रत्यारोपण कार्यक्रम काफी सफल हो सकता है लेकिन हमारे देश में इस संबंध में पंजीकरण करने तथा परिणाम की जानकारी देने वाले किसी तंत्र की कमी है। 
जीवित लिवर दान क्या है?
जब किसी जीवित व्यक्ति द्वारा किसी अन्य ऐसे व्यक्ति के लिए लिवर का हिस्सा दान दिया जाता है जिसे लिवर प्रत्यारोपण कराने की जरूरत है तो इसे जीवित दाता लिवर प्रत्यारोपण कहा जाता है।
— 'दाता' वह व्यक्ति होता है जो अपना लिवर देता है।
— 'प्रत्यारोपण कराने वाला व्यक्ति या 'प्राप्तकर्ता' वह व्यक्ति होता है जो लिवर प्रत्यारोपण कराने की प्रतीक्षा कर रहा है।
जीवित दाता लिवर प्रत्यारोपण प्रक्रिया में जीवित दाता से प्राप्त लिवर के एक हिस्से को उस व्यक्ति (प्राप्तकर्ता) में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है जिसका लिवर ठीक से काम नहीं करता है।
लिवर दान देने वाले (दाता) के शरीर में बचा हुआ लिवर सर्जरी के बाद दो महीनों के भीतर ही अपना पूर्ण आकार प्राप्त कर लेता है और अपने सामान्य आकार और क्षमता को वापस पा लेता है। यहां तक प्राप्तकर्ता के शरीर में प्रत्यारोपित लिवर का भाग भी बढ़ता है और सामान्य कामकाज पुनः करने लगता है।
कई पत्रिकाओं में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, जीवत दाता लिवर प्रत्यारोपण कराने वाले 15 प्रतिशत से अधिक मरीज विदेश के होते हैं। जागरूकता बढ़ने और लिवर की बीमारियों के बढ़ने के कारण उनमें से 85 प्रतिशत से अधिक जीवित दाता होते हैं। भारत में लिवर प्रत्यारोपण के लिए मध्य पूर्व, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार से विदेशी मरीज काफी संख्या में आ रहे हैं। यहां लिवर प्रत्यारोपण के सालाना 200 से अधिक मामले होते हैं, जो भारत में जीवित दाता लिवर प्रत्यारोपण (एलडीएलटी) में आ रही तेजी को दर्शाता है। और अब तक 2500 से अधिक जीवित दाता प्रत्यारोपण किए गए हैं।
भारत में एलडीएलटी पारदर्शी है
भारत में जीवित दाता से लिवर प्रत्यारोपण में काफी पारदर्षिता होती है। यह पूरी तरह से सुव्यवस्थित प्रक्रिया है जिसके लिए संबंधित विशेषज्ञों से आवश्यक अनुशंसा और अनापत्ति (नो आब्जेक्शन) की जरूरत होती है। सीधे रिश्तेदारों (प्रथम डिग्री के संबंध) के अतिरिक्त किए गए डोनशन को सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकरण समिति से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त करने की आवश्यकता होती है। यदि कोई विदेशी रोगी को दान करने या प्रत्यारोपण करने की आवश्यकता होती है, तो राज्य अनापत्ति प्रमाणपत्र के साथ-साथ संबंधित दूतावासों से आवश्यक अनुमोदन की स्वीकृति लेनी पड़ती है। दाता को होने वाले जोखिमों के बारे में भी चर्चा की जाती है और प्राप्तकर्ता के आपरेशन की सफलता के बारे में भी सभी रोगियों को बताया जाता है।
जीवित लिवर दाता कैसे बनें?
लिवर डोनेशन अब बहुत सुरक्षित हो गया है। इसमें प्रत्यारोपण के लिए इस्तेमाल करने के लिए दाता से लिवर के हिस्से को निकालने के लिए सर्जरी की जाती है। सर्जरी के 2-3 सप्ताह की अवधि के भीतर ही दाता पूरी तरह से ठीक हो जाता है क्योंकि लिवर खुद को दोबारा उत्पन्न करता है। जीवित दाता बनने के लिए कुछ मानदंड हैं, जिनमें शामिल हैं -
— दाता की उम्र 18-55 साल की उम्र सीमा के भीतर होनी चाहिए और उसे स्वेच्छा से दान करने के लिए तैयार होना चाहिए।
— लिवर दान करने वाले व्यक्ति का वजन 85 किलोग्राम या संबंधित बीएमआई (25 से कम) से अधिक नहीं होना चाहिए ताकि फैटी लिवर के किसी भी जोखिम का निवारण हो जाए। 
— दाता का ब्लड ग्रूप या तो प्राप्तकर्ता के समान होना चाहिए या यूनिवर्सल डोनर के समान 'ओ' ग्रूप का होना चाहिए।
इसके बाद दाता का पूर्ण स्क्रीनिंग परीक्षण किया जाता है, जिनमें सीबीसी, पीटी, एलएफटी, सीरम क्रिएटिनिन, एचबीएसएजी, एचसीवी एंटीबॉडी, एचआईवी 1, 2, चेस्ट एक्स रे, ईसीजी और पेट का अल्ट्रासाउंड शामिल होते हैं।
भारत में एलडीएलटी की बढ़ती जरूरत
1995 और 1996 में दो असफल प्रयासों के बाद, पहला सफल मृत दाता लिवर प्रत्यारोपण (डीडीएलटी) 1998 में किया गया था। हालांकि, मृत दाता अंगों की बहुत कम उपलब्धता के कारण, लिवर प्रत्यारोपण कराने का इंतजार करने वाले मरीजों की मौत किसी डोनर से अंग मिलने से पहले ही हो जाती थी। लिवर प्रत्यारोपण केवल उन लोगों के लिए यथार्थवादी विकल्प था जो प्रत्यारोपण कराने के लिए विदेश यात्रा के भारी खर्च का वहन कर सकते थे। 
भारत में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक-सामाजिक अवधारणाओं के कारण दान में प्राप्त होने वाले कैडवेरिक अंगों की उपलब्धता में रूकावट आती रही है। लेकिन कम से कम वर्तमान में, एलडीएलटी अब इसका एकमात्र यथार्थवादी विकल्प बन गया है। एलडीएलटी के साथ कुछ बाधाएं भी निहित हैं जिनमें रोगी को उसके गंभीर रूप से बीमार होने से पहले ही प्रत्यारोपण के लिए मृत दाता से प्राप्त अंग का समय पर उपलब्ध नहीं होना, दाता से अंग प्राप्त करने और उसे भेजने में परेषानी, मस्तिष्क से मृत दाताओं के प्रबंधन में विशेषज्ञता की कमी के चलते मामूली ग्राफ्ट की संभावना, प्राप्तकर्ता के बहुत कम समय के नोटिस पर प्रत्यारोपण केंद्र तक पहुंचने में दिक्कत प्रमुख हैं। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आज तक इस देश में किए गए 70 प्रतिशत से अधिक लिवर प्रत्यारोपण एलडीएलटी हैं।
भारत में दायरा और संभावना
भारत में इसकी संभावना का आकलन करने से पहले, एलडीएलटी कार्यक्रम की शुरूआत के लिए पूर्व-आवश्यकताओं को रेखांकित करना जरूरी है।  जाहिर है, इस प्रक्रिया में काफी पैसे और बहुआयामी कुशल कर्मियों की आवश्यकता होती है। हालांकि यह अनिवार्य नहीं है कि किसी अस्पताल या संस्थान को डीडीएलटी करने का अनुभव हो, लेकिन अगर ऐसा अनुभव हो तो फायदेमंद साबित हो सकता है। हर शल्य चिकित्सा टीम के लिए एडवांस्ड हेपेटोबिलरी सर्जरी में महत्वपूर्ण अनुभव वाले कम से कम दो शल्य चिकित्सक और सहायक सर्जनों की आवश्यकता होती है। शल्य चिकित्सा टीम में अत्यधिक कुशल और अनुभवी एनेस्थेटिस्टों, क्रिटिकल केयर चिकित्सकों और ट्रांसप्लांट हेपेटोलॉजिस्ट के समूह को रखा जाना चाहिए, और डायग्नोस्टिक और इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी, डायलिसिस और एंडोस्कोपी, इम्यूनोलॉजी, पैथोलॉजी, ट्रांसफ्यूजन, माइक्रोबायोलॉजी और उच्चतम गुणवत्ता की जैव रसायन सेवाएं चौबीसों घंटे उपलब्ध होनी चाहिए। रैपिड इंफ्युजर, सेल सेवर, नाॅन- इंवैसिव कार्डियक आउटपुट मॉनीटर, अल्ट्रासोनिक सर्जिकल एस्पिरेटर, आर्गन कोगुलेटर और ऑन-साइट लैबोरेट्री से सुसज्जित कम से कम दो अत्याधुनिक आपरेटिंग रूम होना आवश्यक हैं। आपरेशन के बाद, इंवैसिव माॅनीटरिंग, लैमिनार फ्लो और कुशल नर्सिंग स्टाफ के साथ एक आधुनिक गहन देखभाल सुविधा का होना भी आवश्यक है।
निष्कर्ष
एलडीएलटी भारत में डीडीएलटी के लिए आवश्यक बन गया है। लिवर प्रत्यारोपण की सार्वजनिक स्वीकृति को बढ़ावा देना भी आवश्यक है। इससे मृत दाता अंग दान को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है। हालांकि, एलडीएलटी केंद्रों के अनियमित प्रसार को रोकने के लिए एक अत्यंत सतर्क दृष्टिकोण को अपनाना आवश्यक है। एलडीएलटी करने के लिए केंद्रों को अनुमति देने से पहले प्रशिक्षण और सेट-अप के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानदंडों का पालन करना और बढ़ावा देना चाहिए और साथ ही परिणामों का आंतरिक और बाहरी आडिटिंग अनिवार्य किया जाना चाहिए। इनके अलावा, यदि एलडीएलटी से लगातार क्लिनिकल लाभ प्राप्त किए जाते हैं, तो जीवित दाता की सभी परिस्थितियों में सुरक्षा की जानी चाहिए। 


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दुर्लभ आनुवांशिक बीमारियां : लायसोसोमल स्टोरेज बीमारियों (एलएसडी) का प्रकोप भारत में ज्यादा क्यों है

लायसोसोमल स्टोरेज बीमारियां (एलएसडी) उन बीमारियों का समूह हैं जिनमें करीब 50 दुर्लभ आनुवांशिक बीमारियां शामिल हैं। ये बीमारियां शरीर की लायसोसोमल नामक कोशिकाओं के विशेष हिस्सों में एक एंजाइम की कमी के कारण उत्पन्न होती है। ये एंजाइम शरीर के बेकार पदार्थों को लायसोसोम्स में विघटित करते हैं। इस एंजाइम की कमी के कारण शरीर की कोषिकाओं में बेकार पदार्थ जमा होने लगते हैं जिसका प्रभाव अनेक अंगों पर पड़ता है जिससे शरीर का मानसिक और/अथवा मानसिक क्षय होने लगता है। 
इन जटिलताओं के कारण विकास में बाधा पड़ती है, गतिशीलता संबंधी समस्याएं होती है, दौरे पड़ते हैं, लीवर बड़ा हो जाता है, तिल्ली का आकार बढ़ जाता है, हड्डियों कमजोर हो जाती हैं तथा फेफड़े एवं हृदय संबंधी समस्याएं होती हैं। 
इस बात के मद्देनजर कि दिल्ली सरकार ने राज्य में एलएसडी से ग्रस्त मरीजों की संख्या का पता लगाने के लिए एक समिति गठित की है, यह वक्त की जरूरत है कि एक ऐसा कोश गठित हो तथा इन मरीजों का उपचार शुरू हो तथा पुनर्वास की सुविधाओं से सम्पन्न एक केन्द्र की तत्काल स्थापना हो। जरूरत इस बात की है कि राज्य के आनुवांशिक विशेषज्ञों तथा सरकारी अस्पतालों के परामर्श से इस दिशा मे संयुक्त प्रयास किए जायें क्यांकि हर साल दुर्लभ बीमारियों से ग्रस्त बच्चे मौत के ग्रास बन रहे हैं। उन्होंने कहा, ''ईएसआई, सशस्त्र बल, सावर्जनिक क्षेत्र के उपक्रमों एवं महाराष्ट्र सरकार ने देश भर में ऐसे 14 मरीजों को निःषुल्क चिकित्सा देनी शुरू कर दी है।''
सर गंगा राम अस्पताल में मेडिकल जेनेटिक्स के निदेशक डॉ. आई. सी. वर्मा ने इस विचार की पुष्टि करते हुए कहा कि ''दुर्लभ बीमारियों से काफी संख्या में पीड़ित लोगों के जीवन को बचाने और उनके जीवन में सुधार करने के लिए भारत में इन बीमारियों के लिए एक राष्ट्रीय योजना विकसित करने की तत्काल आवश्यकता है। डायग्नोस्टिक और प्रबंधन केंद्रों की स्थापना के साथ- साथ आम लोगों, चिकित्सकों और स्वास्थ्य प्रषासकों में जागरूकता पैदा करने के लिए एक निश्चित नीति बनाना आवश्यक है। इन केन्द्रों को इन बीमारियों की काउंसलिंग और रोकथाम में भी शामिल होना होगा।''
लायसोसोमल स्टोरेज डिसआर्डर जीवित जन्म लेने वाले 5000 में करीब एक बच्चे में होता है। अधिकतर एलएसडी को रोग विषिश्ट सहायक देखभाल उपायों के माध्यम से प्रबंधित किया जाता है। हालांकि, सात प्रकार के एलएसडी का अब एनजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपियों (ईआरटी) के माध्यम से इलाज किया जा सकता है। भारत में वर्तमान में एलएसडी के करीब 300-400 वैसे रोगी हैं जिनमें एलसीडी का इलाज किया जा सकता है।
डाॅ. वर्मा के अनुसार, ''भारत में 5 केन्द्रों में करीब 100,000 नवजात शिशुओं की स्क्रीनिंग पर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के द्वारा एक ताजा अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में पता चला कि मेटाबोलिज्म में जन्मजात गड़बड़ी (आईईएम) के मामले पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में काफी ज्यादा थे और भारत में हर साल आईईएम से पीड़ित लगभग 26,000 शिशु पैदा होते हैं। विषेश आहारों और दवाओं से समय पर उनका उपचार कर उनमें से कई को बचाया जा सकता है या उनकी मानसिक मंदता की रोकथाम की जा सकती है। भारत सरकार को एक प्राथमिकता के रूप में भारत में दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए अनुसंधानों और  उपचारों के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए एक आर्फन औषधि अधिनियम पारित करना चाहिए।'' 


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बिगड़ती जीवन शैली से बढ़ते स्ट्रोक के खतरे

हमारे देश में, अस्पतालों में भर्ती होने वाले पहली बार स्ट्रोक के शिकार होने वाले लगभग पांच में से एक रोगी 40 साल या उससे कम उम्र के होते हैं। कम उम्र में ही धूम्रपान करने, सिस्टोलिक हाइपरटेंशन से पीड़ित होने, फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज के स्तर के अधिक होने, और उच्च घनत्व वाले लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल के कम होने के जैसे कारणों से कम उम्र में ही स्ट्रोक का खतरा बढ़ गया है। जागरूकता की कमी, साक्षरता की कम दर और खराब प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं इसके लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार हैं। ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी इलाकों में स्ट्रोक होने की दर अधिक है।
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में हाल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार खान-पान की खराब आदतें और व्यायाम की कमी स्ट्रोक के किसी भी अन्य जोखिम कारक की तुलना में प्रमुख जोखिम कारक हैं।
स्ट्रोक तब होता है जब मस्तिष्क की रक्त आपूर्ति अवरुद्ध हो जाती है या रक्त वाहिका फट जाती है, जिसके कारण मस्तिष्क को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है और मस्तिष्क कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है या इनकी मौत हो जाती हैं। दुनिया भर में हर साल, लगभग डेढ़ करोड़ लोगों को स्ट्रोक होता है। इनमें से 60 लाख लोगों की मौत हो जाती है और 50 लाख लोग स्थायी रूप से विकलांग हो जाते हैं, जिससे कारण स्ट्रोक विकलांगता का दूसरा प्रमुख कारण बन गया है।
दुनिया भर में स्ट्रोक के प्रमुख जोखिम कारकों में उच्च रक्तचाप, फलों का कम सेवन, शरीर द्रव्यमान सूचकांक (बीएमआई) का अधिक होना, सोडियम का अधिक सेवन, धूम्रपान, सब्जी का कम सेवन, वायु प्रदूषण, घरेलू प्रदूषण, साबुत अनाज का कम सेवन, और उच्च रक्त शर्करा शामिल है।
देश के कुछ हिस्सों में, पुरुषों की तुलना में महिलाओं को स्ट्रोक होने का खतरा पांच गुना अधिक होता है। इसके लिए खराब सामाजिक आर्थिक स्थिति और महिलाओं में कम साक्षरता दर जिम्मेदार है। विकासशील देशों (भारत) में स्ट्रोक वाले मरीजों की औसत आयु अमेरिका जैसे विकसित देशों की तुलना में 15 वर्ष कम है।
उच्च रक्तचाप - स्ट्रोक का प्रमुख कारण
अफसोस की बात है कि भारतीय उच्च रक्तचाप और स्ट्रोक के अन्य जोखिम कारकों के प्रति अधिक संवदेनशील हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि ब्रिटेन की तुलना में भारत में स्ट्रोक से संबंधित मौतें अधिक होती हैं। 
उच्च रक्तचाप स्ट्रोक के लिए अकेला सबसे बड़ा जोखिम कारक है, और ब्लाॅकेज (इस्कैमिक स्ट्रोक) के कारण लगभग 50 प्रतिशत स्ट्रोक होते हैं। यह मस्तिष्क में रक्तस्राव के खतरे को भी बढ़ाता है जिसे हेमोरेजिक स्ट्रोक कहा जाता है। हालांकि उच्च रक्तचाप दिल के दौरे का खतरा बढ़ा सकता है और अन्य अंगों के क्षति पहुंचा सकता है, लेकिन इसका सबसे विनाशकारी प्रभाव स्ट्रोक के रूप में देखा जा सकता है।
उच्च रक्तचाप मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं सहित आपके शरीर में सभी रक्त वाहिकाओं पर स्ट्रेस पैदा करता है। इसके कारण, रक्त परिसंचरण को जारी रखने के लिए आपके दिल को बहुत कठिन काम करना पड़ता है। यह स्ट्रेस आपके रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है, जिसके कारण वे कठोर और संकुचित हो जाती है। यह स्थिति एथरोस्क्लेरोसिस कहलाती है। इससे अवरोध होने की संभावना बढ़ जाती है, जो स्ट्रोक या ट्रांजिएंट इस्कीमिक अटैक (टीआईए, कभी-कभी मिनी स्ट्रोक भी कहा जाता है) का कारण बन सकता है।
उच्च रक्तचाप और स्ट्रोक के खतरे के बीच मजबूत संबंध है, और रक्तचाप जितना अधिक होगा, स्ट्रोक होने का खतरा उतना ही अधिक होगा। हमने अपने अनुभव में पाया है कि स्ट्रोक के रोगियों में सबसे आम जोखिम कारक यही है। उच्च रक्तचाप रक्त वाहिकाओं के ''बैलूनिंग'' के खतरे को बढ़ा सकता है जिसे एन्यूरिज्म कहा जाता है जो बड़े पैमाने पर ब्रेन हैमरेज पैदा कर सकता है।
सलाह - रोजाना एक घंटे तक तेज चलने और नमक के सेवन को 2 ग्राम प्रति दिन कम करने पर आपके रक्तचाप को कम करने में मदद मिल सकती है।
सभी स्ट्रोक में से 50 प्रतिशत से अधिक स्ट्रोक को रक्तचाप को नियंत्रित करके रोका जा सकता है।
वायु प्रदुषण
हैरानी की बात है कि वायु प्रदूषण हमारे देश में स्ट्रोक का एक प्रमुख कारण है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि स्ट्रोक से जुड़ी लगभग 30 प्रतिशत विकलांगता का संबंध वायु प्रदूषण से है, जो विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में विशेष रूप अधिक है। विकासशील देशों में यह 33.7 प्रतिशत और विकसित देशों में 10.2 प्रतिशत है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, भारत में सालाना 43 लाख लोगों की घरेलू वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने के कारण मौत हो जाती है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में, भारत में स्ट्रोक के घातक परिणाम दूसरे स्थान पर है। पहले स्थान पर उच्च रक्तचाप है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में, 30 करोड़ से अधिक लोग अपने घरों में खाना पकाने या अपने घरों को गर्म करने के लिए पारंपरिक स्टोव या खुली आग का उपयोग करते हैं जिनके लिए वे ठोस ईंधन (कोयले, लकड़ी, चारकोल, फसल अवशेष) आदि का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह के हानिकारक प्रथाओं में बहुत अधिक घरेलू प्रदूषण होता है जिसमें सूक्ष्म कण और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे प्रदूशक होते हैं। इसके कारण विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य रोग होते हैं।


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बिनाइन ट्यूमर की जांच आम तौर पर गलत होती है, जबकि साइबरनाइफ की मदद से इसका बेहतर उपचार संभव है

42 वर्षीय राहुल एक साल से अधिक समय से दाहिने कंधे में उभार महसूस कर रहे थे। हालांकि वे इसे एक मामूली समस्या मानकर इसकी अनदेखी कर रहे थे। उन्होंने इस पर तब ध्यान दिया जब इसके लक्षण लगातार बढ़ने लगे और इसके कारण उनकी दैनिक गतिविधियों में परेशानी आने लगी। उन्होंने पाया कि उनका उभार तेजी से बढ़ रहा है। जब उन्होंने एक विशेषज्ञ से परामर्श करने का फैसला किया, तो ज्यादातर डॉक्टरों ने सर्जरी करने की सलाह दी, जबकि कई अन्य डाॅक्टरों ने कहा कि यह कैंसर हो सकता है। निराश होकर, उन्होंने कीमोथेरेपी और सर्जरी से बचने के लिए सेकंड ओपिनियन लेने का फैसला किया। बेहतर निदान के लिए, रोगी आर्टेमिस अस्पताल, गुरुग्राम गया। वहां अल्ट्रासाउंड किया गया क्योंकि अन्य तरीकों से इसकी पहचान करना मुष्किल था। अल्ट्रासाउंड की मदद से पता चला कि ट्यूमर दूधिया सफेद रंग का था और बढ़ रहा था।
उचित जांच रिपोर्टों से पता चला कि लिम्फ नोड्स ठोस से द्रव पिंड में परिवर्तन हो गया था और प्रभावित क्षेत्र में त्वचा की ताजा वृद्धि देखी गयी। आगे और भी रक्त परीक्षणों से कैंसर रहित ट्यूमर कोशिकाएं और इंफ्लामेटरी कोशिका की प्रतिक्रिया का खुलासा हुआ। टीम ने साइबरनाइफ उपचार करने का फैसला किया जो कि नाॅन-इंवैसिव है और इस तरह के ट्यूमर के लिए उपयुक्त है। किसी भी दुष्प्रभाव के बिना, रोगी को पूरी तरह से इलाज किया गया और उसी दिन अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। रोगी नियमित पोस्ट-ऑपरेटिव चेक-अप के लिए 2 सप्ताह से अधिक समय तक अस्पताल आता रहा। अब वह पूरी तरह से स्वस्थ है और परेशानी मुक्त जीवन जी रहा है।
कैंसर रहित ट्यूमर क्या है?
कैंसर रहित ट्यूमर या बिनाइन ट्यूमर ट्यूमर कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि होती हैं जो संख्या में तेजी से बढ़ती नहीं हैं और आस-पास के ऊतकों में नहीं फैलती हैं। अगर ऐसे ट्यूमर का इलाज नहीं किया जाता है तो ये ऐसे ट्यूमर गंभीर समस्या पैदा कर सकते हैं। लेकिन इलाज से इसके ठीक होने की आम तौर पूरी संभावना होती है। ट्यूमर को एक बार हटा देने के बाद, ऐसी कोशिकाओं के पुनः विकास की संभावना लगभग शून्य होती है। ऐसे सभी ट्यूमर घातक नहीं होते हैं, लेकिन समय पर इलाज नहीं होने पर इनके कैंसरजन्य होने की संभावना बहुत अधिक होती है।
कैंसर रहित ट्यूमर के प्रकार
— एडेमोना - ये सबसे आम प्रकार के बिनाइन ट्यूमर हैं जो ग्रंथियों की पतली एपिथेलियल परत से उत्पन्न हो सकते हैं। ऐसे ट्यूमर सबसे अधिक लिवर, पिट्यूटरी ग्रंथियां, थायराइड ग्रंथियां, कोलन या गर्भाशय गुहा में पॉलीप्स में होते हैं।
— फाइब्रॉएड - ऐसे ट्यूमर किसी भी अंग के संयोजी ऊतकों में बढ़ सकते हैं। इस तरह के ट्यूमर को कैंसरजन्य बनने से रोकने के लिए इन पर तत्काल ध्यान देने और उचित उपचार की आवश्यकता होती है।
— हेमांजिओमा - जब रक्त वाहिका कोशिकाएं त्वचा या अन्य अंदरूनी अंगों में बनती हैं, तो इसे हेमांजिओमा कहा जाता है। यह अक्सर सिर, गर्दन और धड़ क्षेत्र में होता है और लाल या नीली रंग के रूप में दिखाई देता है। इसके कारण जब रोगी को देखने, सुनने या चलने-फिरने में कठिनाई होती है तो ऐसे मामलों में सर्जरी करना आवश्यक हो सकता है।
— लिपोमा - यह वयस्कों में पाया जाने वाला सबसे आम प्रकार का बिनाइन ट्यूमर है जो वसा कोशिकाओं से बढ़ता है और यह गर्दन, कंधे और पीठ में होता है। ये स्पर्श करने पर आम तौर पर मुलायम होते हैं, इधर-उधर फिसलते हैं और धीरे-धीरे बढ़ते हैं। इसमें तेजी से वृद्धि होने या दर्द होने पर इस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि इसके कारण आगे होने वाली जटिलताओं को रोका जा सके।
साइबरनाइफ - बिनाइन ट्यूमर के लिए सबसे अच्छा विकल्प
साइबरनाइफ विकिरण सर्जरी कैंसरजन्य और कैंसर रहित ट्यूमर के इलाज के लिए उपलब्ध सबसे उन्नत और नाॅन-इंवैसिव विकिरण चिकित्सा है। इसमें अधिक मात्रा वाली विकिरण की सटीक बीम का इस्तेमाल किया जाता है। यह ऐब्लेटिव मात्रा प्रदान करने के लिए सबसे अच्छा विकल्प है और सर्जरी से चिकित्सा के लिए एक वैध विकल्प है। नाॅन-इंवैसिव होने के कारण, इसमें किसी भी प्रकार से रक्त की हानि नहीं होती है जिसके कारण रोगी को एनेस्थिसिया देने की जरूरत नहीं पड़ती है। यहां तक कि जब पारंपरिक उपचार विफल हो जाते हैं, तब साइबरनाइफ पारंपरिक विकिरण को बढ़ावा देकर सर्जरी के बाद और बार- बार होने वाले मामलों में भी प्रभावी होता है।
साइबरनाइफ रेडिएशन थेरेपी 3 सेंटीमीटर तक के आकार वाले ट्यूमर के लिए सबसे अधिक कारगर साबित होती है और शुरुआती चरण, प्राथमिक, चिकित्सकीय रूप से अक्षम ट्यूमर वाले मरीजों के लिए बहुत ही शक्तिशाली और सटीक तकनीक है। इससे इलाज करना पूरी तरह से सुरक्षित है और शरीर में बार-बार होने वाली बीमारी या षरीर में एक बीमारी वाले मरीजों में एक नया विकल्प भी प्रदान करता है। इससे इलाज में कोई दर्द नहीं होता है और इसके कोई जोखिम भी नहीं हैं। इससे इलाज डे-केयर में ही हो जाता है और सेशन के खत्म होने के बाद जल्द ही रोगी को अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है और इसके कारण रोगी को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं होती है। इससे इलाज के तहत रोगी के ट्यूमर पर विकिरण की उच्च मात्रा की किरणें सीधे डाली जाती है और इसके लिए एक परिष्कृत छवि मार्गदर्शन प्रणाली का उपयोग किया जाता है।
एम 6 - साइबरनाइफ को ट्यूमर के आसपास के ऊतक को क्षति पहुंचाए बगैर ही यहां तक कि शरीर में कहीं भी मूव करने वाले ट्यूमर तक बिल्कुल सही और सटीक मात्रा में विकिरण देने के लिए डिजाइन किया गया है। यही विशेषताएं इसे किसी भी बिनाइन ट्यूमर का इलाज करने के लिए एक आदर्श उपचार विकल्प बनाती है।
बिनाइन ट्यूमर आमतौर पर एक डे-केयर प्रक्रिया होती है जिसके उपचार में मुश्किल से एक घंटा लगता है और उसके बाद रोगी बिना किसी परेशानी के अपनी दैनिक गतिविधियां फिर से करने के लिए तैयार होता है। इससे इलाज में किसी भी अन्य पारंपरिक उपचार के समान ही खर्च आता है। यह प्रक्रिया दर्द रहित और प्रकृति में नाॅन-इंवैसिव भी है, साथ ही रोगी की रिकवरी भी जल्द होती है।


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